Sunday, November 26, 2017

नौ बैणी आछरी बारा बैणी भराड़ी..(2)


 खैट जाने के लिये उनके यहाँ से निकले तो थोड़ी चढ़ाई के बाद रास्ते में लगभग तीन सौ मीटर दूरी तक सिंचाई नहर की पटरी पर साथ चले। सिंचाई नहर पक्की थी, परन्तु उस पर रुके हुये पानी में गांव वालों ने भीमल की टहनियों को मुठ्ठियां बनाकर भिगोने डाल रखी थी जो पत्थरों से दबा रखी थी, ताकि पानी में डूबी रहे। पुरानी सेळू  (सन) नहर के बाहर फेंकी हुयी थी, जिससे यह तो स्पष्ठ था कि सन का उपयोग अब गांव के लोग नहीं करते हैं। भीमल की टहनियों से पूरी नहर भरी हुयी थी, मैने ऐसा पहली बार देखा। हमारे गांव में तो पास की गाड में ही भीमल की मुठ्ठियां भिगोने डाली जाती थी। कुछ समय तक पानी में रहने के बाद भीमल की छाल आसानी से उतर जाती है और उसे कूट कर सफेद सन तैयार हो जाती है। इस सन से कृषि व घरेलू उपयोग में आने वाली रस्सियां आदि बनायी जाती थी। 
 

छाल उतर जाने के बाद भीमल की सूखी लकड़ी चूल्हे में खाना पकाते समय गीली व कच्ची जलावन लकड़ी सुलगाने के काम आती। इस तरह चारे के रूप में भीमल के पत्तियों के अतिरिक्त उसकी टहनियों की छाल व लकड़ी भी बहुत उपयोगी होती है। साथ चल रहे अंकित को मैंने पूछा कि ‘तुम्हारे गांव वाले सन को इस प्रकार क्यों फेंक देते हैं?’ तो उसका जवाब था कि ‘अब गांव में कोई खेती करने को राजी नहीं है इसलिये रस्सी, दौंळी  , दांऊं, मुशके, चारपाई की रस्सियां आदि की जरूरत ही नहीं पड़ती है और बुनने वाले भी तो अब रहे कहाँ.....।’  यह कहते वक्त पलायन के कारण बंजर खेतों और उजाड़ गांवों को देखकर उपजी पीड़ा अंकित के चेहरे पर स्पष्ठ झलक रही थी। 

नहर पार करते ही रास्ता तीखी चढ़ाई वाला था। पहाड़ों में हर मौसम में दिन के दो बजे बाद से ही हवा चलनी शुरू हो जाती है और हम लोग तो भटवाड़ा से ही चार बजे के बाद निकले थे। ज्यों-ज्यों ऊपर चढ़ते गये पसीना खूब बहने लगा, भीतर बनियान गीली हो गयी यहाँ तक कि बाहर पहनी हुयी टी शर्ट भी। परन्तु माथे पर चू रही पसीना गालों तक आने से पहले ही सूख जाता, मानो हवा ने कसम ली हो कि मैं गालों को नहीं भीगने दूंगी। 

लगभग डेढ़ किलोमीटर निरन्तर चढ़ने के बाद एक जगह पर हम थोड़ा सुस्ताने बैठ गये तो मैंने अंकित से पूछा कि ‘क्या यही एक दुर्गम रास्ता है इस गांव से खैट जाने के लिये ?’  तो उसने जवाब दिया कि ‘नहीं, यह खैट
जाने का रास्ता नहीं बल्कि मवेशियों के चलने का रास्ता है। सही रास्ता तो गांव के पूर्वी किनारे से है और हम गांव के पश्चिमी छोर से चढ़ रहे हैं। आप सड़क से आधा किलोमीटर ऊपर प्रधान जी के घर तक पहले ही चढ़ चुके थे, ऐसे में नीचे उतरते और फिर उस पार जाकर चढ़ते तो बुद्धिमता नहीं होती। हाँ, वापसी में जरूर हम उसी रास्ते से आयेंगे। अब तो हम उस रास्ते के मिलान पर पहुँचने ही वाले हैं।’ तीव्र ढलान के साथ-साथ रास्ता पथरीला व संकरा भी था जिससे शरीर का सन्तुलन बनाने के साथ-साथ सारा ध्यान अपने पैरों की तरफ ही रखना पड़ रहा था। चलते-चलते अचानक जब कपड़े कभी कंटीली झाड़ियांे में उलझ जाते तो लगता जैसे कोई पीछे खींच रहा है, कोई मुझे रोकना चाह रहा है। भटवाड़ा के आसपास भीमल, डैंकण, तुंगला आदि पेड़ों के साथ-साथ आड़ू, चुलू आदि अनेक फलदार पेड़ दिखाई दिये वहीं इस ऊँचाई पर चीड़ के पेड़ ही बहुतायत में हैं। एक जगह थोड़ा रुका तो सामने चट्टान पर दौड़ते हुये दो हिरण दिखे। भोजन की तलाश में थे या खतरे की आशंका से भाग रहे थे, कह नहीं सकता। मन ही मन सोचा, इस जंगल में यदि हिरण हैं तो बाघ भी अवश्य होंगे। अतः अकेले यात्री के लिये यह मार्ग सुरक्षित नहीं है। 

खैट जाने वाले मुख्य मार्ग पर पहुँचे तो मन को सकून मिला। घने पेड़ों के बीच एक सीमेण्ट की बेंच लगी थी। अंकित ने बताया कि ‘मुख्य मार्ग पर इस प्रकार की पूरी सात बेंच है। जो कि लगभग पच्चीस साल पहले ग्राम प्रधान भटवाड़ा के सहयोग से वन विभाग द्वारा बनवायी गयी थी।’  मैंने उसे छेड़ने के अन्दाज में कहा कि ‘तब तो तुम पैदा भी नहीं होंगे फिर तब तुम यह सब कैसे जानते हो?’ ‘गांव के बड़े-बूढ़ों से यह बात सुनी है’, उसका जवाब था। इस जगह से बांज, मोरू, बुरांस, तूण, ग्वीर्याळ आदि के पेड़ मिलने शुरू हो गये थे। 

आगे चढ़ते हुये हम पहाड़ी की गर्दननुमा उस जगह पर पहुँचे जिसे स्थानीय लोग ‘रागस खाल’ नाम से जानते हैं। रागस खाल की आकृति कुछ-कुछ ऊंट की गर्दन जैसी है। भूविज्ञान में इस प्रकार की जगह को अभिनति आकार (Synclinal Structure) कहते हैं। इसके दक्षिण-पूरब में पहाड़ी पर सिर की ओर खैट पर्वत स्थित है और उत्तर-पश्चिम अर्थात पूंछ की ओर पीड़ी-प्रतापनगर की पहाड़ी है। इस जगह से पश्चिम में भटवाड़ा आदि गांवों का ही नहीं बल्कि पूरब में ढुंगमन्दार के अनेक गांवों का विहगंम दृश्य दिखायी दे रहा था। बीचों-बीच बह रही सुनेरी गाड के दोनो ओर हरी-भरी खेती व बड़े-बड़े गांव मन मोह रहे थे। जब सड़कें व संचार साधन नहीं थे तब ऐसे ही दूर किसी पहाड़ी के पीछे बसे गांव में ब्याही गयी बेटी मायके में रह रहे माँ-बाप, भाई-बहिनों की याद में व्याकुल होकर गाती होगी;

‘उड़ी जा कागा बादळू  बीच, मेरू रैबार ली जा मेरी माँजी मां....
 
सामने झाड़ियों पर रंगीन कपडो के टुकड़े बँधे दिखे और पास ही कुछ चूड़ियां भी। अंकित ने बताया कि इस मार्ग पर यह पहला थान (देवस्थल) है आछरी का। यहां पर पीढ़ी से खैट के लिये प्रस्तावित पाईप लाईन बिछी देखी, परन्तु योजना अभी अधूरी पड़ी है।

Tuesday, November 21, 2017

नौ बैणी आछरी बारा बैणी भराड़ी (1)....

        भावविभोर करती पंक्तियां  नौ बैणी आछरी बारा बैणी भराड़ी...... ‘ उत्तराखण्ड युवा सिने अवार्ड-2013’, दिल्ली में पाण्डवा ग्रुप की ओर से ‘पम्मी नवल’ द्वारा गाये गये सुमधुर गीत की है। गीत में नौ बैणी (बहिनेंद्) आछरियों और बारह बैणी भराड़ियों से उत्तराखण्डी जनता की कुशलता की कामना की गयी है। आछरी, भराड़ियों, मांतरियों के बारे में हम बचपन से ही सुनते आ रहे थे। कोई बन-ठन कर कहीं जा रहा हो तो लोग मजाक में कह देते थे ‘ध्यान से जाना, कहीं आछरी न हर लें...’ । सुनते थे कि आछरी, भराड़ी सम्मोहित कर प्राण हरती है परन्तु प्रसन्न होने पर वरदान भी देती है। गढ़वाली लोकगाथाओं के नायक जीतू बगड़वाल और लाल सिंह कैन्तुरा पर आछरियां आसक्त हुयी और  सशरीर हर ले गई। आछरी अर्थात अप्सरा, परी, divine girl आदि। जौनसार-बावर, रवांई-बंगाण व फूलों की घाटी आदि अनेक निर्जन व रमणीक जगहों पर आछरी, भराड़ियों का निवास माना जाता है। टिहरी में आज भी मुखेम आदि अनेकांे धार पर आछरियों का निवास है माना जाता है, जिसमें खैटपर्वत प्रमुख है। इसीलिये ऊँचाई व निर्जन स्थान पर स्थित खैटपर्वत को नाम दिया गया है ‘परियों का देश’।
            भूत, हन्त्या और देवता तथा जादू-टोने का असर साक्षात देखने की मेरी बड़ी प्रबल इच्छा हमेशा रही है। परन्तु इस मामले में मैं भाग्यशाली नहीं हूँ। दो बार ऐसा भी हुआ कि मेरे साथ चलने वाले व्यक्ति को भूत ने दर्शन दिये और मुझे ठंेगा दिखा दिया। काला जादू के लिये विख्यात बंगाल के लोगों के साथ मैं युवावस्था में पूरे आठ-नौ साल रहा, परन्तु काले जादू का करिश्मा कभी नहीं देख पाया। देहरादून के जौनसार में ही चार साल तक सीजनल कैम्प करते आये हैं, परन्तु जादू-टोने से भेड़ बनाये जाने के लिये खामखाह बदनाम जौनसार में किसी ने भी मुझे भेड़ नहीं बनाया। भूत-प्रेत, जादू-टोना, आछरी-मांतरी न देख पाने की कसक कहीं मेरे साथ ही न खत्म हो, इसलिये मैंने एक उम्मीद के साथ आछरियों के देश जाने का फैसला लिया।
‘परियों के देश’ खैटपर्वत पर श्रीमद्भागवत कथा व शिवपुराण के आयोजन की सूचना मिली तो मैं आदतन अकेले ही चल पड़ा। देहरादून से ऋषिकेश, टिहरी होते हुये पीपलडाली तक बस से। पीपलडाली में सयोंगवश अपने पुरोहित पं0 परमानन्द भट्ट जी मिल गये जो मुझे अपनी मोटर साईकिल से पन्द्रह किलोमीटर दूर धारमण्डल पट्टी के भटवाड़ा गांव तक छोड़ आये। खैट जाने के लिये भले ही अन्य गांवों से भी रास्ते हैं परन्तु मैं भटवाड़ा से ही खैटपर्वत पर चढ़ने की योजना बना चुका था। भटवाड़ा के पूर्व प्रधान श्री शान्ति प्रसाद डंगवाल जी से फोन पर दो दिन पहले ही भतीजे बलवन्त ने बात करवा दी थी। भटवाड़ा पहुँचने पर जब डंगवाल जी ने फोन नहीं उठाया तो शंका हुयी कि वे कहीं चले न गये हांे। हमारे पुरोहित भट्ट जी ने सड़क पर जहाँ छोड़ा था वहाँ सड़क किनारे दो दुकानंे थी। एक पर सिलाई मशीन रखी हुयी थी, परन्तु वहाँ पर कोई था नहीं। मशीन पर फंसे कपड़े को देखकर स्पष्ठ था कि अभी-अभी ही कोई काम अधूरा छोड़कर कहीं गया होगा। बगल की दुकान में एक महिला बैठकर मैगी खा रही थी, लंच के रूप में या भूख लगने पर, कह नहीं सकता। वैसे भी गावों में अधिकांश लोग अब भूड़ी-पकोड़ी बनाने के झंझट में नहीं पड़ते, झट से मैगी का पैकेट मंगाया, खोला और गैस के चूल्हे पर दो मिनट में मैगी तैयार। न ज्यादा खटराग, न मेहनत और न धुआं ही। हमारी चाची-ताई, माँ-दादी का जमाना कितना मुश्किल भरा था कि दोपहर/अपरान्ह में भूख लगने पर आस-पास के खेतों, सग्वाड़े से राई, मूली, अरबी, चौलाई आदि के पत्ते नोचते या घर में रखे चार आलू-प्याज काटते और लकड़ी के चूल्हे पर जतन से पकाकर भूख शान्त करते। हालांकि घर से उठा कमबख्त धुआं गांव भर में ढिण्डोरा पीट देता कि देखो फलां के यहाँ भरी दोपहर खाना पक रहा है। कैसी आग लगी इनके पेट को। और धुएं को देखकर तो कोई न कोई चटोरा खाने के लालच में ऐन वक्त पर पहुँच भी जाता।          
             मैगी खाने वाली इस महिला से पूछा तो उसने मैगी का कौर मुहँ में रखते हुये बैठे-बैठे वहीं से डंगवाल जी के घर का रास्ता समझा दिया। कुछ चढा़ई चढ़ने के बाद मैं एक बड़े से पेड़ के नीचे स्थित पनधारे पर पहुँचा तो वहाँ सुस्ता रही व गप्पें लड़ा रही महिलाओं, जो शायद मनरेगा में कार्य करती होंगी से मैंने डंगवाल जी के घर का रास्ता फिर पूछा क्योंकि उस जगह से दो रास्ते अलग-अलग दिशाओं को जा रहे थे। रास्ता उन्होंने बता दिया परन्तु साथ ही जोड़ दिया कि उनके घर में एक कुत्ता भी है। कहावत है कि ‘अपने यहाँ के भूत और परायी जगह के कुत्तों से आदमी डरता ही है।’ कुत्ते से मुझे डर लगता है कहने पर उनमें से एक औरत ने डंगवाल जी की पत्नी को नाम लेकर पुकारा, जब उस ओर से कोई जवाब नहीं आया तो एक अधेड़ उम्र की औरत ने पुकारने वाली को ही निर्देश दिया कि ‘तू ही जा, इनको वहाँ तक छोड़ आ।’  मैंने उनका धन्यवाद किया। परन्तु मैंने गौर किया कि उन्होंने मेरा परिचय तक नहीं पूछा। तो क्या मेरा गढ़वाली बोलना ही पर्याप्त था या टी. वी., मोबाईल फोन व सोशल मीडिया वाले इस जमाने में किसी से जुड़ने और हालचाल जानने की आत्मीयता ही खत्म हो गयी? डंगवाल जी घर पर ही मिले, उन्होंने बताया कि बिजली न होने के कारण मोबाईल चार्ज नहीं हो पाया इसलिये फोन बन्द है। पूरी आत्मीयता के साथ उन्होंने अपने घर पर बिठाया और चाय-पानी पिलाकर वायदे के अनुसार विशेष हिदायत के साथ एक लड़का मेरे साथ भेज दिया। अंकित नाम के इस लड़के ने गाईड तथा पोर्टर ही नहीं सुरक्षाकर्मी की भूमिका भी निभाई। 
                                                                                                       क्रमशः अगले अंक में.............


