Wednesday, January 04, 2017

मनुस्मृति में क्या है ?

       चौबीस दिसम्बर को प्रतिवर्श ‘उत्तराखण्ड के गांधी’ नाम से विख्यात इन्द्रमणी बडोनी जी और पच्चीस दिसम्बर को पेषावर काण्ड के नायक चन्द्र सिंह गढ़वाली जी का जन्मदिवस पूरे उत्तराखण्ड में मनाया जाता है। पच्चीस दिसम्बर को ही क्रिसमस की धूम-धाम पूरे विष्व में रहती है। परन्तु इस वर्श चौबीस व पच्चीस दिसम्बर देहरादून वासियों के लिये खास रहा। क्योंकि चौबीस व पच्चीस दिसम्बर को ही(पूरे दो दिन) ‘समय साक्ष्य’ के तत्वाधान में देहरादून के राजपुर में ‘लिट्रेचर फेस्टिवल’ भी मनाया गया। इधर पच्चीस दिसम्बर को ही सोषल मीडिया ‘वर्डसऐप’ पर ‘लोक का बाना’ ग्रुप से इन्द्रेष आईसा (इन्द्रेष मैखुरी)जी का लेख पढ़ा कि ‘‘1927 में पच्चीस दिसम्बर को ही भीम राव अम्बेडकर की नेतृत्व में ‘मनुस्मृति’ को जलाया गया ।‘‘           वामपंथी नेता इन्द्रेष मैखुरी जितने प्रखर वक्ता हैं उतने ही वे ऊर्जावान लेखक भी। वे लिखते हैं कि ‘‘....जातीय श्रेश्ठता के नकली बोध से ग्रसित हमारे समाज के लिये वह घटना एक बड़ी चुनौती थी। मनु स्मृति ही वो संहिता है जो हिन्दू समाज के श्रमषील हिस्से को अछूत मानकर उसके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार को जायज ठहराने का अधार प्रदान करती है। महिलाओं के प्रति भी यह संहिता काफी क्रूर दृश्टिकोण लिये हुये है।.......’’
       मनुस्मृति क्या है- हिन्दू धर्मशास्त्रों में मनुस्मृति एक प्रमाणिक ग्रन्थ माना जाता है। सम्भवतः यह पहला संस्कृत ग्रन्थ है जिसका अनुवाद ब्रिटिश शासनकाल सन् 1794 में ‘सर विलियम जॉन्स’ द्वारा किया गया है। आज मनुस्मृति के पचास से अधिक हस्तलिखित ग्रन्थ उपलब्ध हैं परन्तु सबसे पहले प्रचलन में आया व सर्वाधिक बार अनुवादित हुआ संस्करण ही अठारहवीं सदी से प्रमाणिक माना जाता है। मनुस्मृति के रचनाकाल के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न मत हैं। परन्तु अधिकांश विद्वानों का मानना है कि इस ग्रन्थ की रचना ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी और ईसा की तीसरी शताब्दी के मध्य हुयी। ऐसा माना जाता है कि ‘मनु’ और ‘भृगु’ ऋषि के मध्य धर्म सम्बन्धी हुयी वार्ता इसका आधार है।
         संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब(वेद नगर), बरेली से प्रकाषित एवं डॉ0 चमनलाल गौतम द्वारा सम्पादित ‘मनुस्मृति’ के 2004 संस्करण में सम्पादक/प्रकाषक ने दो षब्द षीर्शक में लिखा है कि ‘....यह ग्रन्थ निरा धर्मग्रन्थ ही नहीं है वरन विषेश रूप से नीतिगत भी है। आज भी इसकी मान्यता और उपयोगिता उतनी ही है जितनी कि पुरातन युग में थी। हिन्दू धर्म सम्बन्धी विवादों में अब भी विधि ग्रन्थ के रूप में इसके प्रमाण न्यायालयों में मान्य किये जाते हैं। .....राजा के लिये आवष्यक है कि वह योग्य दण्डधर होकर न्यायपूर्वक राज्य का पालन करे। उसे देष, काल, षक्ति, विद्या और वित्त के अनुसार अपराधियों को दण्ड देना चाहिये। ‘स राजा पुरुशो दण्डः स नेता षासिता च स’ के अनुसार दण्ड ही राजा है, वही नेता, षासक और रक्षक है तथा ‘दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः’ पण्डितजन दण्ड को ही धर्म कहते हैं।..... ’
             इस मनुस्मृति में बारह अध्याय हैं। जगदुत्पतिकथन, ब्रह्मोत्पति, स्त्री पुरुश की सृश्टि, मनु एवं मरीच्यादि की उत्पति, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैष्य-षूद्र के कर्म, ब्राह्मण का श्रेश्ठतव, धर्म के सामान्य लक्षण, धर्म की वेदमूलता, ब्रह्मवर्तदेषीय सदाचार, द्विजातियों का वैदिक मंत्र से गर्भाधानदि कर्तव्य, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राषन, चूड़ाकरण, ब्रह्मचारी के कर्तव्य, गुरुकुल-वास के नियम, ब्रह्मचर्य विधि, असपिण्ड कन्या से विवाह, चारों वर्णों का भार्या-परिग्रह, विवाह के आठ प्रकार, ब्राह्मादि विवाह फल, सवर्णाविवाह विधि, युग्म तिथि में पुत्रोत्पति, कन्या विक्रय दोश, पिण्डदानादि विधि, तर्पण फल, ब्रह्मचर्य गार्हस्थ्य काल इन्द्रियार्थ आसक्ति निशेध, वय-कुल के अनुरूप आचरण, रजस्वला गमनादि निशेध, नग्न स्नानादि निशेध, रात्रि में तिल भोजन और नग्न षयन निशेध, षूद्र से व्रत कथनादि निशेध, आचार प्रषंसा, यम नियम श्रद्धा-दान का फल, असत्य कथन निन्दा, मृत्यु विषयक प्रश्न, वृथा मांसादि निषेध, आचमन विधि, स्त्री धर्म कथन,
पर-पुरुष गमन निन्दा, वानप्रस्थाश्रम, अथितिचर्या, महाप्रस्थान, राजधर्म, प्रजारक्षण, न्यायवर्ती राजा की प्रंशसा, प्रजारक्षण, काम-क्रोधादि त्याग, सन्धि विग्रह काल, सैन्य प्रशिक्षण, उदासीन गुण, न्यायालय प्रवेश, असत्य कथन दोष, सीमा विवाद स्थल, स्त्री-पुरुष पशु आदि का हरण, दासों के सत्रह प्रकार, स्त्री रक्षा, व्यभिचार प्रायश्चित, कुपुत्र निन्दा, द्विजाति के श्रेष्ठ कर्म, परधर्म जीवन निन्दा, द्विज वर्ण कथन, राज्याधिकार, पंचमहापातक, प्रायश्चित, पापानुताप, निन्दा, तप, वेदाभ्यास, त्रिदण्डी परिचय, पाप से कुत्सिता गति, धर्मज्ञ लक्षण आदि अनेक विषयों पर प्रकाश डाला गया है। ‘लोकानां तु निवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरूपाधतः। ब्राह्मणं क्षत्रियं वैष्यं षूद्रं च निरवर्तयेत्।।’ (31/अध्याय- एक) अर्थात लोकों की वृद्धि के लिये प्रभु ने मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, जंघा से वैष्य एवं चरण से षूद्र उत्पन्न किये। ‘एकमेव तु षूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिषत्। एतेशामेव वर्णानां सुश्रुशामनसूयया।।’ (91/अध्याय- एक) 
अर्थात षूद्र के लिये प्रभु ने एक ही कर्म का आदेष दिया कि वह उक्त तीनों वर्णों की सेवा ईर्श्या छोड़ कर करें।

‘स्वभाव एश नारीणां नराणामिह दूशणम्। अतोर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपष्चितः।।’ (213/अध्याय- दो) अर्थात स्त्रियों का स्वभाव पुरुशों को दूशित करने वाला होने के कारण युवतियों के प्रति ज्ञानी पुरुश असावधान नहीं रहते।
‘षूद्रैव भार्या षूद्रस्य स च स्वा च विषः स्मृते। ते च स्वा चैव राजष्च ताष्च स्वा चाग्रजन्मनः।।’ (13/अध्याय- तीन) अर्थात षूद्र की भार्या षूद्र होती है, वैष्य अपनी सवर्णा और षूद्रा से, क्षत्रिय अपनी सवर्णा, वैष्य और षूद्रा से तथा ब्राह्मण चारों वर्ण की कन्याओं से विवाह कर सकता है। ‘वृशलीफेनपीतस्य निःष्वासोपहतस्य च। तस्यां चैव प्रसूतस्य निश्कृतिर्न विधीयते।।’ (19/अध्याय- तीन) अर्थात षूद्रा के अधर का थूक चाटने वाला ब्राह्मण उसके साथ षयन करके उसके निःष्वास से अपने प्राणों को दूशित करता हुआ सन्तानोत्पादन करता है, उसके उद्धार का कोई प्रतिकार नहीं।
       इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं इस मनुस्मृति में। अतः बाबा साहेब अम्बेडकर साहेब ही क्या एक सामान्य व्यक्ति को भी मनुस्मृति में वर्णित कुछ बातों पर आपत्ति होना स्वाभाविक है। परन्तु यह भी सम्भव है कि मूल ग्रन्थ में ऐसा कुछ न रहा हो जो आज आपत्तिजनक माना जाता है।

Saturday, December 10, 2016

वीर सैनिकों की स्मृति में आयोजित खलंगा मेला

                    देहरादून में एक लम्बा अरसा बीत गया। परन्तु हर वर्ष आयोजित होने वाले खलंगा मेले में जा ही नहीं पाया। कई बार सोचता परन्तु....। इस बार ‘बलभद्र खलंगा विकास समिति, नालापानी, देहरादून’ द्वारा आयोजित मेले के लिये समय निकाल ही लिया। कई मित्रों को फोन किया परन्तु सब कहीं न कहीं व्यस्त थे। वरिष्ठ पत्रकार व कवि चेतन खड़का जी ही साथ दे पाये। हमेशा सोचता कैसा है वह नालागढ़ जिसे दो सौ वर्ष पूर्व ईस्ट इण्डिया कम्पनी की फौज हजारों सैनिकों की कुर्बानी के बाद भी लम्बे समय तक नहीं भेद पायी। हजारों पैदल, सैकड़ों घुड़सवार सैनिक तथा प्रचुर मात्रा में बन्दूक, गोला-बारूद, तोप से लैस अंग्रेज सेना की क्या परेशानी रही कि मुठ्ठी भर गोरखा सैनिकों को एक ही बार के आक्रमण में नहीं जीत पाये, जैसे कि उन्हें आशा थी। गोरख्याणी(गोरखा शासन) से त्रस्त गढ़वाल की प्रजा व राजा के साथ देने पर भी गोरखा सैनिकों के अन्दर
इतना आत्मबल कहाँ से आया कि उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना के नाकों चने चबवा दिये।
                देहरादून शहर के उत्तर-पूरब में लगभग आठ किलोमीटर दूरी पर और ननूरखेड़ा, मंगलूवाला, बझेत, अस्थल व किरसाली गांव के मध्य साल के घने जंगल के बीच लगभग 850 मीटर पर स्थित यह दुर्ग नुमा क्षेत्र वास्तव में बहुत दुर्गम है। आज भले ही वहाँ तक सड़क बन गयी है परन्तु दो सौ साल पूर्व की स्थिति की कल्पना की जा सकती है। वीर गाथा प्रकाशन, विद्याभवन-दोगड़ा-गढ़वाल द्वारा प्रकाशित डॉ0 शिवप्रसाद डबराल की पुस्तक ‘गोरख्याणी’ में ‘खलंगा’ का अभिप्राय ‘सैन्य शिविर’ है। इतिहासकारों के अनुसार गोरखा शासन गढ़वाल, कुमाऊँ व सिरमौर राज्यों के लिये एक काला अध्याय है। गोरखा शासन के  मात्र बारह साल के अल्पकाल में जो अत्याचार हुए वह सैकड़ों वर्ष के शासनकाल में मुगलों ने भी नहीं किया और न ही अंग्रेजों ने। प्रजा की दुर्दशा पर मोलाराम की कविता उस काल की साक्षी है।
‘मालक रहा न गढ़ मैं मुल्क षुवार हो गया।
साहेब गुलाम पाजी सब इकसार हो गया।
काजी करै न काज सित्मगार हो गया।
रैयत पै जुल्म जोर बिसियार हो गया।
क्या षूब श्रीनग्र था उजार हो गया।...........’

बहरहाल! इतिहास में इतना कुछ अंकित है कि पढकर रांेगटे खड़े हो जाते हैं।
                         खलंगा मेले में भ्रमण के दौरान एक मित्र का फोन आया। कहने लगे ‘यह तो गढ़वालियों के लिये गुलामी का प्रतीक है और गढ़वालियों को इसमें शामिल ही नहीं होना चाहिये।’ मैंने कहा कि ‘लाल किला, ताजमहल आदि ही नहीं संसद भवन, गेटवे ऑव इण्डिया आदि भी तो गुलामी के प्रतीक हैं। देहरादून में एफ. आर. आई. के भवन, सर्वे ऑव इण्डिया की व्यवस्था आदि भी तो गुलामी की प्रतीक है। तो क्या हमें उनसे भी
दूर रहना चाहिये?.......’ खैर।
                        शहर से दूर होने के कारण मेले में ज्यादा भीड़ नहीं थी। मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम सुबह ग्यारह बजे से देर तक चलते रहे। परन्तु दिन में ध्यान अक्सर भटक जाता है जिससे लोग इतना लुत्फ नहीं
उठा पाये। मेले में सेलु रोटी, भुटवा, चना छोला, चोमिन, मोमो आदि खूब बिक रहा था। पहली बार मैंने भी लहसुन प्याज की चटनी के साथ सेलु रोटी खायी। मेला स्थल से लगभग तीन सौ मीटर ऊपर पहाड़ी पर बलभद्र खलंगा युद्ध स्मारक (1814) देखने भी गये। इतनी ऊँचाई से देहरादून का विंहगम दृश्य देखकर बहुत अच्छा लगा। सोचा यदि यह मेला तीन-चार दिन चलता तो परिवार सहित अवश्य आता। वायु ध्वनि प्रदूषण आदि से मुक्त इस घने जंगल के बीच में कुछ पल गुजारना किसे अच्छा नहीं लगेगा।

Wednesday, September 07, 2016

भगतु व पत्वा गोर्ला रावत (समय- 17वीं शताब्दी का अंतिम अंश)

