Thursday, March 31, 2011

लोक संस्कृति व लोकपरम्परा के सजग प्रहरी हैं बी० मोहन नेगी

नेगी जी का विस्तृत परिचय आपने 28 मार्च व 30 मार्च 2011 की पोस्ट में पढ़ा;
प्रस्तुत है नेगी जी के शिल्प से परिचय का अगला पड़ाव -
2- बिन्दुओं (dots) द्वारा रेखाचित्र- यह विधा मूल रूप से यद्यपि रेखांकन ही है किन्तु इसमें बीच के स्थान को बिन्दुओं द्वारा भर कर नेगी जी ने अभिनव प्रयोग किया है. जिससे इस श्रेणी के रेखांकन सम्मोहित करते से प्रतीत होंते हैं. इन चित्रों के माध्यम से उन्होंने लोकपरम्पराओं व लोकसंस्कृति के विभिन्न रंग उकेरे हैं.          

Tuesday, March 29, 2011

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी है बी0 मोहन नेगी

नेगी जी का विस्तृत परिचय आपने पिछले अंक में पढ़ा;
प्रस्तुत है नेगी जी के शिल्प से परिचय  -
1-रेखाचित्र- इस विधा के माध्यम से उन्होंने हिमालयी सौन्दर्य, लोकजीवन, लोकपरम्परा व श्रृंगार के संयोग व वियोग पक्ष को अभिव्यक्त किया है.                                    




                                           जारी है अगले अंक में ......     

Monday, March 28, 2011

बी0 मोहन नेगी - जिनके आराध्य है रेखा और बिंदु -1

           उत्तराखंड हिमालय ही नहीं अपितु हिंदी की साहित्यिक व सामाजिक सरोकारों वाली पत्र पत्रिकाओं से वास्ता रखने वाले ऐसे विरले ही होंगे जो बी0 मोहन नेगी जी की कला से वाकिफ न हो. सीधी व आड़ी - तिरछी रेखाओं और बिन्दुओं को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर लगभग पिछले चार दशक से साधनारत है. प्राकृतिक सुषमा से परिवर्धित हिमालय का सम्मोहित करने वाला सौन्दर्य वर्णन हो या हिमालय वासियों की प्रकृति प्रदत्त सहजता, सरलता व निश्चलता हो या फिर अल्हड चंचल बालाओं का स्वाभाविक नख सिख वर्णन अथवा अभावग्रस्त नारी की पीड़ा हो सभी कुछ अभिव्यक्त हुआ है उनके चित्रशिल्प में.
  जो कुछ सीखा प्रकृति के सानिद्ध्य में सीखा. स्कूल कालेज में इस तरह के प्रशिक्षण का सौभाग्य ही नहीं मिल पाया. नेगी जी वार्ता के दौरान कहते हैं "......... अभिभूत करने वाला हिमालय का यह सौन्दर्य स्वयं ही शिक्षक है और  यही सौन्दर्य मेरी प्रेरणा को स्फुरित व अनुप्राणित करता है. हिमालय के पास हमें देने के लिए अपार सम्पदा है...."    
और सच भी है हिमालय के सौन्दर्य पर मर मिटे थे प्रकृति के चितेरे कवि सुमित्रानंदन पन्त; " 
छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, 
तोड़ प्रकृति से भी माया, 
                                         बाले ! तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूं लोचन, ......"  
और अपने काफलपाकू कवि चन्द्र कुंवर बर्त्वाल ने लिखा है; "  
   जाने  कितने प्रिय जीवन, 
    किये मैंने तुझको अर्पण, 
           माधुरी मेरे हिमगिरी की. ...."  
यह नेगी जी का हिमालय प्रेम ही है कि देहरादून जन्मस्थली होने के बावजूद वे पौड़ी जाकर बस गए. रेखाओं द्वारा देवी, देवताओं के चित्र उकेरने का सिलसिला किशोरावस्था में शुरू हुआ जो शौक बन गया और फिर साधना. वे कब प्रकृति के मोहपाश में बन्ध गए समझ ही नहीं पाए. जब भान हुआ तो प्रकृति उनकी सहचरी बन चुकी थी. अपने मित्रों के सहयोग से सन 1984 में गोपेश्वर में जब पहली कविता पोस्टर की प्रदर्शनी लगाई तो दर्शक दंग रह गए. सब वाह-वाह कह उठे. तब से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. देश के विभिन्न नगरों, महानगरों में अपनी चित्रकला की प्रदर्शनी लगा ख्याति अर्जित कर चुके हैं 
परन्तु आज भी चरैवैती, चरैवैती उनका मूल मंत्र है. 
         ऐसा भी नहीं कि नेगी जी ने चित्रकला को धनोपार्जन का साधन बनाया हो. कहते हैं, " जिसमे लालच हो, स्वार्थ हो वह कला कैसी ? कला तो ईश्वर को समर्पित की जानी चाहिए. आजीविका के लिए नौकरी ही काफी है. ......" सच भी है उनसे पत्र या फोन द्वारा निवेदन किया जाय कि इस प्रयोजन हेतु कुछ चित्रों की आवश्यकता है तो मैं समझता हूँ उन्होंने 'ना' कदाचित ही किसी को किया हो. 
         नेगी जी जितने बड़े चित्रशिल्पी हैं उतने ही सरल, मृदुभाषी व व्यवहार कुशल. उनकी स्निग्ध मुस्कान बरबस आकर्षित करती है. आत्मीयता इतनी कि पौड़ी जाना हो तो उनसे मिले बिना नहीं रहा जाता. और संभवतः इसीलिये उनके चाहने वालों की कतार बहुत लम्बी है.
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी भाई नेगी जी की कला को शिल्प की दृष्टि से चार भागों में विभक्त किया जा सकता है, 1 - रेखाचित्र   2 - बिंदुओं (dots) द्वारा रेखाचित्र   3 - कविता पोस्टर और   4 - कोलाज
                                                                                              नेगी जी के शिल्प से परिचय अगले अंक से......
                                                                                                                                    

Thursday, March 24, 2011

शून्य क्षितिज के पार

मन उदास होता है बहुत
जब आती है याद तुम्हारी.
चाहत की आस लिए 
सपनों के पंख लगाकर 
उड़ता है यह मन 
शून्य क्षितिज के उस पार.
और शाम की लालिमा 
उतर आयी है धरा पर .
पक्षियों का कोलाहल 
निश्छल, शांत वातावरण में 
छेड़ जाता है मधुर संगीत 
चुराकर जैसे तुम्हारी आवाज !

आलिंगन में लेने आकाश को
शिखरों सी ऊंची बाहें फैलाये 
आतुर बनी यह धरती,
और जाने क्यों
याद आने लगता है फिर से -  
उन संगमरमरी बाँहों का बंधन,
गंध तुम्हारी देह की 
बसी जो है साँसों में 
असह्य पीड़ा, अपार दुःख लिए यह मन 
लौट आना चाहता है फिर से
तुम्हारे गेसुओं की छांव में !!

Friday, March 18, 2011

हो ली है !!!

  मत जा रे पिया होली आयी रही 
 जिनके पिया परदेश भयो है           
 उनकी नारी रोई रही, मत जा रे पिया.............  
                उत्तराखंड में होली मनाने की कई पद्धतियाँ प्रचलित है. कुमाऊ में होलिका दहन के काफी पहले से बैठ होली मनाई जाती है .इसमें बड़े बुजुर्ग होरी के गीतों को एक स्थान पर बैठ कर गाते हैं और एकादशी से छरड़ी तक गाँव, गाँव घर-घर जाकर यह गीत गाये जाते हैं. गढ़वाल में एकादशी को मेहल की टहनी को होलिका का प्रतीक मानकर पंचायती चौक में गाड़कर पूजा जाता है, उस पर रंगीन कपड़ों के टुकड़े व पैसे बांधकर सजावट की जाती है और उसके चारों ओर घूम-घूम कर होरी गीत गाये जाते हैं............. 
            शहरी क्षेत्रों में गुझिया व अन्य पकवान बनते हैं तो गढ़वाल में भूड़ी-पकोड़ी बनाकर खुशियां मनाई जाती है. होलिका दहन के बाद तो समूचा पहाड़ रंगों से नहा उठता है............ 
                                                                 प्रीतम अपछ्यांण के लेख "  उत्तराखंड के होरी गीत से "  साभार     
        

                   !!!  इब्लॉ हुँने  वाले  !!!









