Wednesday, January 20, 2021

लोरी के बहाने : गोपाल बाबू गोस्वामी और नरेन्द्र सिंह नेगी जी

बचपन में माँ, दादी-नानी से सुने गीतों(लोरियों) की कुछ अस्पष्ठ पंक्तियां आज भी दिल की अतल गहराइयों में तैर रही है। आगे चलकर रेडियो और फिल्मी पर्दे पर गाई गई लोरियों के प्रति आकर्षण बढ़ा, संगीत और मधुर स्वर से सजी वे दिल को छू जाती। कुछ लोरियों के आज भी मुखड़े ही नहीं दो चार पंक्तियां भी याद है; 
यशोदा का नन्द लाला, बृज का उजाला है..., मेरा चन्दा है तू मेरा सूरज है तू...., आजा निन्दिया आजा नैनन बीच समा जा...., राम करे ऐसा हो जाये मैं जागूं तू सो जाये...., चन्दा ओ चन्दा किसने चुराई तेरी..... आदि आदि।

 उत्तराखण्ड के दो महान सितारे गोपाल बाबू गोस्वामी और नरेन्द्र सिंह नेगी ने गीत, संगीत व गायन की दुनिया में नये आयाम स्थापित किये हैं। उत्तराखण्डी समाज में कोई विरला ही होगा जिन्हें इनके गीत उद्वेलित और आलोड़ित नहीं करते होंगे। दोनों महान विभूतियों की दो पृथक लोरियां भी अपने समय, समाज और परिवेश को अभिव्यक्त करती है। शब्दरूप में ये लोरियां प्रभाव छोड़ने में भले ही असफल हों किन्तु जब दर्द भरी लरजती आवाज में इन लोरियों को सुनें तो मन भावुकता के गहरे समुन्दर में गोते लगाने लगता है और आँखों में बादल उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं।
 
- गोपाल बाबू गोस्वामी - नानि-भौ भुखै डाड़ मारी वे.....
(जंगल गई माँ के देर शाम तक न लौटने पर भूख से व्याकुल दूध पीते बच्चे को छाती से लगाकर उसका पिता बच्चे को लोरी गाते हुए चुप कराने का प्रयास करता है। वास्तविकता में वह अपने को भी दिलासा देता सा प्रतीत होता है।)
 
नानि-भौ भुखै डाड़ मारी वे हो हीरू घर ऐजा वै,
घाम ओछैगौ पड़ी रुमुकी हो सुवा घर ऐजा वै। 
नानि-भौ भुखै डाड़ मारी वे.....।
 
चुप्प चुपै जा मेरी लाड़ली, झिट्ट घड़ी में आली इजुली,
मेरी पोथिली दूध पिवाली हो हीरू घर ऐजा वै।
नानि-भौ भुखै डाड़ मारी वे.....।
 
बण घस्यारी घर ऐ गई मेरी सुवा जाणी कां रै गई,
चुप्प चुपै जा मेरी लाड़ली, तेरी इजू घर ऐ जाली।
नानि-भौ भुखै डाड़ मारी वे.....।
 
उडै़ने तारा चाड़ पोथीला डायी बोट्यूं में बै गैई घोल,
आज ले किलै नि आई इजू ओ सुवा घर ऐजा वै।
नानि-भौ भुखै डाड़ मारी वे.....।
 
उखौउ कुटी पाणी लै गई, चेली बेटीआ बौड़ी बि राई,
मेरी सुवा तु किलै नि आई, मन बेचैन म्यरू हैगो वे हो हीरू घर ऐजा वे।
नानि-भौ भुखै डाड़ मारी वे.....।
 
बाटा-घाटा में जाणि कां होली, मेरी रूपसी मेरी घस्यारी,
नानि भाउ कै कसि चुपौनू, हे भगवान के धन कौंनू,
चेलि लछिमा भूख लागिगे हो हीरू घर ऐजा वे।
नानि-भौ भुखै डाड़ मारी वे.....।
 
 
- नरेन्द्र सिंह नेगी - हे मेरी आंख्यूंका रतन......
(दूधपीते बच्चे का सुबह जल्दी उठ जाने पर अकेली माँ घर में बिखरे काम को न समेट पा सकने से खीझ उठती है और बच्चे को सुलाने के बहाने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए एक पूरा खाका ही खींच देती है।)
 
हे मेरी आंख्यूंका रतन बाळा स्ये जादी,
दूधभाति द्योलु त्वेथैन बाळा स्ये जादी।
हे मेरी आंख्यूंका रतन.....।
 
मेरी औंखुड़ि-पौंखुड़ि छई तू मेरी स्याणी छै गाणी,
मेरी जिकुड़ि-बुकुड़ि ह्वेल्यू रे स्येजा बोल्यूं माणी,
ना हो जिदेरू न हो बाबु जन बाळा स्ये जादी।
हे मेरी आंख्यूंका रतन.....।
 
तेरी गुन्दक्याळी हात्यूंकि मुठ्यूंमां मेरा सुखि दिन बुज्यांन,
तेरी टुरपुरि तौं बाळी आंख्यूंमा मेरा सुपिन्या लुक्यांन,
मेरी आस सांस त्वेमा हि छन बाळा स्ये जादी।
हे मेरी आंख्यूंका रतन.....।
 
हे पापी निन्दरा तु कख स्येईं रैगे आज,
मेरि भांडि-कुंडी सुंचिणी रैग्येनी घर-बणो काम-काज,
कबतैं छंट्योलु क्य कन्न क्य ब्वन्न बाळा स्ये जादी।
हे मेरी आंख्यूंका रतन.....।
 
घतसारि सारिकि पाणी ल्हैगेनी पंदेरों बटी पंदेनी,
बणु पैटि ग्येनि मेरि धौड़्या-दगड़्या लखड़्वैनी-घसेनी,
क्या करू क्या नि करू जतन बाळा स्ये जादी।
हे मेरी आंख्यूंका रतन.....।
 
घरबौड़ु नि ह्वायु जु गै छौ झुरैकी मेरी जिकुड़ी,
बिसरी जांदू वीं खैरी बिपदा हेरीकी तेरी मुखड़ी,
समळौ ना वो बत्थ वो दिन बाळा स्ये जादी।
हे मेरी आंख्यूंका रतन.....।

Saturday, January 16, 2021

- जयन्ती पर विशेष - मूर्धन्य साहित्यकार मोहनलाल नेगी(साक्षात्कार)

गढ़वाली भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार मोहनलाल नेगी जी का नब्बे वर्ष की आयु में 26 अक्टूबर 2020 को निधन हो गया। जयश्री सम्मान, केदारखण्ड सांस्कृतिक सम्मान, हिन्दी गौरव सम्मान, श्रीदेव सुमन संस्कृति सम्मान, चिट्ठी सम्मान व आखर सम्मान से सम्मानित नेगी जी के दो गढ़वाली कहानी संग्रह(जोनि पर छापु किलै और बुरांस की पीड़), एक गढ़वाली उपन्यास(सुनैना) और एक संस्मरणात्मक पुस्तक(यादों की गलियां) प्रकाशित हुई है।
    इधर कुछ वर्षो से मेरा उनसे निरन्तर मिलना व टेलीफोनिक संवाद होता रहता था। बातचीत के दौरान प्रायः गढ़वाली मुहावरा कहना और फिर टहाके मारकर हँसना उनकी अदम्य ऊर्जा व जीवन्तता का परिचायक था। यह साक्षात्कार मेरे द्वारा उनकी मृत्यु से लगभग एक वर्ष पूर्व उनके नई टिहरी स्थित आवास पर लिया गया था।

शूरवीर रावत- आपके जन्म, जन्मस्थान और परिवार का संक्षिप्त विवरण?
मोहन लाल नेगी- मेरा जन्म ग्राम- बेलग्राम(नेग्याणा तोक), पट्टी- अठूर, टिहरी, टिहरी गढ़वाल में श्रीमती मायामती व श्री इन्द्र सिंह नेगी के घर बसन्त पंचमी, 23 जनवरी 1930 को हुआ। हम दो बहनें व चार भाई थे। मेरे पिता कृषि के साथ-साथ गांव के पास ही दुकानदारी करते थे और माँ एक गृहणी थी।

शूरवीर रावत- आपकी प्रारंभिक शिक्षा कहाँ हुई? छात्र जीवन में आप सबसे अधिक किस शिक्षक से प्रभावित हुए?
मोहन लाल नेगी- मुझे अक्षर ज्ञान घर में ही चौकले पर, जिसे ‘धुळेटु’ कहते थे, कराया गया और फिर स्लेट-खड़िया पर बारहखड़ी सीखी। खड़िया से बड़ी सुविधा होती थी लिखो और मिटा दो। स्कूल में दाखिले से पूर्व मैंने कभी कलम दवात के दर्शन नहीं किए। प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई इसलिए अंका-दोणा और छुट्टी के समय पहाड़े/कोठे (एक एकाम एक, एक दोणे दो..) बोलने का अवसर मुझे नहीं मिला। जिस कारण मैं गणित में कमजोर रहा, फलस्वरूप हाईस्कूल के बाद मैंने गणित विषय से पल्ला झाड़ दिया।
    घर में चौकले व स्लेट पर ही हिंदी व अंग्रेजी का अक्षर ज्ञान प्राप्त करने के बाद मैं सीधे एकदम अंग्रेजी स्कूल यानि प्रताप हाई स्कूल में तीसरी क्लास में भर्ती हो गया। तीसरी से छठी कक्षा तक हम फर्श पर टाटपट्टी बिछाकर पढ़ते थे। सातवीं में ही कुर्सियों पर बैठने को मिलता था इसलिए जल्दी से जल्दी सातवीं कक्षा में पहुंचने को लालायित रहते थे, जिससे कुर्सी पर बैठ सके। तब टिहरी में दो स्कूल ही थे, एक हिंदी मीडियम का मिडिल ‘हेविट स्कूल’ जिसकी स्थापना हेविट नामक अंग्रेज ने की थी। हिन्दी मीडियम होने के कारण उसे हेविट पाठशाला भी कहते थे। उसके प्राचार्य पण्डित भोला दत्त शास्त्री थे, उनका लड़का जयकृष्ण था।
    बहुत कुछ बड़ों की संगति में सीखा। बड़े भाई साहब और दूसरे उनसे छोटे जो इंग्लिश टीचर थे, से सीखने को मिला। उनके सानिध्य में रहने के कारण मैंने स्कूल में दाखिले से पहले ही अंग्रेजी का बहुत कुछ ज्ञान हासिल कर लिया था। यही कारण था कि मैंने सातवीं कक्षा में ही बड़े भाई जगदीश्वर नेगी, जो उस समय मेरठ कॉलेज में पढ़ते थे, को अंग्रेजी में पत्र लिखा, जिससे वे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने भी मुझे अंग्रेजी में ही उत्तर दिया।
    हमारे परिवार में अंग्रेजी पर लगभग सबकी अच्छी पकड़ रही, विशेषतः टिहरी के स्टैंडर्ड से। भाई श्यामचन्द नेगी ने इण्टरमीडिएट, बी.ए. व जेडी(डिप्लोमा इन जर्नलिज्म) इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया और तत्कालीन वायस चांसलर डॉ. अमरनाथ झा के वे चहेते विद्यार्थी थे। उनकी पुस्तक ‘English Pronounciation’ पर डॉ0 झा की संक्षिप्त भूमिका है। अंग्रेजी पर भाई श्यामचन्द नेगी की पकड़ देखकर महाराजा नरेंद्र शाह कहते थे कि ‘यै छोरा सणी इथगा सुंदर अंग्रेजी कखन औन्दि होलि?’ भाई श्यामचन्द जी ने सन् 1940-44 में अंग्रेजी में एक पुस्तक और लिखी Some Eminent Garhwalis जो अब उपलब्ध नहीं है। वे स्वतंत्रता सेनानी थे और श्रीदेव सुमन तथा भैरव दत्त धूलिया (सम्पादक-कर्मभूमि) के साथ सेंट्रल जेल आगरा में भी रहे। देहरादून में पत्रकार के रूप में उनकी प्रतिष्ठा थी और अंग्रेजी के राष्ट्रीय अखबारों नेशनल हेराल्ड, इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स जैसे पत्रों में संवाददाता रहे। उनकी शागिर्दी में ही परिपूर्णानंद पैन्यूली जी ने पत्रकारिता में कदम रखा था। कांग्रेस वर्किंग कमेटी के रूप में भी भाई श्यामचंद अग्रणी  किन्तु कांग्रेस के पथभ्रष्ट होने के कारण उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का दामन थाम लिया और एक पार्टी प्रत्याशी के तौर पर उन्होंने राजमाता कमलेन्दुमति शाह और राजा मानवेंद्र शाह के विरुद्ध लोकसभा चुनाव भी लड़ा। देहरादून से गढ़वाली भाषा में उन्होंने एक अखबार भी निकाला जिसकी पहचान ‘टीर्याळी’ (टिहरी की) भाषा के लिए अधिक हुई।
    प्रताप हाई स्कूल में तीसरे दर्जे से हाईस्कूल तक की पढ़ाई होती थी। हाईस्कूल की परीक्षा का केंद्र श्रीनगर गढ़वाल रहता था। मेरे भाई जगदीश्वर नेगी ने श्रीनगर केन्द्र से ही हाईस्कूल परीक्षा पास की थी। उस वर्ष हाईस्कूल में छब्बीस विद्यार्थी थे जिनमें केवल आठ ही पास हो पाए, जिनमें भाई भी एक थे। भाई साहब ने इण्टर 1942 में डीएवी कॉलेज, देहरादून और बी.ए. और एल. एल. बी. मेरठ कॉलेज(आगरा यूनिवर्सिटी) से किया। डीएवी कॉलेज देहरादून में तब बी. ए. की कक्षाएं नहीं चलती थी।
     मेरे नौवीं तक पहुंचते-पहुंचते प्रताप हाईस्कूल अपग्रेड होकर प्रताप इण्टर कॉलेज हो गया था। मैंने हाईस्कूल सन 1948 और इण्टर 1950 में वहीं से किया और आगे की पढ़ाई बी.ए. व एल.एल.बी. डी.ए.वी. कॉलेज देहरादून से। अर्थात मैंने अपने जीवनकाल में केवल दो ही विद्यालय देखे। डॉ0 महावीर प्रसाद गैरोला जी द्वारा प्रोत्साहित करने पर इण्टर कक्षा में मैंने एक विषय लॉजिक अर्थात तर्कशास्त्र लिया। वे शिक्षक थे और एकमात्र विद्यार्थी था मैं। डॉक्टर गैरोला, एम.ए.(दर्शनशास्त्र), एल.एल.बी., पी.एच.डी. व डी.लिट. की डिग्रीधारक थे। उनके पिता माया दत्त लाहोर में टिहरी के राजकुमारों अर्थात बालेन्दु शाह और शार्दुल विक्रम शाह के संरक्षक थे जिससे महावीर प्रसाद जी को भी उनके साथ वहाँ पढ़ने का मौका मिल गया। आगे की पढ़ाई उन्होने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से की। मुझे भी उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद जाने को कहा था। इलाहाबाद की पढ़ाई का स्तर निसंदेह अच्छा था, उसकी उपमा इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज से की जाती थी। पर मैं उच्च शिक्षा के लिए देहरादून ही गया और टिहरी के पास होने पर भी मुझे देहरादून में घर की बहुत याद सताती रही, जिससे वहीं पढ़ाई के चार साल निकालने मुश्किल हो गए थे। मैं बहुत भावुक जो था।
    प्रताप इण्टर कॉलेज, टिहरी के अध्यापकों मंे मैं सबसे अधिक जिनसे प्रभावित हुआ वे थे वाइस प्रिंसिपल जगदीश प्रसाद रस्तोगी, जिनके ससुर गंगा प्रसाद एक प्रतिष्ठित चीफ जज थे। रस्तोगी गुरूजी को जब हम प्रणाम करते तो वे दांत बाहर दिखाते हुए मुस्कुराकर प्रणाम स्वीकारते थे। एक और रस्तोगी गुरूजी थे जो बड़े परिश्रम और तन्मय होकर हमें भूगोल पढ़ाते थे। मुजफ्फरनगर के रहने वाले ब्रह्मदत्त शर्मा जी से भी मैं बड़ा प्रभावित था, वे बड़े परीश्रमी और एक आदर्श अध्यापक थे। गवर्नमेंट रॉबर्ट कॉलेज, लाहौर के पढ़े हुए भगवंत राय प्रिंसीपल- प्रताप इण्टर कॉलेज ने भी मुझे प्रभावित किया। भगवंत राय पंजाबी थे और बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे। रॉबर्ट कॉलेज लाहौर में आज के दिन देहरादून के दून स्कूल की तरह अक्सर बड़े-बड़े बड़े घरों के लड़के ही पढ़ते थे, भगवंत राय भी वहीं पढ़े थे। अंग्रेजी पर उनकी पूरी पकड़ थी। उनका उच्चारण काबिले तारीफ था।
    डॉ0 महावीर प्रसाद गैरोला अंतरिम सरकार के समय प्रताप इण्टर कॉलेज में नियुक्त हुए थे, वे बड़ी मेहनत से पढ़ाते थे। पर कुछ समय बाद एक कम्युनिष्ठ होने के झूठे आरोप में मुरादाबाद स्थानांतरित कर दिए गए थे जिससे खिन्न होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और टिहरी कोर्ट में वकालत शुरु कर दी। छः महीने की ट्रेनिंग के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट से मुझे भी वकालत करने का सर्टिफिकेट इश्यू हो गया तो मैं भी टिहरी कोर्ट वकालत करने लगा। इस प्रकार डॉक्टर गैरोला का सानिध्य मुझे फिर से प्राप्त हुआ।