             गढ़वाल के भडों(वीरों) में इन दो जुड़वाँ भाइयों का ऊँचा स्थान है। गोर्ला वंश डोटी व काली कुमाओं में अधिकारहीन होने के बाद गढ़वाल राज्य की शरण में आया था और उसे चौन्दकोट परगने के गुराड़ गाँव में निवास दिया गया था। वहां पहले गुराड़ी नेगी थोकदार थे। लेकिन किसी कारणवश उन्हें पूर्वी नयार के समीप चौमासु आदि गांवों में नेग दे दिया गया और उनकी थोकदारी गोर्ला वंश के प्रथम आगुन्तक भड़ को दे दी गयी। धीरे धीरे उस वंश को कई गांवों की थोकदारियां प्राप्त हो गयी। लेकिन कोई ठोस इलाका अर्थात (पट्टी) उनके पास नहीं थी। अपने बुद्धि चातुर्य तथा वीरता से उनका गढ़वाल के राजवंश से वैवाहिक सम्बन्ध हो गया और दरबार में उनका दबदबा इतना बढ़ गया कि ‘‘भैर गोर्ला, भितर गोर्ला, अर्ज विनती कैमू कर्ला’’ की कहावत प्रचलित हो गयी। उसी वंश के थोकदार के घर में गुराड़ गाँव में इन दो जुड़वाँ भाइयों का जन्म हुआ था।
               इनके बड़े होने पर गृह-कलह की आशंका पैदा हो गयी। यद्यपि ये दो भड़ बड़ी माता के पुत्र थे, लेकिन छोटी माता का पुत्र इनसे जेठा था। अतः इस बात को लेकर कि जेष्ठत्व पत्नी का माना जाना चाहिए या पुत्र का- एक मतभेद पैदा हो गया। इनके विपक्ष में एक तर्क यह भी था कि जुड़वाँ होने के कारण थोकदारी को दो बराबर भागों में विभाजित करना होगा। आखिर यह सारा मसला गढ़वाल के महाराज के सम्मुख पेश किया गया। उन्होंने सब तर्कों पर विचार करके यह बुद्धिमतापूर्ण निर्णय दिया कि गुराड़ की थोकदारी तो उम्र में ज्येष्ठ पुत्र को ही मिलनी चाहिए। लेकिन अगर ये जुड़वाँ भाई पूर्वी सीमा पर जाकर कुमाउंनी सरदार का सिर काट लायें तो गुजडू व खाटली की थोकदारी इन्हें दे दी जाएगी। उन दिनों एक कुमाउंनी सरदार ने उस इलाके में आतंक व अत्याचार मचा रखा था और वहां का तत्कालीन थोकदार उसका मुकाबला नहीं कर पा रहा था।
बस इन दो भड़ों को क्या चाहिए था? ये तो अपनी वीरता प्रदर्शित करने के लिए उत्सुक थे ही। अतः उन्होंने एक शुभ दिन अपनी वीर माता के साथ गुराड़ से विदाई ली और पूर्वी सीमा की ओर प्रस्थान किया। वहाँ जाकर उन्होंने जनता का मजबूत संघटन तैयार किया और कांडा (पट्टी खाटली) में अपना केंद्र स्थापित किया। आखिर सब तैयारी करके एक दिन कुमाउनी फौज से इनकी भिड़न्त हो गयी। ये बड़ी बहादुरी से लड़े और कुमाउनी फ़ौज भगा दी गयी। उसके बाद उसने उस इलाके की ओर कभी भूल कर भी नजर नहीं उठाई। इनके भी कई साथी वीरगति को प्राप्त हुए और ये जख्मी दशा में उस कुमाउनी सरदार का सिर लेकर श्रीनगर दरबार में उपस्थित हुए। महाराज ने इनकी भूरी भूरी प्रशंसा की और चूंकि प्रत्येक भड़ पर ४२ -४२ घाव आये थे, अतः इन्हें उतने ही गांवों की थोकदारी प्रदान की गयी।
                    इस प्रकार विजय प्राप्त करके और महाराज से पुरस्कार पाकर श्री भगतु गोर्ला ने सिसई (पट्टी खाटली) में और पत्वा गोर्ला ने पड़सोली (पट्टी गुजडू) में अपने केंद्र स्थान निश्चित किये तथा भविष्य में दक्षिण-पूर्वी सीमा की जोरदार रक्षा की। इनके वंशज आज भी विद्यमान है। श्री भगतु गोर्ला के वंशजों में श्री उमेश्वर सिंह, डिप्टी कलेक्टर प्रमुख हैं। श्री पत्वा गोर्ला के वंशजों में श्री विष्णु सिंह रावत, संचालक- वीविंग फैक्टरी कोटद्वार तथा श्री नारायण सिंह रावत सदस्य जिला बोर्ड प्रमुख हैं.

                                                                           (स्रोत साभार- गढ़वाल की दिवंगत विभूतियाँ -डॉ0 भक्तदर्शन ! संस्करण- 1952  )

Sunday, August 14, 2016

भारतवर्ष में बाल मजदूरी और बाल श्रम कानून

                                   आज मोटर वर्कशॉप, होटलों, दुकानों, घरों, खदानों में, बैण्ड पार्टी में या कबाड़ बीनने वाले के साथ नाबालिग बच्चों को देखकर हम द्रवित हो उठते हैं, हमारे मन में उन बच्चों के प्रति दया उमड़नी स्वाभाविक है। हम दुनिया और ईश्वर को कोसने लग जाते है। परन्तु प्रायः दूसरे ही पल हम व्यवहारिक व व्यवसायिक भी हो जाते हैं, बल्कि कभी-कभी हम उत्पीड़न करते उनके मालिकों की हाँ में हाँ भी मिलाने लग जाते हैं। विडम्बना ही है कि जिस उम्र में बच्चों को स्कूल पढ़ना चाहिये था उस उम्र में वे दो वक्त की रोटी के फेर में अपने मालिकों के हाथों पिट रहे होते हैं। हाय रे भाग्य!
                                     हमारे देश में गरीबी एक ज्वलन्त समस्या
है। जिसके लिये गरीब परिवार के अधिकाधिक सदस्यों को जीविकोपार्जन के लिये दौड़ना-भागना पड़ता है। उच्च व मध्यम वर्ग अपने बच्चों की परवरिश व शिक्षा-दीक्षा भली भांति कर सकता है। वहीं निम्न मध्यम वर्ग भी येन-केन प्रकार से अपने बच्चों के लिये भोजन व शिक्षा की व्यवस्था कर लेता है। परन्तु गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले परिवारों को अक्सर मजबूरन अपने नाबालिग बच्चों को भी मजदूरी की तपिश में झोंकना पड़ता है।
                            भारतवर्ष में बाल श्रम को रोकने के लिये ‘बाल श्रम (निषेध व निवारण) अधिनियम 1986 (1986 की अधिनियम संख्या-61)’ में स्पष्ठ उल्लेख है कि बाल श्रमिकों को कुछ विशेष कार्यों में संलिप्त नहीं
किया जा सकता। और ऐसा करने पर अधिनियम की धारा-3 के अनुसार न्यूनतम तीन माह सश्रम कारावास का प्राविधान है। यदि इस अधिनियम को शक्ती से लागू किया जाये तो बाल श्रम रोका जा सकता है।
चिन्तन: अन्धकारमय जीवन जी रहे ऐसे बच्चों के लिये हम या हमारा समाज क्या कुछ कर सकता है?
     

Sunday, July 17, 2016

पातीण और पातनी देवी

        पिछले साल विजय दशमी पर गांव जाना हुआ। ट्राली(Rope way) से टिहरी झील पार की और पैदल गांव को चल पड़ा। सोचा दो मील की दूरी के लिये गाड़ी का इन्तजार क्यों करूं। आधा मील ही पहुँचा कि मेरे गांव व मदननेगी जाने वाले रास्ते के मिलान पर पातनी (पातीण) देवी में हाथ स्वतः ही जुड़ गये। पीठ से बैग उतार कर नीचे रखा, यंत्रवत पास ही पातीण के झुरमुट से कुछ पत्तियां तोड़कर देवी के थान पर चढ़ाकर आशीर्वाद लिया और बैठ गया। मेरे गांव के आस-पास ही पातनी देवी के कई थान (स्थान) हैं। गांव से मदननेगी, चम्पाधार, माण्डू होते हुये कठूली जाने वाले रास्ते पर और एक यह अर्थात अलग-अलग दिशा को जाने वाले रास्तों पर। हमारे क्षेत्र के अन्य गांवों के रास्तों पर भी पातनी देवी के  कई थान हैं। पातनी देवी के थान से मतलब बिना किसी ढांचे का मन्दिर। जिसमें दीप, धूप, चढ़ावा आदि कुछ नहीं चढ़ता। दो-चार पत्ते पातीण के डाल दो और हाथ जोड़ दो। रास्ते किनारे ढलान से ऊपर की ओर प्रतीक के तौर पर एक-दो पत्थर और पातीण के कुछ सूखे व हरे पत्तों का ढेर का नाम है पातनीदेवी का थान।
         आखिर क्या है पातनी देवी? माना जाता है कि धर्म की अवधारणा व्यक्ति को अनुशासन में रखने के लिये हुयी है। सामाजिक बन्धनों के साथ-साथ मनुष्य धार्मिक बन्धनों में बान्धने से ही अनुशासित रह सकता है, हमारे पूर्वजों की सोच रही है। लाखों, करोड़ों देवी-देवताओं का उल्लेख हमारे धर्मशास्त्रों में है। तैंतीस करोड़ देवताओं की ‘लिस्ट’ मंे पातनी देवी है या नहीं, कुछ कह नहीं सकता। मेरा मानना है कि पातनीदेवी के थान के मूल में सम्भवतः पातीण के पौधों को समूल नष्ट होने से बचाना भी रहा हो।
उत्तराखण्ड हिमालय में 2000 से 5000 फीट ऊँचाई तक पाये जाना वाला पातीण वह पौधा है जिसे पालतू पशुओं के नीचे बिछाया जाता है- पशुओं को आराम देने की भावना से। परन्तु मूलतः गोबर खाद तैयार करने के निमित्त। यह जौनसार में निनस, निनावा व निनावं, गढ़वाल में तुंगला व पातीण तथा कुमाऊँ में तंग नाम से जाना जाता है। इसे हिन्दी में तुंगला व संस्कृत में तिन्त्रिणी कहा जाता है। अंग्रेजी नाम small flowered poison sumac है और वानस्पतिक नाम Rush parviflora है। जैसा कि संस्कृत नाम(तिन्त्रिणी अर्थात तीन तृण) से ही स्पष्ठ है कि इसकी शाखा पर 0.6 से 2 इन्च आकार के तीन पत्ते फूटते हैं, जिसमें ऊपर का पत्ता बड़ा और आशमान की ओर सिर उठाये होता है जबकि उसके नीचे आमने-सामने के पत्ते छोटे व लम्बवत होते हैं। मई, जून में जहाँ पातीण पर फूल निकलने शुरू हो जाते हैं, वहीं जुलाई, अगस्त में फल पड़ते हैं। तोर के दानों से भी छोटे अर्थात लगभग चार-पाँच मिलीमीटर ब्यास के इसके फल पकने पर हरे से भूरे रंग में बदल जाते हैं। आयुर्वेदिक औषधि के लिये विख्यात अंगूर की भांति गुच्छों के रूप में लदे इन फलों को चिड़िया, गिलहरी, बन्दर ही नहीं बल्कि वनों पर आश्रित पशुचारक, घसियारिनें आदि भी बड़े चाव से खाते हैं।
         पातीण व पातनी देवी से जुड़ी अनेक यादें है। उपयुक्त जलवायु होने के कारण हमारे गांव के उत्तर, दक्षिण व पूरब में पातीण बहुतायत में है। अतः छुट्टी के दिन घर से आदेश मिलता कि अपनी सामर्थ अनुसार खाली बोरी ले जाओ और पातीण काट कर लाओ। यह तीन-चार घण्टे का ही कार्य(हॉफ डे टास्क) होता। परन्तु मन मुताबिक साथी मिल गये तो हम पूरा दिन भी लगा लेते एक बोरी पातीण काटने में। बोरी ठूंस ठूंस कर भर देने के बाद उसे जंगल में साफ जगह पर रख कर कभी बाधा दौड़ में बाधा(हर्डल) के तौर पर बोरियों को रखा जाता और दौड़ लगाते। कभी दौड़कर आते और बोरियों के ऊपर कूदते, यानि बोरियां गद्दों के रूप में इस्तेमाल होती। घर लौटते समय जहाँ हल्की ढालूदार साफ जगह मिलती वहाँ बोरियां नीचे रख दी जाती और लातों से बोरी धकियाकर कुछ दूरी तय कर लेते। एक-दो बार ऐसा भी हुआ कि जंगल में दिशा-शौच को गये और पानी नहीं मिला। वापसी पर रास्ते में पातनीदेवी का थान पड़ा तो पातनी देवी अपवित्र न हो जाये, इस भावना से थान से एक निश्चित दूरी बनाने के चक्कर में हाथ-पैर कांटों से बुरी तरह छिल गये। चार-पाँच साल पहले एक शाम चम्पाधार होतेे हुये गांव लौट रहा था तो रास्ते में पातीण की आड़ में एक जोड़ा प्रेमालाप में लीन था। पलायन और घरों में ढोर-डंगर कम होने के कारण जंगल में पातीण के बड़े-बड़े झुरमुट जो हो गये हैं।