Tuesday, August 29, 2017

पलायन की पीड़ा

आज सुबह रेडियो पर एक गीत सुन रहा था। गीत का मुखड़ा है;
   ‘‘बूझ मेरा क्या नांम रे, नदी किनारे गांव रे।
  पीपल झूमे मोरे आंगना, ठण्डी-ठण्डी छांव रे।.........’’

     गीत गुरूदत्त के प्रोडक्शन में बनी, राजखोसला द्वारा निर्देशित और देव साहब, वहीदा रहमान व शकीला द्वारा अभिनीत फिल्म ‘सी आई डी’ का है। यह गीत मजरूह सुल्तानपुरी द्वारा लिखा गया, ओ. पी. नैयर साहब केे संगीत निर्देशन में तैयार किया गया है और सुरीली आवाज है शमशाद बेगम की। गीत भीतर तक झकझोर गया। हर शब्द मन में गहरे उतर गये। तपती दोपहरी में जैसे भटकती हुयी बदलियां बरस जाये। मन के किसी कोने फिर तो मिट्टी की सोंधी गंध, पीपल की ठण्डी बयार और नदी की कलकल ध्वनि का प्रभाव छाने लगा।     महानगरों में पली-बढ़ी युवा पीढ़ी इस गीत के मायने शायद ही जान पाये। युवा पीढ़ी ही क्यों   वे भी तो कहाँ जान पाते हैं जोे गांव के होते हुये भी गांव का सुख नहीं उठा पाये। और जो हम इस गीत का अर्थ जान पा रहे हैं, समझ रहे हैं वे भी तो मन मसोस कर रह रहे हैं। जी चाहता है सारे बन्धन तोड़कर लौट जायें अपने गांव। शहर की छाया से दूर, शहरी व्याधियों से मुक्त अपने गांव। वहाँ जहाँ बस गांव हो, खेत-खलिहान हो, पानी से भरी नहरें हों, चारों ओर हरियाली हो, खेतों में खुशहाली हो, पक्षियों का कोलाहल हो, बहते झरने हों और अपने लोग हों। बस।
    परन्तु दूसरे ही पल सोचता हूँ क्या सचमुच हम गांव में रह सकेेंगे। गांव में रहने लायक साहस जुटा सकेंगे कभी। नहीं शायद। सच! सुविधाओं के किस कदर दास बन गये हम। कितने लाचार हैं हम। कितने बेवश। बहुत सुविधाभोगी भी तो जो हो गये हैं हम। काश !!...........

Friday, August 18, 2017

अद्भुत-अनोखी है अनुगूंज हमारे ढोल की

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ढोल पूड़ बैठ्यां तेरा सुर्ज चन्दरमा। कुण्डली मां नागदेव, कन्दोटी ब्रह्मा।
कन्दोटी ब्रह्मा, डोरी गणेश कु वास।। चार दिना कि चान्दना ....       भाई नरेन्द्र सिंह नेगी जी की आवाज में ‘सुरमा सरेला’ का यह गीत तो सबने सुना होगा। ढोल दमाऊं गढ़वाल, कुमाऊँ ही नहीं अपितु जौनसार, हिमाचल व जम्मू आदि हिमालयी क्षेत्रों का प्रमुख वाद्ययंत्र है। ढोल क्या है, इसकी उत्पति कैसे हुयी इसका विषद वर्णन ‘ढोलसागर’ में वर्णित है। 
 ढोलसागर शिव-पार्वती संवाद के रूप में लिखा गया ग्रन्थ है। माना जाता है कि ढोलसागर ग्रन्थ ‘शंकर वेदान्त’ अर्थात ‘शब्द सागर’ का छोटा रूप है। ढोलसागर के प्रथम भाग को ‘जोगेश्वरी ढोलसागर’ कहा जाता है जिसमें सृष्टि की उत्पति के बारे में है। नाथपन्थ का इस भाग पर पूरा प्रभाव माना जाता है। ग्रन्थ के दूसरे भाग में ढोल का वर्णन, उसकी उत्पति तथा उसके बजाने की कला का सुन्दर वर्णन है। इसे ‘चिष्टकला ढोलसागर’ कहा जाता है। ढोलसागर ताल संबन्धी ग्रन्थ भी है और ताल का प्रणेता शिव को माना गया है। ताल का अर्थ शिवशक्ति (ता-शिव तथा ल-शक्ति) माना जाता है, इसलिये शिव-शक्ति को ढोल की आत्मा स्वीकारा गया है। आदि ढोल का नाम इसलिये ‘शिवजन्ती’ भी कहा गया है।
Image may contain: 2 people, people standing देवताओं का आह्वाहन और उन्हें अवतरित करने मंे सिद्धहस्त होने के कारण ही आवजियों को ‘देवदास’ कहा जाता है और ढोलसागर का ज्ञाता होने के कारण ‘सरस्वति पुत्र’ भी। .... जीवनस्तर सुधारने व विकास के नाम पर आज पलायन पूरे देश ही नहीं अपितु पूरे विश्व के सभी समाजों में व सभी स्तर पर हो रहा है। ऐसे में संक्रमण के इस दौर में आवजियों/बाजगियों द्वारा भी उन्नत जीवनयापन के लिये या अन्य कारणो से अपने पेशे से मुहँ मोड़ लेने के कारण पर्वतीय समाज में एक प्रकार की सांस्कृतिक शून्यता सी आ गयी है।
भारतीय संगीत शास्त्र में समय व मौसम के अनुसार रागों का वर्णन है। उसी प्रकार ढोलसागर में भी समय, मौसम तथा परिस्थितियों के लिये अलग-अलग तालों का वर्णन है। आवजियों द्वारा मुख्यतः बढ़ै या बढ़ई, धुयेंळ या धुयांळ, शब्द या शबद, रहमानी अर्थात अभियान और नौबत ताल ही बजाये जाते हैं। परन्तु परिस्थिति विशेष के अनुसार वे अन्य ताल भी उतनी ही शिद्दत से बजा सकते हैं। आवजी/बाजगी के पास ज्ञान का अनन्त भण्डार माना जाता है, उनको सरस्वति पुत्र कहने के पीछे भी तर्क यही है। क्योंकि लौकिक अलौकिक ही नहीं उससे परे भी जो है, उन पर आवजी की पकड़ मानी जाती है।
दो वर्ष पहले माननीय हरीश रावत जी की सरकार में संस्कृति विभाग के सौजन्य से देहरादून में आयोजित ‘झुमैलो’ कार्यक्रम यादगार बन गया था और आज माननीय सतपाल महाराज जी के प्रयास से संस्कृति विभाग द्वारा ही गंगाद्वार अर्थात हरद्वार में ‘उत्तराखण्ड की लोक परम्परा में आदि नाद ढोल-दमाउं’ अर्थात ‘नमोनाद’ का आयोजन किया गया। इसके लिये महाराज जी व संस्कृति निदेशालय, उत्तराखण्ड को कोटि-कोटि धन्यवाद दिया ही जाना चाहिये। महाराज जी के प्रेमनगर आश्रम के ‘गोवर्धन हॉल’ में उत्तराखण्ड के विभिन्न जनपदों से आये हुये एक साथ बारह सौ से अधिक ढोलियों को देखना और सुनना अविस्मरणीय अनुभव है। इसकी अनुगूंज उत्तराखण्ड के वायुमण्डल में लम्बे समय तक रहेगी। उनका यह प्रयास निस्सन्देह ढोलियों के बीच सामुहिकता व सामुदायिकता की भावना को अंकुरित करेगा ही साथ ही उन्हें इस आयोजन द्वारा अपने को आंकने/परखने का मौका मिला है जिससे वे अपनी इस कला को और भी निखारेंगे। सोने को निरन्तर तपाकर निखारने की कला में सिद्धहस्त भाई प्रीतम भरतवाण और सबसे संवाद व इतनी अधिक लोगों के लिये व्यवस्था बनाये रखने के लिये हमें भाई बलराज नेगी जी का भी आभार करना नहीं भूलना चाहिये।

Friday, July 14, 2017

बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है....