शूरवीर रावत-  रोजगार के लिए आपने वकालत पेशे को चुना। यह मात्र संयोग था या बैरिस्टर बनने की ठान रखी थी?
मोहन लाल नेगी- बड़े भाई जगदीश्वर सन् 1946 में लॉ करके टिहरी आ गए थे। ताऊ जी के लड़के भाई श्यामचंद जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के कारण राजशाही के खिलाफ थे, जिससे भाई जगदीश्वर जी को भी टिहरी में वकालत का लाइसेंस मिलने में दिक्कत हुई। 14 जनवरी 1948 को सेना ने प्रजामंडल के आगे आत्मसमर्पण कर दिया, महाराजा नरेंद्र शाह को टिहरी पुल से ही वापस जाना पड़ा, रियासत पर महाराजा की पकड़ छूट गई और टिहरी राज्य शासन की बागडोर प्रजा के हाथ में आ गई। सन् 1949 में टिहरी राज्य का भी अन्य देसी रियासतों की भांति भारतीय गणराज्य में विलय हो गया। तत्पश्चात अंतरिम सरकार से ही भाई साहब को वकालत का लाइसेंस मिला पर इसी बीच अंतरिम सरकार से उन्हें परगना अधिकारी पद का नियुक्ति पत्र मिला पर वे योगदान देते इससे पहले ही कुछ विशिष्ठ लोगों के चलते उनके स्थान पर शंभूशरण जोशी को परगना अधिकारी नियुक्त कर दिया गया और भाई को डिस्ट्रिक इलेक्शन ऑफिसर पद पर नियुक्ति आदेश, जिसे अस्वीकार कर वे वकालात में आ गए।
    भाई वकील थे हीे मैं भी वकालत में आ गया। राजनीति व फिल्मों में जिस प्रकार परिवारवाद है ठीक वैसे ही मैं भी इस पेशे में आ गया। हमारे परिवार की ही नहीं यह परिपाटी टिहरी में अन्य परिवारों में भी चली आ रही है। वीरेन्द्र दत्त सकलानी जी के दादा और पिताश्री वकील थे। उनके छोटे भाई पूर्व विधायक लोकेन्द्र दत्त सकलानी व शैलेंद्र दत्त सकलानी और उन भाईयों के पुत्र भी जयेन्द्र दत्त सकलानी, भारत सकलानी आदि भी आज वकील पेशे में है। गढ़वाली मुहावरा है ‘जख अगलु गोरु बाट वखि पिछल्यु गोरु बाट’। नौकरी के लिए कोई भाग दौड़ मैंने नहीं की इसलिए भी। दूसरी बात यह कि वकालत पेशे की तब बहुत गरिमा थी जो धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है, व्यवसाय के उच्च मानदंड मिटते जा रहे हैं और मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अब यह केवल रोजी-रोटी के व्यवसाय में तब्दील हो गया। वकील न्याय के मंदिर का पुजारी न होकर पैसा कमाने की मशीन बन गया है।
     यह बड़े गौरव की बात है कि टिहरी की न्यायिक प्रणाली बहुत उच्च कोटि की थी, वह ‘नेचुरल जस्टिस’ के सिद्धांतों पर आधारित थी। जिसका एक स्वर्णिम पहलू यह था कि वादीकारी को वकील रखने की अनुमति हाईकोर्ट से लेनी पड़ती थी। अनुमति तो मिल ही जाती थी, देखा केवल यह जाता था कि वादीकारियों में कोई स्त्री तो नहीं है। यदि उसका पक्ष रखने वाला कोई वकील है तो दूसरे पक्ष को भी वकील रखने की अनुमति मिल जाती थी। किन्तु यदि पहले पक्ष की तरफ से कोई वकील न हो तो दूसरे पक्ष को भी वकील रखने की अनुमति नहीं मिलती थी। यह उच्च कोटि के न्यायिक सिद्धांत पर आधारित नियम था। इलाहाबाद हाईकोर्ट और बाद में उत्तराखंड हाईकोर्ट से जितने भी जज लोग टिहरी आते थे तो उनके वेलकम ऐड्रेस में मैं टिहरी रियासत के उक्त ‘ Golden rule of the judicial system of the eastwhile Tehri Garhwal Estate*’ का जिक्र करना नहीं भूलता था और विजिटिंग जज प्रभावित हुए बिना न रहते।
    दूसरा गोल्डन रूल यह था कि एक कृषि प्रधान गरीब क्षेत्र होने के कारण टिहरी गढ़वाल के किसानों को अपनी भूमि बेचने पर प्रतिबंध था। ताकि वह पैसे के लालच में आकर भूमिहीन होकर भूखा न मरने पायेे। कृषि के अलावा जीवन यापन का अन्य साधन न होने से भूमि विक्रय पर पाबंदी लगा दी गई थी। केवल कुछ अपवाद स्वरूप नियम थे जैसे गरीब किसान को बच्चों के पालन-पोषण, कन्यादान व किसी अपने के अन्तिम संस्कार करने के लिए या फिर निसन्तान किसान को कुछ शर्तो के साथ भूमि विक्रय का अधिकार था।
    टिहरी का जूडिशियल सिस्टम उच्च कोटि का इसलिए भी माना जाता था कि टिहरी में इंग्लैंड की तरह हाईकोर्ट से भी ऊपर एक और शीर्ष कोर्ट थी, जिसे ‘प्रीवी काउंसिल’ कहते थे अर्थात ‘वन मैन प्रीवी काउंसिल’ थी। जिसके जज यूपी के तत्कालीन एडवोकेट जनरल डॉक्टर एन. पी. अस्थाना थे जो दो-दो, तीन-तीन महीने में टिहरी आकर हाईकोर्ट के फैसलों के विरुद्ध अपील सुनते थे। डॉक्टर अस्थाना के पुत्र के. बी. अस्थाना भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहे। सन् 1976 में वह टिहरी की जिला जजी का उद्घाटन करने भी आए थे। एक शाम बैठक में मुझे भी सर्वानंद डोभाल, जो इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करते थे व एक-दो अन्य को साथ बैठने व बातें करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैं तब उत्तरकाशी जिला का डी. जी. सी. (डिस्ट्रिक्ट गवर्नमेंट काउंसिल) था। श्री नरेंद्र नारायण चड्ढा टिहरी जिला जजशिप के प्रथम जिला जज थे उन्होंने 01 जनवरी 1975 को कार्यभार ग्रहण किया और अगस्त/सितंबर 1979 तक टिहरी में रहे। बाद में अपने पत्रों में उन्होंने टिहरी के वकीलों की भूरी-भूरी प्रशंसा की।
     टिहरी रियासत काल में वादीकारी भी एक से बढकर एक हुए, जिनमें विशेष उल्लेखनीय एक श्री राम का नाम आता है। हाईकोर्ट में उस समय घनश्याम दास चीफ जस्टिस थे और उनके साथ दो कनिष्ठ जज थे। उनमें एक शिव गोपाल माथुर और दूसरे मुकुन्दी लाल श्रीनगर गढ़वाल के थे। जब वादीकारी श्री राम अपने मुकदमे की बहस स्वयं करने लगा तो चीफ जस्टिस घनश्याम दास ने उसे कहा कि ‘श्री राम, हम तुम्हारी बात नहीं समझ रहे हैं, अतः तुम अपना वकील करो।’ इस पर श्री राम ने कहा ‘हुजूर, मैं तो आपकी बात खूब समझ रहा हूँ पर आप ही मेरी बात नहीं समझ रहे हैं, अतः वकील आप करो।’ यह सुनकर पूरा कोर्टरूम ठहाकों से गूंज उठा।
    बैरिस्टर मुकन्दी लाल विलायत रह चुके थे और वहाँ से एक मेम ब्याहकर लाए थे किन्तु बात हमेशा गढ़वाली में ही करते थे। अपना परिचय देते हुए कहते‘मैं मुकुंदी लाल छौं’। महाराजा नरेंद्रशाह उन्हें ‘मुकन्दी’ कहकर पुकारते थे। वह मेम ले आए थे अतः तब उनसे छूत मानते थे। दशहरों में महाराजा नरेंद्रशाह के टिहरी में रहने के दौरान प्रताप इण्टर कॉलेज ग्राउंड में फुटबॉल टूर्नामेंट्स का आयोजन होता था। राजा और अन्य विशिष्ट लोग कॉलेज की इमारत की छत पर बैठकर मैच देखते हुए चाय पानी पीते थे किन्तु बैरिस्टर मुकन्दी लाल अपनी मेम साहिबा के साथ थोड़ा हटकर लगी कुर्सी पर बैठे दिखाई देते।

शूरवीर रावत- एक वकील के तौर पर शोषितों व पीड़ितों की सहायता आप किस प्रकार करते हैं?
मोहन लाल नेगी- वकालत के व्यवसाय में शोषितों व पीड़ितों की सहायता के स्वरूप का जहाँ तक प्रश्न है उनकी सहायता या तो फीस कम लेकर की जा सकती है या उन्हें झूठे मुकदमों में न उलझने की सलाह देकर। वैसे मैंने दलितों और तथाकथित शोषितों को इस मामले में विकृत मानसिकता से अधिक ग्रस्त पाया है। प्रायः वे पड़ोसी या गांव के ही अन्य दीन हीन व्यक्ति से ही अधिक जलन व विद्वेष अधिक रखते हैं, उनसे लड़ते हैं और मर जाएंगे पर उनकी यह भावना कम नहीं होती। उनमें बदले की भावना सम्पन्न लोगों की अपेक्षा अधिक होती है। जहाँ तक जमीन जायदाद के झगड़ों की बात है तो प्रायः उनकी जमीन जायदाद नहीं ही होती है। भूस्वामी द्वारा खेत भी यदि किसी हलिया को हल लगाने के लिए दिया जाता है तो उसे उसकी सेवा के बदले मेहनताना दिया जाता है, खेत मालिक जब चाहे तब अपना खेत छुड़ा सकता है। इस व्यवहार को हम ‘खलूण्डा’ कहते हैं। यह बात गांव में अवश्य थी कि जिस दिन हलिया हल लगाने आता उस दिन का खाना उसे व उसके पूरे परिवार को मालिक के यहाँ से मिलता था।
    टिहरी बांध प्रभावित क्षेत्र में तो किसी के पास मिल्कियत के तौर पर एक छोटे से खेत का टुकड़ा भी रहा है तो बांध विस्थापित होने के नाते उसे भानियावाला अथवा अन्य पुनर्वास स्थल पर दो एकड़ भूमि आबंटित हुई और यदि दुर्भाग्य से भूमिधर की मृत्यु आबंटन से पहले हुई तो उसके प्रत्येक लड़के को भी दो-दो एकड़ भूमि आबंटित हुई। हमारे गांव के ही एक लोहार के पांच लड़के थेे जिससे उनके प्रत्येक लड़के को दो-दो एकड़ भूमि भानियावाला में आबंटित हुई। इतनी भूमि का स्वामी बन जाना प्रायः एक आम आदमी के लिए कल्पना से बाहर की बात है। परन्तु दुख इस बात का है कि बहुत से लोगों ने लालच में आकर सरकार से भूमि की कीमत नगद मांगी या फिर पुनर्वास स्थलों की भूमि औने-पौने दामों में बेचकर चार दिन में ही रुपये फूंक दिये। दुर्भाग्य से ऐसे लोगों में दलितों की संख्या ही अधिक है।  
    