Friday, July 01, 2016

मेरी प्यारी घुघुती जैली

         घुघुती का महत्व किसी अन्य क्षेत्र के लिये कितना है कहना मुश्किल है। परन्तु गढ़वाल-कुमाऊँ में घुघुती सबके गले की घुघुती है। चैत-बैसाख की बात हो और घुघुती न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। खुदेड़(विरह) गीतों की बात हो और घुघुती न हो ऐसा भी नहीं हो सकता। घुघुती हमारे लोक में इस तरह रच-बस गयी है कि हम घुघूती के बिना गांव की कल्पना ही नहीं कर सकते। गांव याद आता है तो गांव में घुघुती याद आ जाती है। कभी ओखली के आस-पास, कभी चौक में, कभी बर्तन धोने वाली जगह पर, कभी छत की मुण्डेर पर और कभी आंगन किनारे खड़े पेड़ों पर।
       घुघुती की महत्ता हमारे लिये कितनी है यह आप समझ सकते हैं; बचपन में दादी, नानी अक्सर एक लोरी सुनाया करती थी- ‘‘घुघुती, बासुती, क्या खान्दी, दूधभाती.......’’
       किशोरावस्था में रेडियो पर एक गाना सुनते; ‘‘ना बास घुघुती चैत की, खुद लगीं छ माँ मैत की।......’’.
      पिछली सदी के आठवें दशक में अक्सर गोेपाल बाबू गोस्वामी के स्वर में यह गाना जरूर बजता था; ‘‘आमा की डायी मां घुघुती न बासा, घुघुती न बासा......’’
     फिर नेगी जी का जमाना आया तो उनके स्वर मेें यह गीत प्रायः सुनाई पड़ता; ‘‘घुघुती घुरॉण लगीं म्यारा मैत की, बौड़ी-बौड़ी ऐगे ऋतु ऋतु चैत की।.......’’
      नेगी जी ने तो उपमा केे तौर पर भी घुघुती की सांकी(गर्दन) को महत्ता दी है; ‘‘कख बटि लै होली घुघुती सी सांकी, कख पायी होली स्या छुंयाळ आँखी....’’
       और अब किशन महिपाल जी तो घुघुती वाले इस लोकगीत के साथ माणा से मुम्बई तक धूम मचाये हुये है; ‘‘किंगर का छाला घुघुती, पंगर का डाळा घुघुती, भै घुर घुरॉन्दि घुघुती, फुर उड़ॉन्दि घुघुती......’’
      हिन्दी फिल्म या साहित्य में कबूतर को पत्रवाहक के रूप में दिखाया जाता है। परन्तु गढ़वाल-कुमाऊँ में घुघुती पत्रवाहक नहीं स्वयं सन्देशवाहक के रूप में गीतों में मौजूद है;   ‘....उड़ि जा ऐ घुघुती न्हैं जा लदाख, हाल म्यरा बतै दिया म्यारा स्वामी पास।.....’
या फिर- ‘...मेरी प्यारी घुघुती जैली, मेरी माँजी तैं पूछि ऐली।.......’
      घुघुती हमें कितनी प्रिय है वह इस बात से देखा जा सकता है कि मुम्बई में बसी उत्तराखण्डी एक महिला का ब्लॉग का नाम ही है ‘घुघुती बासुती’।
       कूर्माचल सांस्कृतिक परिषद, देहरादून की स्मारिका का नाम भी है ‘घुघुती’।
        और हिन्दी साहित्य की कहानी, कविता, सम-सामयिक आदि विभिन्न विधाओं पर सतत लेखन करने वाले स्वनाम धन्य विद्वान लेखक देवेश जोशी जी ने अपनी एक किताब का नाम ही रख डाला है ‘घुघुती ना बास’
.         .इससे यह सोच सकते हैं कि घुघुती हमारे लोकजीवन व जनमानस में कही गहरी छाप छोड़े हुये है जिसे आसानी से भुलाया नहीं जा सकता।

Monday, June 13, 2016

और हमारे गांव का सेळ्वाणि सूख गया।

                 पिछले महीने एक शादी के सिलसिले में गांव गया तो भोपाल सिंह भाई जी ने बताया कि सेळ्वाणि सूख गया है। यह अप्रत्याशित तो नहीं था फिर भी मुझे धक्का पहुँचा। लग भी रहा था कि वह सूखने वाला है। क्योंकि इधर कई वर्षों से सेळ्वाणि के ऊपर वाले सैकड़ों खेत बंजर हो गये हैं। जलवाल गांव व खोला गांव के उन खेतों में फसल नहीं बोयी जा रही है और जब फसल नहीं तो न हल चलाया जा रहा है और न सिंचाई ही। फिर वर्षा का औसत भी तो वर्ष दर वर्ष कम हो रहा है। जमीन रिचार्ज कहाँ से होगी? थोड़ा बहुत जो बरसता है वह कब तक रिसेगा?
               सेळ्वाणि अर्थात प्राकृतिक जलस्रोत। जिसे गढ़वाल में धारा या मंगरा भी कहा जाता है। सेळ्वाणि शब्द शायद सेळि शब्द से बना है शायद। सेळि अर्थात ठण्डक पड़ना, सकून मिलना। गरम दोपहरी में ठण्डा पानी मिल जाये तो ‘सेळि पड़गी’ या बच्चा देर से घर लौटे तो ‘अब पड़ी जिकुड़ा सेळि’ अक्सर कहा जाता है। सेळि में पाणी शब्द जुड़ने से ही यह सम्भवतः सेळ्वाणि बना होगा। हमारे गांव का सेळ्वाणि मेरे लिये केवल धारा या मंगरा नहीं था, बल्कि इसके साथ मेरी अनेक खट्टी मीठी यादें भी जुड़ी हैं।

                 पाईप लाईन द्वारा पीने का पानी हमारे गांव में मेरे जन्म से पहले ही पहुँच गया था। गांव के आगे आंगन की तरह फैले खेतों में सिंचाई के लिये तीन नहरें है, पानी की कमी नहीं है। फ्रिज का जमाना नहीं था इसलिये बैसाख-जेठ की प्यास सेळ्वाणि से ही बुझती थी। गरमियों में स्कूल की छुट्टियां होती और सेळ्वाणि पानी लाने की ड्यूटी लड़कों की होती। यह गांव से लगभग आधा मील दूर उत्तर-पश्चिम में गाड(पहाड़ी नदी) के किनारे है। सेळ्वाणि लाने के बहाने अपने-अपने बर्तन लेकर हम शाम को जल्दी ही निकल पड़ते। रास्ते में हमारी बानर सेना लोगों के खेतों से टमाटर, ककड़ी, प्याज या कच्चे आम चुराकर गाड में बड़े-बड़े गंगलोढ़ों पर बैठकर घर से लाये हुये नमक के साथ खाते। लम्बी-लम्बी बातें हांकते, एक-दूसरे से झगड़ते और रोज डेढ़-दो घण्टा बरबाद करके घर लौटते। घर में अक्सर डांट पड़ती। परन्तु हम थे कि कभी नहीं सुधरे। सेळ्वाणि से जुड़ा एक किस्सा और भी है। भाषली गांव के किशोर सिंह पढ़ाई के लिये अपनी फुफू के पास हमारे गांव आया। वह मेरे से एक क्लास सीनियर था। उसके हाथों में एक बार चर्मरोग हो गया। उसके फूफा (स्व0 भगत सिंह खरोला) ने उसे कहा कि वह रोज सुबह सेळ्वाणि जाकर नहाये, जैसे कोई सजा सुना दी हो। परन्तु मजबूरन उसने बात मानी और ताज्जुब कि एक-दो माह में ही रोग दूर हो गया।

         नौकरी के दौरान भी गांव जाने पर मदननेगी आते-जाते मैं सेळ्वाणि में अवश्य रुकता। ठण्डा पानी पीकर वहाँ पर घड़ी भर बैठना भी न भूलता। फिर मन में खयाली पुलाव पकाता कि यदि कभी बहुत सारा धन मेरे पास आ जायेगा तो वहाँ एक-दो अच्छे बाथरूम और शेष पानी को रोककर एक पूल बनाऊँगा, जहाँ पर गांव के लड़के खुल कर नहा सके। परन्तु नौकरी से पेट का गड्ढा ही नहीं भरता कभी। जितना मिले कम ही कम। बहरहाल।

             सेळ्वाणि सूख गया है। घर-घर में अब फ्रिज हैं, इसलिये शायद गांववालों को इसकी कमी नहीं अखरेगी। परन्तु इस तरह हमारे प्राकृतिक जलस्रोत सूख जाना चिन्ता का विषय तो है ही। खेती-बाड़ी से मोहभंग और पलायन का ही परिणाम है यह।

Tuesday, September 29, 2015

रेणुका जी से परशुराम कुण्ड तक (6)

 पिछले अंक से जारी.........
Me ate Meedo, Near Wakro
लोहित किनारे
    तिराप की सीमा से बाहर निकलकर उत्तर की ओर नामसाई पहुँचे। नामसाई नोआ डिहींग नदी के दोनों तटों पर बसा हुआ है। बायें तट वाला भाग डिब्रुगढ़ का हिस्सा है और दायें तट वाला लोहित का। नामसाई-डिब्रुगढ़ निवासी श्रीमती ओमेम देवरी पिछले लम्बे अरसे से राज्यसभा सदस्य हैं। नोआ डिहीगं नदी निरन्तर उत्तर की ओर बहती हुयी लोहित में मिल जाती है। नामसाई में रात्रि विश्राम के बाद अगली सुबह पूरब की ओर अपने गंतव्य स्थल परशुराम कुण्ड को निकल पड़े। लगभग बीस-पच्चीस कि0मी0 पर चौंग्खम गांव हैं। समुद्रतल से एक हजार फीट से भी कम ऊंचाई वाला समतल भूमि पर बसे खामती आदिवासी बहुल इस गावं में चारों ओर हरियाली व उपजाऊ भूमि है। यहां कृषि व बागवानी की प्रबल संभावना है। गांव के ज्यादा लोग राज्य सरकार में उच्च पदों पर सेवारत् हैं। जो गांव में हैं वे भी दो-दो तीन-तीन हाथियों के स्वामी हैं। एक हाथी की कीमत एक टाटा ट्रक से कम नहीं है। अरुणाचल में पेड़ों के कटान के दौरान लकड़ी के बड़े-बड़े टुकड़ों को जंगल से बाहर खींचने का काम  हाथी करते हैं और औसतन एक हाथी प्रतिदिन एक हजार तक कमा लेता है। जबकि एक मजदूर की दैनिक मजदूरी आज मात्र नौ रुपये है। खामती लोगों का नाम प्रायः तीन शब्दों से मिलकर बना होता है। प्रथम शब्द उनकी जाति व स्थानीयता को इंगित करता है दूसरा नाम को और तीसरा उपजाति को। जैसे हमारे पथ प्रदर्शक थे चौंगखम गांव के ‘चाऊ मायासोई नामचूम’। पूरे अरुणाचल में लगभग 39 (उनतालीस) जनजातियां हैं। भारत के अन्य समाजों में आज हरिजन, राजपूत व ब्राह्मण आदि जातीय व्यवस्था होने के कारण ‘तू छोटा, मैं बड़ा’ का जो अहम् है वह अरुणाचल में नहीं है। क्योंकि अरुणाचल जनजातियों में भले ही बंटा हो पर जातियों में नहीं।सांस्कृतिक रीतिरिवाज तथा सामाजिक व धार्मिक क्रियाकलापों की दृष्टि से उनके मध्य अवश्य अदृश्य एकरूपता दिखती है किन्तु भाषाई भिन्नता है। अकेले तिराप जिले के वांग्चू, नोक्टे, सिंग्फू व तंगछा आदि जनजातियों के लोग परस्पर संवाद बनाने के लिए असमियां, हिन्दी या अंग्रेजी को माध्यम बनाती है। हिन्दी फिल्मों की बदौलत हिन्दी का प्रचलन अधिक है जिसके कारण वे हिन्दी को प्राथमिकता देते हैं। किन्तु हिन्दी इस प्रकार कि आदमी सुनकर सिर पकड़ ले। जैसे कि ‘‘ आप कहाँ जाते हैं ?’’ को वे कहेंगे ‘‘आप कहाँ जाता है?’’ आदि आदि। व्याकरण का उन्हें ज्ञान नहीं होता है।
    चौंग्खम में फ्रेश  होने व चाय वाय पीने के बाद फिर आगे बढ़े तो सुदूर उत्तर व पूरब में गिरिराज हिमालय के दर्शन होते हैं और दक्षिण में शिवालिक शृंखला की छोटी छोटी पहाड़ियां। आबादी वाली क्षेत्र वाकरो में कुछ देर रुककर फिर चाय पी। चाय ऐसी चीज है कि इसके बहाने आप कुछ देर सुस्ता भी लेते हैं और आस पास बैठे व्यक्तियों से अपने मतलब की बातें भी पूछ सकते हैं। वाकरो प्रशासनिक दृष्टि से लोहित जनपद का सर्किल हेड क्वार्टर है। आसपास लोगों द्वारा चाय की बागवानी व खेती भी की गयी है। कादुम से धीरे धीरे पहाड़ियों का उठान शुरु होता है। चौंग्खम से तीसेक किलोमीटर दूरी तय कर पहुंचते हैं धार्मिक व पौराणिक महत्व वाले  पवित्र स्थल परशुराम कुण्ड।
       विपुल जल सम्पदा वाली लोहित नदी के बायें तट पर स्थित परशुराम कुण्ड की धार्मिक महत्ता है। दन्त कथा है कि परशुराम ने फरसे से अपनी माँ रेणुका की हत्या कर दी किन्तु माँ के शाप से फरसा उनके हाथ पर ही चिपक गया। श्राप से मुक्ति तथा क्रोध शमन के लिये वे वर्षो तक तीर्थस्थलों में भटकते रहे। ऋषियों की सलाह पर  जब सुदूर उत्तरपूर्व में उन्होंने बह्मकुण्ड में स्नान किया तो शपमुक्त हो सके। तब उन्होंने फरसा जितनी दूर हो सकता था फेंक दिया। मान्यता है कि जहां फरसा गिरा वहां की बर्फ पिघल गयी और वहीं से एक नदी फूट पड़ी जिसे लोहित नदी नाम दिया गया। बह्मकुण्ड ही परशुराम कुण्ड के रूप में विख्यात है। आबादी विहीन वाले इस क्षेत्र में एक मंदिर के अतिरिक्त दो-चार झोपड़ियां ही हैं। न कोई घाट विकसित किया गया है और न ही कोई सराय, धर्मशाला ही। साल में एक बार जनवरी माह में मेला अवश्य आयोजित होता है तो देश विदेश से आये श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ पड़ती है। हम स्नान से निवृत्त होकर साथ लाये गये आहार को लेते हैं और प्रकृति का आनन्द उठाते हैं। उस पार लोहित के मुख्यालय तेजू के लिए सड़क है किन्तु नदी पर पुल बनना पस्तावित है। लोहित नदी घाटियों से निकलकर यहां पर मैदानी भूभाग में प्रवेश करती है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ऋषिकेश में गंगा व टनकपुर में काली।
    आज सकून मिला रेणुका जी से परशुराम कुण्ड तक की यात्रा पूरी हुयी। रेणुका जी हिमाचल के सिरमौर जिले में है और परशुराम कुण्ड यहाँ। लम्बी थकान से चूर होकर नामसाई लौट आये। यह भी अच्छा है कि नामसाई से परशुराम कुण्ड तक सड़क की स्थिति बिल्कुल ठीक है। यहाँ जनजातीय क्षेत्रवासी भी बिल्कुल भोले नाथ की तरह है। सरल, निष्कपट व्यवहार वाले ये लोग अपनी संस्कृति को जीवन्त रखे हुए हैं। ईर्ष्या व द्वेष भाव से कोसों दूर हैं। आदिवासियों में एक बात यह गौरतलब है कि पुरानी पीढी जहां अन्धविश्वास, पिछड़ेपन व निरक्षरता के अन्धकार में है वहीं नई पीढी आधुनिकता के साथ आगे बढ रही है। शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिये अरुणाचल सरकार सुविधायें दे रही है। प्रत्येक गावं में प्राइमरी स्कूल तथा आगे की शिक्षा के लिये शत-प्रतिशत बच्चों को होस्टल सुविधा व होस्टल में कापी किताबों के साथ  आवास व भोजन मुफ्त। रात नामसाईं में बिताकर सुबह जयरामपुर से साथ चल रहे मित्र अनिल कुमार सिंह ने विदा ली क्योंकि उनको मिआओं जाना था और हम शेष लोग तिनसुकिया होते हुए डिब्रुगढ़ पहुँच गये।
     ब्रह्मपुत्र के बायें तट पर स्थित डिब्रुगढ़ एक डिसेन्ट शहर और ऊपरी असम का शैक्षणिक व सांस्कृतिक केन्द्र है। अनेक दर्शनीय स्थलों के अतिरिक्त डिब्रुगढ़ में इंजीनियरिंग व मेडिकल कालेज तथा डिब्रुगढ़ यूनिवर्सिटी स्थित है। उत्तरी असम तथा उत्तरी अरुणाचल जाने के लिए डिब्रुगढ़ में ही फेरी (मोटरबोट) से
ब्रह्मपुत्र पार किया जाता है। विशालकाय इन मोटरबोट में तीन-चार सौ सवारियांे के अतिरिक्त एक ट्रक/बस, तीन जीप/कार व चार-छः स्कूटर आराम से लद सकते है। ब्रह्मपुत्र पार करने में बरसात में तीन साढ़े तीन घण्टे लगते हैं जबकि अन्य मौसम में पांच घण्टे तक का समय। असमियां लोग मूलतः बहुत सरल होते हैं। यह नहरकटिया से ही हमारे साथ चल रहे रोबिन गुगोई के व्यवहार से भी हम जान गये थे। उसने ही बताया कि कभी व्यापारी एक मीटर कपड़ा बेचता तो चारों ओर से नापकर तब उतने मीटर की कीमत वसूलता था। मुस्लिम बहुल पूर्वी पाकिस्तान ;बांग्लादेशद्ध के हिन्दू लोग असम में बड़ी तादाद में आये और उन्होंने व्यापार व सरकारी नौकरियों में आम असमियां लोगों को पीछे छोड़ दिया। जिससे असम में धीरे-धीरे व्यवस्था के प्रति असन्तोष पनप रहा है।
शिव की नगरी शिवसागर की ओर
      डिब्रुगढ़ में ईश्वर के दर्शनों की अभिलाषा से मन्दिर गये। अरुणाचली लोग उत्सवधर्मी होते हैं और जीवित भगवान पर ज्यादा विश्वास करते हैं। जबकि हम तथाकथित सभ्य लोग पत्थर या धातु की मूर्तियों में कैद भगवान पर। डिबूगढ के उत्तरी छोर पर बाढ़ से बचाव के लिये ब्रह्मपुत्र नदी के समानान्तर एक लम्बी सुरक्षा
दीवार बनाई गयी है जिस पर सूर्यास्त के समय घूमना आनन्दित करता है। ब्रह्मपुत्र की विपुल जलराशि में सूर्य की किरणें अटखेलियां करती है तो प्रतीत होता है मानो नदी के सीने पर सोना ही सोना बिखरा पड़ा हो। काजीरंगा नेशनल पार्क देखने के लिये  अगली सुबह शिवसागर के लिये निकल पड़े। रोबिन गुगोई के साथ जीप हमने वापस खोन्सा भेज दी थी। तिनसुकिया से तीन बंगाली मित्र भी साथ थे। नारायण कार, स्वदेश दत्ता और पार्थो भादुड़ी। लगभग सौ कि0मी0 दूरी तय कर शिवसागर पहुंचे।
     शिवसागर असम राज्य की भाषाई व सांस्कृतिक हृदयस्थली भी है। इतिहास पर नजर दौड़ाये तो असम अनेक प्रजातियों का संगम रहा है। सदियों से असम ने सभ्यताओं व संस्कृतियों के वाहक उन समुदायों को शरण दी हैं जो पृथक-पृथक धाराओं से सम्बन्ध रखते थे। इन समुदायों में आस्ट्रेलियन, हब्सी, द्रविड़, इण्डो-मंगोल, तिब्बती-बर्मी एवं आर्य भी थे। इन लोगों ने विभिन्न मार्गों से असम में प्रवेश कर सर्वथा एक नवीन लोक समाज के संयोजन में योगदान दिया। इस नये समाज को ही ‘‘असमिया’’ कहा जाने लगा। तथापि अधिसंख्य असमियां तिब्बती-बर्मी मूल के ही हैं। लगभग छः सौ वर्षों तक असम पर राज्य करने वाले राजा हूण जाति के थे जिन्होने अहोम राज्य स्थापित कर शिवसागर राजधानी बनायी। असम के बिहू नृत्य पर तेरहवीं शताब्दी के हूण संस्कृति की छाप स्पष्ट दिखायी देती है। असम में आज मूलतः बोरा, बरूआ, गोर्हाइं, हजारिका, गुगोई, सैकिया, डेका, महन्त, कालिटा, फुकन आदि उपजातियां ही अपने को ‘‘औरिजिनल’’ असमियां मानती है। यहां के मूल निवासी असम को ‘अखम’ और असमिया को ‘अखमिया’ उच्चारित करते हैं। कोई भी जनपद, प्रान्त व देश राजनीतिक व भौगोलिक दृष्टि से चाहे कितनी ही दूरी पर क्यों न हो परन्तु उनमें परस्पर भाषागत व सांस्कृति निकटता रहती ही है। असम गढ़वाल-कुमाऊं से भले ही दूर है किन्तु  भाषागत समानता रखता है। शिव की नगरी शिवसागर पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व लिये हुए है। शिवसागर सागर के तट पर तो नहीं किन्तु यहां के तीन पौराणिक मंदिर शिवाडोल, विष्णुडोल तथा देवीटोल, जिनका निर्माण सन् 1734 में रानी मदाम्बिका द्वारा करावाया गया, एक विशाल झील के किनारे स्थित अवश्य हैं। शिवसागर में कुछ देर रुककर जोरहाट के लिए चल पड़े जो हमारा अगला पड़ाव है। रात खाना खाने के बाद जोरहाट सिनेमाहॉल में अनिल कपूर अभिनीत ‘मशाल’ फिल्म देखी। लम्बे समय बाद हॉल में सिनेमा देखने का आनन्द लेते हैं।
      सुबह काजीरंगा नेशनल पार्क पहुंचकर स्वागत कक्ष में पार्क शुल्क भुगतान के बाद घूमने के लिए जीप किराये पर ली। चौकसी के लिए पार्क के दो फारेस्ट गार्ड भी साथ भेजे गये बन्दूकें लेकर। उनके ढीले कपडे,
पतला बदन तथा आरामतलब मिजा ज देखकर कुछ देर सोचता रहा कि उनके हाथों में बंदूकें क्यों पकड़ा दी होंगी। खतरा यदि आन पड़ा तो वे हमारी क्या रक्षा क्या करेंगे उल्टे इनकी रक्षा हमें ही करनी होगी। ब्रहमपुत्र के बायें तट पर बसा काजीरंगा नेशनल पार्क एक सींगी गैण्डों के लिये ही नहीं अपितु जंगली भैंसों तथा विभिन्न प्रजाति के पक्षियों के लिये भी विख्यात है। फरवरी का महीना होने के कारण अधिक तो नहीं किंतु लगभग सौ गज दूरी से एक सींगी गैंडे व जंगली भैंसों के झुण्ड का दर्शन हो गये थे। गैण्डों का एक सींग इनकी खूबसूरती नहीं, सुरक्षा नहीं बल्कि अभिशाप ही है। सींग हथियाने के लिये असामाजिक तत्वों द्वारा गैण्डों की हत्यायें हमेंशा ही की जाती रही हैें। जिससे इनकी संख्या में निरन्तर गिरावट आ रही है। लगभग 450 वर्ग कि0मी0 में फैले विशाल काजीरंगा पार्क आधा अधूरा घूमने के बाद शाम को सभी बंगाली मित्र वापस लौट गये और हम गोहाटी की बस पकड़ने चले गये।                   
                                                                                                                             समाप्त