रफी साहब की मखमली आवाज में ‘सूरज’ फिल्म का यह गाना आज भी जब कहीं गूंजता है तो दिल अद्भुत रोमांच से भर उठता है, मन हिलोरें लेते हुये खयालों में खो जाता है, आँखे ख्वाब देखने लगती हैं, अतीत याद आने लगता है और, और.....। हाँ सचमुच, कुदरत ने गढ़वाल में एक घाटी ऐसी बनायी है जहाँ बहार सैकड़ों प्रजातियों के फूल बरसाती है मीलों तक, फूल ही फूल। बस, महबूब को थोड़ी सी तकलीफ जरूर उठानी पड़ेगी वहाँ तक पहुँचने में। और वह घाटी है चमोली जिले की तहसील जोशीमठ के अन्तर्गत विश्व प्रसिद्ध धरोहर- फूलों की घाटी।देश दुनिया देखने की तमन्ना किसे नहीं होती है? ऐसे लोग विरले ही होंगे जिन्हंे प्रकृति न लुभाती हो। मुझे तो अपने पहाड़ ही प्यारे लगते हैं। मेरा तो मन करता है कि पहाड़ी ढलान पर पसरे गांवों, सर्पीली पगडण्डियों, कल-कल निनाद करती नदियों, हरे-भरे बुग्यालों, बर्फीली चोटियों के सौन्दर्य को अपने भीतर अधिकाधिक भर लूं। कि न जाने कब शरीर ही इन पहाड़ों की यात्रा करने से मनाही कर दे। न जाने कब आँखे सुन्दर दृश्यों को अपने कैमरे में कैद करना ही छोड़ दे। इसलिये इस बार कार्यक्रम बना फूलों की घाटी का।     
बद्रीनाथ मार्ग पर बद्रीनाथ से लगभग पच्चीस किलोमीटर पहले गुरू गोविन्द सिंह जी के नाम से अलकनन्दा नदी के दायें तट पर स्थित ‘गोविन्दघाट’ बसा हुआ है। यहीं से नदी पार कर पूरब दिशा में चौदह किलोमीटर पैदल चलकर पहुँचा जाता है घांघरिया। दूरी मात्र चौदह किलोमीटर परन्तु गोविन्दघाट से लगभग चौदह सौ मीटर ऊँचाई पर। अर्थात औसतन 1ः10 का ढलान (Gradient)। पुलना गांव तक अब पाँच किलोमीटर लम्बा हल्का वाहन मार्ग अवष्य बन गया है किन्तु पैदल दूरी तीन किलोमीटर ही कम हुयी। पुलना गांव लक्ष्मणगंगा के दायें तट पर बसा हुआ है और 2013 की प्रलयंकारी बाढ़ में नदी में पानी के साथ इतना मलबा आया कि पुलना के काफी मकान जमींदोज हो गये हैं।
संकरी व गहरी घाटी में पूरे वेग के साथ बह रही नदी के दोनो ओर घने जंगलों से युक्त पहाड़ ऊँचे उठे हुये हैं। इस मषीनी युग मे समय की बड़ी महत्ता है। इसलिये समय को सम्मान देते हुये हमने गोविन्दघाट से पुलना तक जीप द्वारा और पुलना से घांघरिया तक ग्यारह किलोमीटर का सफर खच्चरों से तय किया। समतल व कच्चे रास्ते पर खच्चर की सवारी करना आनन्द देता है, परन्तु चढ़ाई-उतराई भरे पहाड़ी रास्तों पर घोड़े/खच्चरों की सवारी केवल मजबूरी होती है। खड़न्जे बिछे रास्ते पर बार-बार सन्तुलन बनाना पड़ता है क्योंकि घोड़े/खच्चरों के खुरों पर लोहे की नाल लगी होती है जिससे खड़न्जे वाले रास्ते उनके खुर फिसलते हैं। इसलिये कितना भी हांक लिया जाय घोड़े/खच्चर हमेषा कच्चे भाग का में चलते हैं और ऐसे रास्तों पर कच्चा हिस्सा केवल किनारों पर मिलता है। पहाड़ी की ओर चलने पर सवारी के हाथ-पांव छिलते हैं और घाटी की ओर चलने पर नीचे गहरी खाई में गिरने की आषंका बनी रहती है। दूसरे पल सोचता हूँ कि हमारे ऐतिहासिक नायक महाराणा प्रताप रहे हों या वीर छत्रपति षिवाजी, या महाराजा रणजीत सिंह या फिर महारानी लक्ष्मीबाई जी, ढाल, तलवार व भाले के साथ घोड़े की वल्गा थामे हुये किस तरह अपनी षूरवीरता दिखाते होंगे। झाड़ियों में, जंगलों में, घाटियों मंे, मैदानो में और पहाड़ों में अपने को बचाते हुये किस प्रकार षत्रुओं से लोहा लेते होंगे। कितने महान थे वे और एक हम है कि घोडे़/खच्चर मालिक द्वारा हंकाये जाने व बिल्कुल खाली हाथ होते हुये भी घोड़े/खच्चर की पीठ पर बैठ रहने तक डर से माथे पर पसीना टपकता रहता है।   
लगभग छः किलोमीटर दूरी के बाद भ्यंूडार गांव पहुँचे तो थोड़ा रुककर मैगी के साथ चाय ली। दस रुपये कीमत वाला मैगी का पैकेट जब दुकानदार दो मिनट उबाल कर सर्व करता है तो उसकी कीमत इस मार्ग पर चालीस रुपये हो जाती है और चाय बीस रुपये की। सन्तोश यह था कि खच्चर हांकने वाले हो या छोटे-छोटे ढाबे खोले दुकानदार, प्रायः सभी स्थानीय निवासी थे। फूलों की घाटी और हेमकुण्ड के दर्षनार्थ जो भी यात्री आता है कुछ न कुछ खर्च अवष्य करता है जिससे इस घाटी के निवासियों की आर्थिक स्थिति कमोबेष ठीक है। यह अलग बात है कि पूरा सीजन ही मात्र चार-साढ़े चार माह का है। भ्यूंडार गांव लक्ष्मणगंगा और काकभुसुण्डी नदी के संगम तट पर दायें किनारे बसा हुआ है। 2013 की बाढ़ में गांव के अनेक मकानों का नामोनिशान ही मिट गया था परन्तु अब लोगो ने कुछ पुराने मकान ठीक कर दिये हैं और कुछ नये बना दिये हैं। जहाँ पर आज लक्ष्मणगंगा बह रही है वहाँ कभी आबादी थी और नदी तब एकदम बायें किनारे से सटकर बहती थी। एक सज्जन ने बताया कि भ्यूंडार वस्तुतः पुलना गांव वालों की छानियां थी न कि गांव। भ्यूंडार से लक्ष्मणगंगा पार कर रास्ता उत्तर दिशा में मुड़ जाता है और ढलान अपेक्षाकृत बढ़ जाती है। लगभग आठ फुट चौड़े सीढ़ीदार व खड़ंजे बिछे इस रास्ते पर हेमकुण्ड के प्रति आस्था रखने वाले सैकड़ों श्रद्धालुओं की आवाजाही निरन्तर बनी रहती है। लोक निर्माण विभाग, उत्तराखण्ड द्वारा बनाये गये इस रास्ते पर सफाई का जिम्मेदारी एक गैर सरकारी संगठन ‘ईको विकास समिति, भ्यूंडार’ ने उठा रखी है। जिसके एवज में वे बोझा ढोने वाले कुली और प्रत्येक खच्चर स्वामी से न्यूनतम राशि सफाई के एवज में लेते हैं। परन्तु प्रसन्नता इस बात की है कि स्थानीय यात्री को भुगतान करने से मुक्त हैं।
लगभग साढ़े तीन हजार मीटर की ऊँचाई पर घने देवदारों और दो ऊँची पहाड़ियों के बीच घाटी में बसे घांघरिया पहुँचे तो इस कस्बे को देखकर आश्चर्य हुआ। आते हुये रास्ते में मन में सवाल उठ रहे थे कि वहाँ ठिकाना मिले न मिले परन्तु घांघरिया में बड़े आलीशान होटल, दुकानें और गुरूद्वारा देखकर दंग रह गया। खच्चरों और आदमियों की पीठ पर लादकर कैसे सीमेण्ट, सरिया, रोड़ी, फर्नीचर आदि सामान यहाँ पर लाया गया होगा? रात्रि विश्राम के लिये ठिकाना मिल गया था गढ़वाल मण्डल विकास निगम का विश्राम गृह। सामान वहाँ रखने के बाद फ्रेष होकर लंज लिया और कमर सीधी करने के लिये थोड़ी देर सुस्ता लिये। सहयात्री जोषी जी से बात की कि समय काफी है क्यों न घांघरिया का ही एक चक्कर मार लें। यह जानकर खुषी हुयी कि घांघरिया में बी.एस.एन.एल. का टॉवर लगने के कारण कनेक्टिविटी थी। अन्यथा प्रत्येक दुकान के बाहर दुकानदारों ने
सेटेलाईट फोन रखकर पी.सी.ओ. बूथ खोले हुये थे। सबसे पहले ईको विकास समिति के कार्यालय गये तो वहाँ पर कार्यरत लड़की ने फूलों की घाटी के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी और भी विस्तार में जानने के लिये प्रोजेक्टर चलकार एक डॉक्यूमेण्टरी फिल्म चलवा दी, प्रति व्यक्ति तीस रुपये वसूली के बाद। आधे घण्टे की इस रंगीन फिल्म में फूलों की घाटी का इतिहास, भूगोल और घाटी में पाये जाने वाले पषु-पक्षियों और खिलने वाले फूलों के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। वहाँ से निकलकर घांघरिया के एक होटल में चाय जलेबी लेने के बाद कस्बे के मुख्य रास्ते पर बढ़े। पूरे कस्बे में चार-पाँच हजार लोगों से अधिक लोग रहे होंगे जिनमें नब्बे प्रतिशत सरदार व पंजाबी भाषी लोग और षेश दस प्रतिषत हमारे जैसे स्थानीय यात्री, होटलों के कर्मचारी, घोड़े/खच्चर चलाने वाले और पालकी/पिठ्ठू ढोने वाले। वातावरण में गूंज रहे पंजाबी संवादों व जोर-जोर बोलने की आवाजों से ऐसा लग रहा था मानों हम पंजाब के ही किसी कस्बे में आ गये हैं। शायद यही कारण है कि कुछ लोग इस कस्बे को ‘घांघरिया’ के स्थान पर ‘गोविन्दधाम’ लिख रहे हैं, जो कि अप्रत्यक्ष तौर पर स्थानीयता पर हमला है। घांघरिया के उत्तर-पश्चिम में हेमकुण्ड से आने वाली लक्ष्मण गंगा और फूलों की घाटी से आने वाली भ्यूंडार गाड का संगम है। 
घांघरिया से पैदल उत्तर दिशा की ओर छः-सात सौ मीटर चलने के बाद दायीं ओर सात-आठ फीट चौड़ व पक्का रास्ता हेमकुण्ड साहिब को चला जाता है और सीधा कच्चा रास्ता फूलों की घाटी के लिये। थोड़ी दूर चलने के बाद ही रास्ते के दायीं ओर फॉरेस्ट चौकी बनी हुयी मिली और बायीं ओर कार्यरत कर्मचारियों के आवासीय भवन। चौकी में फूलों की घाटी जाने वाले से 150 रुपये प्रति व्यक्ति शुल्क तथा 500 रुपये सेकुरिटी फी ली जाती है कि यात्री जो भी नमकीन, बिस्कुट आदि के पैकेट लेकर जा रहा है वह उनकी रद्दी वहाँ न फेंके, वापस ले आये। इसके लिये बाकायदा बैग चेक किये जाते हैं। फॉरेस्ट चौकी पर औपचारिकता निभाने के बाद कुछ आगे बढ़ने पर एक नाला पड़ा घुसाधार गाड। पच्चीस-तीस मीटर चौड़ाई वाली गाड के ऊपर काफी बर्फ जमी हुई थी और पानी बर्फ के नीचे से बह रहा था। मुख्य रास्ता बरसात में बह गया होगा इसलिये बर्फ के ऊपर चलकर इसे पार किया। मुझे अमरनाथ यात्रा के दौरान अमरावती नदी के ऊपर चलने की याद आ गई। घुसाधार गाड पार करने के बाद से ही ब्रह्यकमल और फन फैलाये नाग के आकार के फूल दिखने शुरू हो गये थे। आगे उफान मारती भ्यूंडार गाड पर बने पुल से गाड के दायीं तट पर पहुँचे। गाड पार से एक किलोमीटर का जिग-जैग रास्ते पर चलते हुये हम निरन्तर ऊँचाई पर बढ़ते गए। रास्ते में भोजपत्र के पेड़ प्रचुर मात्रा में मिले। संयोग से रास्ते में कुछ लोग मिले तो सोचा शैक्षणिक भ्रमण पर होंगे। परन्तु यह जानकर अच्छा लगा कि वे सूरत (गुजरात) से तीन परिवारों के सदस्यों का दल था और घाटी का आकर्षण उन्हें भी यहाँ खींच लाया था। रुकते और चलते हुये इस चढ़ाई पर एक जगह खड़े होकर गुजराती दल में से चौबीस-पच्चीस साल की हँसमुख लड़की से मैंने पूछा क्या तुमने फिल्ब ‘बाहुबली-1’ देखी है? उसने हाँ बोला तो मैंने भ्यूंडार गाड के बायीं ओर खड़ी चट्टान दिखाकर कहा कि ‘वह देखो, इस चट्टान के ऊपर विषाल माहिश्मति साम्राज्य है।’ वह मुस्कराई और कहा ‘वर्णन तो अच्छा किया सर आपने। दो सौ मीटर से अधिक इस खड़ी चट्टान को देखकर तो सचमुच ही लग रहा है कि इसके ऊपर अवष्य कोई नगर होगा।’ चढ़ाई खत्म होने के बाद कुछ आगे चलकर वक्राकार रास्ता पूरब दिशा की ओर मुड़ जाता है। यहीं से पूरब दिशा में मीलों तक फैली घाटी के अनुपम सौन्दर्य का प्रथम दर्षन हुये। बुग्याल के दोनों ओर कुछ गहराई पर और बीचों-बीच भ्यूंडार गाड धीर-मन्थर गति से बह रही थी, उसका वह रौद्र रूप यहाँ नहीं दिखाई दिया जो घांघरिया से घाटी में प्रवेश करने तक है। भ्यूंडार गाड के दोनो ओर फैली चौड़ी घाटी में खिले थे सैकड़ों प्रजातियों के फूल, दूर-दूर तक। जिस गदेरे से फूलों की घाटी शुरू मानी जाती है वहाँ से ही लगभग छः-सात किलोमीटर दूर तक फेली हुयी है। संकरी घाटियों में प्रायः एक अदृश्य भय सा व्याप्त हो जाता है, परन्तु यह घाटी इतनी चौड़ाई लिये हुये है कि इसमें आगे बढ़ते हुये न भूस्खलन का खतरा मण्डराता है और न ही संकरी घाटियों वाला वह अदृश्य भय। डर है तो यह कि जंगली जानवरों से कहीं सामना न हो जाये। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पहाड़ी की उत्तरी ढलान से बर्फ पिघलकर छोटे-छोटे नालों के रूप में बहकर भ्यूंडार गाड की जल सम्पदा में वृद्धि कर रहे थे। सुदूर पूरब में बर्फ से ढकी गौरी पर्वत घाटी को आशीर्वाद देता सा प्रतीत हो रहा था। उसके ऊपर झक सफेद बादल अठखेलियां कर रहे थे, कभी वह चाँदी की चमक वाले उस पर्वत को अपने आगोश में समेट लेते और कभी चुपचाप उसके पीछे छुप जाते। सचमुच प्रकृति ने अपने दोनों हाथों से गढ़ा है इस घाटी को। मनुष्य क्या देवता भी यहाँ स्वयं वास करने का मोह षायद ही संवरण कर पाये।    1982 में नन्दा देवी राष्ट्रीय पार्क घोषित हो जाने के बाद घाटी में पशुओं की आवाजाही बन्द है और दर्शनार्थियों द्वारा कैम्प डालकर रात को ठहरने पर भी पाबन्दी है। फूलों से लकदक इस घाटी की ओर निरन्तर बढ़ने पर मेरी पत्नी काफी उत्साहित थी और इस यात्रा में सहयात्री महेश चन्द्र जोशी जी भी खूब प्रफुल्लित दिखे। श्रीमती जोशी जी रात बुखार होने के कारण कुछ सुस्त अवश्य रही परन्तु प्रकृति के इस नैसर्गिक सौन्दर्य को देखकर वे भी अभिभूत थी। 
 सभी प्रकार के फूल अभी नहीं खिले थे तथापि कम मात्रा में खिले रंग-बिरंगे फूलों से सजे बुग्याल देखकर मेरा मन हो रहा था कि यहीं बस जाऊं, एडनबरा निवासी मिस जॉन मारग्रेट लीग(1885-1939) की तरह मैं भी यहीं समाधिस्थ हो जाऊं। फूलों की इस सुन्दर घाटी को सन् 1931 में जनता के सामने लाने वाले फ्रैंक स्माइथ को सैल्यूट कर हम वापस घांघरिया लौट आये ताकि अगले दिन हेमकुण्ड साहिब की यात्रा के लिये तरो-ताजा रह सकें।