भी लिखाड़ीयों को होली की रं बिरंगी शुकानायें 

Saturday, March 12, 2011

नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों में बसंत वर्णन - 2


बसंत को ऋतुराज कहा जाता है. बसंत पंचमी से बसंत का आगमन माना जाता है. किन्तु पहाड़ों में शीत अधिक होने के कारण बसंत का चरम चैत्र मास ही माना जाता है. (चैत्र की शुरुआत तो फाल्गुन पूर्णिमा (होली) के बाद  मानी जाती है. किन्तु नेपाल व पंजाब आदि की भांति उत्तराखंड हिमालय में चन्द्र मास नहीं अपितु सूर्य मास के आधार पर तिथि की गणना होती है और सूर्य मास के अनुसार चैत्र प्रायः 14 या 15 मार्च से प्रारंभ होता है.) बसंत उन्माद का महीना है, रंग विरंगा बसंत जीवन की विविधता को दर्शाता है किन्तु यह भी सत्य है कि बसंत में विरह की तड़प और भी बढ़ जाती है. गढ़ शिरोमणि, गढ़ रत्न आदि अनेकानेक सम्मान व पुरस्कारों से सम्मानित जनता के सरताज और गढ़वाली भाषा के सशक्त हस्ताक्षर भाई नरेन्द्र सिंह नेगी की अनेक कविताओं में बसंत ऋतु और विरह का वर्णन मिलता है. नेगी जी की रचनाओं में बसंती बयार में नायक नायिका का मन मयूर नाच उठता है तो कहीं यही बसंत व्याकुल हृदयों के लिए कसक का कारण बन जाता है. बसंत ऋतु को माध्यम बनाकर गढ़ हिमालय का सौन्दर्य वर्णन उनकी काव्य कला का उत्कर्ष है.    
बसंतऋतु पर नेगी जी की ये कवितायेँ उत्कृष्ट रचनाओं में रखी जा सकती है;
1 . ऋतु चैत की......  2. बसंत ऋतु मा जैई........ 3 . कै बाटा ऐली......... और 4 . हे जी सार्यूं मा बौड़ीगे.......
२. - बसंत ऋतु मा जैई
मेरा डांडी कान्ठ्यूं का मुलुक जैल्यु बसंत ऋतु मा जैई, 
बसंत ऋतु मा जैई.......... 
हैरा बणु मा बुरांशी का फूल जब बणाग लगाणा  होला,
भीटा पाखों थैं फ्यूंली का फूल पिंगल़ा रंग मा रंगाणा होला,
लय्या पय्यां ग्वीर्याळ फुलू न होली धरती सजीं देखि ऐई. बसंत ऋतु मा जैई.......... 
{ भावार्थ:  नेगी जी ने वर्णन किया है कि मेरे पहाड़ों में जब भी जाना चाहोगे तो बसंत ऋतु में जाना. जब हरे भरे जंगलों में सुर्ख लाल रंगों में खिले बुरांश के फूल धधकती हुयी अग्नि का आभास करायेंगे, घाटियों को फ्योंली के फूल बासंती रंग में रंग रही होगी और शेष धरती लाई (सरसों), पय्यां और ग्वीराळ (कचनार) के फूलों से रंगी  अपनी सुन्दरता का बयां कर रही होगी. }
नेगी की गीतों में प्रकृति चित्रण हो या विरह की पीड़ा, विशेषता यह है कि सारे उपमान स्थानीयता से लिए गए हैं. उन्होंने अपने गीतों में पतंग, मोर, कमल पुष्प आदि शब्दों का प्रयोग नहीं किया है. वे अपने गीतों के माध्यम से गढ़वाली के विस्मृत शब्दों को भी सामने लाये हैं. अपने गीतों में जो बिम्ब उन्होंने उभारे हैं  यह उनकी अद्भुत कल्पना शक्ति से ही संभव हुआ है.
इसी गीत की  दूसरी अंतरा में उन्होंने हिमालय की अद्भुत छटा के साथ गढ़वाल की लोकरीति और लोक परंपराओं का वर्णन किया है.
बिन्सिरी देळयूं मा खिल्दा फूल  राति गौं गौं गितान्गु का गीत,
चैती का बोल औज्युं का ढोल  मेरा रौन्तेळl मुल्कै की रीत,
मस्त बिगरैला बैखु का ठुमका बांदू का लसका देखि ऐई.  बसंत ऋतु मा जैई..........    
{भावार्थ : वर्णन है कि मेरे पहाड़ों में बसंत ऋतु में जब जाओगे तो वहां परम्परानुसार मुंह अँधेरे ही देहरी पर फूल डले हुए दिख जायेंगे, तो  गाँव गाँव में लोक कलाकारों द्वारा पूरी-पूरी रात गीत सुनने को मिलेंगे. नयनाभिराम दृश्य समेटे मेरे पहाड़ की लोकरीति के अनुसार पूरे साल नहीं केवल चैत के महीने ही मांग कर गुजारा करने वाले 'चैती' के भावपूर्ण बोल और ढोल वादकों के ढोल पर मंत्रमुग्ध ताल भी आपको सुनने को मिलेगी, वहीं इतराते इठलाते मस्त युवाओं के ठुमके भी देख सकोगे तो चित्ताकर्षक अभिनय करती सुंदरियों का नृत्य भी.}
दूरदर्शन द्वारा कुछ वर्ष पूर्व एक प्रोग्राम आया था " नोस्टाल्जिया ऑफ़ मुकेश ". जिसमे मुकेश की जादू भरी आवाज में ' मेरा जूता है जापानी ......'  ' हम उस देश के वासी हैं ........'  आदि गीतों का प्रसारण किया गया. मुकेश के इन गीतों को किसने लिखा, किसने संगीत दिया नहीं जानता हूँ. किन्तु नेगी ने प्रकृति के सानिदध्य में रहकर सारे गीत स्वयं लिखे हैं,  संगीत भी स्वयं दिया और प्रत्येक गीत को उसके भावानुसार प्रभावी स्तर पर टिकाये रखकर स्वयं गाया है. गीत, संगीत और स्वर, पूरे माद्यम पर उनकी अद्भुत पकड़ है.
इसी गीत की एक और अंतरा में देखिये ;
 सैणा दमाला अर चैते बयार  घस्यारी गीतुन गुन्ज्दी डांडी 
खेल्युं मा रंगमत ग्वैर छोरा  अटगदा गोर घमणान्दी घांडी 
उखी फुंडै होलू खत्युं मेरु बि बचपन उक्रि सकिलि त उक्री क लैयी. बसंत ऋतु मा जैई..........
{भावार्थ : वर्णन है कि दूर- दूर तक फैले हुए समतल बुग्यालों के मेरे पर्वतीय प्रदेश में आपको चैत में मकरंद लिए मदहोश करती मंद-मंद बहती बसंती बयार का अहसास होगा और पहाड़ियों पर विरहा भोगती या अपना दर्द बयां करती कारुणिक आवाज में घसियारिनों के गीत गूंजते सुनोगे. एक ओर जहाँ पालतू पशु जंगल में खा पीकर मस्ती में उछलते कूदते गले में बंधी घंटियों से वातावरण को संगीतमय बना रही होंगी. वहीं ग्वाले खेल में सब कुछ भुलाये बैठे होंगे. और , हाँ ! वहीं आस पास ही कहीं मेरा बचपन बीता है, जिसे याद कर मै भावुक हो जाता हूँ , उन यादों को, उन स्मृतियों को यदि तुम उठाकर ला सकोगे तो अवश्य ले आना.}   
                                                                                            अगले अंक में -  हे जी सार्यूं मा बौड़ीगे.............