शूरवीर रावत- वकालत पेशे में हर पेशेवर कानून की पेचीदगी में ही रात-दिन उलझा रहता है। पर आपने कानून की बारीकियों में रत रहने के बावजूद कहानी लेखन का क्षेत्र चुना?  
मोहन लाल नेगी- कहावत है ‘Law is a Jealous mistress, she demands an undivided loyality’ यह सही है कि वकालत के पेशे में जितनी मेहनत की जाए, कम ही है। वकीलांे के लिए और खासकर नए और नवयुवकों के लिए कहा गया है कि ‘Live like a hermit and work like a horse. Labour, labour and labour is a watch word for a lawyer’ शुरू-शुरू में काम जमाने के लिए और महारत हासिल करने के लिए परिश्रम और घोर परिश्रम तो वकालत के पेशे में परम आवश्यक है ही किंतु जब एक बार आपको कानून की बारीकियों का ज्ञान हो जाता है तो वकालत का मुश्किल से मुश्किल काम भी एक रूटीन वर्क हो जाता है और मुश्किल दिखने वाला मामला आसान हो जाता है। (वैसे यह बात हर पेशे पर लागू होती है।) जब कानून के सिद्धांतों पर आपकी पकड़ मजबूत हो जाए और आपकी डिलीवरी ऑपरेशन अच्छा है, फिर तो आप एक नजर में मामले को समझकर बिना तैयारी के भी धुआंधार बहस कर सकते हैं।
    एक बार का किस्सा बताते हैं कि कोर्ट में अन्तिम कार्यदिवस था और उसके बाद तीन महीने के लिए कोर्ट में छुट्टी थी। उस दिन अगर कोर्ट में बहस होकर 'Temporary Injection' मिल जाये तो तीन महीने तक आराम। कोर्ट का अन्तिम दिन और उसी दिन मामले में पेशी होनी थी। मामला तत्कालीन एडवोकेट जनरल के. एल. मिश्रा साहब को सौंपा गया वह भी ऐन मौके पर। उन्होंने कोर्ट की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते मुकदमे के पन्ने पलटे और चले गए कोर्ट में बहस करने। कानून के सिद्धांतों पर उनकी मास्टरी थी और वाचाल शक्ति होने के कारण तीन घंटे की बहस के बाद उन्होंने न्यायालय से आदेश अपने हक में प्राप्त कर लिया।
    यह सही बात है कि वकालत के पेशे में रहकर आप अन्य काम नहीं कर सकते किन्तु अगर आपके पास समय है तो वकालत के अलावा अन्य काम जैसे लेखन या अन्य रूचि का काम बखूबी कर सकते हैं। कलाकृति में रुचि के कारण मैंने वकालत के दौरान ही लेखन और कलाकृतियां की। ‘जोनि पर छापु किलै’ की कहानियों के डायलॉग्स मैंने कोर्ट में ही मुकदमे के पुकारे जाने तक के ‘वेटिंग पीरियड’ में लिखें। यह तो आपके एटीट्यूड पर निर्भर है कि जब आप लिख रहे हैं तो मुकदमा भूल जाओ और जब मुकदमा कर रहे हो तो लिखना भूल जाओ। अंग्रेजी का प्रसिद्ध लेखक लॉर्ड बेकॉन तथा कवि व नाटककार विलियम शेक्सपियर वकील ही थे जो बाद में ख्यातिप्राप्त साहित्यकार हुए। यह बात नहीं कि कानून की पेचीदकियों में उलझा एक वकील सफल लेखक नहीं हो सकता। रोमन इतिहास के पन्ने टटोलो, अनेक कानूनविद् व राजनीतिज्ञ साहित्य के उपासक हुए हैं।    
    आदमी के अन्दर अगर किसी काम करने की रुचि और प्रतिभा हो तो बहुत सारे रुचि के काम साथ-साथ हो सकते हैं और खासकर वकीलों को तो समाज के बहुत से कल्याणकारी कामों में रुचि लेने की सलाह दी गई है। मद्रास उच्च न्यायालय में वकालत कर चुके अति कुशाग्र बुद्धि संपन्न चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जिनसे मुंबई हाईकोर्ट के धाकड़ वकील मोहम्मद अली जिन्ना, जो पाकिस्तान के निर्माता कहे जाते हैं, भी कतराते थे। राजगोपालाचारी ‘रेजर शार्प इंटेलिजेंसी’ के धनी थे और उन्होंने स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल की बागडोर भी संभाली। उन्होंने रामायण और महाभारत को अंग्रेजी में इतनी सरल और सुगढ़ भाषा में लिखा कि हर कोई दंग रह जाता है, उनकी सूक्ष्म बुद्धि को नमन करने को जी चाहता है। ये लोग मार्गदर्शक हैं, जिनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।

शूरवीर रावत-  कहानी लेखन के लिए आपके प्रेरणास्रोत कौन थे?
मोहन लाल नेगी- मैंने हिंदी में पहली कहानी ‘नौकर’ और दूसरी कहानी ‘टिहरी के घंटाघर की कहानी उसी की जुबानी’ लिखी, जिनका जिक्र मैंने अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक ‘यादों की गलियां’ में भी किया है। ‘घंटाघर की कहानी उसी की जुबानी’ जब स्थानीय पत्रों में छपी तो लोग बहुत प्रभावित हुए। उन दिनों मैं प्रेमचंद साहित्य खूब पढ़ रहा था इसलिए मैं तब महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद जी से प्रभावित था और फिर कृष्णचंद्र के साहित्य को पढ़ने का चस्का लगा। डॉक्टर गैरोला का कहना था कि ‘तुम सणि फिणौणु खूब ऑन्दु’ यानि लेखन में विस्तार देने की कला खूब आती है। कहानी हो या लेख, उसे विस्तार देने की यदि मेरे अन्दर कोई कला है तो वह कृष्णचंद्र से प्रभावित है। मेरे ऊपर कृष्णचंद्र का प्रभाव लम्बे समय तक रहा।
     डॉ0 महावीर प्रसाद गैरोला मेरे गुरू व भाई जगदीश्वर नेगी एडवोकेट के सहपाठी रह चुके थे और जब वे वकालत में आये तो हमपेशा होने से कोर्ट के अलावा उनके घर भी आना-जाना व उठना-बैठना होता था। वकालत के अलावा साहित्य चर्चा भी होती थी। उनकी सर्वप्रथम साहित्यिक रचना ‘खिचड़ी’ नामक पुस्तक थी जिसमें से उनके साहित्यकार होने की खुशबू आने लगी थी। यह कहने में कोई संकोच नहीं कि डॉ0 गैरोला ही कहानी लेखन में मेरे प्रेरणास्रोत थे।
    
शूरवीर रावत- कहानी लेखन के लिए आपने गढ़वाली भाषा को चुना। जबकि आप उच्च शिक्षा प्राप्त थे और आपके लिए हिन्दी व अंग्रेजी में लिखना ज्यादा सरल व सहज होता।
मोहन लाल नेगी- गढ़वाली भाषा में लेखन की प्रेरणा मुझे डॉक्टर महावीर प्रसाद गैरोला से मिली जिसमें सफलता भी खूब मिली। हिंदी में मेरी शैली और शिल्प देखकर उन्होंने ही मुझे गढ़वाली में लिखने का सुझाव दिया, तब मैंने पहली गढ़वाली कहानी ‘थौळू’ लिखी। यह ‘मदननेगी के थौळू’ और  हमारे यहां के ‘बालसी का थौळू’ से प्रभावित थी। मुझे गढ़वाली भाषा में लेखन करने में कोई दिक्कत नहीं हुई। पहली गढ़वाली कहानी होने के बावजूद भाषा-शिल्प पर पकड़ व सूक्ष्म वर्णन ने लोगों को बहुत प्रभावित किया और मुझे प्रोत्साहित। जिस कारण मैं एक के बाद दूसरी और होते-करते दस कहानियां लिख गया और दस कहानियों का एक संग्रह ‘जोनि पर छापु किलै’ प्रकाशित होने का मार्ग प्रशस्त हुआ। सन् 1985 में स्वर्गीय बुद्धिबल्लभ थपलियाल जी द्वारा स्थापित ‘जयश्री ट्रस्ट’ द्वारा आयोजित गढ़वाली व हिंदी भाषा में किए गए लेखन का वार्षिक मूल्यांकन किया जाने लगा। प्रथम वर्ष 1984/85 में अबोधबन्धु बहुगुणा को उनकी  रचना ‘भूम्याळ’ के लिए सम्मानित किया गया और उसके बाद मुझे ‘जोनि पर छापु किलै’ के लिए। सम्मान समारोह बड़ी-बड़ी हस्तियों की उपस्थिति में आलीशान ढंग से देहरादून टाउन हॉल में आयोजित किया गया। विस्तृत विवरण प्रमुख अखबारों में प्रकाशित होने के कारण लोगों को जानकारी मिली। इस विषय पर प्रसिद्ध साहित्यकार पुरुषोत्तम डोभाल जी ने जो लिखा वह मेरे दूसरे कहानी संग्रह ‘बुरांस की पीड़’ की भूमिका में समाहित है। डोभाल जी माने हुए साहित्यकार थे जिन्हें इंडियन एक्सप्रेस के द्वारा वर्ल्डस् आउटस्कर्ट स्टोरी राइटिंग में प्रथम स्थान मिला। उनका हिंदी पर अधिकार उनके द्वारा लिखी भूमिका से मालूम पड़ जाता है। ‘जोनि पर छापु किलै’ का सम्मान समारोह उन्हीं की अध्यक्षता में संपन्न हुआ था।
    मैं व्यवसायिक नहीं शौकिया लेखक रहा हूँ इसलिए मैंने अपने क्षेत्र को विस्तार नहीं दिया। हिंदी और अंग्रेजी में कदम नहीं रखा। वकालत पेशे पर ही रोजी-रोटी निर्भर थी, इसलिए मेरी रचनाएं एक लंबे अंतराल के बाद ही आती रही। पहला कहानी संग्रह ‘जोनि पर छापु किलै’ 1966-67 में, दूसरा संग्रह ‘बुरांस की पीड़’ 1985 में, गढ़वाली भाषा में उपन्यास ‘सुनैना’ 2012 में और संस्मरणात्मक पुस्तक ‘यादों की गलियां’ 2019 में।
    अपनी दोनों कहानी संग्रहों से दस कहानी छांटकर मैंने उनका अंग्रेजी अनुवाद किया जो Stories of the mid himalayas' पुस्तक रूप में दिल्ली, पहाड़गंज स्थित ‘समकालीन प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित की गई। दिल्ली साहित्य अकादमी ने उस पर अपनी समीक्षा भी दी, तत्पश्चात किसी और ने भी। जिसके सम्बन्ध में हैदराबाद के एक वकील का भी पत्र आया था। ‘स्टोरीज ऑफ द मिड हिमालयास’ की भूमिका प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक रस्किन बॉन्ड ने लिखी थी।
    गढ़वाल में साहित्य अभिरुचि कम होने के कारण पुस्तकों का अधिक प्रचार-प्रसार नहीं हो सका, फिर दुनिया बेईमान भी है। जहाँ पुस्तकें दी उनका पेमेंट ही नहीं हुआ। मामला हर तरफ से निराशाजनक है। अपना समय बर्बाद करो, पैसे लगाओ और हासिलपाई जीरो। बस, ‘देख तमाशा फंूक झोपड़ी’। सरकारी तंत्र स्वार्थी लोगों के हाथों की कठपुतली है, जो उसे नोच-नोच कर खा रहे हैं, संतोष केवल स्वांतः सुखाय का है। लिखने तक का संतोष है किंतु छपाना भी अपने ही पैसों से पड़े तो मामला चिंताजनक है। अधिकतर लोग फोकट में पुस्तक का आनंद उठाना चाहते हैं, जो सम्भव नहीं है।

शूरवीर रावत-  साहित्य क्षेत्र में सक्रिय होने के कारण आपके पेशे पर कोई प्रभाव पड़ा?
मोहन लाल नेगी- जैसा मैंने पहले कहा कि एक बार जब आप किसी क्षेत्र में महारत हासिल कर लेते हैं तो व्यवसाय एक रूटीन ऑर्डर हो जाता है और अपनी हॉबी को भी आप आराम से अपना सकते हैं। जब व्यवसाय की व्यस्तता अधिक हो तो दूसरे काम स्वतः ही सस्पेंडेड हो जाते हैं और यही कारण है कि मेरी एक पुस्तक से दूसरी पुस्तक के प्रकाशन के बीच का अंतराल काफी रहा जिससे मेरी रचनाओं की संख्या अधिक नहीं है। जो होल टाईम राइटर है और रहे हैं, उन्होंने दर्जनों कहानी संग्रह और उपन्यास लिखे हैं। मशहूर साहित्यकार रांघेय राघव मात्र 39 वर्ष तक जिये पर दर्जनों पुस्तकें लिखी। अल्पायु पाने के बावजूद और एक समर्पित लेखक होने के कारण जब तक जिए तब तक लिख सके।

शूरवीर रावत- आपके पहले कहानी संग्रह ‘जोनी पर छापु किलै’ को पाठकों ने हाथों-हाथ लिया। इसी संग्रह से आपकी लोकप्रियता बढ़ी। पर दूसरे कहानी संग्रह ‘बुरांस की पीड़’ और उपन्यास ‘सुनैना’ को वह रिसपॉन्स नहीं मिल पाया?
मोहन लाल नेगी- गढ़वाल में पहले तो साहित्य प्रेमी और साहित्य अभिरुचि संपन्न लोग बहुत कम है। जयश्री ट्रस्ट द्वारा सम्मानित होने से पहले ‘जोनी पर छापु किलै’ बहुत कम लोगों ने पढ़ी थी और बहुत कम लोगों ने ही प्रशंसा की। केवल ऊँची अभिरुचि के लोग ही उसकी भाषा शिल्प और श्रम से प्रभावित हुए। उस पर पहली समीक्षा श्री लीलाधर जगूड़ी जी ने लिखी और तहे दिल से सराहना की। बाद में सन् 1985 में जब मुझे जयश्री ट्रस्ट द्वारा सम्मानित किया गया और अखबारों में उसकी खबर छपी तब लोगों ने उस पुस्तक की ढूंढ की। वैसे गढ़वाली लिखना इतना सरल भी नहीं है और जब तक आप भाषा के लिए समर्पित न हो तब तक उसकी सेवा नहीं हो सकती।

शूरवीर रावत- आपके समकालीन लेखकों में गढ़वाली भाषा के लेखक कौन-कौन हैं? गढ़वाली साहित्य का भविष्य आप किस रूप में देखते हैं?
मोहन लाल नेगी- गढ़वाली साहित्य के भविष्य के विषय में कहना कुछ मुश्किल है। पहले गढ़वाली का विकास इसलिए नहीं हुआ कि ‘पहले पेट पूजा तब काम दूजा’ से कृषि पर निर्भर थे। पर उस पर भी गुजारा न होने के कारण पहाड़ी लोग बाहर निकलकर छोटे-छोटे काम कर अपनी उदरपूर्ति करते थे। ऐसी परिस्थिति में भाषा की श्रीवृद्धि पर किसका ध्यान जाता। पहाड़ी लोग प्रायः हीनता की भावना से भी ग्रस्त रहे। बाहरी लोगों के सामने पहाड़ी होने में भी झेंप महसूस करते हैं, भाषा की उन्नति और उसके साहित्य पर केवल मुठ्ठी भर बुद्धिजीवी लोगों का ध्यान गया। रायबहादुर तारादत्त गैरोला की ‘सदेई’ एक विशिष्ठ कृति है, जिसमें मानव हृदय की संवेदनायें छलकती है। एक खुदेड़ बेटी ससुराल में रहकर मायके को याद करती है, अपनी विवशता व्यक्त करती है ‘घणी कुळायों छांटी ह्नावा, देखण बाबा जी को देश द्यावा’।
    उस काल में गढ़वाली भाषा को समर्पित कई महापुरुष हुए, टिहरी और गढ़वाल दोनों जगह। पौड़ी में आत्माराम गैरोला, भजन सिंह ‘सिंह’ कोटनाला, आदित्यराम दुदपड़ी, अबोधबन्धु बहुगुणा तथा गारी, म्वारी व ब्वारी कथासंग्रह के लेखक दुर्गा प्रसाद घिल्डियाल आदि प्रमुख हैं। टिहरी में तारादत्त गैरोला, डॉ0 महावीर प्रसाद गैरोला, सत्यशरण रतूड़ी, चन्द्रमोहन रतूड़ी, योगेन्द्रपुरी आदि। यही नहीं मैं कह सकता हूँ कि टिहरी में गढ़वाली को आगे बढ़ाने में मेरे सहपाठी भाई बचन सिंह नेगी का कार्य उल्लेखनीय है, जिन्होंने कहानियां, कवितायें व उपन्यास सहित सत्रह पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने रामचरित मानस, महाभारत आदि ग्रन्थों का गढ़वाली रूपान्तर भी किया है।
    यह हर्ष का विषय है कि कुछ लोग आज भी गढ़वाली को समर्पित हैं। अखबार पढ़ो तो कुछ आशा बंधती है। कुछ लोगों के उत्साह और प्रयास से गढ़वाली भाषा के दीपक की लौ जलती रहेगी। लोगों में अपनी भाषा के प्रति प्रेम और श्रद्धा अभी भी बाकी है। निराशा तब होती है जब पलायन के कारण गांव के गांव खाली हो रहे हैं और उनके आचार-विचार आधुनिक चकाचौंध में विलुप्त होते जा रहे हैं। भाई नरेंद्र सिंह नेगी जैसे गढ़वाली भाषा के समर्पित कवि और गायकों से कुछ आस अवश्य बंधती नजर आती है। कुछ प्रेरणादायक समाचारों को यहां उद्धृत किया जा सकता है;
    - ‘गढ़वाल मंडल के स्वर्ण जयंती समारोह को आयुक्त श्री बी. बी. आर. पुरूषोत्तम गढ़वाली में सम्बोधित करेंगे।’ किसी भी सरकारी कार्यक्रम में गढ़वाली कहने वाले वे पहले गैर गढ़वाली अधिकारी होंगे।
    - ‘गढ़वाली गीतांजलि का हुआ विमोचन।’ रविंद्रनाथ टैगोर की विश्व प्रसिद्ध कृति गीतांजलि का गढ़वाली रूपांतर गढ़वाली साहित्यकार बिमल नेगी और महेशानंद ने किया।

Wednesday, July 29, 2020

उफ, ये देहरादून की बारिस !