Wednesday, January 04, 2017

मनुस्मृति में क्या है ?

       चौबीस दिसम्बर को प्रतिवर्श ‘उत्तराखण्ड के गांधी’ नाम से विख्यात इन्द्रमणी बडोनी जी और पच्चीस दिसम्बर को पेषावर काण्ड के नायक चन्द्र सिंह गढ़वाली जी का जन्मदिवस पूरे उत्तराखण्ड में मनाया जाता है। पच्चीस दिसम्बर को ही क्रिसमस की धूम-धाम पूरे विष्व में रहती है। परन्तु इस वर्श चौबीस व पच्चीस दिसम्बर देहरादून वासियों के लिये खास रहा। क्योंकि चौबीस व पच्चीस दिसम्बर को ही(पूरे दो दिन) ‘समय साक्ष्य’ के तत्वाधान में देहरादून के राजपुर में ‘लिट्रेचर फेस्टिवल’ भी मनाया गया। इधर पच्चीस दिसम्बर को ही सोषल मीडिया ‘वर्डसऐप’ पर ‘लोक का बाना’ ग्रुप से इन्द्रेष आईसा (इन्द्रेष मैखुरी)जी का लेख पढ़ा कि ‘‘1927 में पच्चीस दिसम्बर को ही भीम राव अम्बेडकर की नेतृत्व में ‘मनुस्मृति’ को जलाया गया ।‘‘           वामपंथी नेता इन्द्रेष मैखुरी जितने प्रखर वक्ता हैं उतने ही वे ऊर्जावान लेखक भी। वे लिखते हैं कि ‘‘....जातीय श्रेश्ठता के नकली बोध से ग्रसित हमारे समाज के लिये वह घटना एक बड़ी चुनौती थी। मनु स्मृति ही वो संहिता है जो हिन्दू समाज के श्रमषील हिस्से को अछूत मानकर उसके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार को जायज ठहराने का अधार प्रदान करती है। महिलाओं के प्रति भी यह संहिता काफी क्रूर दृश्टिकोण लिये हुये है।.......’’
       मनुस्मृति क्या है- हिन्दू धर्मशास्त्रों में मनुस्मृति एक प्रमाणिक ग्रन्थ माना जाता है। सम्भवतः यह पहला संस्कृत ग्रन्थ है जिसका अनुवाद ब्रिटिश शासनकाल सन् 1794 में ‘सर विलियम जॉन्स’ द्वारा किया गया है। आज मनुस्मृति के पचास से अधिक हस्तलिखित ग्रन्थ उपलब्ध हैं परन्तु सबसे पहले प्रचलन में आया व सर्वाधिक बार अनुवादित हुआ संस्करण ही अठारहवीं सदी से प्रमाणिक माना जाता है। मनुस्मृति के रचनाकाल के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न मत हैं। परन्तु अधिकांश विद्वानों का मानना है कि इस ग्रन्थ की रचना ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी और ईसा की तीसरी शताब्दी के मध्य हुयी। ऐसा माना जाता है कि ‘मनु’ और ‘भृगु’ ऋषि के मध्य धर्म सम्बन्धी हुयी वार्ता इसका आधार है।
         संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब(वेद नगर), बरेली से प्रकाषित एवं डॉ0 चमनलाल गौतम द्वारा सम्पादित ‘मनुस्मृति’ के 2004 संस्करण में सम्पादक/प्रकाषक ने दो षब्द षीर्शक में लिखा है कि ‘....यह ग्रन्थ निरा धर्मग्रन्थ ही नहीं है वरन विषेश रूप से नीतिगत भी है। आज भी इसकी मान्यता और उपयोगिता उतनी ही है जितनी कि पुरातन युग में थी। हिन्दू धर्म सम्बन्धी विवादों में अब भी विधि ग्रन्थ के रूप में इसके प्रमाण न्यायालयों में मान्य किये जाते हैं। .....राजा के लिये आवष्यक है कि वह योग्य दण्डधर होकर न्यायपूर्वक राज्य का पालन करे। उसे देष, काल, षक्ति, विद्या और वित्त के अनुसार अपराधियों को दण्ड देना चाहिये। ‘स राजा पुरुशो दण्डः स नेता षासिता च स’ के अनुसार दण्ड ही राजा है, वही नेता, षासक और रक्षक है तथा ‘दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः’ पण्डितजन दण्ड को ही धर्म कहते हैं।..... ’
             इस मनुस्मृति में बारह अध्याय हैं। जगदुत्पतिकथन, ब्रह्मोत्पति, स्त्री पुरुश की सृश्टि, मनु एवं मरीच्यादि की उत्पति, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैष्य-षूद्र के कर्म, ब्राह्मण का श्रेश्ठतव, धर्म के सामान्य लक्षण, धर्म की वेदमूलता, ब्रह्मवर्तदेषीय सदाचार, द्विजातियों का वैदिक मंत्र से गर्भाधानदि कर्तव्य, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राषन, चूड़ाकरण, ब्रह्मचारी के कर्तव्य, गुरुकुल-वास के नियम, ब्रह्मचर्य विधि, असपिण्ड कन्या से विवाह, चारों वर्णों का भार्या-परिग्रह, विवाह के आठ प्रकार, ब्राह्मादि विवाह फल, सवर्णाविवाह विधि, युग्म तिथि में पुत्रोत्पति, कन्या विक्रय दोश, पिण्डदानादि विधि, तर्पण फल, ब्रह्मचर्य गार्हस्थ्य काल इन्द्रियार्थ आसक्ति निशेध, वय-कुल के अनुरूप आचरण, रजस्वला गमनादि निशेध, नग्न स्नानादि निशेध, रात्रि में तिल भोजन और नग्न षयन निशेध, षूद्र से व्रत कथनादि निशेध, आचार प्रषंसा, यम नियम श्रद्धा-दान का फल, असत्य कथन निन्दा, मृत्यु विषयक प्रश्न, वृथा मांसादि निषेध, आचमन विधि, स्त्री धर्म कथन,
पर-पुरुष गमन निन्दा, वानप्रस्थाश्रम, अथितिचर्या, महाप्रस्थान, राजधर्म, प्रजारक्षण, न्यायवर्ती राजा की प्रंशसा, प्रजारक्षण, काम-क्रोधादि त्याग, सन्धि विग्रह काल, सैन्य प्रशिक्षण, उदासीन गुण, न्यायालय प्रवेश, असत्य कथन दोष, सीमा विवाद स्थल, स्त्री-पुरुष पशु आदि का हरण, दासों के सत्रह प्रकार, स्त्री रक्षा, व्यभिचार प्रायश्चित, कुपुत्र निन्दा, द्विजाति के श्रेष्ठ कर्म, परधर्म जीवन निन्दा, द्विज वर्ण कथन, राज्याधिकार, पंचमहापातक, प्रायश्चित, पापानुताप, निन्दा, तप, वेदाभ्यास, त्रिदण्डी परिचय, पाप से कुत्सिता गति, धर्मज्ञ लक्षण आदि अनेक विषयों पर प्रकाश डाला गया है। ‘लोकानां तु निवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरूपाधतः। ब्राह्मणं क्षत्रियं वैष्यं षूद्रं च निरवर्तयेत्।।’ (31/अध्याय- एक) अर्थात लोकों की वृद्धि के लिये प्रभु ने मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, जंघा से वैष्य एवं चरण से षूद्र उत्पन्न किये। ‘एकमेव तु षूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिषत्। एतेशामेव वर्णानां सुश्रुशामनसूयया।।’ (91/अध्याय- एक) 
अर्थात षूद्र के लिये प्रभु ने एक ही कर्म का आदेष दिया कि वह उक्त तीनों वर्णों की सेवा ईर्श्या छोड़ कर करें।