Thursday, March 10, 2011

नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों में बसंत वर्णन


       चैत्र मास शुरू होने में अब एक सप्ताह से भी कम का समय शेष है. वैसे चैत्र की शुरुआत तो फाल्गुन पूर्णिमा (होली) के बाद ही होगी. किन्तु नेपाल देश व पंजाब आदि राज्यों की भांति उत्तराखंड हिमालय में चन्द्र मास नहीं अपितु सूर्य मास के आधार पर तिथि की गणना होती है. और सूर्य मास के अनुसार चैत्र 14 या 15 मार्च से प्रारंभ होता है. बसंत को ऋतुराज कहा जाता है. बसंत पंचमी से बसंत का आगमन माना जाता है किन्तु पहाड़ों में शीत अधिक होने के कारण बसंत का चरम चैत्र मास ही माना जाता है. बसंत उन्माद का महीना है, रंग विरंगा बसंत जीवन की विविधता को दर्शाता है किन्तु पहाड़ की विषमताओं व अभाव के कारण यहाँ का जीवन विरह प्रधान है और बसंत में विरह की तड़प और भी बढ़ जाती है. गढ़ शिरोमणि, गढ़ रत्न आदि अनेकानेक सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित जनता के सरताज और गढ़वाली के सशक्त हस्ताक्षर भाई नरेन्द्र सिंह नेगी की अनेक कविताओं में बसंत ऋतु और विरह का वर्णन मिलता है. नेगी जी की रचनाओं में बसंती बयार में नायक नायिका का मन मयूर नाच उठता है तो कहीं यही बसंत व्याकुल हृदयों के लिए कसक का कारण बन जाता है. बसंत ऋतु को माध्यम बनाकर गढ़ हिमालय का सौन्दर्य वर्णन उनकी काव्य कला का उत्कर्ष है.    
  बसंत ऋतु पर नरेन्द्र सिंह नेगी जी की ये चार कविताएं उत्कृष्ट रचनाओं में रखी जा सकती है;
1 . ऋतु चैत की...  2. बसंत ऋतु मा जैई.... 3 . कै बाटा ऐली.... और 4 . हे जी सार्यूं मा बौड़ीगे.......
 ऋतु चैत की...
 डांडी कांठी को ह्यूं गौळीगी होलू, मेरा मैत कु बोण मौळीगी होलू 
चखुला घोलू छोड़ी उडणा होला, बेटुला मैतुड़ा को पैटणा होला.
घुघूती घुरौंण लगीं मेरा मैत की, बौड़ी बौड़ी ऐगे ऋतु ऋतु चैत की............
(भावार्थ: मायके की याद में दिन गिन रही बेटी बसंत आते ही तड़प उठती है और उसके मुंह से बोल फूट पड़ते हैं कि - पहाड़ों की बर्फ अब पिघल चुकी है, चारागाहों में नयी नयी कोपलें फूट आयी होगी, चिड़ियाएँ भी घोसले से बाहर निकलकर खुली हवा में उड़ रही होगी और बेटियां मायके की तैयारी कर रही होगी. क्योंकि चैत्र मास लौट आया है और घुघूती (फाख्ता )अब अपनी मधुर आवाज में तड़प को और बढ़ा रहा है.)
  इसी गीत की दूसरी अंतरा में गढ़वाल हिमालय का सौन्दर्य वर्णन यहाँ की लोकपरम्परा और लोक जीवन के साथ मिश्रित होकर अनुपम छटा बिखेरता है.
डांडयूं खिलणा होला बुरांशी का फूल, पाख्युं हैंसणी होली फ्योंली मुलमुल.
फुलारी फूलपाती लेकी देळयूं देळयूं जाला, दगडया भाग्यन थड्या चौंफल़ा लगाला.  
घुघूती घुरौंण लगीं मेरा मैत की, बौड़ी बौड़ी ऐगे ऋतु ऋतु चैत की...........
 (भावार्थ: ऊंचे पहाड़ों में जहाँ बुरांश के फूल खिले होंगे वहीं घाटियों में फ्योंली के फूल मंद मंद मुस्करा रही होंगी . बसंत ऋतू के आगमन पर देहरी देहरी पर फूल डालने वाले बच्चे घर घर जायेंगे और भाग्यशाली सहेलियां  थड्या और चौंफल़ा नृत्य पर थिरकंगी. क्योंकि चैत्र मास लौट आया है......... )
                                                                                                           अगले अंक में -  बसंत ऋतु मा जैई....

Thursday, March 03, 2011

दास्तान मेरे सुल्तान की

बच्चों की जिद और कुछ आस पड़ोस की देखा-देखी,
माँ और पत्नी की लाख मनाही के बावजूद,
पाई, पाई जोड़ कर संकट के लिए रखे पैंसों से
खरीद लाया मै विदेशी नस्ल का एक कुत्ता.
मैथ्स, फिजिक्स के फार्मूलों से कहीं अधिक 
कुत्ते की प्रजातियाँ है याद मेरे होनहार बच्चों को, 
इसलिए पूँछ कटे इस कुत्ते को उन्होंने 'डोबरमैन' बताया.  

इस विदेशी पूँछ कटे कुत्ते की पीठ सहलाते जाने क्यों 
बाबा भारती सा आनन्दित हो जाता हूँ मै,
और भावनाओं के अतिरेक में बह मैंने भी 
नाम 'सुल्तान' रखा है इस पूंछ कटे कुत्ते का.
गाँव में कभी गाय, बैल, भैंसों के सींगों को बार-त्यौहार 
तेल लगा चमकाते जो खुशी होती थी मेरे बड़े- बूढों को
उससे कहीं अधिक पुलकित होता हूँ जब
नहलाता हूँ शैम्पू से सुल्तान को हर इतवार मल-मल कर.

गर्दन पर बंधी मोटी चमकीली सांखल पकड़े
तमगे लटकाए फौजी अफसर सा अकड़ कर मै
कुत्ता घुमाने (नहीं, नहीं , कुत्ता हगाने) के बहाने रोज 
सुबह-सवेरे निकलता हूँ मोहल्ले की सड़कों पर.
मेरी भी थोड़ी इज्ज़त बढ़ गयी है मोहल्ले में 
कल तक वर्मा जी ! वर्मा जी ! कहने वाले पडोसी 
वर्मा साहब कह कर अब पुकारने लगे हैं. 
सड़कों पर अक्सर फब्तियां कसते आवारा लड़के भी
अंकल जी !अंकल ! जी कह अब मान देने लगे हैं.

किताबों से दूर भागने वाला मै पढता हूँ गीता, रामायण की तरह 
अब  'फूडिंग एंड हैबिट्स ऑफ़ डॉग' जैसी किताबें.
वक्त बेवक्त धमक कर चाय सुड़कने वाले पडोसी,या
अख़बार के नाम पर सुबह वक्त ख़राब करने वाले पडोसी 
अब आते हैं सोच-समझ कर ही, क्योंकि अपने गेट के बाहर
मैंने भी लटका दी  है  'यहाँ कुत्ते रहते हैं ' की एक सुन्दर सी तख्ती. 

हर आगुन्तक को शक की नज़र से देखता या 
"  कुत्ता भय से भौंकता है "  की कहावत चरितार्थ करता 
जोर-जोर से भौंकता जब भी , तो न जाने क्यों 
मंत्रोच्चार कर स्वागत करता सा लगता मुझे कुत्ता .
ऊंचा कद, ऊंचे ओहदे वाला ही क्यों न हो आगुन्तक 
सोफे पर शान से उनके बराबर में जा बैठता है कुत्ता. 

पर हकीकत, साल भर बाद सुना रहा हूँ तुम्हे दोस्तों !
कुत्ते की सेहत मेंटेन रखने को हमारी वैष्णवी रसोई में पकने लगा मांस 
हंसी ख़ुशी गुजारा हो जाता था वेतन से, अब एडवांस, लोन लेकर भी 
नहीं बचता पैसा एक भी अपने पास. पहले 
तुलसी, गोमूत्र से गमकता था घर, अब टट्टी,पेशाब से गंधीयाता है घर. 
झूठी शान बखारता मै, मुटिया रहा खूब यह पूंछ कटा कुत्ता .
बीबी के ताने सुनता मै, खाली जेब भटकता, बन गया मै गली का कुत्ता. 
रोज हाथ जोड़ फरियाद करता हूँ खुदा से -कोई खडग सिंह आये और 
इस कलयुगी सुल्तान को धोखे से नहीं, खुशी खुशी लूट ले जाए. 