Monday, September 28, 2015

रेणुका जी से परशुराम कुण्ड तक (5)

 पिछले अंक से जारी..........
शरणार्थियों का बाजार है मिआओं
         मिआओं कस्बा प्रशासनिक दृष्टि से ई0ए0सी0 (एक्स्ट्रा असिस्टेण्ट कमीश्नर) हेडक्वार्टर है। राज्य सरकार के अनेक कार्यालय, हायर सेकेण्ड्री स्कूल, बैंक, सी0आर0पी0 कम्पनी आदि हैं। सी0आर0पी0 के एक जवान से परिचय होता है तो वह बताता हैं कि गत वर्ष तक यहां पर विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित स्व0 दरबान सिंह के पुत्र श्री नारायण सिंह नेगी कम्पनी कमाण्डर के रूप में तैनात थे। नेगी जी दबंग और कानूनप्रिय अफसर थे। रात्रि पी0डब्लू0डी0 विश्राम गृह में बितायी। अरुणाचल में जिलों के नाम नदियों पर हैं उसी भांति इस विश्राम गृह के कमरे भी तिराप जनपद की नदियों के नाम से हैं। जैसे- नामचिक, रीमा, तिराप आदि। नदियों का संगम हमेशा ही देखा किन्तु विपुल जलराशी वाली डिहीगं नदी को दो भागों में बंटा यहीं देखा। मिआओं वासियों ने बताया कि 1897 के विनाशकारी भूकम्प में जमीन पर दरार के कारण डिहींग नदी दो भागों में बंट गयी, जो पूर्ववत बही उसे बूरी (अर्थात बूढी) डिहींग और लम्बवत बहने वाली नई को नोआ (नूतन) डिहींग कहते हैं।
    तिब्बत से भारत के मैत्रीपूर्ण सम्बंध थे और व्यापारिक प्रगाढता भी। तिब्बत रहते हुये भारतवर्ष की उत्तरी सीमा पूरी तरह सुरक्षित थी। परन्तु चीन ने तिब्बत को निगल लिया। तिब्बत की निर्वासित सरकार को भारतवर्ष में शरण दे दी गयी  और तिब्बतियों को शरणार्थियों के रूप में रहने की स्वतन्त्रता। भारत के सीमान्त क्षेत्रों में आज भी लाखों तिब्बती शरणार्थी रह रहे हैं, जिनमें नेफा भी है। मिआओं के पश्चिम में तीन-चार किलोमीटर पर तिब्बतियन रिफ्यूजी कैम्प है जो खुशहाल व एक भरा-पूरा गांव है। स्थानीय तंग्छा गांवों की अपेक्षा काफी बड़ा है। प्रचुर खेती, बौद्ध मन्दिर, मिडिल स्कूल और कार्पेट बुनाई केन्द्र यहाँ पर है। भारत सरकार तिब्बतियों को भारत की नागरिकता के अतिरिक्त लगभग सभी प्रकार की सुविधायें प्रदान कर रही है। 1960 के आसपास ही बंाग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) के चिट्टगांव की पहाड़ियों और मेमन जिलों से हजारों बौद्ध धर्मावलम्बी चकमा व हाजोंग जनजाति के लोग पूर्वोत्तर भारत में आये। मिआओं, डायून में चकमा व हाजोंग भी हजारों की संख्या में शरणार्थी जीवन यापन कर रहे हैं। बड़ी संख्या में तिब्बती और चकमा आदि शरणार्थियों के बस जाने के कारण यहां का सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक जीवन पूरी तरह प्रभावित हुआ है।
    मिआओं से आगे सुदूर पूरब में विजयनगर कस्बा है (भारत के मानचित्र पर नजर दौड़ायें तो विजयनगर उस बिन्दु पर पडे़गा जहां भारत-बर्मा सीमा पर चौकान पास है।) अरुणाचल के प्रथम उप राज्यपाल श्री के0 ए0 ए0 राजा की प्रेरणा से मिआओं से विजयनगर तक मीलों लम्बी सड़क बनी तो है किन्तु वर्षा की अधिकता व लगभग आबादी विहीन क्षेत्र होने के कारण इस सड़क का मरम्मत कार्य बन्द हैै। विजयनगर जिला तिराप का ही अंग है। जाने का अवसर तो नहीं मिला पर कुछ लोग बताते है कि विजयनगर कस्बा मूलतः भारत के गढ़वाल, कुमाऊँ सहित विभिन्न प्रान्तों के सेवानिवृत्त सैनिकों द्वारा बसाया गया है जिससे विजयनगर में सम्पूर्ण भारतवर्ष की सांस्कृतिक झलक देखने को मिलती है। वर्तमान में विजयनगर केवल हवाई मार्ग से जुड़ा है।  मिआओं-विजयनगर मार्ग पर ही डिहींग नदी के दोनों ओर मीलों तक फैला हुआ ’नामडफा नेशनल पार्क’ नाम से एक ’टाईगर प्रोजेक्ट’ है।   
    एक दिन मिआओं में बिताकर अगली सुबह मिआओं से डिहींग की विभिन्न धाराओं पर लकड़ी की लम्बी-लम्बी बल्लियों व बांस की खपच्चियों से बने हैं कई छोटे-छोटे पुलों से होकर बूरी डिहींग नदी पार की और डायून की ओर बढ गये। इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि मार्गेरिटा से आगे पूरब में डिहींग नदी पर कहीं भी एक भी पक्का या स्थायी पुल नहीं है, जिससे डिहींग के दोनों ओर के आबादी युक्त क्षेत्र बरसात में असम्पृक्त रहते हैं। तब मिआओं से मात्र दस-बारह कि0मी0 दूरी पर स्थित डायून व बरदुम्सा को असम से होते हुये सौ-डेढ़ सौ कि0मी0दूरी तय कर ही पहुंचा जाता है। डायून एक छोटा सा गांव है और धीरे-धीरे एक कस्बे में परिवर्तित होता जा रहा है। डायून में एक प्राईमरी स्कूल और छोटा सा बाजार है। यहां प्लाईवुड मिल के स्वामी गांधी उपनाम वाले व्यक्ति से मुलाकात  हुयी। मिआओं-डायून मार्ग में चकमा व हाजोंग जनजातीय लोगों, की बस्तियां हैं। बांस/लकड़ियों के बने घर, अपने हाथों से बनाए हुए बेंत के फर्नीचर, कार्पेट, साफ-सुथरे आंगन, आस-पास थोड़ी बहुत खेती भी। मूल आदिवासियों की अपेक्षा हाजोंग व चकमाओं का रहन-सहन शालीन व साफ सुथरा है। आजीविका के लिये ये लोग बंेत के फर्नीचर व कार्पेट का व्यापार करते हैं।  
    अरुणाचल वन विभाग में कार्यरत् एस. चक्मा घर पर थे। उन्होंने बैठने के लिए कहा तो इटावा निवासी मित्र अनिल कुमार सिंह ने तुरंत हामी भर दी। चाय पीने की इच्छा हो रही थी। काफी देर तक इधर उधर की बातों के बाद एस. चक्मा ने भरे गले से बताया कि सरकार तिब्बती शरणार्थियों की भांति हाजोंग व चक्माओं को
Photo - Courtesy by Google
सुविधा नहीं दे रही। न आवागमन के साधन, न शिक्षा और न ही चिकित्सा। शिक्षा व उपचार हेतु छः-सात माह निकटस्थ कस्बे मिआंओ तो जा सकते हैं किंतु बरसात में वह भी संभव नहीं है। रोज चार-पांच किलोमीटर चलकर बच्चे प्राथमिक शिक्षा डायून में पा लेते हैं किंतु आगे वे नहीं पढ़ पाते हैं। वे प्रार्थना करते हैं कि विशाल व्यक्तित्व वाले दलाईलामा की भांति कोई उनका धार्मिक व राजनैतिक नेता बने। अंधकारमय व त्रासदीपूर्ण जीवन जी रहे इन चक्मा शरणार्थियों के मन में यह भय कहीं गहरे तक है कि हो सकता है कि अरुणाचल सरकार कभी भी उन्हें राज्य छोड़ने का फरमान जारी कर सकती है। सहानुभूति के दो बोल कहकर द्रवित हृदय लिये हम लौट पड़े।                शेष अगले अंक(6) में...............