वर्षा ऋतु में पच्चीस-तीस साल पहले के देहरादून की बारिस के कुछ किस्से भुलाये नहीं भूलते।


1.    विभागीय मुख्यालय- लखनऊ से रोकड़िया के. बी. श्रीवास्तव देहरादून आये थे। हमारा ऑफिस तब बसन्त विहार में था। के. बी. बाबू को शाम जनता एक्सप्रेस से लौटना था। दिन भर साथ ही ऑफिस में रहे, शाम को घर लौटते समय मैंने कहा मैं आपको स्टेशन छोड़ देता हूँ। सोचा अनुराग नर्सरी के आसपास चाय पीते हुये चलेंगे पर ऑफिस से निकले ही थे कि आशमान झमाझम बरसने लगा। इसलिए चाय का बिचार त्यागकर चलते रहे। कांवली रोड वाले बिन्दाल पुल पर पहुँचे तो पुल डूब चुका था (तब पुराना पुल संकरा और नीचे था)। गोबिन्दगढ़ से जाना चाहा पर वहाँ भी सड़कों पर पानी लबालब भरा था। वापस बल्लीवाला चौक, बल्लूपुर चौक, चकरॉता रोड, तिलक रोड, भण्डारी चौक होते हुये रेलवे स्टेशन पहुँचे तो ट्रेन प्लेटफार्म पर लग चुकी थी। बारिस में सड़क के अदृश्य गड्ढों से ही नहीं सामने वाले की रफ ड्राईविंग से भी स्कूटर चलाते हुये बचकर चलना होता है। बारिस इतनी तेज थी कि अण्डरगारमेण्ट्स तक में से भी पानी इतना बह रहा था जैसे नदी में डुबकी मारकर बाहर निकलने पर।

2.    एक बार मेरे दोनों बच्चों को बुखार आ गया। शायद छः-सात साल के रहे होंगे। दिन चढ़ने पर बुखार तेज होता गया था। मैंने श्रीमती जी को और बच्चों को स्कूटर पर बिठाया और डॉक्टर दिखाने को निकला। समय थोड़ा गलत चुन लिया था, दिन के डेढ़-पौने दो बजे होंगें। एक डॉक्टर के पास गया पर वे उठने की तैयारी में थे और ‘शाम को आना’ कहकर निकल गये। दूसरे और फिर तीसरे के पास, पर सभी ने शाम को दिखाने को कहा। मैंने श्रीमती जी को कहा ‘अब आ गये हैं तो फिर शाम को दिखाकर ही जायेंगे। लिहाजा समय काटने के लिए पिक्चर ही देख लेते हैं, दो से पाँच का शो।’ वह राजी हो गयी। हम चकरॉता रोड पर नटराज सिनेमा चले गये।
          पिक्चर खत्म होकर बाहर निकले तो बाहर आशमान झमाझम बरस रहा था। नटराज वाला चौकीदार शो शुरू होने पर चैनल बन्द कर देता है पर बारिस रुकने के इन्तजार में हमारे जैसे चार-छः और लोग भी चैनल के बाहर खड़े थे। हॉल के बरामदे का प्रोजक्शन मुश्किल से एक-डेढ़ फीट ही बाहर होगा जिससे हम उस तेज बारिस में कमर से नीचे भीग ही रहे थे। पौन घण्टा रुकने के बाद भी बारिस नहीं रुकी तो मैंने स्कूटर स्टार्ट किया, पर बुरी
तरह भीगने के कारण डॉक्टर के पास जाने की हमारी स्थिति नहीं थी इसलिए सीधे घर आ गये। यह सोचकर कि डॉक्टर को कल दिखा देंगे। रात खाना खाते समय देखा तो बच्चों का बुखार पूरी तरह गायब था।

 
3.    मेरे बच्चे तब डालनवाला के एक प्राईवेट स्कूल में पढ़ते थे और बस से आते-जाते थे। आशमान में बदरा घिर आये थे। बाजार से लौट रहा था तो सोचा बच्चे भीग न जायें क्यों न मैं ही उन्हें लेते चला जाऊं। पर तेज बारिस में मैं ही नहीं बच्चे भी बुरी तरह भीग गये। आराघर चौक पहुँचा तो देखा कि आठ-नौ साल के कुछ स्कूली बच्चे उस बारिस में नहर से लगी सड़क पर अपने बस्ते बहा रहे थे और नहीं बहने पर किक मार रहे थे।                                                                                            
(पुराने लोगों को पता है कि आराघर चौक में पहले एक बहुत बड़ा पिलखन का पेड़ था और सड़क दो हिस्सों में बंटी थी। पिलखन के पेड़ की सीध में धर्मपुर की ओर अर्थात आज की सड़क के बीचों-बीच दस-बारह दुकानों का एक छोटा सा बाजार भी था। जिसमें गढ़वाल ऑप्टिकल्स, शराब का ठेका और उसकी बगल में मच्छी की पकौड़ी बनाने वाले की व अन्य दुकानें थी। तब देहरादून की नहरें आज की तरह भूमिगत नहीं थी। ई. सी. रोड और बलवीर रोड का पानी जब बाजार के पीछे वाली पतली सड़क पर बहता था तो काफी बहाव हो जाता था। भारी बस्ते तो नहीं पर जूते-चप्पल आसानी से बह जाते थे।)    

Monday, May 18, 2020

हमारे मेले व त्यौहार

गल्ली थौळू पर विशेष
             मनुष्य जैसे-जैसे सभ्य होता गया उसके अन्दर असुरक्षा की भावना बढ़ने लगी, असुरक्षा से हवस और संग्रहण की प्रवृत्ति पुष्ट हुयी और धीरे-धीरे उसके चारों ओर एक ऐसा दायरा बन गया जिसमें हर कोई अधिकाधिक संग्रह करने की ओर उन्मुख होता है, एक नये समाज का निर्माण होने लगा। जो उनके जैसे नहीं हो सके वे ऐसे समाज से बाहर हो गये और इस तथाकथित सभ्य समाज ने अपने से कमतर समझे जाने वाले समाज को नाम दिया आदिवासी समाज। सच भी है आदिवासी समाज आज भी सभ्य समाज की चालाकियां कदाचित ही समझ पाया हो आदिवासी प्रकृति की गोद में उन्मुक्त व उल्लास से भरा जीवन जीते आये हैं। प्रकृति सानिध्य में वे प्रकृति के हर सुख-दुख में शरीक होते। प्रकृति की पीड़ा वे समझते। प्रायः आदिवासी समाज की पहचान क्षेत्रीय आधार पर होती। परन्तु अब धीरे-धीरे अधिकांश आदिवासी समाजों में भी जातिगत अवधारणा विकसित हुयी है और वे मुख्य समाज में जुड़ने लगे।
            आज उत्तराखण्डी समाज भी उसी प्रक्रिया से गुजर रहा है। मुख्य समाज में समाहित होने के प्रयास भले ही हों किन्तु सदैव वर्तमान में जीने वाले ऐसे समाज में उत्सवधर्मिता कम नहीं हुयी है। उतरायणी मेला, स्याल्दे बिखोती, पूर्णागिरी मेला, कण्डाळी मेला, नन्दा राजजात, कण्वाश्रम मेला, ज्वाल्पा मेला, काण्डा मेला आदि असंख्य मेले उत्तराखण्डी संस्कृति की अभिन्न पहचान है।
            उत्तराखण्ड ही क्या टिहरी गढ़वाल में भी कुछ ऐसे मेले हैं जो प्रतिवर्ष आयोजित होते हैं। धार्मिक श्रेणी के इन मेलों में जन-जन की आस्था है और इनके लिए जनसमुदाय पूरे वर्ष भर प्रतीक्षा करता है यथा; सुरकण्डा का गंगा दशहरा मेला, कुंजापुरी तथा चन्द्रबदनी के नवरात्र मेले, बूढ़ाकेदार का कैलापीर मेला, सेम-मुखेम मेला, सिद्धपीठ ओणेश्वर कोटेश्वर महादेव मेला, ज्वाला देवी-विनयखाल मेला, माणेकनाथ मेला, मकर संक्रान्ति व बसन्त पंचमी मेला, अलेरू-रथी देवता का मेला प्रमुख है।
            इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे मेले भी हैं जो स्थान विशेष पर आयोजित होने के कारण जाने जाते हैं। यह अलग बात है कि इनका स्वरूप भी कहीं-कहीं धार्मिक है। यथा; छाम-कण्डीसौड़, नगुण, देवीसौड़, कमान्द, नैखरी(चन्द्रबदनी), चम्बा, पथल्डा(हिण्डोलाखाल), चम्बा(वीर गबर सिंह का मेला), रौड़धार, खण्डोगी, अंजनीसैण, डिबनू, बादशाही थौल, बग्वान, महड़, जामणीखाल, पौड़ीखाल आदि अनेक मेले।

             टिहरी गढ़वाल की चौवन पट्टियों में इक्कीस गांवों की एक पट्टी है धारमण्डल। प्रतापनगर तहसील के अन्तर्गत इस पट्टी में भी प्रतिवर्ष तीन मेले आयोजित होते हैं; मदननेगी(बीस गते बैसाख- जिसमें स्थानीय देवता मदननेगी की पूजा अर्चना की जाती है), गल्ली(पांच गते जेठ- जिसमें गल्ली अर्थात गलेश्वर महादेव की पूजा की जाती है) और दयारा(छः गते जेठ- जिसमें स्थानीय देवता नागर्जा की पूजा की जाती है, हालांकि कुछ लोग दयारा में सिलंग्वा देवता के पूजे जाने की बात करते है)। दयारा नाम की जगह टिहरी बांध में डूब जाने के कारण अब दयारा का मेला उनके पुनर्वास स्थल भानियावाला में ही हर वर्ष आयोजित किया जाता है।
मेला को गढ़वाली भाषा में थौळू या कौथिग भी कहा जाता है और मेले में प्रतिभाग करने वाले को थौळेर या कौथिगेर। ‘कौथिगेरू न थौळू भरीगे, स्याळी सुरमा...’  
              चालीस-बयालीस साल पहले गल्ली थौळू में एक-दो बार ही मेरा जाना हुआ परन्तु आज भी जब उसकी याद आती है तो आदिम युग के दृश्य आंखों के आगे तैरने लगते हैं। जब टेमरू, बांज, तुंगला आदि के डण्डों से खूंखार मर्द प्रतिशोध की भावना से एक-दूसरे पर टूट पड़ते थे और परिणाम औरतों व बच्चों का सहम जाना और फिर घायलों को चारपाई पर डालकर अस्पताल के लिए रवाना करना। यह मंजर तब हर वर्ष के मेले में होता था। न जाने क्यों गल्ली का थौळू खून-खराबे के लिए अभिशप्त था। तब शायद ही कभी सौहार्दपूर्ण ढंग से मेला निपटा हो। ऐसा भी नहीं कि झगड़ा अचानक जुट जाता हो। यह सब पूर्व नियोजित होता था। लड़ाई-झगड़े करने वाले इस तैयारी से जाते थे कि आज हमने उस गांव वालों को सबक सिखाना है। यह अलग बात है कि कभी-कभी वे खुद ही पिट जाते थे। बल्कि छ महीने, साल भर पहले ही धमकी दी जाती थी कि ‘मिलना बेटे गल्ली के थौळू में’। लड़ाई का उद्देश्य कोई किला फतह करना नहीं केवल नाक की लड़ाई होती थी। किसी ने किसी की बहू-बेटी छेड़ दी तो उसका बदला गल्ली के थौळू में उतारा जाता था। अपनी शूरवीरता दिखाने का यह अवसर आदिम खयालों वाले लोग चूकते नहीं थे। लड़ाई-झगड़ा, मारपीट कब से गल्ली में चला आ रहा था कह नहीं सकते किन्तु बीसवीं सदी के आठवें दशक तक यह जारी रहा।
            थौळू मेलो के पीछे की अवधारणा थी परस्पर मिलन और आवश्यक वस्तुओं की खरीददारी। बल्कि यह कहना ज्यादा प्रासंगिक होगा कि थौळू की परिकल्पना तब की गयी होगी जब बहू-बेटियां वर्षों तक आपस में नहीं मिल पाती होगी। तब वे अपने शुभचिन्तक द्वारा सूचना भेजती थी कि फलानी को कहना कि इस बार अमुक थौळू में जरूर आना। और सचमुच जब दो सहेलियां, या दो रिश्तेदार, या ननद-भावजें ऐसे मेलों में मिलती थी तो उनका गले लग-लगकर रोना धोना मैंने भी कई बार अपनी आँखों से देखा है। परन्तु गल्ली के थौळू में करुण रस और वियोग श्रंगार नहीं वीर रस की प्रधानता होती जब दो गुट आपस में टूट पड़ते थे। मेलास्थल की हालत तो ऐसी हो जाती थी जैसे साण्डों की लड़ाई में खड़ी फसल वाले खेत।