 

Monday, February 28, 2011

कण्व ऋषि की प्रतीक्षा में है कण्वाश्रम -3

अंतिम किश्त. ( क्रमशः अंक 2 से आगे  ............)
कण्वाश्रम                                                                 साभार गूगल
युधिष्टर के शाशनकाल तक कण्वाश्रम लोकप्रियता के चरम पर था. महारिशी वेदव्यास कुलपति तो रहे ही बल्कि उनके द्वारा अनेक ग्रंथों की सृजन स्थली भी यह आश्रम व मालिनी तट ही रहा. चाणक्य काल में यद्यपि तक्षशिला व मगध विश्वविध्यालय भी अस्तित्व में आ गए थे, किन्तु कण्वाश्रम महत्वहीन नहीं हुआ था. महाकवि के 'रघुवंशम' के अनुसार उनके समय में यह मथुरा के नीप वंशीय राजा सुवर्ण के अधीन था.  विदेशी आक्रमणों, छोटे-छोटे रजवाड़े बन जाने और संभवतः आश्रम को योग्य कुलपति न मिलने के कारण शनैः शनैः कण्वाश्रम अपना महत्व खोता गया और यह राहगीरों, यात्रियों, फकीरों का अड्डा बन कर ही रह गया.  
घाटी में सैकड़ों गुफाएं व समय समय पर उत्खनन के उपरांत प्राप्त भग्नावशेषों से यहाँ पर आश्रम होने की पुष्टि होती है. आश्रम के मानदंडो के अनुरूप यहाँ पर विद्यालय,छात्रावास, सम्मलेन स्थल आदि व कृषि योग्य प्रचुर भूमि भी आज भी है. कण्वाश्रम के छः-सात मील उत्तर में कौशिकी नदी किनारे विश्वामित्र की गुफा है जिसे स्थानीय लोग विस्तरकाटल कहते हैं, जो कि संभवतः विश्वामित्र काटल का अपभ्रंश है. आस पास सिद्धे  की धार, सिद्धे की गाजी आदि अनेक स्थल है. मालिनी उपत्यका के सौंदर्य ने "अभिज्ञानशाकुंतलम" जैसी अमर कृति के लिए भावभूमि का काम किया है. संभव है महाकवि कालिदास को मालविकाग्निमित्रं, रघुवंशम, कुमारसम्भवम आदि ग्रथों की सामग्री भी यहीं कहीं मिल गयी हो. 
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो समुद्र तल से लगभग साढ़े पांच सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित कण्वाश्रम विकास समिति, कोटद्वार  द्वारा विकसित स्थल के उत्तर में मध्य हिमालय है व दक्षिण में भावर (हल्की ढलान लिए मैदानी) क्षेत्र.  मालिनी के बाएं तट पर कोटला, गोरखपुर, नंदपुर, पदमपुर, शिवराजपुर, दुर्गापुर, मावाकोट, लिम्बूचौड़, घमंडपुर आदि गाँव  तो दायें तट पर उदैरामपुर, कमालगंज, भीमसिंग पुर, मानपुर, त्रिलोकपुर, गीतापुर, हल्दूखाता, किशनपुरी आदि गाँव है. मालिनी को मालन या मालिन नदी कह कर संबोधित किया जाने लगा है. वर्षा का औसत वर्ष दर वर्ष कम होने से मालिनी में पानी बहुत कम रह गया है. बल्कि यह कहना ज्यादा प्रासंगिक होगा की मालिनी वर्तमान में बरसाती नदी बन कर रह गयी है.  गढ़वाल मंडल विकास निगम द्वारा "कण्वाश्रम विश्राम गृह" बना तो दिया गया है किन्तु कोटद्वार से पांच छः मील दूर होने व सुविधाएँ न होने के कारण शायद ही कोई यहाँ रुकता हो. मुज़फ्फरनगर निवासी व्यक्ति द्वारा यहाँ पर एक गुरुकुल की स्थापना की गयी है किन्तु अभी गुरुकुल जैसा कुछ भी नहीं दिखाई दिया. कण्वाश्रम विकास समिति द्वारा प्रतिवर्ष बसंत पंचमी पर दो तीन दिन का मेला आयोजित करवा इति समझी जाती है. चिंता का विषय है कि हमें अपनी थाती, अपनी विरासत को सहेजने का सलीका कब आएगा ?  
       कोटद्वार उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल संभाग के अंतर्गत पौड़ी गढ़वाल जनपद का तहसील मुख्यालय है. यहाँ पर हनुमान जी के सिद्धबली मंदिर में दूर-दूर से भक्त दर्शनार्थ आते हैं, जो कि खोह नदी के बाएं तट पर एक ऊंची चट्टान पर स्थित है. राज्य सरकार के अनेक विभागों के अतिरिक्त भारत सरकार का उपक्रम 'भारत इलेक्ट्रिकल लिमिटेड ' भी यहाँ पर है. ठहरने हेतु कण्वाश्रम विश्राम गृह के अतिरिक्त गढ़वाल मंडल विकास निगम का 'पनियाली विश्राम गृह ' भी है. वन विभाग का भी पनियाली में विश्राम गृह है. इसके अतिरिक्त पी० डब्लू० डी० का व पेय जल निगम का भी गेस्ट हॉउस है तथा देवयानी, पैराडाईज व राज आदि होटल में ठहरा जा सकता है. दिल्ली से लगभग 250 किलोमीटर व हरिद्वार से 75 किलोमीटर दूरी पर कोटद्वार सड़क व रेल मार्ग से भली भांति जुड़ा हुआ है.  
 
  

Monday, February 21, 2011

कण्व ऋषि की प्रतीक्षा में है कण्वाश्रम -2

(पिछले अंक में आपने पढ़ा कि ऋषि विश्वामित्र किस तरह मालिनी तट स्थित आश्रम में आ गए. यहीं विश्वामित्र और मेनका के संयोग से शकुंतला का जन्म हुआ. मेनका ऋषि विश्वामित्र को पथभ्रष्ट करने के बाद पुत्री व ऋषि को छोड़कर चली गयी. और ऋषि विश्वामित्र भी कुछ समय पश्चात् आश्रम और पुत्री शकुंतला को अपने निकटस्थ महर्षी कण्व को सौंपकर अज्ञात स्थान की ओर प्रस्थान कर गए. )
           संभवतः महर्षि विश्वामित्र के पश्चात् महर्षि कण्व ही आश्रम के कुलपति नियुक्त हुए. शकुंतला का लालन पालन, दुष्यंत-शकुन्तला का प्रेम प्रसंग, भरत का जन्म तथा भरत का बाल्यकाल भी इसी आश्रम में महर्षि कण्व के काल में हुआ. अतः सभी पौराणिक ग्रंथों में यह कण्वाश्रम के रूप में लोकप्रिय हुआ. दुष्यंत शकुन्तला का पुत्र भरत ही चक्रवर्ती सम्राट बना और उनके नाम से ही हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा. भरत के पुत्र शांतनु हुए और शांतनु के पुत्र देवब्रत, अर्थात भीष्म पितामह हुए. भरत से ही कौरव, पांडवों को भरतवंशी कहा जाता हैं. 
          विद्वानों की राय में भगवान श्रीकृष्ण के देह परित्याग के पश्चात ही कलयुग प्रारंभ हुआ. कलयुग की गणना को कलिसम्वत कहते हैं. कलिसम्वत को युधिष्टर संवत भी कहा जाता है. कलयुग का प्रारंभ अर्थात द्वापर की समाप्ति. कलिसम्वत के 3044 वर्ष बाद बिक्रमी संवत का प्रारंभ माना जाता है. इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण को इहलोक गए 5100 साल से अधिक हो गए. राजा दुष्यंत युधिष्ठर से छः पीढ़ी पहले हुए अर्थात लगभग 300 बर्ष पूर्व. अतः महर्षि कण्व के समय को लगभग 5400 वर्ष पूर्व माना जा सकता है. महाभारत के आदिपर्व में कण्वाश्रम का वर्णन मिलता है, विद्वानों का मत है कि महर्षि वेदव्यास इसी आश्रम के स्नातक थे और बाद में इसी आश्रम के कुलपति भी नियुक्त हुए. महाकवि कालिदास व उनके दो साथी निचुल और दिगनणाचार्य ने इसी आश्रम में शिक्षा पाई. महाकवि की कालजयी रचना 'अभिज्ञानशाकुंतलम 'में ही नहीं अपितु 'रघुवंशम' के छटे सर्ग में भी कण्वाश्रम का विषद वर्णन मिलता है.          
        महाभारत एवं अभिज्ञानशाकुंतलम के आधार पर यह तो स्पष्ट है कि कण्वाश्रम मालिनी तट पर स्थित था. किन्तु वर्णित मालिनी नदी के विषय में जो भ्रम है वह भी स्पष्ट हो. महर्षि बाल्मीकि ने शोणभद्रा  को मगध मालिनी तथा गढ़वाल मालिनी को उत्तर मालिनी नाम दिया है. बाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि राम वनवास के समय भरत को बुलाने जो दूत कैकेय भेजा गया था उसने मालिनी को वहां पर पार किया जहाँ पर कण्वाश्रम था, तत्पश्चात गंगा नदी को. अयोध्या-कैकेय मार्ग आज भी है जो कंडी रोड के नाम से जाना जाता है.(कंडी से अभिप्राय बांस व रिंगाल से बनी टोकरी से है) संभवतः राजाओं, साधुओं, तीर्थयात्रियों व ऋषि मुनियों द्वारा सुदूर क्षेत्रों की यात्रायें इस मार्ग से की जाती रही हो, जिससे यह मार्ग प्रचलन में रहा हो. कंडी रोड चौघाट (चौकी घाट) से होकर गुजरने का वर्णन ग्रंथों में मिलता है. पूरब-पश्चिम दिशा को जाने वाला यह मार्ग कोटद्वार के समीप गढ़वाल व बिजनौर जिले (वर्तमान उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश) की सीमा भी है. मालिनी के पृष्ठ भाग में हिमवंत प्रदेश है इसका वर्णन महाभारत में मिलता है.  
प्रस्ते हिमवते रम्ये मालिनीम भितो नदीम.
कालिदास ने मालिनी स्थित कण्वाश्रम को मैदानी व पर्वतीय भूभाग का मिलन माना है.
कार्यसैकतलीनं हंसमिथुना स्रोतोबहामालिनी , यदास्तामाभितो निष्न्नाहरिणा गौरी गुरो पावनः      
मालिनी चरकारण्य पर्वत से प्रवाहित होकर चौघाट तक अल्हड बाला की भांति उछलती कूदती आती है और फिर समतल भूभाग में बहती हुयी रावली (बिजनोर )में गंगा में प्रवाहित हो जाती है.           
                                                                                                                  अगले अंक में जारी ..............