Saturday, September 05, 2015

फिल्म समीक्षा - मांझी : दि माउण्टेन मैन

        किसी भी फिल्म की सफलता के लिये आवश्यक होता है कुशल निर्देशन, मंझे हुये सितारे, एक अच्छी कहानी, बेहतरीन पटकथा, कसे हुये संवाद, कर्णप्रिय गीत-संगीत आदि आदि। परन्तु कभी कुछ फिल्म केवल कुशल निर्देशन या अच्छी कहानी या बडी स्टार कास्ट या गीत-संगीत के बल पर भी चल पड़ती है। और कभी सब कुछ ठीक-ठाक होने के बावजूद भी फिल्म अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाती है। ऐसे कई उदाहरण है जब बड़े बजट की फिल्म बॉक्स आफिस पर लुढ़क गयी और छोटे बजट की फिल्म झण्डे गाड़ गयी, दर्शकों की वाहवाही बटोर ले गयी।
    केतन मेहता द्वारा निर्देशित और नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राधिका आप्टे, पंकज त्रिपाठी, गौरव द्विवेदी, अशराफुलहक, दीपा साही, तिग्मांशु धूलिया, प्रशान्त नारायण आदि द्वारा अभिनीत फिल्म मांझी: दि माउण्टेन मैन की रिलीज के दिन से ही देखने की उत्सुकता थी, परन्तु देखकर निराशा ही हाथ लगी।  होली, सरदार, भवनी भवाई, मिर्च मसाला, मंगल पाण्डे: द राईजिंग व रंग रसिया जैसी एक से एक बेहतरीन फिल्म देने वाले केतन मेहता जी शायद अबकी चूक गये। लगा जैसे इस फिल्म में सारी जिम्मेदारी नवाजुद्दीन सिद्दीकी और राधिका आप्टे केे कन्धों पर डालकर वेे चुपचाप जाकर कैमरे के पीछे बैठ गये। इतनी चर्चित और दमदार कहानी हाथ आने और अभिनय के क्षेत्र में अपना लोहा मनवा लेने वाले कलाकार साथ होने के बावजूद फिल्म में कहीं कोई कसाव नहीं, कहीं गति नहीं, कोई रवानगी नहीं। फिल्म देखते समय यह उत्सुकता ही नहीं जागती कि अब आगे क्या होगा, आगे क्या होगा। जैसा कि अमूमन हर फिल्म देखते हुये या कहानी-उपन्यास पढ़ते हुये होता है। हॉल में अन्तिम समय तक इसलिये बैठे रहे कि घर से इस बहाने निकले हुये थे और फिर टिकट खरीद रखी थी।
     -गांव में एक हरिजन पुरूष के जूते पहन लेने पर दबंग सवर्णों द्वारा उसके पांव काट दिये जाते हैं। परन्तु कोई आक्रोश नहीं, कोई प्रतिकार नहीं। यहाँ तक कि गांव में दबी जुबान भी कोई चर्चा नहीं करता। बीसवीं सदी की नहीं चौदहवीं-पन्द्रहवीं सदी की घटना हो जैसे।
     -बचपन में घर से भाग जाने के बाद दशरथ मांझी सात साल बाद जब गांव लौटकर आता है तो सवर्णों द्वारा उसकी पिटाई कर दी जाती है परन्तु उसके चेहरे पर पीड़ा नहीं दिखायी देती और न ही कोई आक्रोश झलकता है। इस घटना को बिल्कुल सहजता से ले लेता है वह।
     -गहलोर गांव की सामाजिक व आर्थिक स्थिति का फिल्मांकन कमजोर है जबकि मदर इण्डिया की भांति उनकी निर्धनता को बेहतरीन ढंग से दर्शाया जा सकता था। यहाँ तक कि शादी के बहाने उस क्षेत्र के लोकगीत, लोकनृत्यों को फिल्माये जाने की संभावना थी। परन्तु निर्देशक चूक गये।

     -हासिल, मकबूल, पान सिंह तोमर आदि फिल्मों का निर्देशन कर और गैंग्स ऑव वासेपुर फिल्म में अपने अभिनय का लोहा मनवा लेने वाले तिग्मांशु धूलिया की भूमिका प्रभावहीन रही। न कहीं कोई रौब, न ठाकुरों जैसी अकड़। बिल्कुल भावहीन चेहरा।
    -नायिका के पहाड़ से फिसल जाने के बाद नायक द्वारा उसे जिस तेजी से अस्पताल पहुँचाया जाता है वह तो फिल्म के अनुरूप है। परन्तु अस्पताल में नायक की न तड़प देखी गयी न आशमान सिर पर उठा देने की वेदना और न ही दहाड़ मार कर रोना। बल्कि एक कोने में अपराधी सा बैठकर चुपचाप टुकुर-टुकुर देखना।
    - तकनीकी तौर पर देखें तो खामियां नजर आती है जैसे कि नायक का पिता
(अशराफुलहक) शुरू से अन्त तक बिल्कुल उसी मेकअप में नजर आता है। वह बुढ़ाता ही नहीं है। जबकि फिल्म में नायक के बचपन से लेकर बूढ़े होने तक की कहानी है।
    -सर्वविदित है कि राजनीतिक दल कांग्रेस द्वारा केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार की विफलता के बाद ही सन् 1980 के चुनाव में हाथ को चुनावचिन्ह बनाया गया था। परन्तु फिल्म के एक दृश्य में आपातकाल से पहले ही इन्दिरा गांधी द्वारा ‘हाथ’ को मजबूत करने की अपील जनता से की जा रही है। 
   -नायक के बजीरपुर से पैदल ही दिल्ली कूच करने पर तेरह सौ किलोमीटर लम्बे रास्ते की कठिनाइयों को उभारा
नहीं गया है।
   -गांव के मुखिया व बीडीओ द्वारा रुपये हड़प लिये जाने को मीडिया नहीं उठाता है। यहाँ तक कि पूरा पहाड़ काट लेने पर रास्ता बन जाने को भी मीडिया ज्यादा तवज्जो देता नहीं दिखायी देता।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी और राधिका आप्टे द्वारा अपने अभिनय के बल पर फिल्म को सफल बनाने की पूरी कोशीश की गयी है किन्तु निर्देशक थोड़ा मेहनत करते थे तो निश्चित तौर पर यह फिल्म शेखर कपूर की ‘बैंडिट क्वीन’ से आगे की श्रेणी में रखी जा सकती थी।

Sunday, August 16, 2015

रेणुका जी से परशुराम कुण्ड तक (4)

(क्षमा चाहता हूँ ब्लॉग के समस्त मित्रों से जिनकी प्रेरणा से लिखना शुरू किया था और जिन्होंने कमेण्ट के रूप में समय-समय पर अपनी टिप्पणी देकर मेरा हौसला बनाये रखा। लगभग एक वर्ष से अधिक बीत गया है, जब से मैं ब्लॉग से अनुपस्थित हूँ। अब इतने समय बाद आया तो पहले इस अधूरे यात्रा संस्मरण को ही पूरा कर लूं।)   पिछले अंक से........
सुदूर पूरब की ओर
              असम-अरुणाचल सीमा पर ही दक्षिण से उत्तर की ओर बहने वाली नामसांग नदी के दायें तट पर फुटहिल्स में स्थित है एक खूबसूरत कस्बा देवमाली। नदी पार कर पुल के किनारे ही पुलिस चेक पोस्ट पर इनर लाईन पास की जांच करवाकर आगे बढे। जिला तिराप के नामसांग सर्किल के अन्तर्गत देवमाली कस्बा समुद्र तल से मात्र साढे चार सौ फीट ऊँचाई पर बसा हुआ है और इसके चारों ओर आरक्षित वन क्षेत्र है। समशीतोष्ण जलवायु और चारों ओर खूबसूरत पहाडियों से घिरे देवमाली कस्बे में राज्य सरकार के छोटे-बड़े प्रतिष्ठानों के अलावा अरुणाचल वन निगम का मुख्यालय और कुछ प्लाइवुड मिल्स है। देवमाली के दक्षिण में लगभग आठ-दस कि0मी0 नामसांग नदी के दायें तट पर आगे बढने पर नामसांग गांव में पंहुचे, केवल इस गांव को देखने की इच्छा से। नामसांग ही संभवतः भारतवर्ष का पहला गांव होगा जहां से वर्ष 1984 के आम चुनाव में कांग्रेस के
टिकट पर लोकसभा के लिए श्री वांग्फा लोवागं और विधान सभा के लिए श्री कैप्चन राजकुमार विजयी हुये। और यह भी संयोग ही माना जायेगा कि राज्य और केन्द्र दोनों में कांग्रेस सरकार ही सत्तारूढ हुयी। दोनों जन प्रतिनिधियों के प्रयास से नामसांग गांव की तस्वीर तो बदल ही सकती है। देवमाली से छः-सात कि0मी0 पूरब में बसे नामसांगमुख में श्रीरामकृष्ण मिशन का हायर सेकेण्डरी स्कूल है। श्री रामकृष्ण मिशन की स्थापना वर्ष 1896 में स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा अपने आध्यात्मिक गुरू श्रीरामकृष्ण परमहंस के नाम पर की गई थी। मिशन के आज देश-विदेश में शिक्षा, चिकित्सा, सेवा-सुश्रुषा एवं अध्यात्म पर केन्द्रित सैकड़ों केन्द्र है। मिशन मुख्यालय बेलूरमठ (पश्चिम बंगाल) में है और ग्रीष्मकालीन लोहाघाट (पिथौरागढ़) के समीप मायावती में। मिशन में शिक्षक व अन्य कर्मचारी सामान्यतः बाहर से लिये जाते है परन्तु प्रबन्धन व देखरेख मिशन के सन्यासियों के हाथों में ही रहता है। सन्यासियों में श्वेत वस्त्रधारी ’महाराज’ और भगवा वस्त्रधारी ’स्वामी’ कहलाए जाते हैं। भगवा की पात्रता ’महाराज’ सन्यासियों को कठिन परीक्षाओं व कई बरसों की कड़ी मेहनत के बाद ही मिल पाता है। यहां मिशन भवन की बाहरी दीवार पर प्लास्टर को उकेरकर रंगों के साथ एक आदिवासी द्वारा अपने बच्चे को शिक्षा के लिये प्रेरित करने का मनमोहक चित्र उभारा गया है। मिशन केन्द्र के प्रभारी स्वामी गोकुलानन्द जी से औपचारिक भेंट करते हैं। एक सन्यासी के तेज व वाणी के ओज से प्रभावित हुये बिना नहीं रहते। मिशन स्कूल के पीछे जंगल में रुद्राक्ष के काफी पेड़ हैं, अरुणाचल का राज्य पक्षी हॉर्नबिल रुद्राक्ष फलों को बड़े चाव से खाता है।