           पिछली सदी के आठवें दशक तक रजाखेत क्षेत्र में सड़क नहीं थी। हम भी जब अपने गांव से गल्ली जाते तो बेरगडी, नारगढ़, भौन्याड़ा, पाचरी, भाषली होते हुये गल्ली पहुंचते। पूर्व विधायक श्री बिक्रम सिंह नेगी द्वारा अपने ब्लॉक प्रमुख काल में क्षेत्र के प्रधानों के सहयोग से आज भले ही गल्ली में भव्य मन्दिर बनवाया गया है किन्तु तब केवल वहाँ पर एक मण्डला(मिट्टी-पत्थरों से तैयार एक प्रतीकात्मक मन्दिर) ही था। मन्दिर के पुजारी आस-पास के ही ब्राह्मण होते थे और मेले में कफलोग, नेल्डा, म्यूंडा, सिलोळी, तुन्यार, कोटचौरी-भाषली, कोळगाैं-भटवाड़ा, खाण्ड आदि गांवों के ढोल सम्मिलित होते थे। हालांकि दबदबा तब तुन्यार और सिलोळी वालों का ही रहता था। इतनी अधिक जोड़ी ढोलों की नाद से तब पूरी गल्ली गाड की घाटी गुंजायमान होती थी। रोमांच भर जाता था। पांव थिरकने लगते थे। स्वर लहरियंा गूंजने लग जाती थी। तब एकाएक कहीं से उन्मादित मर्द विघ्न डालते थे। सपना टूट जाने का सा अहसास होता था।
           संचार साधनों और यातायात की सुविधा होने के साथ-साथ जगह-जगह बाजार उपलब्ध है जिससे मेलों का स्वरूप बदल गया है। थौळू मेले अब औपचारिकता रह गये हैं। फिर भी यह अत्यन्त सौभाग्य की बात है कि आज की पीढ़ी शिक्षित व समझदार हैं। अब गल्ली के थौळू में पहले की भांति झगड़े-फसाद नहीं होते हैं।
गलेश्वर महादेव से प्रार्थना है कि इस साल का मेला कोरोना की भेंट अवश्य चढ़ गया है परन्तु जब भी मेला हो सुखमय हो, उल्लासपूर्ण हो और पारस्परिक सद्भाव बना रहे।

Saturday, May 09, 2020

580वीं जयन्ती पर विशेष

प्रातः स्मरणीय वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप
(मई 09, 1540 - जनवरी 19, 1597)

        दो दिन उदयपुर के दर्शनीय स्थलों के दर्शन के बाद नाथद्वारा में कुछ समय बिताया। नाथद्वारा से हल्दीघाटी की दूरी मात्र 17 कि0मी0 है किन्तु सीधी बस सेवा नहीं है। यह बस स्टैण्ड पर देर तक खड़े रहने के बाद ही मालूम
हुयी। एक ऑटो किया ढाई सौ रुपये में, इस समझौते के साथ कि हम दोनों के अतिरिक्त जो भी सवारी मिलेगी उनका भाड़ा भी ऑटो वाला रख सकता है। तो ऑटो चालक बीच-बीच में मुख्य सड़क से हटकर गांवों के बीच से ऑटो चलाकर ले गया। गावों के बीच से गुजरते हुये लग रहा था जैसेे शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी पर बसे गावों के बीच से ही गुजर रहे हों। बिल्कुल वही वनस्पति, वही भूगोल, वही पथरीली मिट्टी और वैसे ही घर। आगे बनास नदी दिखाई पड़ी तो रूककर बनास के साफ निर्मल पानी में हाथ मुंह धोया। पूरा मेवाड़ ही वैसे महाराणा प्रताप की धरती कहलाती है किंतु हल्दीघाटी के आस-पास आज भी चेतक के टापों की आवाज गूंजती सी लगती है। कुछ आगे चलकर ऑटो चालक बताता है कि बालची गांव में यह चेतक स्थल है। उसे रोका, सड़क के दांयी ओर एक छोटे से मैदान में चेतक की स्मृति में सीमेंट का चबूतरा बनवाया गया है। उस पर हल्दीघाटी युद्ध का संक्षिप्त विवरण तथा चेतक के विषय में लिखा गया है। इसी स्थल पर प्रताप को युद्ध भूमि से सुरक्षित निकालकर 18 जून 1576 को चेतक ने अंतिम सांस ली थी। संसार में शायद ही किसी पशु को उसकी स्वामीभक्ति व वीरता के लिए चेतक जैसा सम्मान मिला हो।
        मार्ग के चारों ओर हरा-भरा मिश्रित जंगल है, पूरा क्षेत्र रमणीकता लिये हुये। सड़क आगे पहाड़ी के बीचों-बीच है। सड़क के दोनों ओर नयी कटिंग की गयी लगी। मैंने ऑटो रोका, उतर कर नाखूनों द्वारा मिट्टी खुरची तो अन्दर मिट्टी पीलापन लिये हुये थी, हल्दी जैसी। दूसरी जगह पर भी खुरचा तो फिर वही रंग। ऑटो वाला मुझे देखकर बोला, ‘‘साहब, खमणौर गांव की पूरी मिट्टी का रंग ही हल्दी जैसा है तभी तो इसे हल्दीघाटी कहा जाता है। ऑटो हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप संग्रहालय जाकर रुका। जहां पर पहले से दो बसें, कुछ छोटी गाड़ियां और तीन-चार ऑटो खड़े थे। एक छोटी पहाड़ी के ढलान के मध्य जमीन काटकर विशाल महाराणा प्रताप राष्ट्रीय संग्रहालय बनवाया गया है जो वर्ष 1997 में प्रारम्भ होकर वर्ष 2006 में सम्पन्न हुआ। संग्रहालय की बाहरी दीवार व प्रवेश द्वार वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। दीवार पर एक ओर हल्दीघाटी युद्ध और दूसरी ओर चेतक व विलाप करते प्रताप का चित्र उकेरा गया है। प्रवेशद्वार के भीतर और संग्रहालय के बाहर महाराणा प्रताप की युद्ध भूमि के विभिन्न मुद्रायें और हकीम खान सूूर, झाला मान व राणा पुन्जा की विशाल आदमकद कांस्य प्रतिमायें है। संग्रहालय में प्रवेश करने के बाद भीतर हल्दीघाटी क्षेत्र का एक बड़ा मॉडल (भूस्थलाकृति) देखते हैं जिसे कांच के एक बड़े बक्से के अन्दर रखा गया है। दीवारों पर प्रताप की वीरता को बयां करती अनेक पोर्ट्रेट हैं।
संग्रहालय दर्शन के बाद हमें एक घुप्प अंधेरे कमरे में प्रवेश किया। यह ‘‘लाइट एण्ड साउण्ड’’ इफेक्ट देने का प्रयास था। शुरु में चेतक के दौड़ने की आवाजें सुनाई दी फिर युद्ध भूमि से दूर उसके गिरने की मुद्रा में वह दिखाई दिया और पास ही शोकमग्न महाराणा प्रताप। धीरे धीरे आंखें अंधेरे में देखने की अभ्यस्त हो गयी। पास ही पन्ना धाय को महाराणा उदय सिंह को बचाने और बदले में अपने पुत्र को बलिदान करते हुए दिखाया गया है। वास्तव में यह एक खुली जगह है जिसे चारों ओर से ढका गया था। दूसरी ओर से बाहर निकले तो यह द्वार एक तालाब के पास निकला। वहीं पर प्रताप व हल्दीघाटी से सम्बन्धित भिन्न-भिन्न प्रकार की सामग्री बिक्री केन्द्र है। लकड़ी व धातु का चेतक, राज चिह्न भाला, ढाल व तलवार आदि आदि, किन्तु सभी कुछ प्रतापमय। पास ही भील-भिलनियों की दिनचर्या दिखाने हेतु मिट्टी व प्लास्टर ऑफ पेरिस के हल, बैल, कृषक हथियार ढालते स्त्री पुरुष आदि-आदि। वहीं कैन्टीन से चाय पीने के बाद पास चल रहे कोल्हू तथा उस जुते बैल को गौर से देखा। जगह जगह बिजली पहुंचने व मशीनें लगने के कारण अब कोल्हू या रहट देखने को कम ही मिलते हैं। पर यहां पर अभी भी सरसों की पिराई कोल्हू से ही की जा रही थी।
        संग्रहालय से बाहर निकला तो जिस पहाड़ी पर यह संग्रहालय बना हुआ है उसकी पर्वत श्रेणियों को खमणौर की पहाड़ियां कहा जाता है। संग्रहालय का विस्तार निरन्तर चोटी की ओर किया जा रहा है। जिज्ञासावश उधर बढा। इस ऊंचाई से तो हल्दीघाटी का सौन्दर्य और भी मंत्रमुग्ध कर रहा था। चारों ओर हरियाली और मन्द-मन्द बासन्ती हवायें चल रही थी, मदहोशी का आलम था। प्रेम के बीज ऐसे ही मौसम में अंकुरित व प्रस्फुटित होते हैं। एक राजस्थानी लोकगीत याद आ गयाः
‘‘उड़ ज्या रे काग गिगन का वासी खबर तो ल्याव म्हारी गोरी की
नांव नहीं जांणू मै गावं नहीं जांणू सूरत न जांणू थारी गोरी की
नांव बतास्यां  गांव बतास्यां  सूरत बतास्यां  म्हारी गोरी की
लांबा लांबा केस मिरग का सा नेतर चाल चलै ठुकराण्यां की।’’  

लेकिन वीरों की धरती मेवाड़ में श्रृगांर रस के लिये स्थान कहाँ। यहां खड़े होकर हम मेवाड़ की तत्कालीन परिस्थितियों की कल्पना भली भांति कर सकते हैं। हल्दीघाटी का इतिहास बहुत विस्तार लिये हुए है। महाराणा प्रताप की वीरता ने ही हल्दीघाटी क्षेत्र को अमर कर दिया। 18 जून 1576 को अकबर की विशाल सेना और महाराणा की छोटी सेना के मध्य लड़ा गया युद्ध जिसमें प्रताप हारकर भी विजयी हुए, जिसने उनकी कीर्ति को सारे विश्व में फैला दिया, वह हल्दीघाटी और प्रताप इतिहास ही नहीं प्रत्येक हिन्दुस्तानी के सीने में अंकित है। आज चार सौ साल से ज्यादा समय हो गया है किंतु आज भी मेवाड़ में लोग प्रताप की सौगन्ध लेते हैं।
हल्दीघाटी युद्ध में सेनानियों की कुल संख्या के बारे में अलग-अलग आंकड़े हैं। किन्तु अकबर की सेना के साथ चल रहे इतिहासकार अल बदायुनी ने मुगलों की सेना की संख्या पांच हजार व महाराणा की सेना की संख्या तीन हजार बताई है। अकबर की सेना में जहां हल्का आधुनिक तोपखाना था वहीं राणा के सैनिकों के मुख्य हथियार भाले, छोटी तलवारें, धनुष वाण व गोफन (गुलेल) थे। यह अद्भुत संयोग था कि मान सिंह की सेना के अग्रिम दल में जगन्नाथ के नेतृत्व में राजपूत सैनिक थे तो वहीं महाराणा के अग्रिम दल में हकीम खां सूर के नेतृत्व में मुसलमान पठान सैनिक।
       हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप को यद्यपि युद्ध का मैदान छोड़कर जाना पड़ा परन्तु विजय अकबर की भी नहीं हुयी। उसके बाद अकबर की सेना और प्रताप के बीच यु़द्ध अनवरत चलता रहा। ......
इतिहास जहां पर मौन हो जाता है वहां यह भी हकीकत है कि चारणों ने ही भूतकाल को जीवित रखा। चारण गीतों में राजाओं महाराजाओं के अनेक किस्से मिलते हैं। चारणों की वीरगाथाओं में ही यह भी मिलता है कि निरन्तर युद्ध पर युद्ध और हार पर हार से प्रताप तिलमिला गए। हर वक्त डर रहता था कि वे स्वयं या राजपरिवार का कोई सदस्य मुगलों के हाथ न पडे। वे कभी पर्वतों की गुफाओं में पत्थरों पर सोकर रातें गुजारते तो कभी पेड़ों पर बैठे-बैठे दिन काटते। जंगली फलों पर गुजारा करते। कई बार शत्रुओं से बचने के लिए उन्हें मामूली भोजन छोड़कर भी भागना पड़ता। केवल इस संकल्प के लिए कि तुर्कों के सामने सिर नहीं झुकायेंगे। किन्तु एक बार उनकी प्रतिज्ञा टूटने लगी, वे झुकने लगे। हुआ यह कि महारानी और युवरानी ने घास के बीज के आटे से रोटी बनाई थी। बच्चों को एक-एक रोटी दी गई कि वे आधी अभी खा लें और आधी बाद में। प्रताप किनारे बैठे किसी गहन सोच में थे कि उनकी पौत्री की दारुण पुकार उन्हें सुनाई दी। वास्तव में एक जंगली बिल्ली उसके हिस्से की रोटी झपट्टा मारकर ले गई थी। महाराणा तिलमिला गए। एक घास की रोटी के लिए राजपरिवार की कन्या की हृदयभेदी चीत्कार ! युद्ध भूमि में सगे क्या, पुत्र की वीरगति पर भी जो प्रताप कभी विचलित नहीं हुए, वह राजकुमारी की चीख से तिलमिला गए, आंखों में आँसू आ गये। युद्ध भूमि में सगे क्या, पुत्र की वीरगति पर भी जो प्रताप कभी विचलित नहीं हुए, वह राजकुमारी की चीख से तिलमिला गए, आंखों में आँसू आ गये। उन्होंने तुरंत अकबर को संधि पत्र लिखा।
          अकबर पत्र पाकर बहुत खुश हुआ। पत्र बीकानेर रियासत के राजा के भाई पृथ्वीराज को दिखाया जो अकबर के दरबार में राजकवि था। पृथ्वीराज राजपूतों की आखिरी आशा और वीर महाराणा की वह चिट्ठी देखकर अत्यन्त दुखी हुआ। किंतु प्रत्यक्ष में कहा कि ‘मुझे विश्वास नहीं है कि यह चिट्ठी प्रताप की है। मुगल साम्राज्य मिलने पर भी प्रताप कभी सिर नहीं झुकाएगा। मैं स्वयं ही पता कर लेता हूं।’ पृथ्वीराज महान कवि थे, अतः घुमा फिराकर यह पत्र लिखा-
‘अकबर समद अथाह, तिहं डूबा हिंदू तुरक,
मेवाड़ तिड़ मांह, पोयण फूल प्रताप सी। अकबरिये इकबार,......
(अर्थात अकबर रूपी समुद्र में हिन्दू तुर्क डूब गए हैं, परन्तु मेवाड़ के राणा प्रताप उसमें कमल की तरह खिले हुए हैं। अकबर ने सबको पराजित किया किन्तु चेतक घोड़े पर सवार प्रताप अभी अपराजित है। अकबर के अंधेरे में सब हिन्दू ढक गये हैं किन्तु दुनिया का दाता राणा अभी उजाले में खड़ा है। हे हिन्दुओं के राजा प्रताप, हिन्दुओं की लाज रख। अपनी प्रतिज्ञा के पूर्ण होने के लिए कष्ट सह। चित्तौड़ चंपा का फूल है और प्रताप उसकी सुगंध। अकबर उस पर बैठ नहीं सकता, यदि प्रताप अकबर को अपना बादशाह माने तो भगवान कश्यप का पुत्र सूरज पश्चिम में उदय होगा। हे एकलिंग महादेव के पुजारी प्रताप, वह लिख दो कि मैं वीर बनके रहूंगा या तलवार से अपने को काट डालूंगा)