‘स्वभाव एश नारीणां नराणामिह दूशणम्। अतोर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपष्चितः।।’ (213/अध्याय- दो) अर्थात स्त्रियों का स्वभाव पुरुशों को दूशित करने वाला होने के कारण युवतियों के प्रति ज्ञानी पुरुश असावधान नहीं रहते।
‘षूद्रैव भार्या षूद्रस्य स च स्वा च विषः स्मृते। ते च स्वा चैव राजष्च ताष्च स्वा चाग्रजन्मनः।।’ (13/अध्याय- तीन) अर्थात षूद्र की भार्या षूद्र होती है, वैष्य अपनी सवर्णा और षूद्रा से, क्षत्रिय अपनी सवर्णा, वैष्य और षूद्रा से तथा ब्राह्मण चारों वर्ण की कन्याओं से विवाह कर सकता है। ‘वृशलीफेनपीतस्य निःष्वासोपहतस्य च। तस्यां चैव प्रसूतस्य निश्कृतिर्न विधीयते।।’ (19/अध्याय- तीन) अर्थात षूद्रा के अधर का थूक चाटने वाला ब्राह्मण उसके साथ षयन करके उसके निःष्वास से अपने प्राणों को दूशित करता हुआ सन्तानोत्पादन करता है, उसके उद्धार का कोई प्रतिकार नहीं।
       इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं इस मनुस्मृति में। अतः बाबा साहेब अम्बेडकर साहेब ही क्या एक सामान्य व्यक्ति को भी मनुस्मृति में वर्णित कुछ बातों पर आपत्ति होना स्वाभाविक है। परन्तु यह भी सम्भव है कि मूल ग्रन्थ में ऐसा कुछ न रहा हो जो आज आपत्तिजनक माना जाता है।

Saturday, December 10, 2016

वीर सैनिकों की स्मृति में आयोजित खलंगा मेला

                    देहरादून में एक लम्बा अरसा बीत गया। परन्तु हर वर्ष आयोजित होने वाले खलंगा मेले में जा ही नहीं पाया। कई बार सोचता परन्तु....। इस बार ‘बलभद्र खलंगा विकास समिति, नालापानी, देहरादून’ द्वारा आयोजित मेले के लिये समय निकाल ही लिया। कई मित्रों को फोन किया परन्तु सब कहीं न कहीं व्यस्त थे। वरिष्ठ पत्रकार व कवि चेतन खड़का जी ही साथ दे पाये। हमेशा सोचता कैसा है वह नालागढ़ जिसे दो सौ वर्ष पूर्व ईस्ट इण्डिया कम्पनी की फौज हजारों सैनिकों की कुर्बानी के बाद भी लम्बे समय तक नहीं भेद पायी। हजारों पैदल, सैकड़ों घुड़सवार सैनिक तथा प्रचुर मात्रा में बन्दूक, गोला-बारूद, तोप से लैस अंग्रेज सेना की क्या परेशानी रही कि मुठ्ठी भर गोरखा सैनिकों को एक ही बार के आक्रमण में नहीं जीत पाये, जैसे कि उन्हें आशा थी। गोरख्याणी(गोरखा शासन) से त्रस्त गढ़वाल की प्रजा व राजा के साथ देने पर भी गोरखा सैनिकों के अन्दर
इतना आत्मबल कहाँ से आया कि उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना के नाकों चने चबवा दिये।
                देहरादून शहर के उत्तर-पूरब में लगभग आठ किलोमीटर दूरी पर और ननूरखेड़ा, मंगलूवाला, बझेत, अस्थल व किरसाली गांव के मध्य साल के घने जंगल के बीच लगभग 850 मीटर पर स्थित यह दुर्ग नुमा क्षेत्र वास्तव में बहुत दुर्गम है। आज भले ही वहाँ तक सड़क बन गयी है परन्तु दो सौ साल पूर्व की स्थिति की कल्पना की जा सकती है। वीर गाथा प्रकाशन, विद्याभवन-दोगड़ा-गढ़वाल द्वारा प्रकाशित डॉ0 शिवप्रसाद डबराल की पुस्तक ‘गोरख्याणी’ में ‘खलंगा’ का अभिप्राय ‘सैन्य शिविर’ है। इतिहासकारों के अनुसार गोरखा शासन गढ़वाल, कुमाऊँ व सिरमौर राज्यों के लिये एक काला अध्याय है। गोरखा शासन के  मात्र बारह साल के अल्पकाल में जो अत्याचार हुए वह सैकड़ों वर्ष के शासनकाल में मुगलों ने भी नहीं किया और न ही अंग्रेजों ने। प्रजा की दुर्दशा पर मोलाराम की कविता उस काल की साक्षी है।
‘मालक रहा न गढ़ मैं मुल्क षुवार हो गया।
साहेब गुलाम पाजी सब इकसार हो गया।
काजी करै न काज सित्मगार हो गया।
रैयत पै जुल्म जोर बिसियार हो गया।
क्या षूब श्रीनग्र था उजार हो गया।...........’

बहरहाल! इतिहास में इतना कुछ अंकित है कि पढकर रांेगटे खड़े हो जाते हैं।
                         खलंगा मेले में भ्रमण के दौरान एक मित्र का फोन आया। कहने लगे ‘यह तो गढ़वालियों के लिये गुलामी का प्रतीक है और गढ़वालियों को इसमें शामिल ही नहीं होना चाहिये।’ मैंने कहा कि ‘लाल किला, ताजमहल आदि ही नहीं संसद भवन, गेटवे ऑव इण्डिया आदि भी तो गुलामी के प्रतीक हैं। देहरादून में एफ. आर. आई. के भवन, सर्वे ऑव इण्डिया की व्यवस्था आदि भी तो गुलामी की प्रतीक है। तो क्या हमें उनसे भी
दूर रहना चाहिये?.......’ खैर।
                        शहर से दूर होने के कारण मेले में ज्यादा भीड़ नहीं थी। मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम सुबह ग्यारह बजे से देर तक चलते रहे। परन्तु दिन में ध्यान अक्सर भटक जाता है जिससे लोग इतना लुत्फ नहीं
उठा पाये। मेले में सेलु रोटी, भुटवा, चना छोला, चोमिन, मोमो आदि खूब बिक रहा था। पहली बार मैंने भी लहसुन प्याज की चटनी के साथ सेलु रोटी खायी। मेला स्थल से लगभग तीन सौ मीटर ऊपर पहाड़ी पर बलभद्र खलंगा युद्ध स्मारक (1814) देखने भी गये। इतनी ऊँचाई से देहरादून का विंहगम दृश्य देखकर बहुत अच्छा लगा। सोचा यदि यह मेला तीन-चार दिन चलता तो परिवार सहित अवश्य आता। वायु ध्वनि प्रदूषण आदि से मुक्त इस घने जंगल के बीच में कुछ पल गुजारना किसे अच्छा नहीं लगेगा।

Wednesday, September 07, 2016

भगतु व पत्वा गोर्ला रावत (समय- 17वीं शताब्दी का अंतिम अंश)

             गढ़वाल के भडों(वीरों) में इन दो जुड़वाँ भाइयों का ऊँचा स्थान है। गोर्ला वंश डोटी व काली कुमाओं में अधिकारहीन होने के बाद गढ़वाल राज्य की शरण में आया था और उसे चौन्दकोट परगने के गुराड़ गाँव में निवास दिया गया था। वहां पहले गुराड़ी नेगी थोकदार थे। लेकिन किसी कारणवश उन्हें पूर्वी नयार के समीप चौमासु आदि गांवों में नेग दे दिया गया और उनकी थोकदारी गोर्ला वंश के प्रथम आगुन्तक भड़ को दे दी गयी। धीरे धीरे उस वंश को कई गांवों की थोकदारियां प्राप्त हो गयी। लेकिन कोई ठोस इलाका अर्थात (पट्टी) उनके पास नहीं थी। अपने बुद्धि चातुर्य तथा वीरता से उनका गढ़वाल के राजवंश से वैवाहिक सम्बन्ध हो गया और दरबार में उनका दबदबा इतना बढ़ गया कि ‘‘भैर गोर्ला, भितर गोर्ला, अर्ज विनती कैमू कर्ला’’ की कहावत प्रचलित हो गयी। उसी वंश के थोकदार के घर में गुराड़ गाँव में इन दो जुड़वाँ भाइयों का जन्म हुआ था।
               इनके बड़े होने पर गृह-कलह की आशंका पैदा हो गयी। यद्यपि ये दो भड़ बड़ी माता के पुत्र थे, लेकिन छोटी माता का पुत्र इनसे जेठा था। अतः इस बात को लेकर कि जेष्ठत्व पत्नी का माना जाना चाहिए या पुत्र का- एक मतभेद पैदा हो गया। इनके विपक्ष में एक तर्क यह भी था कि जुड़वाँ होने के कारण थोकदारी को दो बराबर भागों में विभाजित करना होगा। आखिर यह सारा मसला गढ़वाल के महाराज के सम्मुख पेश किया गया। उन्होंने सब तर्कों पर विचार करके यह बुद्धिमतापूर्ण निर्णय दिया कि गुराड़ की थोकदारी तो उम्र में ज्येष्ठ पुत्र को ही मिलनी चाहिए। लेकिन अगर ये जुड़वाँ भाई पूर्वी सीमा पर जाकर कुमाउंनी सरदार का सिर काट लायें तो गुजडू व खाटली की थोकदारी इन्हें दे दी जाएगी। उन दिनों एक कुमाउंनी सरदार ने उस इलाके में आतंक व अत्याचार मचा रखा था और वहां का तत्कालीन थोकदार उसका मुकाबला नहीं कर पा रहा था।
बस इन दो भड़ों को क्या चाहिए था? ये तो अपनी वीरता प्रदर्शित करने के लिए उत्सुक थे ही। अतः उन्होंने एक शुभ दिन अपनी वीर माता के साथ गुराड़ से विदाई ली और पूर्वी सीमा की ओर प्रस्थान किया। वहाँ जाकर उन्होंने जनता का मजबूत संघटन तैयार किया और कांडा (पट्टी खाटली) में अपना केंद्र स्थापित किया। आखिर सब तैयारी करके एक दिन कुमाउनी फौज से इनकी भिड़न्त हो गयी। ये बड़ी बहादुरी से लड़े और कुमाउनी फ़ौज भगा दी गयी। उसके बाद उसने उस इलाके की ओर कभी भूल कर भी नजर नहीं उठाई। इनके भी कई साथी वीरगति को प्राप्त हुए और ये जख्मी दशा में उस कुमाउनी सरदार का सिर लेकर श्रीनगर दरबार में उपस्थित हुए। महाराज ने इनकी भूरी भूरी प्रशंसा की और चूंकि प्रत्येक भड़ पर ४२ -४२ घाव आये थे, अतः इन्हें उतने ही गांवों की थोकदारी प्रदान की गयी।
                    इस प्रकार विजय प्राप्त करके और महाराज से पुरस्कार पाकर श्री भगतु गोर्ला ने सिसई (पट्टी खाटली) में और पत्वा गोर्ला ने पड़सोली (पट्टी गुजडू) में अपने केंद्र स्थान निश्चित किये तथा भविष्य में दक्षिण-पूर्वी सीमा की जोरदार रक्षा की। इनके वंशज आज भी विद्यमान है। श्री भगतु गोर्ला के वंशजों में श्री उमेश्वर सिंह, डिप्टी कलेक्टर प्रमुख हैं। श्री पत्वा गोर्ला के वंशजों में श्री विष्णु सिंह रावत, संचालक- वीविंग फैक्टरी कोटद्वार तथा श्री नारायण सिंह रावत सदस्य जिला बोर्ड प्रमुख हैं.