Wednesday, February 09, 2011

कण्व ऋषि की प्रतीक्षा में है कण्वाश्रम -1

कोटद्वार नगर का विहंगम दृश्य                फोटो- गूगल से साभार
                केदारखंड, मध्य हिमालय, खसदेश या उत्तराखंड आदि अनेक नामों से विख्यात यह तपोभूमि सदियों से ऋषि  मुनियों, श्रृद्धालुओं, प्रकृति प्रेमियों व सैलानियों को आकर्षित करती रही है. हिन्दू धर्म शास्त्रों में वर्णित वशिष्ट आश्रम हिन्दावं (टिहरी गढ़वाल) में, अगत्स्य ऋषि का आश्रम अगत्स्यमुनी में होना माना जाता है. तो ब्यासी, ब्यासघाट, ब्यास् गुफा आदि महामुनि ब्यास का इस क्षेत्र से जुड़े होने का पुष्ट प्रमाण है. अत्री, अंगीरा, भृगु, मार्कंडेय, जमदग्नि, मनु, भरद्वाज, दत्तात्रेय आदि अनेक ऋषियों का कर्म क्षेत्र यह पावन भूमि रही है. पौराणिक ग्रंथों में इस क्षेत्र का उल्लेख ब्रह्मऋषि प्रदेश. ब्रह्मावत प्रदेश या ब्रह्मऋषि मंडल आदि के नाम से भी किया गया है. महाभारत कालीन भीम पुल (माणा, निकट बद्रीनाथ),लाक्षागृह (लाखामंडल,जौनसार-देहरादून), युधिष्टर की चौपड़ (गोविन्दघाट ), किरातार्जुन युद्ध स्थल श्रीपुर (श्रीनगर) आदि अनेक घटनाएँ व स्थल उत्तराखण्ड हिमालय की महत्ता को रेखांकित करते हैं. गत चार पांच दशकों से अनेक विद्वान लेखकों के सद्प्रयास से थापली, डूंगरी, रानीहाट, मलारी, मोरध्वज व पुरोला आदि स्थानों पर हुए उत्खनन एवं प्राप्त अवशेषों से उपरोक्त अवधारनाओं को बल ही मिला है बल्कि पुष्ट प्रमाण भी मिले हैं. यह स्पष्ट हो गया है कि भारत की उत्तराखण्ड भूमि भी पिछले पांच हज़ार सालों से सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रही है.
                   पुरापाषाणकाल के उपरांत ऐतिहासिक काल के धुंधलके में यदि हम झांके तो किरात, खस, तंगण, नाग, पौरव आदि अनेक राजाओं का उल्लेख हमारे ग्रंथों में है. सम्राट अशोक द्वारा कालसी का शिलालेख, पांचवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वैनसांग  द्वारा भारत भ्रमण, बौद्धों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा ज्योतिर्मठ की स्थापना व बद्री-केदार मंदिरों का जीर्णोद्धार, कत्यूरी, पंवार व चन्द शासकों का उदय व अस्त की कहानी प्राप्त ताम्रपत्र, सिक्के, पांडुलिपियाँ व अभिलेख भली-भांति बयां करते हैं. भजन सिंह 'सिंह' जी ने अपनी पुस्तक "आर्यों का आदि निवास मध्य हिमालय" में वर्णन किया है कि आर्य मध्य हिमालय के मूल निवासी थे और यहीं से शेष भारत व विश्व में जाकर बसे. किन्तु यह विडम्बना ही है कि पुष्ट प्रमाण होने के बावजूद भी उत्तराखण्ड के अधिकांश पौराणिक स्थलों को वैश्विक स्तर पर पहचान नहीं मिल पाई है. ऐसा ही एक पौराणिक स्थल कोटद्वार से पांच छः मील पश्चिम में उत्तर दक्षिण बहने वाली मालिनी नदी के तट पर स्थित है कण्व का आश्रम- कण्वाश्रम.
                       कथा है, त्रेता युग में अत्यंत ओजस्वी, वीर व धर्म के नियामक हुए महर्षि विश्वामित्र. वह मूलतः एक क्षत्रिय सम्राट थे और किसी घटना से क्षुब्ध होकर वे पद, वैभव, सम्मान, भोग, लालसा त्याग कर वीतरागी हो गए और हट के चलते अपनी दीर्घ जिजीविषा से महर्षि पद को प्राप्त हुए. यह उनकी कठिन साधना का ही परिणाम था कि राजा त्रिशंकु को अपनी साधना बल से स्वर्ग भेजा और इंद्र द्वारा त्रिशंकु को स्वर्ग पहुँचने पर रोके जाने से त्रिशंकु के लिए एक पृथक स्वर्ग का निर्माण किया. (वर्तमान परिपेक्ष्य में देखें तो कई राजनितिक, सामाजिक या सरकारी/गैरसरकारी संघटनों में ऐसी घटनाएँ देखी जा सकती है.)
                   बाल्मीकि कृत रामायण (बालकाण्ड) के अनुसार मगध में शोणभद्रा के निकट माना गया है महर्षि विश्वामित्र का आश्रम-सिद्धाश्रम. प्रत्येक आश्रम का नाम तब सम्मानपूर्वक लिया जाता था, आश्रम को ही ऋषिकुल या गुरुकुल भी कहा जाता था. आश्रम में दस हज़ार मुनियों (विद्यार्थियों) के लिए आवास, भोजन व  विद्यार्जन हेतु भवन आदि के अतिरिक्त शिक्षकों, प्राचार्यों के लिए भी आवास आदि की उचित व्यवस्था होती थी. साथ ही समय-समय पर होने वाले अधिवेशनों, धर्म सम्मेलनों के लिए पर्याप्त स्थान होता था. इसके अतिरिक्त फल, फूल व अन्नोत्पादन हेतु प्रचुर कृषि भूमि का होना भी आवश्यक होता था. 
"मुनीनां दस सहस्त्रं यो अन्न पाकादि पोषणात, अध्यापयति ब्रह्मषीरसौ कुलपति रमतः."   
अर्थात जिस आश्रम में इस तरह की व्यवस्था हो उस आश्रम के महर्षि को कुलपति कहा जाता था.  महर्षि विश्वामित्र द्वारा अवध नरेश दशरथ पुत्र राम व लक्ष्मण को आश्रम की सुरक्षा व राक्षसों के संहार के लिए सिद्धाश्रम ही लाया गया था. सिद्धाश्रम में रहकर ही श्रीराम ने धर्म व नीति के व्यावहारिक पक्ष को जाना तथा अनेक युद्धाश्त्रों का चालन व सञ्चालन सीखा. यहीं पर ही उन्होंने ताड़का व सुबाहु का वध किया था.श्रीराम के वन गमन के बाद राक्षसों के बढ़ते आतंक से खिन्न होकर वे इस हिमवंत प्रदेश आ गए जहाँ पर उन्होंने पुनः सिद्धाश्रम की स्थापना की . 
  "   उत्तरे जान्हवी तीरे हिमवत शिलोच्च्यम."    बाल्मीकि रामायण(बाल कांड ) 
          यह भी संभव है कि मालिनी तट स्थित आश्रम पहले से ही स्थापित हो और विश्वामित्र की महिमा को देखते हुए आश्रम ने उन्हें कुलपति नियुक्त किया हो. यहीं घोर तपस्या में लीन होने पर स्वर्ग के राजा इंद्र ने उनको मार्ग से हटाने के लिए स्वर्ग की अप्सरा मेनका का सहारा लिया. तदोपरांत महर्षि विश्वामित्र और मेनका के संयोग से शकुन्तला का जन्म हुआ.
                                                                                                             अगले अंक में जारी ..............    