        पृथ्वीराज की इस कविता ने दस हजार सैनिकों का काम किया। प्रताप रोमांच से भर उठा और प्रताप ने उत्तर में लिख भेजा।
तुरुक कहां सो मुख पतों, इन तणसुं इकलिंग
उसै जासु ऊगसी, प्राची बीच पतंग,........
(अर्थात भगवान एकलिंग जी के नाम से सौगंध खाता हूं कि मैं हमेशा अकबर को तुर्क नाम से ही पुकारुंगा। जिस दिशा में सूरज हमेशा से उगता आया है वह उसी दिशा में उगता रहेगा। वीर पृथ्वीराज, सहर्ष मूंछों पर ताव दो, प्रताप की तलवार यवनों के सिरों पर ही होगी)
        मेवाड़ की धरती प्रताप के ऐसे वीरता पूर्ण किस्सों से भरी पड़ी है। खमणौर की पहाड़ियों की सोंधी खुशबू देर तक
अपने हृदय मे भरकर चाहते हुए भी वापसी के लिए निकल पड़ा। इस आशा के साथ कि अगली बार पर्याप्त समय लेकर आऊंगा और आहड़, गोगूंदा, मांडलगढ़, कुम्भलगढ़, भोमट आदि स्थानों को अवश्य देखूंगा। वापसी में एक बार फिर चेतक स्मारक पर उतरकर उस वीर पशु को श्रद्धांजलि दी।
                                                                                   (उदयपुर, हल्दीघाटी व चित्तौड़गढ यात्रा संस्मरण का एक अंश)

Sunday, May 03, 2020

सरल हृदय व विराट व्यक्तित्व का महापुरुष: कैप्टन शूरवीर सिंह पंवार

पुण्यतिथि पर विशेष

    अप्रैल 1992 में इलाहाबाद से आदरणीय मोहनलाल बाबुलकर जी का पत्र आया कि‘देहरादून टाउन हॉल, में
उन्नीस अप्रैल को डॉक्टर भक्तदर्शन और कैप्टन शूरवीर सिंह पंवार को श्रद्धांजलि स्वरुप वसुधारा का श्रद्धांजलि अंक के लोकार्पण के सिलसिले में देहरादून आ रहा हूँ, मिलना।’  डॉक्टर भक्तदर्शन और कैप्टन शूरवीर सिंह पंवार की यह पहली पुण्यतिथि वर्ष था। टाउन हॉल खचाखच भरा हुआ था, मंचासीन वक्ताओं श्रीमती सावित्री भक्तदर्शन, मेहरबान सिंह नेगी, कर्नल युद्धवीर सिंह परमार, श्रीमती सुमित्रा धूलिया, मोहनलाल बाबुलकर तथा मुख्य अथिति महन्त इन्द्रेश चरणदास जी के अतिरिक्त हॉल में उपस्थित राधाकृष्ण कुकरेती, कर्नल इन्दर सिंह रावत, बलवन्त सिंह नेगी, लेफ्टिनेंट जनरल महेन्द्र सिंह गुसाईं, चंद्र सिंह रावत आदि गणमान्य लोगों ने दिवंगत विद्वानों के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।
   

 टिहरी का निवासी होने के कारण कैप्टन शूरवीर सिंह पंवार(18/5/1907 - 5/5/1991) के दर्शन दो-तीन बार अवश्य हुये थे। लगभग साढ़े पाँच फुट छरहरी काया, सुतवा नाक, सिर पर पहाड़ी टोपी, अचकन और चूड़ीदार सफेद पायजामा। आँखों में चमक और मुख पर छलकता आत्मविश्वास। बातों में माधुर्य तो नहीं किन्तु अकड़ भी नहीं। तनकर बात करने का अन्दाज। हमारा पुराना दरबार जाना कदाचित ही होता था। मेरा गांव टिहरी के पूरब में भिलंगना की उपत्यका में बसा हुआ है और पुराणा दरबार टिहरी नगर के पश्चिमी छोर पर। मेरे गांव, इलाके के लोग टिहरी की भादो की मगरी, चना खेत व सुमन चौक क्षेत्र तक ही बसे थे। पुराणा दरबार तब बसा था जब दिसम्बर 1815 में महाराजा सुदर्शन शाह ने टिहरी राजधानी के रूप में बसाया। पुराणा दरबार हम तीन कारणों से ही जाते थे; भारतीय स्टेट बैंक में, टिहरी प्रवास के दौरान बस अड्डे से घूमते हुये और कभी कॉलेज से बंक मारने पर।
    कैप्टन शूरवीर सिंह पंवार जी संयुक्त प्रान्त(अविभाजित उत्तर प्रदेश) सरकार में प्रशासनिक पदों पर रहे, किन्तु समाज में उनकी छवि प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर नहीं विद्वान लेखक, इतिहास पुरुष व पुरातत्वविद के रूप में है। सौ से अधिक छात्रों को उनकी जाति, धर्म पूछे बिना पारिवारिक तथा निजी खर्चों में कटौती कर मेहनत से जुटाये गये धन से खरीदी गई हजारों पुस्तकें, दर-दर भटककर एकत्रित किये गये ताम्रपत्र व अन्य बेशकीमती पांडुलिपियां उपलब्ध करवाकर उन्हें शोध पूरा करवाया। सैकड़ों छात्रों को अपने व्यय से भोजन व आवास की सुविधाएं उपलब्ध करवाकर शिक्षित करवाया ताकि शिक्षा के क्षेत्र में प्रसार हो। अपनी भाषा व अपनी संस्कृति के प्रति इतना समर्पण कि ब्रिटिश काल में उच्च शिक्षा प्राप्त होने पर भी उन्होंने न मातृभाषा गढ़वाली बोलना छोड़ा और न अपने सिर पर पहाड़ी टोपी पहनना।
    

उच्च शिक्षा प्राप्त राजपरिवार का सदस्य, टिहरी राज्य में एस. डी. एम., डी. एम. व होम सेक्रेट्री, भारतीय सेना में कैप्टन और उत्तर प्रदेश प्रान्त में ए. डी. एम. जैसे महत्वपूर्ण पदों पर सेवा दे चुके ठाकुर पंवार के भीतर अहंकार लेशमात्र भी नहीं था। जिसके सैकड़ों शोधपत्र देश के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके थें, अनेक विश्वविद्यालयों के विषय विशेषज्ञ भी जिनके ज्ञान का लोहा मानते थे ऐसा विद्वान ठाकुर शूरवीर सिंह पंवार दरबार से निकलकर साहित्य सेवा से जुड़े किसी भी व्यक्ति के दरवाजे पर जाने से नहीं हिचकते थ,े एडवोकेट महावीर प्रसाद गैरोला, साहित्यकार मोहनलाल नेगी, डॉ0 यशवन्त सिंह कटौच, डॉ राकेश चन्द्र नौटियाल, एडवोकेट वंशीलाल पुण्डीर, सरदार प्रेम सिंह आदि विद्वानों ने यह अपने संस्मरणों में लिखा। सरकारी सेवा मंे अधिकांश लोग जहाँ अपनी ऊर्जा धनोपार्जन पर लगाते हैं वहीं ठाकुर साहब ने अपनी ऊर्जा, समय और पैसा दुर्लभ पांडुलिपियों के संग्रहण और ताम्रपत्रों की खोज में लगाया। पुराणा दरबार पुस्तकालय के संरक्षण व संवर्द्धन में आजीवन लगे रहे, संत चन्ददास, संत लक्षदास, संत मीता साहिब, टीकाराम और गिरधारी दुबे आदि गुमनाम विद्वानों के साहित्य की खोज में लगे रहे।
    

ठाकुर शूरवीर सिंह पंवार पर निन्दक कट्टरता के आरोप लगाते रहे पर ठाकुर साहब नौटियाल, डंगवालों को अपना गुरु मानते थे और गुरू किसी भी उम्र का ही क्यों न रहा हो उसके सामने नतमस्तक होकर ही प्रणाम करते थे। पीपल-बरगद पेड़ या लोक देवता के रूप में स्थापित पत्थर की वह परिक्रमा करना कभी न भूलते। कोई स्थानीय हो या बाहर से आया हुआ यदि उन्हें मालूम हो जाता कि जिससे वह बात कर रहे हैं गढ़वाली है तो फिर उससे वह गढ़वाली में ही बात करते। सामने वाले को तब गढ़वाली में ही बात करनी पड़ती थी। गढ़वाली भाषा के प्रति इतनी चाहत, इतना लगाव व समर्पण शायद ही कहीं हो। 
ठाकुर साहब के बारे में विभिन्न विद्वानों के मत इस प्रकार हैं; ठकुरानी ठा0 शूरवीर सिंह ए0 के0 पंवार- ‘ठाकुर साहब को तरह-तरह के व्यंजन खाने और मित्रों को खिलाने का शौक रहा है।........ रामपुर में सेवाकाल के दौरान वहाँ के नवाब साहब से पारिवारिक सम्बन्ध जैसे बन गए थे, जिससे उनकी बहन नन्हीं बेगम ठाकुर साहब को राखी बान्धती थी। वहाँ से निकलने के बाद भी वह राखी पर आया करती थी और यह क्रम कई वर्षों तक चलता रहा।
कर्नल युद्धवीर सिंह पंवार- ‘....हमारे पिता राजकुंवर विचित्रशाह की भांति कैप्टन शूरवीर सिंह पंवार जी साहित्य प्रेमी व विद्या व्यसनी रहे। उन्हे देर रात तक पुस्तकें पढ़ने-लिखने की आदत थी और यह आदत उनकी अन्तिम समय तक बनी रही।.....’
डॉक्टर महावीर प्रसाद गैरोला- ‘फतेह प्रकाश’ एवं ‘अलंकार प्रकाश’ का सम्पादन एवं प्रकाशन करके भी कैप्टन साहब ने ख्याति अर्जित कर ली थी। ‘गढ़वाली एवं गढ़वाल के प्रमुख अभिलेख एवं शिलालेख’ को भी कैप्टन साहब ने पुस्तक रूप में प्रकाशित किया था।.... मेरेे अथक प्रयास के बाद भी गढ़वाल तथा कुमाऊं विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित नहीं नहीं किया।......’
डॉक्टर गोविन्द चातक- ‘...वह एक लेखक ही नहीं एक सजग पाठक भी थे। ‘जीतू की गाथा’ को जब मैंने अपनी लोककथाओं की पुस्तक में शामिल किया तो ए.डी.एम. के रूप के अलीगढ़ में तैनाती के दौरान उनकी टिप्पणी मिली। भौतिक रूप से उनसे मिलने का सिलसिला तदोपरान्त ही प्रारम्भ हुआ। पुराणा दरबार की टूटी-फूटी विशाल इमारत में अकेले रहने वाला व्यक्ति, जो यहाँ धूल-गर्द से भरी चारों तरफ बिखरी किताबों व पांडुलिपियों के बीच स्वयं अतीत या अतीतातीत बनकर बैठा है। उन्हें देखकर कभी लगता जैसे कोई योगी भैरवी की साधना में जुटा हो। वैसे ही उजाड़ पुराना दरबार का झांकता अतीत, वैसे ही जीवन की सांझ, किताबें पांडुलिपियां और नीचे टिहरी का उजड़ता हुआ शहर।......’
मोहनलाल बाबुलकर- ‘....ठाकुर साहब ‘शोध का पितामह’ है। ...गढ़वाल के इतिहास के बारे में इस समय जो भी ज्ञातव्य है वह उनकी साधना का ही परिणाम है। वह गढ़वाल के इतिहास के सबसे बड़े अन्वेषक और जानकार जाने जाते रहे हैं। उनकी अपनी एक मौलिक दृष्टि थी, एक नया दृष्टिकोण था।....’
सत्य प्रसाद रतूड़ी- ‘....ठाकुर साहब को अपने संग्रहित पुस्तकों से अथाह प्रेम था वह पुस्तकांे को अलमारी में नहीं बक्सों में छुपाकर रखते थे। अपने विशाल अनन्य पुस्तकालय को आग से बचाए रखने के लिए पूरे भवन पर बिजली फिटिंग नहीं करवाई और ना पुस्तकालय भवन के लिए कोई कनेक्शन ही था।......’
मोहनलाल नेगी- ‘....ठाकुर साहब अपने पुस्तकालय की ओर देखने तक नहीं देते थे और किसी का पुस्तकालय में जाने का प्रश्न ही नहीं था। पुस्तकों के प्रति उन्हें अथाह प्रेम था जिससे वह बड़े शंकालु प्रकृति के हो गये थे। उन्हें शक रहता था कि लोगों की नजर उनकी किताबों पर है।.... ठाकुर साहब राजपूतों के बड़े हिमायती माने जाते रहे हैं। उनका तर्क था राजपूत क्योंकि बुद्धि और विद्या में ब्राह्मणों से पीछे थे इसलिए वे जोर-शोर से राजपूतों के उत्थान की बात करते थे।....’
डॉक्टर कुसुम डोभाल- ‘...प्राचीन टिहरी गढ़वाल की परंपरा के संदर्भ में कैप्टन शूरवीर सिंह पंवार के लेख पढ़ने को मिले। इन लेखों में इतिहास साहित्य एवं पुरातत्व का समावेश पाकर लगा कि सत्य, शिव एवं सुन्दरता मानो एक साथ ही प्रतिष्ठित हो गए हैं। उनके लेख अपनी व्यापकता में शोध एवं वोध की सम्भावना को आबद्ध किए हुए हैं। उनके साहित्यिक जीवन के उन्मेष का श्रेय उनकी दादी स्वर्गीय राजमाता महारानी गुलेरिया एवं उनकी माता को है।..... कैप्टन साहब का गढ़वाल की संस्कृति एवं भाषा के प्रति रागात्मक सम्बन्ध है। इसका प्रमाण उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘गढ़वाली के प्रमुख अभिलेख एवं दस्तावेज’ है। इस पुस्तक की भूमिका में गढ़वाली भाषा को वैदिक भाषा की ज्येष्ठ पुत्री कहा गया है।....(‘हिमालय के बहुआयामी व्यंितव का कृतित्व)
    