                                                                           (स्रोत साभार- गढ़वाल की दिवंगत विभूतियाँ -डॉ0 भक्तदर्शन ! संस्करण- 1952  )

Sunday, August 14, 2016

भारतवर्ष में बाल मजदूरी और बाल श्रम कानून

                                   आज मोटर वर्कशॉप, होटलों, दुकानों, घरों, खदानों में, बैण्ड पार्टी में या कबाड़ बीनने वाले के साथ नाबालिग बच्चों को देखकर हम द्रवित हो उठते हैं, हमारे मन में उन बच्चों के प्रति दया उमड़नी स्वाभाविक है। हम दुनिया और ईश्वर को कोसने लग जाते है। परन्तु प्रायः दूसरे ही पल हम व्यवहारिक व व्यवसायिक भी हो जाते हैं, बल्कि कभी-कभी हम उत्पीड़न करते उनके मालिकों की हाँ में हाँ भी मिलाने लग जाते हैं। विडम्बना ही है कि जिस उम्र में बच्चों को स्कूल पढ़ना चाहिये था उस उम्र में वे दो वक्त की रोटी के फेर में अपने मालिकों के हाथों पिट रहे होते हैं। हाय रे भाग्य!
                                     हमारे देश में गरीबी एक ज्वलन्त समस्या
है। जिसके लिये गरीब परिवार के अधिकाधिक सदस्यों को जीविकोपार्जन के लिये दौड़ना-भागना पड़ता है। उच्च व मध्यम वर्ग अपने बच्चों की परवरिश व शिक्षा-दीक्षा भली भांति कर सकता है। वहीं निम्न मध्यम वर्ग भी येन-केन प्रकार से अपने बच्चों के लिये भोजन व शिक्षा की व्यवस्था कर लेता है। परन्तु गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले परिवारों को अक्सर मजबूरन अपने नाबालिग बच्चों को भी मजदूरी की तपिश में झोंकना पड़ता है।
                            भारतवर्ष में बाल श्रम को रोकने के लिये ‘बाल श्रम (निषेध व निवारण) अधिनियम 1986 (1986 की अधिनियम संख्या-61)’ में स्पष्ठ उल्लेख है कि बाल श्रमिकों को कुछ विशेष कार्यों में संलिप्त नहीं
किया जा सकता। और ऐसा करने पर अधिनियम की धारा-3 के अनुसार न्यूनतम तीन माह सश्रम कारावास का प्राविधान है। यदि इस अधिनियम को शक्ती से लागू किया जाये तो बाल श्रम रोका जा सकता है।
चिन्तन: अन्धकारमय जीवन जी रहे ऐसे बच्चों के लिये हम या हमारा समाज क्या कुछ कर सकता है?
     

Sunday, July 17, 2016

पातीण और पातनी देवी

        पिछले साल विजय दशमी पर गांव जाना हुआ। ट्राली(Rope way) से टिहरी झील पार की और पैदल गांव को चल पड़ा। सोचा दो मील की दूरी के लिये गाड़ी का इन्तजार क्यों करूं। आधा मील ही पहुँचा कि मेरे गांव व मदननेगी जाने वाले रास्ते के मिलान पर पातनी (पातीण) देवी में हाथ स्वतः ही जुड़ गये। पीठ से बैग उतार कर नीचे रखा, यंत्रवत पास ही पातीण के झुरमुट से कुछ पत्तियां तोड़कर देवी के थान पर चढ़ाकर आशीर्वाद लिया और बैठ गया। मेरे गांव के आस-पास ही पातनी देवी के कई थान (स्थान) हैं। गांव से मदननेगी, चम्पाधार, माण्डू होते हुये कठूली जाने वाले रास्ते पर और एक यह अर्थात अलग-अलग दिशा को जाने वाले रास्तों पर। हमारे क्षेत्र के अन्य गांवों के रास्तों पर भी पातनी देवी के  कई थान हैं। पातनी देवी के थान से मतलब बिना किसी ढांचे का मन्दिर। जिसमें दीप, धूप, चढ़ावा आदि कुछ नहीं चढ़ता। दो-चार पत्ते पातीण के डाल दो और हाथ जोड़ दो। रास्ते किनारे ढलान से ऊपर की ओर प्रतीक के तौर पर एक-दो पत्थर और पातीण के कुछ सूखे व हरे पत्तों का ढेर का नाम है पातनीदेवी का थान।
         आखिर क्या है पातनी देवी? माना जाता है कि धर्म की अवधारणा व्यक्ति को अनुशासन में रखने के लिये हुयी है। सामाजिक बन्धनों के साथ-साथ मनुष्य धार्मिक बन्धनों में बान्धने से ही अनुशासित रह सकता है, हमारे पूर्वजों की सोच रही है। लाखों, करोड़ों देवी-देवताओं का उल्लेख हमारे धर्मशास्त्रों में है। तैंतीस करोड़ देवताओं की ‘लिस्ट’ मंे पातनी देवी है या नहीं, कुछ कह नहीं सकता। मेरा मानना है कि पातनीदेवी के थान के मूल में सम्भवतः पातीण के पौधों को समूल नष्ट होने से बचाना भी रहा हो।
उत्तराखण्ड हिमालय में 2000 से 5000 फीट ऊँचाई तक पाये जाना वाला पातीण वह पौधा है जिसे पालतू पशुओं के नीचे बिछाया जाता है- पशुओं को आराम देने की भावना से। परन्तु मूलतः गोबर खाद तैयार करने के निमित्त। यह जौनसार में निनस, निनावा व निनावं, गढ़वाल में तुंगला व पातीण तथा कुमाऊँ में तंग नाम से जाना जाता है। इसे हिन्दी में तुंगला व संस्कृत में तिन्त्रिणी कहा जाता है। अंग्रेजी नाम small flowered poison sumac है और वानस्पतिक नाम Rush parviflora है। जैसा कि संस्कृत नाम(तिन्त्रिणी अर्थात तीन तृण) से ही स्पष्ठ है कि इसकी शाखा पर 0.6 से 2 इन्च आकार के तीन पत्ते फूटते हैं, जिसमें ऊपर का पत्ता बड़ा और आशमान की ओर सिर उठाये होता है जबकि उसके नीचे आमने-सामने के पत्ते छोटे व लम्बवत होते हैं। मई, जून में जहाँ पातीण पर फूल निकलने शुरू हो जाते हैं, वहीं जुलाई, अगस्त में फल पड़ते हैं। तोर के दानों से भी छोटे अर्थात लगभग चार-पाँच मिलीमीटर ब्यास के इसके फल पकने पर हरे से भूरे रंग में बदल जाते हैं। आयुर्वेदिक औषधि के लिये विख्यात अंगूर की भांति गुच्छों के रूप में लदे इन फलों को चिड़िया, गिलहरी, बन्दर ही नहीं बल्कि वनों पर आश्रित पशुचारक, घसियारिनें आदि भी बड़े चाव से खाते हैं।
         पातीण व पातनी देवी से जुड़ी अनेक यादें है। उपयुक्त जलवायु होने के कारण हमारे गांव के उत्तर, दक्षिण व पूरब में पातीण बहुतायत में है। अतः छुट्टी के दिन घर से आदेश मिलता कि अपनी सामर्थ अनुसार खाली बोरी ले जाओ और पातीण काट कर लाओ। यह तीन-चार घण्टे का ही कार्य(हॉफ डे टास्क) होता। परन्तु मन मुताबिक साथी मिल गये तो हम पूरा दिन भी लगा लेते एक बोरी पातीण काटने में। बोरी ठूंस ठूंस कर भर देने के बाद उसे जंगल में साफ जगह पर रख कर कभी बाधा दौड़ में बाधा(हर्डल) के तौर पर बोरियों को रखा जाता और दौड़ लगाते। कभी दौड़कर आते और बोरियों के ऊपर कूदते, यानि बोरियां गद्दों के रूप में इस्तेमाल होती। घर लौटते समय जहाँ हल्की ढालूदार साफ जगह मिलती वहाँ बोरियां नीचे रख दी जाती और लातों से बोरी धकियाकर कुछ दूरी तय कर लेते। एक-दो बार ऐसा भी हुआ कि जंगल में दिशा-शौच को गये और पानी नहीं मिला। वापसी पर रास्ते में पातनीदेवी का थान पड़ा तो पातनी देवी अपवित्र न हो जाये, इस भावना से थान से एक निश्चित दूरी बनाने के चक्कर में हाथ-पैर कांटों से बुरी तरह छिल गये। चार-पाँच साल पहले एक शाम चम्पाधार होतेे हुये गांव लौट रहा था तो रास्ते में पातीण की आड़ में एक जोड़ा प्रेमालाप में लीन था। पलायन और घरों में ढोर-डंगर कम होने के कारण जंगल में पातीण के बड़े-बड़े झुरमुट जो हो गये हैं।

Friday, July 01, 2016

मेरी प्यारी घुघुती जैली

         घुघुती का महत्व किसी अन्य क्षेत्र के लिये कितना है कहना मुश्किल है। परन्तु गढ़वाल-कुमाऊँ में घुघुती सबके गले की घुघुती है। चैत-बैसाख की बात हो और घुघुती न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। खुदेड़(विरह) गीतों की बात हो और घुघुती न हो ऐसा भी नहीं हो सकता। घुघुती हमारे लोक में इस तरह रच-बस गयी है कि हम घुघूती के बिना गांव की कल्पना ही नहीं कर सकते। गांव याद आता है तो गांव में घुघुती याद आ जाती है। कभी ओखली के आस-पास, कभी चौक में, कभी बर्तन धोने वाली जगह पर, कभी छत की मुण्डेर पर और कभी आंगन किनारे खड़े पेड़ों पर।
       घुघुती की महत्ता हमारे लिये कितनी है यह आप समझ सकते हैं; बचपन में दादी, नानी अक्सर एक लोरी सुनाया करती थी- ‘‘घुघुती, बासुती, क्या खान्दी, दूधभाती.......’’
       किशोरावस्था में रेडियो पर एक गाना सुनते; ‘‘ना बास घुघुती चैत की, खुद लगीं छ माँ मैत की।......’’.
      पिछली सदी के आठवें दशक में अक्सर गोेपाल बाबू गोस्वामी के स्वर में यह गाना जरूर बजता था; ‘‘आमा की डायी मां घुघुती न बासा, घुघुती न बासा......’’
     फिर नेगी जी का जमाना आया तो उनके स्वर मेें यह गीत प्रायः सुनाई पड़ता; ‘‘घुघुती घुरॉण लगीं म्यारा मैत की, बौड़ी-बौड़ी ऐगे ऋतु ऋतु चैत की।.......’’
      नेगी जी ने तो उपमा केे तौर पर भी घुघुती की सांकी(गर्दन) को महत्ता दी है; ‘‘कख बटि लै होली घुघुती सी सांकी, कख पायी होली स्या छुंयाळ आँखी....’’
       और अब किशन महिपाल जी तो घुघुती वाले इस लोकगीत के साथ माणा से मुम्बई तक धूम मचाये हुये है; ‘‘किंगर का छाला घुघुती, पंगर का डाळा घुघुती, भै घुर घुरॉन्दि घुघुती, फुर उड़ॉन्दि घुघुती......’’
      हिन्दी फिल्म या साहित्य में कबूतर को पत्रवाहक के रूप में दिखाया जाता है। परन्तु गढ़वाल-कुमाऊँ में घुघुती पत्रवाहक नहीं स्वयं सन्देशवाहक के रूप में गीतों में मौजूद है;   ‘....उड़ि जा ऐ घुघुती न्हैं जा लदाख, हाल म्यरा बतै दिया म्यारा स्वामी पास।.....’
या फिर- ‘...मेरी प्यारी घुघुती जैली, मेरी माँजी तैं पूछि ऐली।.......’
      घुघुती हमें कितनी प्रिय है वह इस बात से देखा जा सकता है कि मुम्बई में बसी उत्तराखण्डी एक महिला का ब्लॉग का नाम ही है ‘घुघुती बासुती’।
       कूर्माचल सांस्कृतिक परिषद, देहरादून की स्मारिका का नाम भी है ‘घुघुती’।
        और हिन्दी साहित्य की कहानी, कविता, सम-सामयिक आदि विभिन्न विधाओं पर सतत लेखन करने वाले स्वनाम धन्य विद्वान लेखक देवेश जोशी जी ने अपनी एक किताब का नाम ही रख डाला है ‘घुघुती ना बास’
.         .इससे यह सोच सकते हैं कि घुघुती हमारे लोकजीवन व जनमानस में कही गहरी छाप छोड़े हुये है जिसे आसानी से भुलाया नहीं जा सकता।