     

Saturday, January 29, 2011

धरती पर कई स्वर्ग हैं !

Statue-Lord Shiva, Hardwar     Photo-Subir
सपनों में अक्सर मै हर रोज 
करता हूँ भगवान से फोन पर लम्बी-लम्बी बातें,
और अपने स्वर्ग के बारे में वे मुझे खूब लुभाते,
स्वर्ग में यह है, स्वर्ग में वह है, स्वर्ग धरती जैसा नहीं है...... !

पर, मौन हो जाते हैं वे जब भी पूछता हूँ मै उनसे- 
अकाल मृत्यु को प्राप्त अपने पिता के बारे में,
उनकी मृत्यु पर पड़ा पर्दा हटाने के बारे में,
स्वर्गवासी अपने सगे, सम्बन्धियों, मित्रों के बारे में ,
मै उनसे जानना चाहता हूँ क्या हैं स्वर्ग के-
नियम, कायदे, कानून व्यवस्था और राज- काज !
मै उनसे जानना चाहता हूँ क्या है स्वर्ग की- 
लोकोक्ति, लोकगीत, लोककथाएं, लोकरीति और लोकाचार  !
मै उनसे जानना चाहता हूँ क्या है स्वर्ग की-
परम्पराएँ, आस्था, विश्वास और लोकव्यवहार  !
मै उनसे प्रार्थना करता हूँ कि वे बता दें स्वर्ग की 
वेबसाइट, टेलीफोन डाईरेक्टारी या मेरे पिता की ई-मेल आई0 डी0 ही !
और भगवान  नहीं सुनते मेरी विनती पर
रख देते हैं फोन झट से क्रेडिल पर पटक कर.

मै भगवान के रोष को नहीं समझ पाता हूँ 
(या भगवान् ही शायद मुझे समझने में असमर्थ है )  
अपने में ही बुदबुदाता हूँ  मै -
अपने बनाये इंसानों से क्यों दूर भागते हो भगवान !
अपने भक्तों के प्रश्नों से क्यों कतराते हो भगवान !
अपने स्वर्ग पर इतना क्यों इतराते हो भगवान !
"..स्वर्गादपि गरीयसी.." का मन्त्र धरती पर ही है भगवान !
अरे तुम ठहरे इकलौते स्वर्ग के स्वामी, और 
हमारी धरती पर तो कई स्वर्ग है ! कई-कई स्वर्ग हैं भगवान !!

Thursday, January 20, 2011

भूली हुयी दास्ताँ याद आ गयी

कुछ लिखने के प्रयास में कई कागज़ रंग डाले किन्तु नतीजा सिफ़र ही रहा. कारण क्रिएटिविटी का न होने से अधिक "..मरने वाला कोई जिंदगी चाहता हो जैसे..." वाला जज्बा नहीं रहा. बड़ी पत्रिकाओं /बड़े अख़बारों में प्रतिक्रियाएं छपी तो छोटों में  कहानी, कविता, लेख, यात्रा संस्मरण, समीक्षाएं भी प्रकाशित हुयी. लखनऊ में गंगोत्री संघटन और देहरादून में धाद की नींव डालने में अग्रणी रहा. साथ साथ अन्य सामाजिक संघटनों से भी जुड़ा किन्तु संघटनों से ही मोहभंग हो गया. (हाँ, पत्र-पत्रिकाओं और बुक्स के प्रति बेशक रुझान कभी कम नहीं हो पाया) हटकर  'बारामासा' का संपादन व प्रकाशन प्रारम्भ किया. परन्तु जैसा कि लघु पत्रिकाओं के साथ होता आया है बारामासा भी अनेक कारणों से निरंतर प्रकाशित नहीं हो पाई. 

बारामासा के जो प्रेरणास्रोत रहे या जिनका शारीरिक, आर्थिक या रचनात्मक स्तर पर सहयोग रहा तथा  जिनके आशीर्वाद से पत्रिका प्रकाशित हो पाई उनका मै शुक्रगुज़ार हूँ, अहसानमंद हूँ.उनमे प्रमुख हैं-  
         मुबई - स्व० अर्जुन सिंह गुसाईं (हिलांस), श्री केशर सिंह बिष्ट  दिल्ली - स्व० डॉ० गोविन्द चातक,  सर्व श्री नेत्र सिंह असवाल व रमन सिंह बुटोला   इलाहाबाद -श्री मोहन लाल बाबुलकर  पटना -डॉ० तारिक असलम 'तस्मीन'  देहरादून - सुश्री बिमला रावत, स्व० बुद्धि बल्लभ थपलियाल, स्व० डॉ० सुरेश खंडूड़ी, स्व० वीर सिंह ठाकुर, डॉ० शोभा राम शर्मा, सर्व श्री बाबू राम वर्मा, ज्ञानेंद्र कुमार, विद्या सागर नौटियाल, बलवीर सिंह पयाल, सुरेन्द्र भण्डारी, बलवीर सिंह पंवार, चन्दन सिंह नेगी, जितेन ठाकुर, भजन सिंह कलूड़ा, वीरेन्द्र कुमार, दीपक पोखरियाल, प्रीतम अपच्छ्याण, मोहन बंगाणी, जगदम्बा प्रसाद मैठाणी व भूमेश भारती, सुश्री वीणा पाणी जोशी, भारती पाण्डे व रानू बिष्ट. सर्व श्री अरुण भण्डारी, टी0 एस0 असवाल, विनोद नेगी, संजय डोभाल, देवेन्द्र प्रसाद जोशी, विजय पाल सिंह रावत व मदन डुकलान पौड़ी- सर्व श्री बी मोहन नेगी, नरेन्द्र सिंह नेगी, वीरेन्द्र पंवार, रवी रावत  गोपेश्वर - सर्व श्री नन्द किशोर हटवाल, देवेश जोशी, डॉ० सत्यानन्द बडोनी, जगमोहन पंवार 'जय' व लक्ष्मण सिंह नेगी  बालाघाट (म़० प्र0) - श्री आनंद बिल्थरे  उत्तरकाशी - डॉ० सुरेन्द्र सिंह मेहरा, सर्व श्री सुभाष  रावत, रविन्द्र सिंह चौहान व  उदय राम देवला  टिहरी -स्व0 डॉ0 महाबीर प्रसाद गैरोला, प्रोफेसर राकेश चन्द्र नौटियाल, सर्व श्री बिक्रम सिंह राणा, विजय सिंह पंवार, विजेंद्र राणा व महिपाल सिंह नेगी  धरपा(बुलंदशहर) -  श्री महावीर रवांल्टा  सहारनपुर - श्री दिगंबर दत्त थपलियाल व होशियार सिंह चौहान  मसूरी - सर्व श्री राम स्वरुप रौन्छेला व सुरेन्द्र पुंडीर  अल्मोड़ा - स्व० बलवंत सिंह मनराल, श्री सुरेन्द्र सिंह अधिकारी व सुश्री तनूजा पाण्डे  हल्द्वानी - सर्वश्री महेश जोशी व दीपेन्द्र सिंह चन्द  उदयपुर(राज0) - श्री दर्शन सिंह रावत  रुद्रप्रयाग - श्री चन्द्र बल्लभ पुरोहित आदि.             