ठाकुर साहब के शोध कार्यों का यदि विधिवत अध्ययन किया जाय तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उपरोक्त विद्वानों के वक्तव्यों से तो ठाकुर शूरवीर सिंह पंवार जी के व्यक्तित्व व कृतित्व की एक झलक मात्र ही परिलक्षित होती है। उनके लेख ‘केदारखण्ड गढ़वाल में नागवंश’, ‘वाल्हीक जनपद कहाँ था’ ‘उत्तराखंड के इतिहास में मौखरी काल’ ‘आदिमानव की जन्मभूमि उत्तराखण्ड’ ‘शिवाजी का प्रभाव उत्तराखण्ड तक था’ आदि अनेक महत्वपूर्ण लेख उनकी इतिहास एवं ऐतिहासिक खोजों के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करती है। वहीं ‘मेहरौली (दिल्ली) के लौह स्तंभ का ऐतिहासिक महत्व’ ‘उत्तरकाशी के शक्ति स्तम्भ का अभिलेख’ आदि लेख उनकी पुरातत्विक जिज्ञासा की अभिव्यक्ति है। फतेह प्रकाश, अलंकार प्रकाश व गढ़वाली एवं गढ़वाल के प्रमुख अभिलेख एवं शिलालेख आदि उनके प्रकाशित ग्रंथ हैं। उनके संग्रहालय में उपलब्ध हस्तलिखित ग्रंथों की सूची, जो कि ठाकुर साहब द्वारा स्वयं प्रेषित की गई थी, इस प्रकार है;
1.    ‘वास्तु शिरोमणि’- संस्कृत ग्रंथ, शंकर गुरु कृत श्रीनगर गढ़वाल में। (सत्रहवीं शती पूर्वार्ध की रचना)
2.    ‘गढ़वाल राज वंशावली’ संस्कृत ग्रंथ, कवि देवराज कृत टिहरी गढ़वाल की उन्नीसवीं शती की रचना। (छोटे आकार का ग्रंथ)
3.    ‘श्री दत्तात्रेय तंत्र’ संस्कृत ग्रंथ, हिंदी भाषानुवाद सहित।
4.    ‘वृत कौमिदी ग्रन्थ’(छन्द सार पिंगल)- हिंदी भाषा, कवि मतिराम त्रिपाठी कृत संवत् 1758 वि0 की रचना।
5.    ‘रसरंग’ हिंदी भाषा, कवि टीकाराम त्रिपाठी कृत संवत् 1841 वि0 की उत्कृष्ट रचना।
6.    ‘सुदामा चरित्र’ हिंदी भाषा, कवि गिरधारी, सातनपुर-रायबरेली, बांसवाड़ा निवासी कृत। संवत् 1905 वि0 की रचना।
7.    ‘भागवत दशम स्कन्द’ कृष्णलीला- हिंदी भाषा, कवि गिरधारी कृत संवत् 1894 वि0 की उत्कृष्ट रचना।
8.    ‘रसमसाल’ हिंदी भाषा, कवि गिरधारी कृत संवत् 1950 वि0।
9.    ‘कृष्ण चरित्र’(12 सर्ग) कविवर चिंतामणि त्रिपाठी कृत हिंदी ग्रंथ।

10.    चन्ददास कृत ‘चन्द काव्य कौमुदी’ (विशाल आकार) हिंदी भाषा, अठाहरवीं शती की रचना।
11.    ‘अमृतराव प्रकाश’ हिन्दी भाषा में ऐतिहासिक महत्व का ग्रंथ, कवि ईश्वरी प्रसाद संवत् 1874 वि0।
12.    ‘विद्वन्मोद तरंगिणी’ हिंदी भाषा में अनेक श्रेष्ठ कवियों की उत्कृष्ट रचनाओं का विशाल संग्रह, जो राजा सुव्वा  सिंह एवं सुवंस शुक्ल द्वारा संग्रहित किया गया। इसी ग्रंथ से हिंदी भाषा के प्रसिद्ध इतिहासकार शिवसिंह सेंगर ने ‘शिवसिंह-सरोज’ ग्रंथ लिखने में विशेष सहायता ली थी।
13.    मेरे संग्रह में अठाहरवीं एवं उन्नीसवीं शती के अन्य श्रेष्ठ साहित्यकारों कवि मून, उदयनाथ, नेवाज, मीता साहब, भवानी प्रसाद द्विजराज, राव भूपाल सिंह, नन्द कुमार दत्त, समनेश, देव, भूधर आदि की रचनाओं के उत्कृष्ट संग्रह है।
14.    ‘सभासार’ हिंदी भाषा में, महाराजा सुदर्शन शाह, टिहरी गढ़वाल नरेश कृत सन् 1828 ई0 की रचना।
15.    ‘गढ़वाल का पुरातत्व’ फोटो चित्रों सहित- हिंदी भाषा में, कैप्टन शूरवीर सिंह पंवार कृत।
      

 विडम्बना ही है कि जहाँ सौ से अधिक विद्वानों ने उनके मार्गदर्शन में उनके द्वारा संग्रहित ग्रन्थों, शोधपत्रों, पाण्डुलिपियों और ताम्रपत्रों को आधार बनाकर एम. फिल. और पी. एच. डी. की उपाधियां प्राप्त कर देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों के रूप में ख्याति अर्जित की उन्हीं ठाकुर साहब को किसी भी विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित तक नहीं किया गया। उनके शोध व उनके लेखों का समग्र मूल्यांकन आज तक भी नहीं हो पाया है।

Friday, May 01, 2020

जन जन के ईष्ट देवता मदननेगी

(मदननेगी मेले पर विशेष)

चन्द्रभाट चाँदनी का नाती बघेरा बाघनी का नाती
सोन का कलश लोहा का दरवाजा
पापा पुमराज का नाती गज गंभीर का नाती
पाट को पटुड़ी नीती भोज का राजा
गंगा को बग्यूं राजौं लगे दोष
पैलु थौळू देला राज का रौतेला
तब थौळू देला धारकोटा नेगी..............।
इन्हीं शब्दों के साथ नेल्डा (धारमंडल) के आवजी एलमदास मदननेगी लोकदेवता का द्यौ सिंगार (महिमा मण्डन/आह्वाहन) करते थे।

देवभूमि उत्तराखंड में प्रायः प्रत्येक धार प्रत्येक खाल में एक लोक देवता है। आस्था इतनी कि कहीं पर मन्दिर और कहीं प्रतीक रूप में पत्थरों का ढेर और उस पर झण्डा गड़ा हुआ। लोकदेवता की प्रसिद्धि समय के अन्तराल व भक्तों की संख्या पर निर्भर करती है। श्री मदननेगी का मन्दिर उन्हीं के नाम से चल रहे मदननेगी कस्बे में स्थापित है।

 टिहरी-प्रतापनगर पैदल मार्ग पर टिहरी शहर से छः मील दूरी पर भिलंगना की उपत्यका में बसा हुआ है मदननेगी।(टिहरी शहर जो अब विशाल झील में जलमग्न हो गया है) उत्तर में सात हजार फीट से अधिक ऊंचाई वाला खैट-पीढ़ी-प्रतापनगर पर्वत पूरब पश्चिम फैला हुआ है और उसी के लम्बवत छोटी पहाड़ी के मध्य स्थित है मदननेगी। (गढवाली लोकगीतों व जागरों में खैट को आछरियों का निवास माना जाता है तो पीढ़ी को भराड़ियों का) इस पहाड़ी के बिल्कुल समानान्तर पूरब में एक गाड(पहाड़ी नदी) है। लगभग दस कि0मी0 लम्बाई वाली यह गाड भिलंगना नदी में समाहित होने से पूर्व पूरे दस गांवों को धन-धान्य से पूर्ण करता है।


मदननेगी का कहीं लिखित इतिहास नहीं मिलता परन्तु लोकधारणा है कि मदननेगी जीतू बगड़वाल के मामा थे।(यह अलग बात है कि कहीं जीतू बगड़वाल को ही मदननेगी का मामा माना जाता है) जीतू अपने मामा मदननेगी के साथ बैलों की जोड़ी खरीदने माळ (बैलों की मण्डी) गये और वापसी में दुर्भाग्यवश दोबाटा पडियारगावं व रामपुर गांव के बीच की भागीरथी नदी पार करते हुये पांव फिसला और वहीं जलसमाधि ले ली। तब वे मात्र 30 वर्ष के एक अविवाहित युवक थे। कहीं यह गाथा भी प्रचलित है कि धुनारों ने कह दिया था हम आप लोगों को नदी पार करा देते हैं पर शुल्क देना पड़ेगा। तो मदन नेगी ने मना कर दिया कि हम स्वयं ही पार कर लेंगे, पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। कहा जाता है कि धुनार पेशेवर तैराक होते थे और वे किसी व्यक्ति या सामान को नदी पार कराने के एवज में शुल्क लेते थे। यही उनका आजीविका का साधन था। (मदन नेगी के बहने की तिथि संभवतः बैशाख महीने की बीस गते रही होगी क्योंकि मदननेगी का मेला प्रतिवर्ष उनकी याद में इस तिथि को ही लगता है)

गढ़वाली लोक गाथाओं के युगपुरुष जीतू मूलतः भागीरथी नदी के बायें तट पर स्थित बगूड़ी गांव के निवासी थे। जीतू गढ़वाल राजा मानशाह के सामन्त थे, जिनका शासनकाल सन् 1547-1608 ई0 रहा। लोकगाथाओं व लोकगीतों में जीतू का वर्णन है कि खैट की आछरियों (अपसराओं) द्वारा जीतू का अपहरण छः गते आषाढ़ को
किया गया जब वे अपने खेतों को रोपाई के लिये तैयार कर रहे थे। खेत के मध्य ही धरती फटी और जीतू बैलों सहित धरती की गोद में समा गया। यह विडम्बना ही कही जायेगी कि मामा मदननेगी व भांजे जीतू की मृत्यु जल में डूबकर ही हुयी।

कुछ लोग श्री मदननेगी का पैतृक गांव धारमण्डल के पटूड़ी मानते हैं किन्तु सान्दणा के स्व. जितार सिंह रावत जोर देकर कहते थे कि मदननेगी मूलतः सान्दणा के निवासी थे, उनकी अगली पीढ़ी पटूड़ी बस गयी और फिर कालान्तर में उनके वंशज धारकोट और कफलोग चले गये। बहरहाल, सान्दणा व धारकोट गांव के पुराने संबन्ध आज भी है। वर्षों से पुरोहिताई कार्य कर रहे जलवाल गांव के स्व. भोलादत्त जुयाल का कहते थे कि पहले सान्दणा गांव के निवासियों द्वारा मदननेगी में त्रिशाली (प्रत्येक तीसरे वर्ष) जात्रा दी जाती थी। सान्दणा, खोला व जलवाल गांव के बाशिन्दे कोई भी शुभकार्य प्रारम्भ करने से पूर्व आज भी मदननेगी के नाम रोट-भेंट अवश्य करते हैं। लेकिन वास्तविकता यह भी है कि मदननेगी धारमण्डल पट्टी के बीस-पच्चीस गांवों में ही नहीं टिहरी नगर वासियों, रैका, अठूर, सारज्यूला व खासपट्टी के अनेक गांवों में श्रृद्धा भाव से पूजे जाते हैं। श्री मदननेगी मेले में प्रतिवर्ष अपार भीड़ का उमड़ना भी इसकी पुष्टि करता है।

मंदिर की स्थापना के विषय में लोगों का मानना यह है कि अकाल मृत्यु के पश्चात् मदननेगी ने गढ़वाल के राजा  को सपने में दर्शन दिये और कहा कि ’’मेरा स्मारक ऐसे स्थान पर बनाया जाय जहां से मैं अपना गांव और पतित पावनी मां भागीरथी के दर्शन कर सकूँ।’(भागीरथी व भिलंगना के तट पर टिहरी तो सन् 1815 के बाद बसना शुरु हुआ) महाराजा द्वारा मन्दिर निर्माण के आदेश दे दिये गये। गढ़वाल के महाराजा पर मदननेगी के प्रभाव से सन्देह होता है कि संभवतः मदननेगी राजदरबार में किसी महत्वपूर्ण पद पर आसीन रहे हों। परन्तु लोकगाथाओं
में जीतू के समान  मदननेगी को स्थान नहीं मिला है। मदननेगी लोकदेवता के रुप में स्थापित हो चुके थे, जन आस्था को देखते हुये और मदननेगी के आकर्षण के कारण उन्होंने मन्दिर बनवाने व प्रतिवर्ष मेले की व्यवस्था के लिये राजकोष से धन मुहैया कराना स्वीकार किया होगा। तब मेला 20 से 25 गते बैशाख तक चलता था। धीरे धीरे राजदरबार की ओर से मेले के लिए सहायता मिलनी बन्द हुयी तो मेला बन्द हो गया।

महाराजा कीर्तिशाह (शासनकाल सन् 1886-1913)द्वारा रैका की कोलगढ़ व बनाली गावं की भूमि पर अपने पिता महाराजा प्रतापशाह की याद में जब प्रतापनगर बसाया गया तो मदननेगी का महत्व और भी बढ गया। लगभग 2000 मीटर ऊँचाई पर स्थित होने के कारण प्रतापनगर को रियासत की ग्रीष्मकालीन राजधानी के रुप में विकसित किया गया। साथ ही टिहरी से प्रतापनगर तक लगभग बारह मील लम्बा और दस-बारह फिट चौड़ा सम्पर्क मार्ग भी बना। प्रत्येक वर्ष मई माह में राजा व राजपरिवार, मंत्रीगण तथा मुख्य कारिन्दों सहित प्रतापनगर चले जाते थे। बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि राजा, राजपरिवार के सदस्य व दासियों को भी पालकियों पर ढोया जाता था। जिसके लिये तब बेगार प्रथा प्रचलन में थी। यह हो सकता है कि टिहरी के बाद पहला पड़ाव पांच मील दूरी पर मदननेगी में पड़ता होगा, सभी लोग यहां पर कुछ देर सुस्ताकर टिहरी का विहगंम दृश्य देखकर ही आगे बढते होंगे।

Monday, April 13, 2020

कहानी - 'द क्वारनटाईन डेज'