Monday, June 13, 2016

और हमारे गांव का सेळ्वाणि सूख गया।

                 पिछले महीने एक शादी के सिलसिले में गांव गया तो भोपाल सिंह भाई जी ने बताया कि सेळ्वाणि सूख गया है। यह अप्रत्याशित तो नहीं था फिर भी मुझे धक्का पहुँचा। लग भी रहा था कि वह सूखने वाला है। क्योंकि इधर कई वर्षों से सेळ्वाणि के ऊपर वाले सैकड़ों खेत बंजर हो गये हैं। जलवाल गांव व खोला गांव के उन खेतों में फसल नहीं बोयी जा रही है और जब फसल नहीं तो न हल चलाया जा रहा है और न सिंचाई ही। फिर वर्षा का औसत भी तो वर्ष दर वर्ष कम हो रहा है। जमीन रिचार्ज कहाँ से होगी? थोड़ा बहुत जो बरसता है वह कब तक रिसेगा?
               सेळ्वाणि अर्थात प्राकृतिक जलस्रोत। जिसे गढ़वाल में धारा या मंगरा भी कहा जाता है। सेळ्वाणि शब्द शायद सेळि शब्द से बना है शायद। सेळि अर्थात ठण्डक पड़ना, सकून मिलना। गरम दोपहरी में ठण्डा पानी मिल जाये तो ‘सेळि पड़गी’ या बच्चा देर से घर लौटे तो ‘अब पड़ी जिकुड़ा सेळि’ अक्सर कहा जाता है। सेळि में पाणी शब्द जुड़ने से ही यह सम्भवतः सेळ्वाणि बना होगा। हमारे गांव का सेळ्वाणि मेरे लिये केवल धारा या मंगरा नहीं था, बल्कि इसके साथ मेरी अनेक खट्टी मीठी यादें भी जुड़ी हैं।

                 पाईप लाईन द्वारा पीने का पानी हमारे गांव में मेरे जन्म से पहले ही पहुँच गया था। गांव के आगे आंगन की तरह फैले खेतों में सिंचाई के लिये तीन नहरें है, पानी की कमी नहीं है। फ्रिज का जमाना नहीं था इसलिये बैसाख-जेठ की प्यास सेळ्वाणि से ही बुझती थी। गरमियों में स्कूल की छुट्टियां होती और सेळ्वाणि पानी लाने की ड्यूटी लड़कों की होती। यह गांव से लगभग आधा मील दूर उत्तर-पश्चिम में गाड(पहाड़ी नदी) के किनारे है। सेळ्वाणि लाने के बहाने अपने-अपने बर्तन लेकर हम शाम को जल्दी ही निकल पड़ते। रास्ते में हमारी बानर सेना लोगों के खेतों से टमाटर, ककड़ी, प्याज या कच्चे आम चुराकर गाड में बड़े-बड़े गंगलोढ़ों पर बैठकर घर से लाये हुये नमक के साथ खाते। लम्बी-लम्बी बातें हांकते, एक-दूसरे से झगड़ते और रोज डेढ़-दो घण्टा बरबाद करके घर लौटते। घर में अक्सर डांट पड़ती। परन्तु हम थे कि कभी नहीं सुधरे। सेळ्वाणि से जुड़ा एक किस्सा और भी है। भाषली गांव के किशोर सिंह पढ़ाई के लिये अपनी फुफू के पास हमारे गांव आया। वह मेरे से एक क्लास सीनियर था। उसके हाथों में एक बार चर्मरोग हो गया। उसके फूफा (स्व0 भगत सिंह खरोला) ने उसे कहा कि वह रोज सुबह सेळ्वाणि जाकर नहाये, जैसे कोई सजा सुना दी हो। परन्तु मजबूरन उसने बात मानी और ताज्जुब कि एक-दो माह में ही रोग दूर हो गया।

         नौकरी के दौरान भी गांव जाने पर मदननेगी आते-जाते मैं सेळ्वाणि में अवश्य रुकता। ठण्डा पानी पीकर वहाँ पर घड़ी भर बैठना भी न भूलता। फिर मन में खयाली पुलाव पकाता कि यदि कभी बहुत सारा धन मेरे पास आ जायेगा तो वहाँ एक-दो अच्छे बाथरूम और शेष पानी को रोककर एक पूल बनाऊँगा, जहाँ पर गांव के लड़के खुल कर नहा सके। परन्तु नौकरी से पेट का गड्ढा ही नहीं भरता कभी। जितना मिले कम ही कम। बहरहाल।

             सेळ्वाणि सूख गया है। घर-घर में अब फ्रिज हैं, इसलिये शायद गांववालों को इसकी कमी नहीं अखरेगी। परन्तु इस तरह हमारे प्राकृतिक जलस्रोत सूख जाना चिन्ता का विषय तो है ही। खेती-बाड़ी से मोहभंग और पलायन का ही परिणाम है यह।

Tuesday, September 29, 2015

रेणुका जी से परशुराम कुण्ड तक (6)