           नामसांगमुख से कुछ आगे पूरब में फॅारेस्ट रेंज आफिस और मात्र चार-पांच फर्लांग पर ही राज्य का फारेस्टर टेªनिंग स्कूल है। आगे रास्ता आबादी विहीन क्षेत्र से होकर गुजरता है और छः-सात कि0मी0 पर दिरोकमुख नामक जगह पड़ती है। दिरोकमुख उत्तर-दक्षिण बहने वाली दिरोक नदी के बायें तट पर स्थित है जो असम-अरुणाचल की सीमा भी है। आगे यही मार्ग मार्गेरिटा तक जाता है। वानस्पतिक दृष्टि से यह बात गौर करने लायक है कि अरुणाचल के तराई क्षेत्र में व समुद्र तल से बारह-चौदह सौ फीट ऊँचाई तक तिराप जिले में मुख्यतः ’’ग्रीन गोल्ड’’ नाम से विख्यात हौलोक व हौलोगं के आरक्षित वन है। शाल परिवार का हौलोक जहां इमारती लकड़ी के रूप में प्रयोग होती है तो वहीं हौलोंग से उत्तम क्वालिटी की प्लाई तैयार होती है। आरक्षित वनों के भीतर ही कहीं-कहीं बंेत व रिंगाल के जंगल भी हैं और कहीं बांस के जंगल बहुतायत में है जिनसे स्थानीय लोग घर, चारपाईयां व दाल-चावल रखने तथा पानी ढोने के ठूंगे तैयार करते हैं। पेपर मिल यदि कभी अरुणाचल में कहीं लगे तो अच्छा ’स्कोप’ है।)
अरुणाचल में दिरॉक नदी के पश्चिम में देवमाली, नामसांग, खोन्सा, लाजू आदि नोक्टे जनजातीय क्षेत्र है और लॉगंडिंग, वाक्का, पंग्चाव आदि वांग्चू जनजातीय क्षेत्र। वहीं दिरॉक नदी के पार चांगलांग, जयरामपुर, नाम्पोगं व मिआओं आदि तंग्छा बहुल। फुटहिल्स में स्थित मार्गेरिटा असम के डिब्रूगढ जिले का भाग है और पश्चिम को बहती बूरी डिहींग नदी के दोनों तटों पर बसा हुआ है। कुछ सरकारी कार्यालयों के अतिरिक्त ’कोल इण्डिया लिमिटेड’ का ’रिजनल ऑफिस’ भी मार्गेरिटा में है। रेलवे लाईन तिनसुखिया से आकर मार्गेरिटा होते हुये आगे लेखापानी तक जाती है।
             हम मार्गेरिटा से पूरब की ओर बढते हैं पांच-छः कि0मी0 बाद लीडो, (लीडो क्वैलारी वाला)और कुद आगे लेखापानी है। लेखापानी तक रेल लाईन है, सेना का ब्रिगेड हेडक्वार्टर है और पास ही तिराप और बूरी डिहींग नदी का संगम भी। लेखापानीबूरी डिहींग नदी के बायें तट पर बसा हुआ है। बढते जाते हैं तो लेखापानी से सात-आठ कि0मी0 पूरब में जगुन गांव पड़ता है। जिसे स्थानीय लोग ’’नौ माइल’’ कहते हैं। जगुन से एक सड़क पूरब में मिआओं की ओर चली जाती है और दूसरी सड़क दक्षिण में जयरामपुर को।
                    हम जगून से दक्षिण की ओर बढते हैं। मात्र बारह-चौदह कि0मी0 पर ही तिराप जनपद का सबसे खूबसूरत कस्बा जयरामपुर है, जो हमारा पड़ाव है। चेकपोस्ट के बाहर बांस व लकड़ियों की बनी सैकड़ों दुकानें हैंं, जो कि असम में है। इन्हीं दुकानों से जयरामपुर कस्बे के लोग सब्जियाँ, माँस, मछली इत्यादि खरीदते हैं। दुकानों में ही कहीं कच्ची शराब भी धड़ल्ले से बिकती है।  पुलिस चौकी जगून और जिला मुख्यालय डिब्रूगढ़ यहाँ से दूर होने के कारण इसे रोक पाना मुश्किल है।
            जयरामपुर का पुराना नाम ’तेरह माइल’ है। पैदल मार्ग अवश्य जगुन से चार मील ही होगा किन्तु सड़क से दूरी आठ-नौ मील की ही है। दक्षिण से उत्तर की ओर हल्की ढलान वाली भूमि पर बसा जयरामपुर एक वेल प्लान्ड कस्बा है, साफ सुथरी चौड़ी सड़कें तथा टिन की छत वाले सैकड़ों मकान हैं। यह अरुणाचल में ही सम्भव है जहां पर प्रायः शत-प्रतिशत कर्मचारियों को सरकारी आवास उपलब्ध हो पाते हैं। लगभग पन्द्रह-बीस हजार की आबादी वाले जयरामपुर में हायर सेकेण्ड्री स्कूल, सा0 नि0 वि0 का सर्किल कार्यालय, वन विभाग व वन निगम का डिवीजन, असम राईफल्स का बटालियन हेडक्वार्टर, आदि प्रतिष्ठान है। दो, तीन प्लाईवुड कारखाने भी हैं। हल्की ढलान वाला जयरामपुर चारों ओर घने जंगलों से घिरा हुआ है।
               अगली सुबह जयरामपुर से अठारह-बीस कि0मी0 दूर नाम्पोगं को चल पड़ते हैं।  लगभग चार-साढे़ चार हजार फीट की ऊँचाई वाला नाम्पोगं पहाड़ी की दक्षिणी ढलान पर बसा हुआ है। दक्षिण में मात्र बारह कि0मी0 दूरी पर नाम्पोगं पास (दर्रा) है और सड़क आगे बर्मा के निग्ंबेन, कामोइगं कस्बों से होकर मिटक्यीना शहर को जोड़ती है। भारतवर्ष में यह पूरी सड़क पक्की व चौड़ी है और बर्मा में भी इसे ’नेशनल हाइवे’ की तरह मेण्टेन किया जाता है। वस्तुतः यह ब्रिटिश काल में बनी उन सड़कों में से है जब बर्मा भारत का ही अंग था। सीमा पर तैनात बर्मी सैनिक नाम्पोगं कस्बे में दैनिक आवश्यकताओं की खरीददारी करने आते हैं। अरुणाचल के जिला तिराप की दक्षिणी सीमा पर बसे पग्ंचाव, खासा, वाक्का, लाजू, नाम्पोगं आदि कस्बे पूरब-पश्चिम फैली इस शिवालिक श्रेणी पर स्थित हैं और भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने इस पर्वत श्रेणी को पतकै बूम नाम दिया है। नाम्पोगं से वापस जयरामपुर, जगुन होते हुये मिआओं की ओर बढ़ते हैं। नामचिक नदी पार अरूणाचल पुलिस का चेकपोस्ट है। नामचिक चेकपोस्ट के पास जंगलात का रंेज कार्यालय व एक विश्राम गृह है। विशाल बूरी ढिहींग की सहायक नदी होने के कारण नामाचिक में बहुत मछलियां है और काफी स्वादिष्ठ मानी जाती है। मिऑओं की ओर बढ़ते हैं तो दोनों ओर बड़े-बड़े हौलोक व हौलोंग के जंगलों के बीच से गुजरना देहरादून के लच्छीवाला/आशारोड़ी अथवा रुद्रपुर-हल्द्वानी मार्ग के जंगलों के बीच से गुजरने की याद दिलाता है। पच्चीस-तीस कि0मी0 की इस सड़क पर नामचिक, नामफाई, खरसियांग आदि गांव पड़ते हैं। रास्ते में प्लाईवुड मिल्स हैं। जिससे इस सड़क पर ट्रैफिक ज्यादा है।           शेष अगले अंक में...............

Tuesday, May 13, 2014

रेणुका जी से परशुराम कुण्ड तक (3)


पिछले अंक से जारी..........
शिवालिक पहाड़ियों की गोद में
        नहरकटिया में बस पकड़कर हम आगे बढ़े, दक्षिण में अरुणाचल की ओर। दस बारह  कि0मी0 के बाद ही शिवालिक पहाड़ियां प्रारम्भ होती है। सीमान्त राज्य होने के कारण अरुणाचल, नागालैण्ड आदि राज्यों की सीमा में प्रवेश के लिए इनर लाईन कार्ड/परमिट होना नितान्त आवश्यक है। हुकुनजुरी चेकपोस्ट पर चेकिंग से गुजरने के बाद बोगापानी और बरदूरिया जैसे छोटे-छोटे पड़ाव पार कर पैंतीस-चालीस कि0मी0 निरन्तर हल्की चढ़ाई चढ़ते हुये हम पहुँचते हैं तीन हजार फीट ऊँचाई पर बसे हुए तिराप के मुख्यालय खोन्सा में। सहयात्री बताते हैं कि देवमाली, हुकुनजुरी व बरदूरिया क्षेत्र में सर्दियों में प्रायः दिन में भी हाथी सड़क पर आ जाते हैं जिससे घण्टों तक जाम लग जाता है। वन बहुल्य  क्षेत्र होने के कारण असम व अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में जंगली हाथियों की संख्या काफी अधिक है। इसलिये हाथी को यहां "डांगरिया" रूप में पूजा जाता है। (डांगरिया डांगर शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है बड़ा, पूज्य अर्थात शिव ) इसीलिये प्रायः जंगली भूभाग पर कोई काम प्रारम्भ करने से पूर्व पेड़ की आड़ में प्रतीक रूप में छोटा सा डांगरिया मन्दिर बनाया जाता है और वहां पर पूजा -हवन किया जाता है। दक्षिण से उत्तर की ओर ढलान लिए खोन्सा की बनावट नरेन्द्रनगर, टिहरी गढवाल से मिलती-जुलती है। आबादी का घनत्व अत्यधिक कम और धारा 371 के लागू रहने के कारण सड़कें सूनी और गांव दूर-दूर हैं। जिला मुख्यालयों में भी कम ही है। खोन्सा में लगभग सभी विभागों के जिला कार्यालय, हायर सेकेण्ड्री स्कूल, श्री मां शारदा मिशन हायर सेकेण्ड्री (गर्ल्स), सी0आर0पी0 का बटालियन हेडक्वार्टर, एक सिनेमाहाल, जिला पुस्तकालय व एक बाजार है। अरुणाचल में जगह-जगह थाने तो खुल गये हैं किन्तु सीमान्त राज्य होने के कारण असम-अरुणाचल सीमा व चौकियों पर सी0आर0पी0 ही तैनात है। जनपद तिराप में वांग्चू, नोक्टे और तंग्छा तीन मुख्य जनजातियों के अतिरिक्त सिंग्फू आदि जातियां है। सबकी अलग बोलियां है, जो वे आपस में भी नहीं समझ पाते हैं और संवाद बनाने के लिये उन्हें भी असमिया या हिन्दी का ही सहारा रहता है।
खोंसा क्लब और दूर पहाड़ियों पर श्री माँ शारदा स्कूल
         प्रशासनिक दृष्टि से तिराप दस सर्किल में बंटा हुआ है। भूमि का बन्दोबस्त न होने के कारण अरुणाचल में अभी तक तहसीलों का गठन नहीं हुआ है। बस, एक सर्किल आफिसर ही सर्किल की सभी शक्तियां रखता है। राजनीतिक मानचित्र के अनुसार छः विधान सभा सीट वाला तिराप ’’अरुणाचल-ईस्ट’’ लोकसभा क्षेत्र के अन्तर्गत है। प्राकृतिक छटा के साथ-साथ दर्शनीय स्थलों में बौद्ध शैली में बना एक गोम्पा मन्दिर व श्री माँ शारदा मिशन का भव्य भवन है।
जिन्दादिल वांग्चुओं की धरती पर
              दूसरी सुबह खोन्सा से पश्चिम में लांगडिंग की ओर बढते हैं, पैंतीस-चालीस कि0मी0 बाद बरसाती नदी टंगसा पड़ती है। जो पंग्चाव की पहाड़ियों से निकलकर  पश्चिम-पूरब और फिर उत्तर को बहती हुयी नाकफन नदी में समाहित हो जाती है। (देहरादून की दो टोंस नदियों - हर की दून उदगम वाली तथा दूसरी मसूरी की पहाड़ियों से निकलने वाली, का पौराणिक नाम भी टंगसा/तमसा ही है)। टंगसा से पहले ही एक सड़क बारह-चौदह कि0मी0 पर बसे सीमान्त क्षेत्र वाक्का को चली जाती है। वाक्का के आसपास दालचीनी के पेड़ बहुतायत में है। चौड़ी घाटी वाले इस क्षेत्र में थोड़ी मेहनत की जाये तो खेती की अच्छी संभावना है। किसी विभाग में कार्यरत एक असमियां युवा अनूप गोहाईं से भेंट होती है। टूटी फूटी हिन्दी में वह हमारा मार्गदर्शन करता है और आगे बढकर अपनी धुन में मस्त होकर गाना शुरु करता है- 
’’धुनिया धुनिया सैंतोली, धुनिया धुनिया सैंतोली..........’’  
           टंगसा पार कर हम वांग्चू जनजातीय क्षेत्र में प्रवेश करते हैं और दस-बारह कि0मी0 बाद ही पहंुचते हैं लॉगंडिगं कस्बे में। रास्ते में सेनुआ नामक जगह पर भूमि संरक्षण विभाग का प्रशिक्षण केन्द्र हैं। खोन्सा के आसपास जहां घने बांस के जंगल हैं वहीं लॉगंडिंग कस्बा कछुए की आकृति वाले पहाड़ी की ढलान पर बसा हुआ है और आसपास गांव होने के कारण इसका सौन्दर्य भी आकर्षित करता हैं। लॉगंडिंग के निकट एक ऊँची पहाड़ी पर चढ़कर देखते हैं तो दक्षिण में भारत-बर्मा की सीमा पर शिवालिक पहाड़ियां और सुदूर उत्तर में असम के मैदान और असम के पास अरुणाचल में उच्च हिमालय। जगह-जगह तेल के कुओं से रिसने वाली गैस जल रही है। रात को ऐसा प्रतीत होता है मानो सैकड़ों लोग हाथों में मशाल लिये ‘’रगांली बिहू’’ का आनन्द ले रहे हों।
         पूर्वोत्तरवासियों की बनावट व कद-काठी जहाँ मंगोलों से मिलती है वहीं वांग्चू लोगों की मुखाकृति मंगोलों की भांति तो है किन्तु आकार में वे प्रायः लम्बे-चौडे़ होतहैं। कमर में छोटी लंगोट बांधे, काले दाँत और हाथ में दाव (पाठल) लिये कभी कोई वांग्चू एकाएक मिले तो शरीर ंिसंहर जाता है। बलिष्ठ भुजायें और पुष्ट जंघायें उनकी ताकत का अहसास कराये बिना नहीं रहती। (अरुणाचल की कुछ जनजातियों में सफेद-साफ दाँत अच्छे नहीं माने जाते। इसलिये वे जंगली पेड़ की छाल दांतों पर रगड़ कर दाँत काले करते है) शाम को निकट स्थित जेडुआ के गांवबूढ़ा श्री आबू वांग्चू के यहां से निमत्रंण मिलता है तो मैं और गुनिन गोगोई चले जाते हैं। गांव तक सड़क है। कमर में लंगोट व लंगोट में खुंसी दाव तथा बाहर से मेहरून रंग के कोट पहने लगभग साठ वर्षीय गांवबूढ़ा की दो-ढाई हजार फीट कवर्ड एरिया लिये बांस व टोको पात से बनी हवेली गांव के शुरू में ही है। मेहरून रंग के कोट पहनने का अघिकार केवल गांव बूढा को ही होता है। (फर्न परिवार के ’टोको’ पौधे के पत्ते, आकार में पपीते के पत्तों की भांति किन्तु काफी मोटे व बड़े होते हैं। स्थानीय लोग टोको पात का प्रयोग छाते के रूप में भी करते हैं) प्रवेश द्वार पर मिथुनों के दो बड़े-बड़े सिर स्वागत करते हैं। भीतर बढ़ते हैं तो फर्श न सीमेण्ट का है न मिट्टी का, बल्कि लकड़ियों की बल्लियों पर टिका हुआ बांस की चटाई का है। चटाईयों का ही पार्टीशन देकर कई कमरे बनाये गये थे, सभी सदस्यों के लिये अलग-अलग कमरे। बैठक की दीवार पर गांवबूढा की राज्य के मुख्यमंत्री माननीय श्री गेगोंग अपांग, स्व0 प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी व अन्य राजनीतिक हस्तियों के साथ खिंची तस्वीरें टंगी थी। घर के बीच में चटाई के ऊपर थोड़ी मिट्टी बिछाकर उस पर जांती रखी हुयी थी और जांती पर ही खाना पक रहा था। एल्मुनियम की बाहर-भीतर पूरी तरह काली पड़ चुकी डेगची पर भात बन रहा था और वैसी ही दूसरी पर बिना तेल, हल्दी व मसाले का मुर्गा। गांवबूढ़ा बताता है कि वे लोग तेल, मसाला नहीं खाते हैं और न ही चाय पीते हैं। घर में प्रवेश करने से लेकर रात सोने तक वे चावल की बनी हुयी शराब लावपानी अवश्य पिलाते रहते हैं जब तक कि पीने वाला ही मना न कर दे।  चावल की बनी इस शराब का स्वाद कुछ-कुछ ताजी व गाढी मठ्ठा की तरह था। गांवबूढ़ा के घर में न रजाई है, न बिस्तर और न तकिया। सोचता हूँ कि जब गांव में सम्पन्न माने जाने वाले इस व्यक्ति के ये हाल हैं तो सामान्यजन के कैसे होंगे? लकड़ी का टुकड़ा सिरहाने रखकर जांती के आसपास ही पसर जाते हैं। कुछ जांती के नीचे राख में दबी आग की गरमी और कुछ लावपानी का नशा कि घण्टे-डेढ घण्टे करवटें बदलने के बाद नंगी चटाई पर नींद आ ही जाती है। सुबह जागकर चाय पीने की बड़ी तीव्र इच्छा होती है किन्तु गांवबूढ़ा असमर्थता व्यक्त करता है। दिशा-शौच के लिये पानी की बोतल आदि खोजता हूँ तो गांवबूढ़ा हँसकर मना कर देता है, कहता है ’’अजी! हम लोग कहाँ पानी इस्तेमाल करते हैं।’’
            सुबह मैं गांवबूढा, उनके दो सहयोगी तथा ग्रामीण निर्माण विभाग के जे0ई0 गुनिन गोगोई व मैं दो-तीन कि0मी0 उतरकर खेतों में गये। सहयोगी के कन्धे पर झोला लटका था और हाथ में कभी न धुली गयी एक अल्मुनियम की डेगची व जांती। एक गदेरे में प्रस्तावित नहर हेतु दो घण्टे चली नाप-जोख के बाद खेत के किनारे बैठ गये। इतने में सहयोगियों द्वारा बिना तेल मसाले का मुर्गा बना दिया गया था और चावल पकाना शेष था। वे ढाई-तीन इंच व्यास का लम्बा कच्चा बांस काटकर लाये थे, फटाफट एक-एक फिट के आठ दस ठूंगे (कलमनुमा टुकड़े)े किये, उनमें पानी भरा और चौड़े पत्तों में चावल बांधकर ठूंगे मे रखते गये, फिर ठूंगे जलती आग में पत्थरों के सहारे खड़े कर कुछ देर पकने दिया गया। बड़म-बड़म कर बांस फूटने लगे तो उन्हे आग से हटाकर ठूंगे फाड़कर चावल की पोटली बाहर निकाली। चावल पक चुका था, फिर मुर्गे के साथ वह चावल खाया तो उसका स्वाद वर्षों बाद आज भी जीभ पर है।  
 अरुणाचल, नागालैण्ड और बर्मा सीमा पर
          लांगडिंग से पंग्चाव के लिये कच्ची सड़क तो है किन्तु सार्वजनिक परिवहन नहीं। सुबह लॉगंडिंग से चलकर लगभग चौदह कि0मी0 दूर मिण्टोगं गांव पहुँचते हैं। रास्ते में गावं इक्का दुक्का हीे है, एक जगह आर्मी का कम्पनी हेडक्वार्टर है। मिण्टोंग में राजस्थानी मूल के युवा दुकानदार भवंर सिंह को स्थानीय वांग्चू से उलझते और उसी की बोली में बात करते देखा तो लगा कि आदमी प्रयास करने से काफी कुछ सीख सकता है। उत्तराखण्ड के लोग दूर प्रदेश में नौकरी भले ही करे परन्तु व्यापार शायद ही कभी करे। मिण्टांेग में पडा़व डाला। बारह-चौदह साल के लड़कों को नग्न देखकर अटपटा लगता था। किन्तु जब सभी आयुवर्ग की स्त्रियों को केवल अधोभाग को एक छोटे से गमछे से ढके लगभग नंग धड़गं आते-जाते देखा तो सन्न रह गया। सोचा विकास के सरकारी आंकड़े कितने झूठे हैं ? यह क्षेत्र काफी पिछड़ा हुआ है और लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। समूह में स्त्रियों के चलने पर कहीं से घण्टियों की आवाज आ रही थी तो मैने सोचा कहीं भेड़-बकरी या गाय चर रहीं होंगी। लेकिन तब एक स्थानीय व्यक्ति ने ही बताया कि आकर्षण के लिये अविवाहित लड़कियां गमछे के नीचे घण्टियां बाँधा करती हैं।यहां सभी के जीवन में हर्ष और उल्लास है। लड़के-लड़कियों को अपने जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता है। इसके लिए प्रत्येक गांव में अलग से एक मोरंग घर बना होता है। (मोरंग असमिया के मोरम शब्द का अपभ्रंश है अर्थात् प्रेम, प्यार) मोरंग घर में युवक-युवतियां रात को एकत्रित होकर नाच-गाना करते है और एक दूसरे की भावनाओं, विचारों से परिचित होते हैं और यहीं होते हैं फैसले जीवन के, शादी के। हाँ, विवाह के बाद युवक-युवती का मोरंग में प्रवेश बन्द हो जाता हैं। मोरंग घर को ’’बैचलर क्लब’’ की संज्ञा भी दी जा सकती है। यहीं पर लड़के-लड़कियों के बीच विवाह पूर्व ऐसे सम्बन्ध भी स्थापित हो जाते हैं जो हमारे समाज में वर्जित हैं।  आदिवासी समाज में प्रायः विवाह की कोई विशेष रीति-रिवाज, परम्परायें नहीं है। लड़का लड़की आपस में मिलते हैं, साथ घूमते फिरते हैं, और साथ रह भी लेते हैं, एक-दूसरे को भली भांति परखते हैं। कभी लम्बा समय भी लगता है। एक-दूसरे को जंच गये तो रहने का फैसला कर लेते हैं। शादी की रश्म के नाम पर न बारात, न बाजे, न पालकी और न गहने। गहनों का फैशन पूर्वाेत्तर राज्यों में प्रायः नहीं है, गांववालों व रिश्तेदारों को हैसियत के अनुसार एक, या एकाधिक मिथुन काटकर मीट-भात व लावपानी की दावत दी जाती है। शादी का जश्न दो-तीन दिनों तक नहीं कई दिनों तक चलता है। (साण्ड व गौर के अंतः प्रजनन से तैयार प्रजाति मिथुन कहलाती है)
           शाम को मैं भवंर सिंह को पूछता हूँ कि ये लोग खेती नहीं करते क्या? कहने लगा वह दिखाई तो दे रही साहब! कहीं कहीं वह हरी झाड़ियां। कच्चू की खेती थी वह , जो अरबी की तरह होता है। झूम खेती ;ैीपजिपदह बनसजपअंजपवदद्ध का यहां पर प्रचलन है। प्रत्येक एक-दो साल बाद भूमि चयन की जाती है, सफाई की जाती है और फिर दाव द्वारा ही जमीन खोद कर खेत तैयार कर कच्चू आलू की भांति लगा दिया जाता है और कुछ महीनों में ही फसल तैयार। (दाव ही इन आदिवासियों का एकल हथियार है। दाव पाठल के रूप में इस्तेमाल होती है तो कुदाल के रूप में भी, सब्जी-मीट काटने के लिये चाकू के रूप में भी तो बाल काटने के लिए उस्तरे के तौर पर भी) अन्य धान, दाल, सब्जियां बोना लोगों ने अभी सीखा नहीं है। किन्तु धीरे-धीरे अब लोग जानने लग गये हैं। झूम खेती से एक ओर जंगल तेजी से साफ हो रहें है और पर्यावरण का गम्भीर संकट पैदा हो गया है वहीं दूसरी ओर पारिस्थितीकीय संतुलन भी गड़बड़ा रहा है। मिण्टोंग से निर्माणाधीन मिण्टोंग-खासा सड़क पर अगली सुबह जब पैदल बढने लगे तो रास्ते में साथ आये दो स्थानीय युवा तेजी से एक जगह पर दौड़े तो मैं भी पीछे-पीछे भागा और दौड़ने का कारण पूछा तो कहने लगे ’निगोनी है’ निगोनी अर्थात चूहा। देखते-देखते एक युवक ने बिल में हाथ डाला दिया। मैं काँप उठा कि बिल में कही साँप हुआ तो? लेकिन जब उसने हाथ बाहर खींचा तो हाथ में मधुमख्खियों का छत्ता और कोहनी तक लिपटी हुयी सैकड़ों मधुमख्खियां। परन्तु वह इस प्रकार हटा रहा था मानो घरेलू मख्खियां हों। चूहे के पीछे सारा सामान जमीन पर पटक कर दूर तक अन्धे की तरह दौड़ने पर आश्चर्य हुआ। पूछा तो कहने लगा’’ आपको पता नहीं चूहा हमारे यहां विशिष्ट भोजन है जो मेहमानों के लिये खासतौर पर तैयार किया जाता है।’’ वांग्चू जनजाति के लोग सभी जीवों का भक्षण करते हैं। बच्चे-बूढ़ों के हाथों में गुलेल रहती है और कमर में दाव। गांव का प्रत्येक परिवार एक-दो बन्दूकें रखता ही है। कहां साठ प्रतिशत भाग वन क्षेत्र होने के कारण अरुणाचल जैव विविधता के लिये सबसे सुरक्षित राज्य हो सकता था और कहां यह मरघट का सा सन्नाटा। न कहीं चिड़ियों की चहचहाट और न जानवरों की आवाजें। बन्दर भी मनुष्यों से कम से कम सौ मीटर का फासला बना कर रहते हैं। बाहरी लोग मजाक में अक्सर कहते भी हैं ’’उड़ने वाले में हवाई जहाज और पैर वालों में चारपाई छोड़कर आदिवासी सभी कुछ खा जाते हैं।’’ ऐसी भी अफवाह यहां पर थी कि कुछ दशक पूर्व तक दुश्मनों का मांस खाने की प्रथा भी रही। रात खासा से कुछ पहले कमुआ- नकनू गांव में बिताकर वापस मिण्टोंग लौट आये ।
            