              कशरी को सूचना मिली कि उसका बेटा किड़ू शहर में महामारी की चपेट में आ गया। सूचना गांव के लड़के भगत ने ही भेजी थी। कशरी ने किड़ू से बात करने के लिए बड़े बेटे हरि को कहा। हरि ने फोन मिलाया तो किड़ू का मोबाइल बंद पड़ा था। हरि ने फिर भगत को फोन मिलाना चाहा तो उसका मोबाइल भी अब बन्द मिला। शायद फोन चार्ज नहीं कर पाया होगा, उसने सोचा। कई बार फोन लगाया तो स्विच ऑफ। कहीं ऐसा तो नहीं कि भगत ने सवाल-जवाब से बचने के लिए ही मोबाइल ऑफ कर दिया हो। ऐसी आशंका होनी भी लाजिमी थी, क्योंकि इस वैश्विक महामारी के दौर में हर कोई अपने को ही बचाने में लगा था।
             किड़ू को शहर गए हुए अभी साल भर ही हुआ था, उस शहर में भगत ही उसका सहारा था। हालांकि वह उनकी बिरादरी का नहीं था परन्तु परदेश में तो लोग ढूंढते हैं कि कोई अपना हो। फिर भगत तो गांव का ही था। भगत कई सालों से वहाँ पर था और उसके बच्चे भी साथ थे। किड़ू ने फोन पर बताया था कि होटल की नौकरी से फुर्सत कम ही मिलती है, रात ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे तक काम निबटा पाते हैं और फिर बिस्तर में जाने तक रात के बारह बज ही जाते हैं। फिर भी वह भगत भाई के यहां दो बार हो आया है।
             किड़ू बीच-बीच में भाई और माँ से फोन पर बात कर लेता था। एक दिन फोन पर रुआंसा होकर कह रहा था माँ, गांव में तो हम लोग अन्धेरा होने तक खाना पका लेते हैं और फिर जल्दी खा भी लेते हैं। परन्तु इस नामुराद शहर में लोग रात दस-ग्यारह बजे तक सड़कों पर घूमते रहते हैं। देर में सोते हैं तो सुबह देर से उठते हैं। हमारी दिनचर्या भी वही हो गयी है। उठने के साथ ही हमारा काम शुरू हो जाता है। दोपहर भोजन के बाद तीन घंटे की छुट्टी मिलती है, बस।
               भगत ने ही एक दिन फोन पर सूचना दी कि 'महामारी में संक्रमण से बचने के लिए लॉकडॉउन किया गया है जिसके चलते शहर के सभी होटल बन्द हो चुके हैं। किड़ू जिस होटल में काम करता है वह भी बन्द हो गया है। होटल का मालिक जो स्वयं मैनेजर भी है, माली, धोबी, स्वीपर व नौकरों का हिसाब करके और ताला लगाकर चला गया है। होटल कर्मचारी जिनके घर आसपास थे वे भी किसी प्रकार चले गए हैं। परन्तु किड़ू के साथ उसके दो साथी हैं जो नहीं जा पाए। होटल के सबसे नीचे की कोठरी में उनके रहने खाने की व्यवस्था तो है पर किड़ू गांव लौटने के लिए बेचैन है।' सुनकर माँ कशरी मायूस हो गई। कहने लगी, हमारी भगवती किड़ू को जरूर घर लाएगी।
                 चार दिन बाद भगत का फिर फोन आया कि ‘किड़ू संक्रामक बीमारी की चपेट में आ गया है। उसके दोस्तों ने ही बताया कि उसे होटल के ही पुराने गैराज में रखा गया है। दोस्त बांस की लंबी सीढ़ी के छोर पर सुबह शाम खाने का पैकेट और पानी की बोतल बांधकर सीढ़ी उसकी ओर खिसका देते हैं और किड़ू खाकर वहीं पड़ा रहता है। उसके पास कोई नहीं जा रहा है क्योंकि यह बीमारी ही ऐसी है। उसके साथियों ने एक भले आदमी के माध्यम से सरकार को सूचना भिजवा दी है, सरकारी लोग आते ही होंगे और उसे अस्पताल ले जाएंगे।’ उसके बाद भगत से भी बात नहीं हो पाई।
                   कशरी ने अपने बेटे हरि ही नहीं भतीजे और गांव के कई लोगों से विनती की, हाथ जोड़े कि कोई तो उसके बेटे किड़ू की खोज-खबर करे, उसकी जिन्दगी बचाए। परन्तु लॉक डाउन के चलते सबने हाथ खड़े कर दिए थे तो कशरी आवेश में आ गयी और गुस्से में बोली; ‘हरि, मैं जानती हूँ कि तेरे मन में क्या है, किड़ू की जैदाद(जायदाद) पर तेरी नजर है। जा ला कागज और बुला पंचों को मैं अंगूठा लगा लेती हूँ। यदि तू नहीं जाता  तो मैं ही शहर चली जाती हूँ और अपने किड़ू को घर ले आऊंगी। देखती हूँ कैसे रोकेगी सरकार एक माँ को उसके बेटे से मिलने से।’ इतना कहकर वह फूट-फूटकर रो पड़ी। हरि माँ की पीड़ा समझ रहा था पर यह भी जान रहा था कि इस लॉक डाउन में कोई कैसे कहीं जा सकता है। सभी विवश हैं। पूरा जिला, पूरा राज्य क्या, पूरा देश ही नहीं बल्कि पूरा संसार ही।
                    दो हफ्ते से अधिक समय गुजर गया था परन्तु लॉक डाउन अभी भी जारी था। किड़ू की कहीं से भी कोई सूचना नहीं मिली, गांव में सबकी जुबान पर यही चर्चा थी। सूचना प्रसार के प्रचुर साधन होने के कारण सभी लोग इस बीमारी की भयावहता से भली-भांति परिचित हो चुके थे। किड़ू के बहाने लोग अपनों को भी याद करने लगे जो दूसरे शहरों में रह रहे थे। एक दिन गांव के बहुत से लोग मन्दिर प्रांगण में इकट्ठा हुए और महामारी तथा गांव से बाहर रहने वाले लोगों के बारे में चर्चा करने लगे। बचनू दा, जिनके बेटे-बेटियां संयोग से परदेश में नहीं थे, गांव व आसपास के कस्बों में ही रहकर गुजारा कर लेते थे, ने कहा कि ‘ऐसी स्थिति में शहर गए हुए अपने लोगों को गांव नहीं लौटना चाहिए। जैसे भी है हम लोग रूखा-सुखा खाकर, अभाव में रहकर गांव में सुख चैन से तो हैं। अब शहर गये लोग गांव लौटेंगे तो क्या भरोसा कि वह खतरनाक बीमारी भी साथ लेकर न आये। वे वहीं पर रहे। ईश्वर करे वे राजी-खुशी से रहें और खुदा न खास्ता कुछ बात हो भी जाती है तो शहरों में अस्पतााल वगैरा तो हैं ही। कम से कम हमारे पुरखों द्वारा बसाया यह यह गांव तो बचा रहेगा।’ गांव के तीन-चार बदनाम लड़कांे ने अति उत्साह दिखाते हुये बचनू दा की बात का समर्थन करते हुये आगे जोड़ दिया कि ‘शहरों से गांव लौट रहे लोगों को वे आने नहीं देंगे। वे संकल्प लेते हैं कि नीचे सड़क से जैसे ही कोई भी गांव की चढ़ाई चढ़ना शुरू करेगा हम लोग ऊपर से पथराव कर देंगे। चाहे अपना भाई ही क्यों न हो। (यह अलग बात थी कि उनमें से किसी का भी कोई भाई-बहन परदेश में नहीं था) हमें तो जिन्दा रहना है भाई। ऐसा थोड़ी होता है कि जब तुम शहरों में पैंसे कमा रहे थे, मजे उड़ा रहे थे तब तुमने हमें मरने के लिए गांव में छोड़ दिया, कभी पलटकर भी नहीं देखा और अब संकट आया है तो गांव याद आने लगा। सामान्य बात होती तो ठीक था पर इस संक्रमण के दौर में? नहीं, नहीं। अरे भाई, तुम लोग तो सारे सुख भोग चुके हो, मर भी जाओगे तो क्या फर्क पड़ता है। परन्तु हमें तो कम से कम लम्बी उमर जीने का सुख भोगने दो।’
                        बदनाम युवकों की बात सुनकर गांव के आठ-दस मर्द औरतें निकलकर आगे आए और उनके सुर में सुर मिलाने लगे, जबकि भले लोग बैठक छोड़कर चले गए। बेटे किड़ू के गम में डूबी कशरी के कानों में यह बात पड़ी तो वह गाली देने लगी। ‘तुम्हारे बाप-दादाओं का ही तो है यह गांव, जो तुम बाहर से आने वालों पर पथराव करोगे। तुमने ही तो इन खेतों, धारे-मंगरों के पुश्तांे की चिनाई की है सालों? खुद किसी काबिल नहीं हुए और परदेश जाकर कमाने वालों से ईर्ष्या करते हो।’ थोड़ी देर गहरी-गहरी सांसे लेने के बाद माथे पर दुहत्थी मारकर कशरी विलाप करने लगी ‘अरे, तुम ही अगर बाहर चले जाते तो हमारे खेतों से काखड़ी, मुंगरी, लौकी, कद्द,ू मटर, टमाटर कौन चुराता। गरीबों के छौने ही नहीं आये दिन पूरे के पूरे बकरे गायब कैसे हो जाते। गांव की बहू-बेटियों पर बुरी नजर कौन डालता। डूब मरो स्सालों....।’
                     कुछ दिनों बाद की बात है। अन्धेरा अभी ज्यादा नहीं हुआ था कि एक रोज एक साया गांव के नीचे सड़क पर रेंगता हुआ दिखाई दिया, जो शहर से आने वाली पगडण्डी से चलकर आया था और थोड़ी देर के लिए सड़क पर रुक गया था। शायद मंजिल पर पहुंचने की भावना से खड़े-खड़े सुस्ता रहा था। धीरे-धीरे वह गांव की पगडण्डी पर चढ़ने लगा। वह नशे में था या फिर बहुत थका हुआ, उसके पैर लड़खड़ा रहे थे।
                       संयोग कहें या दुर्योग कि बदनाम और उग्रवादी विचार रखने वाले उन चार लड़कों की नजर उस साये पर पड़ी तो उन्हें वह महामारी का साक्षात दूत दिखाई दिया। वे चारों एक साथ चिल्लाए ; ‘अरे, आ गया रे शहर से बीमारी की पुड़िया। भगाओ इसे।’’ वह कुछ कदम ही चढ़ पाया था कि लड़कों ने उस पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिये। वह गिड़गिड़ाया,‘रुको, पागल हो गए हो क्या? अरे, मैं इसी गांव का हूँ भाई, किड़ू। इसी गांव का खाद-पानी मेरी रगों में भी है। पाँच दिन से लगातार भूखा-प्यासा चलकर आज अपनी धरती पर पहुँचा तो तुम लोग मुझे भगा रहे हो। मेरी पीड़ा तुम क्या जानो नामुरादों? जंगली जानवरों की परवाह किये बिना मैं रात में चलता था और दिन में पुलिस की डर से झाड़ियों में छिपा रहता। लॉक डाउन के चलते कहीं एक बिस्कुट का पैकेट तक नहीं मिला। नदी नालों के पानी से प्यास बुझाता रहा। सोचा माँ, भाई-भाभी के दर्शन करूंगा और गांव के अपने बड़े-छोटों के बीच कुछ दिन रहूंगा। परन्तु तुम लोग तो रिश्ते ही भूल गए हो। इंसानियत ही भूल गए। जाने किस आदिम युग में जी रहे हो। मेरे भाई, मेरा कसूर तो बताओ।’ परन्तु कुत्तों को जैसे कमजोर पशु का शिकार करने में आनन्द मिलता है ठीक उसी प्रकार बिना कुछ कहे-सुने वे पत्थर बरसाते रहे। इस अप्रत्याशित हमले से किड़ू लहूलुहान हो गया, कपड़े खून से लथपथ हो गये थे और अब अधिक देर तक खड़े रहने की ताकत उसके अन्दर नहीं बची थी। चुपचाप वापस मुड़ा और थोड़ी दूर जाकर झाड़ियों में कटे पेड़ सा गिर पड़ा। 
                    होश आया तो देखा रात आधी से अधिक बीत चुकी थी। किड़ू ने उठने की कोशिश की तो उठ नहीं पाया। शरीर असमर्थ हो गया था पर मन में अनेक खयाल आते रहे। सोचता किसी ऊंची चट्टान से कूदकर आत्महत्या कर लेता हूँ। फिर सोचा जब इतनी दूर से आ गया हूँ तो माँ से तो मिलना जरूरी है।
                   पूरा गांव सुनसान था, किड़ू कुहनियों और घुटनों के बल रेंगता हुआ एक मील की चढ़ाई चढ़कर अपने घर के आंगन तक पहुंच गया। चारों ओर घनघोर अन्धेरा था। सभी दरवाजे खिड़कियां बन्द थी। भूख, थकान और चोटों से उसकी आवाज भर्रा गयी थी। उसने दरवाजे पर पहुंचकर माँ को पुकारा, तो भीतर माँ कशरी बेचैन हो उठी। उसने हरि से कहा, ‘देख, किड़ू की आवाज सी सुनी मैंने।’ परन्तु माँ को हरि ने यह कहकर रोक दिया कि ‘माँ तुम्हारा भ्रम है। जब लॉक डाउन में चिड़िया तक नहीं उड़ रही है तो सौ मील दूर से बीमार किड़ू कैसे आ सकता है। लॉक डाउन जैसे ही खुलेगा मैं खुद ही चला जाऊंगा उसे लेने।’ जबकि सच्चाई यह थी कि हरि ने रात में ही उड़ते-उड़ते सुन लिया था कि किड़ू गांव पहुँच चुका है और हरि तब से ही भयभीत था, वह किसी भी कीमत पर नहीं चाहता था कि किड़़ू के कारण वह अपना परिवार खो बैठे। यह बीमारी है ही ऐसी। देर तक किड़ू पुकारता रहा पर किसी ने नहीं सुना। कुदरत को कुछ और ही जो मंजूर था।
    सुबह हरि ने दरवाजा खोला तो देखा कि किड़ू हाथों में एक छोटा सा बैग पकड़े हुए आंगन में औंधा लेटा हुआ था। हरि ने दरवाजे पर ही खड़े होकर गौर से देखा तो किड़ू की सांसे नहीं चल रही थी तो उसकी रुलाई फूट पड़ी। सुनकर माँ भी दरवाजे पर आ गयी और बाहर का नजारा देखकर वह दहाड़ मारकर किड़ू की ओर लपकने लगी। पर हरि ने अपने मजबूत हाथों से माँ को दरवाजे पर ही रोक दिया। अब हरि व उसकी पत्नी असमंजस में थे कि किड़ू के पास कौन जाएगा। संयोग से ठीक उसी समय वहाँ पर गांव के बुजुर्ग मकान सिंह आ धमके, वे शायद गांव में किसी को मिलने जा रहे थे। उन्होंने कुछ देर जमीन पर पड़े किड़ू को देखा, सामने माँ को जबरन द्वार पर रोके हरि की ओर देखा तो माजरा समझ गया।
    मकान सिंह ने दुनिया देखी थी और कई नामी सन्तों के सम्पर्क में आश्रमों में रह चुका था। मकान सिंह ने ‘मृत्यु तो निश्चित् है और दिन भी पहले से ही तय है तो फिर मौत से क्या घबराना’ कहते-कहते किड़ू को पलटकर सीधा किया तो देखा उसके प्राण पखेरू उड़ चुके थे। दुखी होकर उन्होंने उसका बैग टटोला, बैग में एक जोड़ी कपड़े थे, पचास-साठ हजार की नकदी थी- जो किड़ू ने पाई-पाई कर जोड़ी होगी और बैग में सरकारी अस्पताल द्वारा जारी एक प्रमाणपत्र भी था, जिसमें ‘‘पन्द्रह दिन तक क्वारनटाईन में रखकर किशोर सिंह (अर्थात किड़ू) की जांच निरन्तर की गई परन्तु जांच में कुछ नहीं पाया गया। अतः उन्हें अस्पताल से मुक्त कर दिया गया है।’’ स्पष्ठ लिखा हुआ था। मकान सिंह ने हरि को धिक्कारते हुये वह प्रमाणपत्र और बैग उसकी ओर फेंका और स्वयं आगे बढ़ गया।
    हरि की पकड़ कुछ ढीली हुयी तो कशरी दौड़ते हुये दहाड़ मारकर बेटे किड़ू के शरीर के ऊपर गिर पड़ी। हरि ने सुबकते हुये नगदी वाला बैग पास खड़ी पत्नी को पकड़ाया और माँ को किड़ू के मृत शरीर से अलग करने लगा। परन्तु माँ तो किड़ू के साथ ही परलोक सिधार चुकी थी।
    श्मसान घाट पर दो चितायें सजायी गयी और दोनो शव चिता पर रखे गये तो गांव के लोग एक-दूसरे से पूछने लगे यार, कशरी तो बेटे के गम में मरी, साफ है। पर, किड़ू इतनी बड़ी जंग जीतने के बाद घर पहुँच गया था। तो फिर उसकी मौत थकान के कारण हुयी या भूख के कारण या गांव के लड़कों द्वारा लहूलुहान करने से या फिर बार-बार पुकारने पर भी भाई और माँ द्वारा दरवाजा न खोलने के सदमें से?