Thursday, January 13, 2011

पुत्रदायिनी है माँ अनुसूया देवी - 2

यात्रा संस्मरण - 1999
Maa Anusooya Temple     Photo-Subir
                   (पिछले अंक में आपने गढ़वाल उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थित माँ अनुसूया देवी के दर्शनार्थ मंडल (गोपेश्वर) तक की यात्रा का विवरण पढ़ा. अब आगे है मंडल से मंदिर की ओर की यात्रा............. )
                   गोपेश्वर से केदारनाथ की ओर जाने वाले मार्ग पर मंडल से बीस- बाईस किलोमीटर पश्चिम में कस्तूरा मृग के लिए विख्यात कान्चुला खरक है और आगे तीनेक किलोमीटर पर गढ़वाल का स्विटज़रलैंड चोपता. चोपता का सौदर्य मनमोहक है और यहाँ के बुग्याल चित्ताकर्षक. हरे बुग्यालों पर लोट कर स्वर्गिक आनंद की अनुभूति होती है. (चोपता से तीन किलोमीटर पैदल चढ़ाई तय कर पञ्च केदार में से एक लगभग 3600 मीटर ऊँचाई पर स्थित तुंगनाथ के दर्शन किये जा सकते हैं) और उखीमठ, गुप्तकाशी होते हुए यही मार्ग केदारनाथ को चला जाता है. किन्तु हमारा गंतव्य है माँ अनुसूया मंदिर. अतः हम मंडल में थोड़ा सुस्ता कर पैदल ही उत्तर की ओर तेज कदमो से मंदिर की ओर बढ़ते हैं जो मंडल से पांच किलोमीटर दूरी पर है और मार्ग चढ़ाई वाला है.
                  माँ अनुसूया देवी मंदिर का प्रवेश द्वार मंडल में सड़क किनारे ही बना हुआ है. सड़क मार्ग से गुजरने वाले श्रृद्धालु यहीं घंटी बजाकर माँ का स्मरण कर लेते हैं. घंटी बजाने के लिए मै भी हाथ उठाता हूँ तो पंजों के बल खड़े होकर ही घंटी बजा पाया, जबकि नारायण सिंह नेगी लम्बा कद के होने के कारण आसानी से घंटी की डोर पकड़कर मेरी ओर देख मुस्कराने लगा. मंडल से गढ़ गंगा के किनारे आगे बढ़ते हैं तो सिरोली गाँव पड़ता है. तीसेक परिवार वाला यह गाँव आम पर्वतीय गांवों की श्रेणी में रखा जा सकता है. गाँव के दक्षिण में जहाँ समतल भूभाग पसरा हुआ है वहीं उत्तर में घने जंगल से युक्त हल्की ढलान युक्त पहाड़. पेय व सिंचाई के लिए गढ़ गंगा का जल प्रयाप्त है और चारा ईंधन के लिए जंगल. समतल भूभाग और उचित जलवायु होने के कारण खेती की अच्छी संभावना है. किन्तु प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग हम कहाँ कर पाते हैं. यह विडम्बना ही है कि तकनीकी अज्ञानता और नौकरी को प्रधानता के कारण हम लोग बहुत ही पिछड़ गए हैं और परिणति है पलायन. पर्वतीय  उत्पाद के विपणन के लिए उचित व्यवस्था न होना भी एक कारण है. फलस्वरूप पहाड़ का कृषक अपने उत्पाद सेब, माल्टा, आलू, राजमा, अखरोट, अदरक आदि दलालों के हाथ औने पौने दामों में बेचने को विवश है. हिमाचल राज्य में सेब विकास निगम और उत्तर प्रदेश में गन्ना विकास निगम की भांति सरकार उत्तराखण्ड फल विकास निगम बनाकर स्थानीय कृषकों को प्रोत्साहित करने हेतु माल्टा आदि उत्पादों का समर्थन मूल्य घोषित कर सकती हैं.
                   सिरोली गाँव से गढ़गंगा के दायें तट पर चलते हुए एक-आध किलोमीटर के बाद पुनः बाएं तट पर चलते हैं. अंग्रेजी के 'एस' अक्षरनुमा मार्ग पर आगे बढ़ते हैं. चौड़े पत्थरों से सीढियां बनाई गयी है जो काफी चौड़ी है. सुनील जो अपेक्षाकृत जवान है बच्चों की भांति दोनों पैरों से कूद कूद कर कुछ सीढियां पार कर लेता है और आगे जाकर घास पर लेटकर हमारी प्रतीक्षा करता है. कुछ सीढियां और कुछ मार्ग चलकर हम पांच हजार फीट ऊँचाई पर स्थित माँ अनुसूया देवी मंदिर में पहुँच जाते हैं. मंदिर सघन घने जंगल के बीच है जिससे रमणीकता बनी हुयी है. आबादी क्षेत्र से दूर और औसत ऊँचाई लिए हुए इस स्थान का मौसम अत्यंत सुवाहना है. केदार मंदिरों की भांति कत्युरी शैली में निर्मित यह मंदिर कष्ट छत्र्युक्त है. गर्भ गृह में माँ अनुसूया की भव्य मूर्ती है. गर्भ गृह के आगे बरामदा है और साथ में एक धर्मशाला. आस पास कुछ निजी भवन. भक्त साल भर देवी के दर्शनार्थ आते रहते हैं, विशेषतः निसंतान दम्पति. मान्यता है कि माँ के द्वार से कोई खाली हाथ  नहीं लौटा. प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को यहाँ विशाल मेला लगता है. 
                   अत्री ऋषि की पत्नी अनुसूया के बारे में कथा है कि वह ईश्वर की अनन्य उपासक और पतिव्रता देवी थी. मृत्यु लोक पर तो गुणगान होने ही लगा किन्तु उनकी ख्याति स्वर्ग तक पहुंची तो स्वर्ग की देवियाँ विचलित हो गयी. स्वर्ग की तीन श्रेष्ठ देवियों ने अपने अपने  पति (ब्रह्मा, विष्णु और महेश ) को  अनुसूया की परीक्षा लेने को भेजा. तीनो देवता भेष बदल कर माँ अनुसूया के आश्रम में पहुंचे. माँ से भोजन मांगते हुए कहा कि वह हमें अपने हाथों से भोजन कराये वह भी निर्वस्त्र. माँ ने अपने ईष्ट को स्मरण किया और तीनो देव बालकों के रूप में परिवर्तित हो गए, और माँ ने उन्हें स्तन पान कराकर वहीं पालने में डाल दिया. कई दिनों तक जब देवता वापस नहीं लौटे तो देवियों को चिंता होने लगी. वे अनुसूया आश्रम में आये तो वहां देखा तीन बालक पालने में खेल रहे हैं. उन्होंने अपने पतियों को वापस माँगा तो अनुसूया ने कह दिया उनके पति पालने में लेटे हैं, पहचान कर ले जाएँ. नन्हे बालकों के रूप में अपने पतियों को न पहचान पाने पर क्षमा मांगते हुए वे अनुसूया के कदमो में लेट गयी. स्वर्ग के देवताओं को भी अपनी भूल का आभास हुआ और उन्होंने माँ से क्षमा मांगी. तदनंतर ब्रह्मा ने चन्द्रमा, शिव ने दुर्वासा और विष्णु ने दत्तात्रेय के रूप में माँ अनुसूया की गोद से जन्म लिया और तभी से देवी अनुसूया 'पुत्रदा' अर्थात माँ के रूप में प्रसिद्द है.
                   अनुसूया आश्रम से डेढ़ किलोमीटर घने जंगलों से गुजरने के बाद निर्जन स्थान पर एक गुफा है, जिसे अत्री आश्रम कहते हैं. गुफा के बाहर लगभग चार सौ फीट ऊँचाई पर से एक झरना गिर रहा है. झरना जिस स्थान पर गिर रहा है वहां पर एक कुण्ड सा बन गया है जिसे अत्री कुण्ड भी कहा जाता है. गुफा के मध्य में एक अर्ध चंद्राकर संकरा मार्ग है जिसे श्रृद्धालु रेंग कर पार करते हैं. मान्यता है कि परिक्रमा करने वाले को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है. आगे बढ़ते हैं तो सोलह किलोमीटर दूर पैदल रुद्रनाथ मंदिर तक जाया जा सकता है किन्तु जो घने जंगलों के बीच से होकर गुजरता है. किन्तु हम यहीं से लौटकर वापस गोपेश्वर को आते हैं.                                                                                                                                                                              