        अगली सुबह पश्चिम में चौदह-पन्द्रह कि0मी0 दूरी पर स्थित पंग्चाव आये । पंग्चाव सर्किल हेडक्वार्टर है। यहीं बर्मा, नागालैण्ड व अरुणाचल की सीमा आपस में मिलती है। पंग्चाव से आगे कोई मार्ग नहीं है। नागालैण्ड को अरुणाचल से जोड़ने वाली यह अकेली सीमा हो सकती है यदि सड़क कोहिमा तक बढ़ायी जाय। दो राज्यो की बीच प्रगाढता आयेगी ही अपितु खोन्सा, लॉगंडिंग आदि स्थानों से कोहिमा व गोहाटी जाने वालों के लिए दूरी घट जायेगी। लगभग साढ़े चार हजार फीट ऊंचाई पर स्थित पंग्चाव से पश्विम में नागालैण्ड और दक्षिण में बर्मा के बेहतरीन नजारे देख  सकते है। यहां पर सेना व सी0आर0पी0 तैनात है। सी0आर0पी0 कैम्प सबसे ज्यादा ऊँचाई पर है। रातें काफी सर्द होती है, एक सी0आर0पी0 जवान से दोस्ती में रात का जुगाड़ हो जाता है। दूसरे दिन वापस खोन्सा होते हुये देवमाली पहंुचे।                      शेष अगले अंक(4) में...............

Friday, April 18, 2014

रेणुका जी से परशुराम कुण्ड तक (2)

 पिछले अंक से जारी..........
ब्रहमपुत्र की धरती पर
              गोहाटी तक ब्रोडगेज लाईन की लम्बी यात्रा के बाद ट्रेन बदलते हैं और प्रारम्भ होती है मीटर गेज लाईन पर एक उबाऊ, थकानपूर्ण और असमाप्य सी लगती यात्रा। दिल्ली से गोहाटी तक की लगभग 45 घण्टे की यात्रा में एक रफ्तार है और भीड़भाड़ भी। परन्तु गोहाटी से आगे पूरब की ओर बढने पर लगता है कि हम किसी अज्ञात प्रदेश की ओर बढ रहे हैं। यात्रियों की संख्या भी अपेक्षाकृत कम ही रह जाती है और भाषा बिल्कुल अजनबी सी, असमिया, नागा, बंग्ला, सिलेटी, मणिपुरी आदि। मीटर गेज पर एक तो ट्रेन की सुस्त रफ्तार और भीतर डिब्बे में घुटन भरा सा वातावरण। बाहर छोटे-छोटे स्टेशन पीछे छूटते जाते हैं- नारंगी, हौजाई, लंका आदि, आदि। ट्रेन में हॉकरों का चढना उतरना इस उबाऊपन में और भी खलता है। लगभग छः घण्टे के सफर के उपरान्त गाड़ी में कुछ हलचल होती है तभी जान पड़ता है कि लमडिगं स्टेशन आ गया। लमडिगं से ही असम की बैराक वैली के लिए एक मीटर गेज लाइन अलग कट जाती है जो कि त्रिपुरा, मणिपुर व मिजोरम राज्यों को जोड़ती है। (असम प्राकृतिक रूप से दो भागों में बंटा है - ब्रहमपुत्र वैली और बैराक/बराक वैली) बीस-पच्चीस मिनट बाद लम्बी व्हिसिल के साथ गाड़ी आगे बढ़ती है तो डिब्बों में गिनती की सवारी रह जाती है। खालीपन और भी काटने लगता है। असम और बंगाल में (सिलीगुड़ी के बाहरी भाग - न्यू जलपाइगुड़ी स्टेशन पार करते ही)  गौर करने लायक है जल आप्लावित भूमि में घास-फूस  व बांस से बने घरों के गांव। कहीं लकड़ी के आधार पर ही पूरा घर बनाकर और चौखटों के अन्दर बांस की खपचियां फंसा कर बाहर भीतर मिट्टी अथवा रेत सीमेण्ट का प्लास्टर किया जाता है। बांस से ही कई तरह के घरेलू सामान और चारपाईयां आदि तैयार की जाती है अर्थात् बांस यहां के जीवन का अभिन्न अंग है। प्रायः घरों के आस-पास पोखर या तालाब दिखाई देते हैं और आंगन व पिछवाड़े में केले के झुरमुट। (बाढ़ के दौरान असमिया लोग केले के तनों को ही आपस में बांधकर नाव के रूप में इस्तेमाल करते हैं) लोग प्रायः घर के आंगन या पिछवाड़े नारियल, सुपारी के पेड़ लगाते हैं और उन्हीं पेड़ों से लिपटी होती है पान की लताएं। (सुपारी को स्थानीय भाषा में तामूल कहा जाता है, जो कि संस्कृत शब्द ताम्बूल का अपभ्रंश है) असमिया लोगों के घर जाने पर वे सर्वप्रथम मेहमान को पान, ताम्बूल ही पेश करते है। प्रत्येक घर में पान-तामूल रखने का पीतल का ‘सोराइ’ बर्तन होता है।
खेतों में धान ही बोया जाता है। जुताई बैलों या भैंसों द्वारा ही की जाती है। तालाब पोखरों में बंसी (कांटा) फंसाकर मच्छियां मारना यहां आम ग्रामीणों की दिनचर्या है। मच्छी भात असम बंगाल का प्रिय भोजन है। दालें शायद ही कहीं बोयी जाती हों। हाँ, मुस्लिम बाहुल्य नौगावं जिले में सब्जी की पैदावार अच्छी है। वर्षा की अधिकता के कारण गन्ना व गेहूं पूर्वोत्तर भारत में बोया नहीं जाता है। हिन्दी भाषी राज्यों के लोग यहां प्रायः मजाक में कहते भी हैं कि ”पूर्वोत्तर के लोगों ने आटे और चीनी के पेड़ नहीं देखे है।“
लमडिंग से दो घण्टे के सफर के बाद स्टेशन पड़ता है दीमापुर। भाबर क्षेत्र दीमापुर नागालैण्ड का एकमात्र रेलवे स्टेशन है। आजादी के बाद नागालैण्ड अशान्त राज्य रहा। कहां कब क्या घट जाये, हमेशा ही आशंका बनी रहती है। एक अलगाव नागाओं के मन में जो शुरू से पनप रहा था इतने लम्बे अरसे बाद भी दूर नहीं किया जा सका। शायद इसी अलगाव के कारण गोहाटी से आगे पटना, दिल्ली आदि शहरों की ओर बढ़ने पर कुछ नागा कहते भी हैं कि ”इण्डिया जा रहे है“।
दीमापुर से अगला स्टेशन आमगुड़ी है। जोरहाट की सवारी यहां उतर जाती है । आमगुड़ी के बाद ट्रेन सोनारी, नाजिरा, लखुवा, सफेकटी, नामरूप आदि पड़ावों से गुजरती है। (नाजिरा व लखुवा की पहचान ओ0एन0जी0सी0 के ऑयलफील्ड के रूप में भी है) 

चाय के बगीचों के बीच से ट्रेन का छुक-छुक होकर गुजरना मन को रोमांचित करता है। मध्य हिमालय में ऊँचे पहाड़ों पर फैले हैं अनगिनत बुग्याल। जहां कठिन यात्रा के बाद ही पहुंचा जा सकता है। लेकिन असम में दूर-दूर तक फैले ‘ड्रेस्ड ' चाय बागान बुग्यालों का सा भ्रम करा देते हैं। लगता है ऊषा मंगेशकर की सुमधुर आवाज में असमियां गीत यहीं कहीं गूंज रहा है-
"हे अखम देकोर बागीचा रे सुवाली, झुमुर-झुमुर नाचे क्वरूं धेमाली,
हे लछमी न ह्वै मोरे नाम समेली, बीरबलेर बेटी मोर नाम समेली.....‘‘

(असम देश के बगीचे में मैं एक लड़की उधम मचा रही हूं अरे! मैं लक्ष्मी नहीं, मेरा नाम चमेली है। बीरवल की बेटी मैं चमेली हूँ )
असमिया भाषा की विशेषता यह भी है कि ‘च’ का उच्चारण ‘स’ और ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ के रूप में होता है यथा- चाय का साय, सागर का हागर आदि। (वैसे टिहरी गढ़वाल के लम्बगावं क्षेत्र में कहीं-कहीं ‘स’ को ‘ह’ उच्चारित किया जाता है, ) गढ़वाल के लोक वाद्य यन्त्रों में जिस प्रकार ‘मोछंग’ को एक विशिष्ठ स्थान प्राप्त है वहीं असमिया गीतों में प्रायः मोछंग की कर्णप्रिय धुन अवश्य सुनाई देती है। कुमाऊंनियों की भांति असमिया व अरूणाचल की कुछ जनजातियों के लोग भी बात करते समय ‘हूं’ की जगह सांस भीतर खींचकर ‘‘होय’’ कहते हैं। वहीं असमियां भाषा में श्रीनगर, पौड़ी के आसपास बोले जाने वाली गढ़वाली की भांति ही ध्वनि में ‘अ’ का उच्चारण संवृत्त व वृत्तमुखी, अर्थात ‘ओ’ की भांति होता है, जैसे घर का घौर, बडा का बौडा, आदि। और असमियां में महन्त का मोहन्त, बगाईगावं का बोगाइगावं आदि।   
       नामरूप फर्टिलाइजर्स कार्पोरेशन आवॅ इण्डिया के लिये विख्यात है। गोहाटी से चौदह घण्टे की उबाऊ यात्रा के बाद हम पहुंचते हैं मात्र पांच सौ किलोमीटर दूर अपने पड़ाव नहरकटिया। नहरकटिया बूरी डिहींग नदी के बायें तट पर बसा हुआ डिब्रूगढ का तहसील हेडक्वार्टर है। ट्रेन निरन्तर पूरब ढुलियाजान व तिनसुखिया की ओर बढती है। ढुलियाजान में इण्डियन ऑयल कार्पोरेशन का बड़ा प्रतिष्ठान है और तिनसुखिया ऊपरी असम का सबसे बड़ा व्यापारिक केन्द्र है। 

                                                                                                               अगले अंक में जारी.........

Tuesday, July 23, 2013

रेणुका जी से परशुराम कुण्ड तक - 1

(सन् 1985 में की गयी यह वह पहली यात्रा है जिसे मैंने लिपिबद्ध किया है 1988 में। जगहों और समाज को समझने की समझ तब नहीं थी। यह भी नहीं सोचा था कि कभी इस पर लिख पाऊंगा। फिर भी जैसे तैसे तैयार कर इसे अपने ब्लॉग के मित्रों के सामने रख रहा हूँ। यह यात्रा संस्मरण कई पत्रिकाओं में छप चुका है और अपनी पुस्तक ‘आवारा कदमों की बातें’ में भी इसे प्रकाशित कर चुका हूँ। आज लगभग तीस साल बाद जब समाज, परिस्थितियां पूरी तरह बदल गयी है तब इस लेख की प्रासंगिकता भी शायद न हो। फिर भी यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। पाठकों से निवेदन अवश्य करूंगा कि वे अपनी टिप्पणी अवश्य दें। )
        विविधता में एकता का रंग भरने वाले भारतवर्ष में संस्कृति के विभिन्न आयाम देखने को मिलते हैं। विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न संस्कृति। भिन्न जातियों की भिन्न भाषा। सांस्कृतिक धरातल पर आदिवासियों की एक अलग पहचान है। आदिवासी कहीं के भी हो किन्तु सबके रीति-रिवाज, त्यौहार, मान्यतायें, परम्परायें, गीत, संगीत हमें लुभाते हैं। विकास की ओर अग्रसर नई पीढी़ आज अपने रीति-रिवाज, अपनी भाषा, परम्परा एवं संस्कृति से उन्मुख होकर पाश्चात्य सभ्यता व भाषा संस्कृति की भोंडी नकल कर रही है। किन्तु आदिवासी समाज इस सांस्कृतिक क्षरण से थोड़ा-बहुत बचा हुआ है।  उत्तर में हिमालय व दक्षिण में शिवालिक श्रेणियों से आबद्ध, समृद्ध नैसर्गिक सौन्दर्य से परिपूर्ण, शान्त व सुन्दर परिवेश तथा मन मोहने वाले अनेक प्रकार के पेड़-पौधे व जीव जन्तु (Flora and Fauna) की भूमि और विभिन्न प्रकार की कथायें, लोककथायें, रहस्य रोमांच से पूर्ण दन्त कथायें और विविध संस्कृतियांे को समाहित करने वाले पूर्वोत्तर भारत की एक लघु यात्रा का विवरण है।
        ’सेवन सिस्टर्स’ नाम से लोकप्रिय पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों में असम के अतिरिक्त अन्य मेघालय, मिजोरम, मणिपुर, नागालैण्ड, त्रिपुरा व अरुणाचल प्रदेश राज्य हैं। असम (जो समतल नहीं है) के छोटे-छोटे पर्वतीय राज्यों में विभाजन के बाद आज केवल लगभग समतल भूभाग ही असम में रह गया है। अतः अब ‘‘असम‘‘ शब्द की प्रासंगिकता ही नहीं रही। (वैसे असम को ’असोम’ का अपभ्रंश भी माना जाता है और असोम नाम अहोम राजा द्वारा दिया गया था जब उन्होंने तेरहवीं शताब्दी में इस देश पर विजय पायी थी) बंगाल की खाड़ी से निकटता और वनाच्छादित हिमालयी क्षेत्र होने के कारण असम में शेष भारत की अपेक्षा वर्षा का औसत कहीं अधिक है। अप्रैल से अक्टूबर तक, लगभग छः माह चलने वाली वर्षा ऋतु असम में तबाही मचा देती है। विडम्बना है कि पूर्वोतर में विपुल जलराशि वाली ब्रह्मपुत्र व सहायक नदियां व्यर्थ बह रही है। न कोई जल विद्युत परियोजना है और न सिंचाई परियोजना। वर्षा की अधिकता के कारण पूर्वोत्तर राज्यों में सदैव सावन की सी हरियाली छायी रहती है और -
पतझड़ सावन बसन्त बहार,
एक बरस के मौसम चार, मौसम चार,
पाँचवां मौसम प्यार का इन्तजार का ..’‘
         की टेर लगाने वालों को यहां मायूस होना ही पड़ सकता है, यहां साल में दो ही मौसम होते हैं - वर्षा और शीत।
              औपनिवेशिक राज्यों का दोहन और उसे सैरगाह व ऐशगाह के रूप में देखने वाली ब्रिटिश सत्ता ने आदिवासी क्षेत्रों की घोर उपेक्षा ही की है। उपयुक्त जलवायु होने के कारण जहां असम और बंगाल के सैकड़ों चाय बगीचे अंग्रेजों की देन है वहीं ब्रिटिशराज में पूर्वोत्तर क्षेत्र का विकास शेष भारत की भांति नहीं हो पाया है। असम के जंगलों की उपयोगिता उनके लिये मात्र लकड़ी प्राप्ति और शिकार के लिए ही रही है। नेफा भी इससे अछूता नहीं रहा। (एक खूबसूरत हिल स्टेशन शिलॉगं को अंग्रेजों द्वारा अवश्य विकसित किया गया) आदिवासी क्षेत्रों में कबीलाई संस्कृति विकसित होती रही। अपने ही कबीलों तक सीमित रहना, अपने ही समाज के भीतर दैहिक व दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति आदिवासी समाज की विवशता भी रही है। जो कि उनके विकास में बाधक बनी है। स्वतंत्रता के बाद भी पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिति कमोवेश वही रही, सिवाय यह कि जगह-जगह असम में स्थापित आरा मिलों के लिये जंगलों से ’कच्चा माल’ ढोया जाने लगा। उसके लिये ही सड़कों का निर्माण किया गया और प्रारम्भ हुयी विकास की प्रक्रिया।
           ’सेवन सिस्टर्म’में एक राज्य है अरुणाचल, अर्थात सूर्य का आंचल जहां सर्वप्रथम लहराता है। अरुणाचल का अस्तित्व हम तभी से मान सकते हैं जब चौदहवीं सदी के आरम्भ में असम पर अहोम राजा का साम्राज्य स्थापित हुआ। 1838 में अंग्रेजों ने असम को अपने आधिपत्य में लिया तो नेफा स्वतः इसके नियंत्रण में आ गया। लगभग अठ्ठासी हजार वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल में फैले प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर केन्द्र शासित अरुणाचल प्रदेश को यह नाम जनवरी 20, 1972 में मिला। इससे पूर्व यह 1948 से नेफा(North East Frontier Agency) नाम से जाना जाता था 21 जनवरी, 1972 को ही खासी, गारो व जयन्यिता हिल्स को मिलाकर मेघालय राज्य की स्थापना हुयी (जो कि इससे पूर्व 02 अप्रैल 1970 को एक स्वायत्त राज्य के रूप में घोषित हो चुका था) तथा ब्रिटिश सरकार के अधीन “लुसाई हिल्स” वाले जिले को 1954 में संसद की कार्यवाही के बाद “मिजो हिल्स” नाम दिया गया और 21, जनवरी 1972 को ही मिजोरम नाम देकर केन्द्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया गया। गढवाली कुमाउंनी गीतो में नेफा, लद्दाख जैसे दुरूह क्षेत्रों का वर्णन प्रायः विरह गीतों में आता है,
उड़ि जा ऐ घुघूती न्हैं जा लद्दाख,
हाल म्यारा बतै दिया मेरा स्वामी पास घुघूती. . .

      प्रेयसी अपने प्रिय के सकुशल लौटने की कामना करती है। ऐसा इसलिए भी कि गढ़वाल-कुमाऊँ में अधिकांश लोग सेना में होते हैं और नेफा व लद्दाख पहले से ही दुर्गम और बीहड़ क्षेत्र माने जाते रहे हैं। नेफा से लौटे हुये सैनिक भी संभवतः नेफा के भयानक जंगलों और खतरनाक कबीलों का वर्णन ही लोगों से करते रहे हैं। वहां की परम्पराओं, लोकजीवन, भाषा और संस्कृति का वर्णन कदाचित ही कोई करता हो। इसके पीछे शायद अपनी जीवटता का प्रदर्शन और अपने लिए सहानुभूति बटोरने की मानसिकता ही अधिक रहती हो।
     ’हिन्दी-चीनी भाई भाई’ और पंचशील समझौते को धत्ता बताते हुए चीन ने वर्ष 1962 में भारतवर्ष पर हमला कर दिया। चीन ने अपनी ताकत का अहसास कराकर हमारी सेनाओं को सैकड़ों मील पीछे धकेल दिया। केन्द्र सरकार का ध्यान भी तभी सामरिक महत्व के इन सीमान्त क्षेत्रों की ओर गया। केन्द्रशासित अरुणाचल प्रदेश गठन के उपरान्त पाँच जिले बने। पंच आब -पांच नदियों(रावी, ताप्ती, ब्यास, सतलज और चेनाब) की धरती को पंजाब नाम मिल गया किन्तु पांच प्रमुख नदियों के नाम से सृजित जिलों वाले नेफा को पंजाब जैसा नाम नहीं मिल पाया। ये जिले बने- कामेंग, सुबन्सिरी, सियागं, लोहित और तिराप। राज्य की राजधानी ईटानगर सुबन्सिरी में है तो राज्य का एकमात्र- जवाहर लाल नेहरू कालेज पासीघाट (सियांग जिला) में, जो कि चंढीगढ विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है।
            दिल्ली से कानपुर, इलाहाबाद, मुगलसराय, पटना, भागलपुर, जलपाइगुड़ी, बंगाइगांव व रंगिया होते हुये ट्रेन से गोहाटी पहुंचते हैं। गोहाटी जो कि भौगोलिक रूप से असम का केन्द्र है एक पौराणिक नगर भी है। गोहाटी के निकट ही पश्चिम में ब्रहमपुत्र के बायें तट पर एक ऊँची पहाड़ी पर कामाख्या देवी का मन्दिर है। (कथा है कि भगवान शिव की पत्नी एवं हिमालय पुत्री सती के पित्रगृह में प्राण त्यागने के उपरान्त भगवान शिव क्रोधित हो उसके शव को अपने कन्धों पर रख ताण्डव करने लगे थे। तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि होने पर भगवान विष्णु ने यह सोचकर कि जब तक सती का शव शंकर के कन्धे पर रहेगा वे अपने को रोक नहीं पायेंगे। अतः उन्होंने सर्वप्रथम सुदर्शन चक्र से सती के शव के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। जहां-जहां सती के अंग गिरे वहां-वहां आज शाक्त पीठ हैं। माना जाता है कि कामाख्या में भी देवी सती का ‘भग‘ गिरा था। कामाख्या मन्दिर में कुमारी पूजा का नियम है) प्रागज्योतिशपुर नाम से विख्यात इस गोहाटी को राजा नरकासुर द्वारा बसाये जाने का वर्णन पुराणों व महाकाव्यों में है। नरकासुर के पुत्र भागदत्त ने कौरवों की ओर से हाथियों की विशाल सेना सहित महाभारत युद्ध में भाग लिया था।
                                                                                              क्रमशः  -------------------------