Sunday, January 09, 2011

पुत्रदायिनी है माँ अनुसूया देवी - 1

यात्रा संस्मरण - 1999
Maa Anusooya Temple  Photo-Subir
                    जैसा कि डॉक्टर टी. जी. लोंगस्टाफ ने लिखा है कि "..... मैं हिमालय पर्वत पर छः बार गया और विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि एशिया में गढ़वाल ही सबसे खूबसूरत क्षेत्र है ...."  और सचमुच ही प्राकृतिक सुषमा से परिवर्धित हिमालय का नैसर्गिक सौंदर्य देखा जा सकता है उत्तराखण्ड  के गढ़वाल हिमालय में. देवभूमि, वीरभूमि नाम से विख्यात गढ़वाल में सैकड़ों पवित्र धाम है तो हजारों दर्शनीय स्थल भी. लेकिन सैलानियों का स्वर्ग है तो गढ़वाल का चमोली जनपद. पञ्च बद्री (तिरुपति की भांति बद्री को भगवान विष्णु का रूप मानते है , पञ्च बद्री  हैं - बद्रीनाथ, वृद्ध बद्री, भविष्य बद्री, आदि बद्री और ध्यान बद्री ), पञ्च केदार (केदार शिव का रूप है, वस्तुतः उत्तराखण्ड हिमालय पुराणों में केदारखंड ही है, पञ्च केदार हैं  - केदारनाथ, मद्महेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पनाथ ), लोकपाल लक्ष्मण मंदिर, हेमकुन्ठ  साहिब आदि तपस्वियों /मनीषियों की साधनास्थली  रही है तो फूलों की घाटी, भारतवर्ष का सर्वोच्च शिखर नंदा पर्वत, कामेट शिखर, कर्जन ट्रैक, सतोपंथ, काकभुसुंडी  ताल आदि पर्वतारोहण व ट्रेकिंग के लिए आमंत्रित करते हैं. शीतकालीन क्रीड़ास्थल औली और अनगिनत बुग्याल (medows) क्या नहीं है चमोली जनपद में. मुखौटा नृत्य और रममाण यहाँ की संस्कृति के परिचायक है तो पांडवकालीन चक्रव्यूह रचना पुराणों में अगाध आस्था का प्रमाण. ईश्वर तो इस देवभूमि के कण-कण में व्याप्त है. इसके अतिरक्त ऐसे देवस्थल भी है जो ज्यादा ख्याति प्राप्त तो नहीं किन्तु जिनके दर्शन मन को आल्हादित करते हैं. माँ अनुसूया देवी मंदिर भी एक ऐसा ही स्थल है.
                   ऋषिकेश- बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर लगभग 210 किलोमीटर दूर अलखनंदा नदी के बाएं तट पर चमोली क़स्बा है जो सीमान्त जनपद चमोली के गठन के उपरांत जनपद मुख्यालय था, किन्तु 1971  में बिरही की बाढ़ के कारण तहस नहस हो गया था और अब मात्र तहसील मुख्यालय है. 1971  के बाद चमोली से लगभग 10  किलोमीटर दूरी पर अलखनंदा नदी के दायें तट व  समुद्र तल  से लग्भग 1550  मीटर ऊँचाई पर पार्श्व भाग में बांज आदि पेड़ों से आच्छादित पहाड़ी के नीचे बसे गोपेश्वर गाँव को चमोली जनपद का मुख्यालय बना लिया गया. केदारनाथ व बद्रीनाथ के बीचों बीच स्थित होने के कारण गोपेश्वर की अलग महत्ता है. गोपीनाथ मंदिर एवं अन्य स्मारकों के साथ यह नगर जहाँ दर्शनीय है वहीं रुद्रनाथ, तुंगनाथ, देवरियाताल और उखीमठ आदि स्थलों का यह केंद्र भी है. जब यातायात के साधन नहीं थे तो केदारनाथ व बद्रीनाथ के दर्शनार्थ जाने वाले यात्रियों का पड़ाव गोपेश्वर में अवश्य होता था. उत्तर से दक्षिण की ओर ढलान लिए पहाड़ी के मध्य भाग पर बसा है गोपेश्वर. उत्तर में रुद्रनाथ पर्वत है तो दक्षिण में पतित पाविनी अलखनंदा .यहाँ पर नौवीं सदी (गुप्तकाल )में निर्मित  विशाल व भव्य गोपीनाथ मंदिर प्रमुख है. कत्युरी शैली में निर्मित इस मंदिर की ऊँचाई 90  फिट है. मंदिर के बायीं ओर प्रांगण  में छटी शताब्दी में निर्मित एक 16 फिट ऊंचा विशाल लौह त्रिशूल है. त्रिशूल के निचले भाग पर ब्राह्मी लिपि  में अष्ठ धातु  से तथा ऊपरी हिस्से पर संस्कृत में एक लेख अंकित है. राहुल संकृत्यायन ने इसका अनुवाद कर इसे अशोक चल्ल का विजय लेख माना है. त्रिशूल के मध्य भाग पर परशुराम का फरसा भी है. गोपीनाथ मंदिर के निकट ही वैतरणी कुण्ड व मंदिर समूह है. प्रायः गोपीनाथ भगवान श्रीकृष्ण को कहते हैं किन्तु यहाँ गोपीनाथ भगवान शिव है. मान्यता है कि भगवान शिव ने कामदेव को गोपेश्वर में ही भस्म किया था. गोपेश्वर का प्राचीन नाम गोस्थल या गोथल माना जाता है. गोपेश्वर रुद्रनाथ का गद्धिस्थल है.
               गोपेश्वर से पूर्व दिशा में छ किलोमीटर दूरी पर घिंगराण गाँव है जो कि बद्रीनाथ के समीपस्थ सीमान्त गाँव म़ाणा का शीतकालीन प्रवास है. यह गाँव सड़क से जुड़ा हुआ है और यहाँ से आगे बद्रीनाथ तक सड़क की मांग स्थानीय निवासी करते आ रहे हैं. किन्तु गोपेश्वर से मेरे मित्र नारायण सिंह नेगी, सुनील कुंवर और मै पश्चिम की ओर बढ़ते हैं, हमारा गंतव्य स्थल है माँ अनुसूया देवी मंदिर. 
              तीन किलोमीटर दूरी पर पहला गाँव पड़ता है गंगोल गाँव. नगर बस जाने के कारण गोपेश्वर की लगभग वनस्पति विहीन पहाड़ियों की अपेक्षा गंगोल गाँव के आस पास हरियाली है. गंगोल गाँव से लगभग चार किलोमीटर दूरी पर बसे देवलधार तक सड़क अर्ध वृत्ताकार है. आगे डेढ़ दो किलोमीटर दूर बढ़ते हैं तो सगर गाँव पड़ता है. माना जाता है कि सगर गाँव का नाम चक्रवर्ती सम्राट सगर के नाम पर पड़ा. सगर के वंशज ही राजा भागीरथ हुए जिन्होंने कठिन तपस्या कर अपने पित्रों के तर्पण के लिए गंगा को स्वर्ग से उतरवाया था. कालांतर में यह सगर चट्टी के नाम से भी जाना जाता रहा है. सगर में ग्रामीण महिलाओं द्वारा सहकारिता व सहभागिता के आधार पर माल्टा व बुरांश का जूस निकालने का एक छोटा सा कारखाना चलाया जा रहा है. जिसका विपणन भी वे स्वयं ही किया करती है. आगे देवलधार में पीने पिलाने का बड़ा अच्छा सिस्टम है, एक तो एकान्त, नीचे बह रही बालखिला नदी की मछलियों के पकोड़े और सामने प्रकृति का अद्भुत नजारा. मित्र सुनील की थोड़ी देर रुकने की इच्छा होती है पर हम दोनों उसे खींच ले जाते हैं. देवलधार से कुछ दूर गहरे में शेरखुमा गाँव है जहाँ पर भोटिया जनजाति के लोग निवास करते हैं. देवलधार से पांच-छ किलोमीटर दूरी पर बैरान्गना पड़ता है, बैरान्गना में फ़्रांस सरकार के सहयोग से चल रहा ट्राउट मछलियों का प्रजनन केंद्र है और एक राजकीय इंटर कॉलेज भी. बैरान्गना से कुछ ही दूरी पर है मंडल. बालखिला नदी के बाएं तट पर स्थित मंडल घाटी में है किन्तु चारों ओर सघन वन क्षेत्र होने के कारण बारिस अत्यधिक होती है और इसे गढ़वाल का चेरापूंजी भी कहा जाता है. गोपेश्वर से मंडल तक माल्टा प्रचुर मात्रा में है अतः इस क्षेत्र को माल्टा पट्टी के रूप में मान्यता दी जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. मंडल में संस्कृत महाविद्यालय, दूर संचार केंद्र, राज्य सहकारी संघ का भेषज अनुसन्धान संसथान, अलकनंदा ग्रामीण बैंक आदि प्रतिष्ठान है. 
                                                                                                                           (शेष अगले अंक में .........)