 पिछले अंक से जारी.........
Me ate Meedo, Near Wakro
लोहित किनारे
    तिराप की सीमा से बाहर निकलकर उत्तर की ओर नामसाई पहुँचे। नामसाई नोआ डिहींग नदी के दोनों तटों पर बसा हुआ है। बायें तट वाला भाग डिब्रुगढ़ का हिस्सा है और दायें तट वाला लोहित का। नामसाई-डिब्रुगढ़ निवासी श्रीमती ओमेम देवरी पिछले लम्बे अरसे से राज्यसभा सदस्य हैं। नोआ डिहीगं नदी निरन्तर उत्तर की ओर बहती हुयी लोहित में मिल जाती है। नामसाई में रात्रि विश्राम के बाद अगली सुबह पूरब की ओर अपने गंतव्य स्थल परशुराम कुण्ड को निकल पड़े। लगभग बीस-पच्चीस कि0मी0 पर चौंग्खम गांव हैं। समुद्रतल से एक हजार फीट से भी कम ऊंचाई वाला समतल भूमि पर बसे खामती आदिवासी बहुल इस गावं में चारों ओर हरियाली व उपजाऊ भूमि है। यहां कृषि व बागवानी की प्रबल संभावना है। गांव के ज्यादा लोग राज्य सरकार में उच्च पदों पर सेवारत् हैं। जो गांव में हैं वे भी दो-दो तीन-तीन हाथियों के स्वामी हैं। एक हाथी की कीमत एक टाटा ट्रक से कम नहीं है। अरुणाचल में पेड़ों के कटान के दौरान लकड़ी के बड़े-बड़े टुकड़ों को जंगल से बाहर खींचने का काम  हाथी करते हैं और औसतन एक हाथी प्रतिदिन एक हजार तक कमा लेता है। जबकि एक मजदूर की दैनिक मजदूरी आज मात्र नौ रुपये है। खामती लोगों का नाम प्रायः तीन शब्दों से मिलकर बना होता है। प्रथम शब्द उनकी जाति व स्थानीयता को इंगित करता है दूसरा नाम को और तीसरा उपजाति को। जैसे हमारे पथ प्रदर्शक थे चौंगखम गांव के ‘चाऊ मायासोई नामचूम’। पूरे अरुणाचल में लगभग 39 (उनतालीस) जनजातियां हैं। भारत के अन्य समाजों में आज हरिजन, राजपूत व ब्राह्मण आदि जातीय व्यवस्था होने के कारण ‘तू छोटा, मैं बड़ा’ का जो अहम् है वह अरुणाचल में नहीं है। क्योंकि अरुणाचल जनजातियों में भले ही बंटा हो पर जातियों में नहीं।सांस्कृतिक रीतिरिवाज तथा सामाजिक व धार्मिक क्रियाकलापों की दृष्टि से उनके मध्य अवश्य अदृश्य एकरूपता दिखती है किन्तु भाषाई भिन्नता है। अकेले तिराप जिले के वांग्चू, नोक्टे, सिंग्फू व तंगछा आदि जनजातियों के लोग परस्पर संवाद बनाने के लिए असमियां, हिन्दी या अंग्रेजी को माध्यम बनाती है। हिन्दी फिल्मों की बदौलत हिन्दी का प्रचलन अधिक है जिसके कारण वे हिन्दी को प्राथमिकता देते हैं। किन्तु हिन्दी इस प्रकार कि आदमी सुनकर सिर पकड़ ले। जैसे कि ‘‘ आप कहाँ जाते हैं ?’’ को वे कहेंगे ‘‘आप कहाँ जाता है?’’ आदि आदि। व्याकरण का उन्हें ज्ञान नहीं होता है।
    चौंग्खम में फ्रेश  होने व चाय वाय पीने के बाद फिर आगे बढ़े तो सुदूर उत्तर व पूरब में गिरिराज हिमालय के दर्शन होते हैं और दक्षिण में शिवालिक शृंखला की छोटी छोटी पहाड़ियां। आबादी वाली क्षेत्र वाकरो में कुछ देर रुककर फिर चाय पी। चाय ऐसी चीज है कि इसके बहाने आप कुछ देर सुस्ता भी लेते हैं और आस पास बैठे व्यक्तियों से अपने मतलब की बातें भी पूछ सकते हैं। वाकरो प्रशासनिक दृष्टि से लोहित जनपद का सर्किल हेड क्वार्टर है। आसपास लोगों द्वारा चाय की बागवानी व खेती भी की गयी है। कादुम से धीरे धीरे पहाड़ियों का उठान शुरु होता है। चौंग्खम से तीसेक किलोमीटर दूरी तय कर पहुंचते हैं धार्मिक व पौराणिक महत्व वाले  पवित्र स्थल परशुराम कुण्ड।
       विपुल जल सम्पदा वाली लोहित नदी के बायें तट पर स्थित परशुराम कुण्ड की धार्मिक महत्ता है। दन्त कथा है कि परशुराम ने फरसे से अपनी माँ रेणुका की हत्या कर दी किन्तु माँ के शाप से फरसा उनके हाथ पर ही चिपक गया। श्राप से मुक्ति तथा क्रोध शमन के लिये वे वर्षो तक तीर्थस्थलों में भटकते रहे। ऋषियों की सलाह पर  जब सुदूर उत्तरपूर्व में उन्होंने बह्मकुण्ड में स्नान किया तो शपमुक्त हो सके। तब उन्होंने फरसा जितनी दूर हो सकता था फेंक दिया। मान्यता है कि जहां फरसा गिरा वहां की बर्फ पिघल गयी और वहीं से एक नदी फूट पड़ी जिसे लोहित नदी नाम दिया गया। बह्मकुण्ड ही परशुराम कुण्ड के रूप में विख्यात है। आबादी विहीन वाले इस क्षेत्र में एक मंदिर के अतिरिक्त दो-चार झोपड़ियां ही हैं। न कोई घाट विकसित किया गया है और न ही कोई सराय, धर्मशाला ही। साल में एक बार जनवरी माह में मेला अवश्य आयोजित होता है तो देश विदेश से आये श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ पड़ती है। हम स्नान से निवृत्त होकर साथ लाये गये आहार को लेते हैं और प्रकृति का आनन्द उठाते हैं। उस पार लोहित के मुख्यालय तेजू के लिए सड़क है किन्तु नदी पर पुल बनना पस्तावित है। लोहित नदी घाटियों से निकलकर यहां पर मैदानी भूभाग में प्रवेश करती है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ऋषिकेश में गंगा व टनकपुर में काली।
    आज सकून मिला रेणुका जी से परशुराम कुण्ड तक की यात्रा पूरी हुयी। रेणुका जी हिमाचल के सिरमौर जिले में है और परशुराम कुण्ड यहाँ। लम्बी थकान से चूर होकर नामसाई लौट आये। यह भी अच्छा है कि नामसाई से परशुराम कुण्ड तक सड़क की स्थिति बिल्कुल ठीक है। यहाँ जनजातीय क्षेत्रवासी भी बिल्कुल भोले नाथ की तरह है। सरल, निष्कपट व्यवहार वाले ये लोग अपनी संस्कृति को जीवन्त रखे हुए हैं। ईर्ष्या व द्वेष भाव से कोसों दूर हैं। आदिवासियों में एक बात यह गौरतलब है कि पुरानी पीढी जहां अन्धविश्वास, पिछड़ेपन व निरक्षरता के अन्धकार में है वहीं नई पीढी आधुनिकता के साथ आगे बढ रही है। शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिये अरुणाचल सरकार सुविधायें दे रही है। प्रत्येक गावं में प्राइमरी स्कूल तथा आगे की शिक्षा के लिये शत-प्रतिशत बच्चों को होस्टल सुविधा व होस्टल में कापी किताबों के साथ  आवास व भोजन मुफ्त। रात नामसाईं में बिताकर सुबह जयरामपुर से साथ चल रहे मित्र अनिल कुमार सिंह ने विदा ली क्योंकि उनको मिआओं जाना था और हम शेष लोग तिनसुकिया होते हुए डिब्रुगढ़ पहुँच गये।
     ब्रह्मपुत्र के बायें तट पर स्थित डिब्रुगढ़ एक डिसेन्ट शहर और ऊपरी असम का शैक्षणिक व सांस्कृतिक केन्द्र है। अनेक दर्शनीय स्थलों के अतिरिक्त डिब्रुगढ़ में इंजीनियरिंग व मेडिकल कालेज तथा डिब्रुगढ़ यूनिवर्सिटी स्थित है। उत्तरी असम तथा उत्तरी अरुणाचल जाने के लिए डिब्रुगढ़ में ही फेरी (मोटरबोट) से
ब्रह्मपुत्र पार किया जाता है। विशालकाय इन मोटरबोट में तीन-चार सौ सवारियांे के अतिरिक्त एक ट्रक/बस, तीन जीप/कार व चार-छः स्कूटर आराम से लद सकते है। ब्रह्मपुत्र पार करने में बरसात में तीन साढ़े तीन घण्टे लगते हैं जबकि अन्य मौसम में पांच घण्टे तक का समय। असमियां लोग मूलतः बहुत सरल होते हैं। यह नहरकटिया से ही हमारे साथ चल रहे रोबिन गुगोई के व्यवहार से भी हम जान गये थे। उसने ही बताया कि कभी व्यापारी एक मीटर कपड़ा बेचता तो चारों ओर से नापकर तब उतने मीटर की कीमत वसूलता था। मुस्लिम बहुल पूर्वी पाकिस्तान ;बांग्लादेशद्ध के हिन्दू लोग असम में बड़ी तादाद में आये और उन्होंने व्यापार व सरकारी नौकरियों में आम असमियां लोगों को पीछे छोड़ दिया। जिससे असम में धीरे-धीरे व्यवस्था के प्रति असन्तोष पनप रहा है।
शिव की नगरी शिवसागर की ओर
      डिब्रुगढ़ में ईश्वर के दर्शनों की अभिलाषा से मन्दिर गये। अरुणाचली लोग उत्सवधर्मी होते हैं और जीवित भगवान पर ज्यादा विश्वास करते हैं। जबकि हम तथाकथित सभ्य लोग पत्थर या धातु की मूर्तियों में कैद भगवान पर। डिबूगढ के उत्तरी छोर पर बाढ़ से बचाव के लिये ब्रह्मपुत्र नदी के समानान्तर एक लम्बी सुरक्षा
दीवार बनाई गयी है जिस पर सूर्यास्त के समय घूमना आनन्दित करता है। ब्रह्मपुत्र की विपुल जलराशि में सूर्य की किरणें अटखेलियां करती है तो प्रतीत होता है मानो नदी के सीने पर सोना ही सोना बिखरा पड़ा हो। काजीरंगा नेशनल पार्क देखने के लिये  अगली सुबह शिवसागर के लिये निकल पड़े। रोबिन गुगोई के साथ जीप हमने वापस खोन्सा भेज दी थी। तिनसुकिया से तीन बंगाली मित्र भी साथ थे। नारायण कार, स्वदेश दत्ता और पार्थो भादुड़ी। लगभग सौ कि0मी0 दूरी तय कर शिवसागर पहुंचे।
     शिवसागर असम राज्य की भाषाई व सांस्कृतिक हृदयस्थली भी है। इतिहास पर नजर दौड़ाये तो असम अनेक प्रजातियों का संगम रहा है। सदियों से असम ने सभ्यताओं व संस्कृतियों के वाहक उन समुदायों को शरण दी हैं जो पृथक-पृथक धाराओं से सम्बन्ध रखते थे। इन समुदायों में आस्ट्रेलियन, हब्सी, द्रविड़, इण्डो-मंगोल, तिब्बती-बर्मी एवं आर्य भी थे। इन लोगों ने विभिन्न मार्गों से असम में प्रवेश कर सर्वथा एक नवीन लोक समाज के संयोजन में योगदान दिया। इस नये समाज को ही ‘‘असमिया’’ कहा जाने लगा। तथापि अधिसंख्य असमियां तिब्बती-बर्मी मूल के ही हैं। लगभग छः सौ वर्षों तक असम पर राज्य करने वाले राजा हूण जाति के थे जिन्होने अहोम राज्य स्थापित कर शिवसागर राजधानी बनायी। असम के बिहू नृत्य पर तेरहवीं शताब्दी के हूण संस्कृति की छाप स्पष्ट दिखायी देती है। असम में आज मूलतः बोरा, बरूआ, गोर्हाइं, हजारिका, गुगोई, सैकिया, डेका, महन्त, कालिटा, फुकन आदि उपजातियां ही अपने को ‘‘औरिजिनल’’ असमियां मानती है। यहां के मूल निवासी असम को ‘अखम’ और असमिया को ‘अखमिया’ उच्चारित करते हैं। कोई भी जनपद, प्रान्त व देश राजनीतिक व भौगोलिक दृष्टि से चाहे कितनी ही दूरी पर क्यों न हो परन्तु उनमें परस्पर भाषागत व सांस्कृति निकटता रहती ही है। असम गढ़वाल-कुमाऊं से भले ही दूर है किन्तु  भाषागत समानता रखता है। शिव की नगरी शिवसागर पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व लिये हुए है। शिवसागर सागर के तट पर तो नहीं किन्तु यहां के तीन पौराणिक मंदिर शिवाडोल, विष्णुडोल तथा देवीटोल, जिनका निर्माण सन् 1734 में रानी मदाम्बिका द्वारा करावाया गया, एक विशाल झील के किनारे स्थित अवश्य हैं। शिवसागर में कुछ देर रुककर जोरहाट के लिए चल पड़े जो हमारा अगला पड़ाव है। रात खाना खाने के बाद जोरहाट सिनेमाहॉल में अनिल कपूर अभिनीत ‘मशाल’ फिल्म देखी। लम्बे समय बाद हॉल में सिनेमा देखने का आनन्द लेते हैं।
      सुबह काजीरंगा नेशनल पार्क पहुंचकर स्वागत कक्ष में पार्क शुल्क भुगतान के बाद घूमने के लिए जीप किराये पर ली। चौकसी के लिए पार्क के दो फारेस्ट गार्ड भी साथ भेजे गये बन्दूकें लेकर। उनके ढीले कपडे,
पतला बदन तथा आरामतलब मिजा ज देखकर कुछ देर सोचता रहा कि उनके हाथों में बंदूकें क्यों पकड़ा दी होंगी। खतरा यदि आन पड़ा तो वे हमारी क्या रक्षा क्या करेंगे उल्टे इनकी रक्षा हमें ही करनी होगी। ब्रहमपुत्र के बायें तट पर बसा काजीरंगा नेशनल पार्क एक सींगी गैण्डों के लिये ही नहीं अपितु जंगली भैंसों तथा विभिन्न प्रजाति के पक्षियों के लिये भी विख्यात है। फरवरी का महीना होने के कारण अधिक तो नहीं किंतु लगभग सौ गज दूरी से एक सींगी गैंडे व जंगली भैंसों के झुण्ड का दर्शन हो गये थे। गैण्डों का एक सींग इनकी खूबसूरती नहीं, सुरक्षा नहीं बल्कि अभिशाप ही है। सींग हथियाने के लिये असामाजिक तत्वों द्वारा गैण्डों की हत्यायें हमेंशा ही की जाती रही हैें। जिससे इनकी संख्या में निरन्तर गिरावट आ रही है। लगभग 450 वर्ग कि0मी0 में फैले विशाल काजीरंगा पार्क आधा अधूरा घूमने के बाद शाम को सभी बंगाली मित्र वापस लौट गये और हम गोहाटी की बस पकड़ने चले गये।                   
                                                                                                                             समाप्त

Monday, September 28, 2015

रेणुका जी से परशुराम कुण्ड तक (5)

 पिछले अंक से जारी..........
शरणार्थियों का बाजार है मिआओं
         मिआओं कस्बा प्रशासनिक दृष्टि से ई0ए0सी0 (एक्स्ट्रा असिस्टेण्ट कमीश्नर) हेडक्वार्टर है। राज्य सरकार के अनेक कार्यालय, हायर सेकेण्ड्री स्कूल, बैंक, सी0आर0पी0 कम्पनी आदि हैं। सी0आर0पी0 के एक जवान से परिचय होता है तो वह बताता हैं कि गत वर्ष तक यहां पर विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित स्व0 दरबान सिंह के पुत्र श्री नारायण सिंह नेगी कम्पनी कमाण्डर के रूप में तैनात थे। नेगी जी दबंग और कानूनप्रिय अफसर थे। रात्रि पी0डब्लू0डी0 विश्राम गृह में बितायी। अरुणाचल में जिलों के नाम नदियों पर हैं उसी भांति इस विश्राम गृह के कमरे भी तिराप जनपद की नदियों के नाम से हैं। जैसे- नामचिक, रीमा, तिराप आदि। नदियों का संगम हमेशा ही देखा किन्तु विपुल जलराशी वाली डिहीगं नदी को दो भागों में बंटा यहीं देखा। मिआओं वासियों ने बताया कि 1897 के विनाशकारी भूकम्प में जमीन पर दरार के कारण डिहींग नदी दो भागों में बंट गयी, जो पूर्ववत बही उसे बूरी (अर्थात बूढी) डिहींग और लम्बवत बहने वाली नई को नोआ (नूतन) डिहींग कहते हैं।
    तिब्बत से भारत के मैत्रीपूर्ण सम्बंध थे और व्यापारिक प्रगाढता भी। तिब्बत रहते हुये भारतवर्ष की उत्तरी सीमा पूरी तरह सुरक्षित थी। परन्तु चीन ने तिब्बत को निगल लिया। तिब्बत की निर्वासित सरकार को भारतवर्ष में शरण दे दी गयी  और तिब्बतियों को शरणार्थियों के रूप में रहने की स्वतन्त्रता। भारत के सीमान्त क्षेत्रों में आज भी लाखों तिब्बती शरणार्थी रह रहे हैं, जिनमें नेफा भी है। मिआओं के पश्चिम में तीन-चार किलोमीटर पर तिब्बतियन रिफ्यूजी कैम्प है जो खुशहाल व एक भरा-पूरा गांव है। स्थानीय तंग्छा गांवों की अपेक्षा काफी बड़ा है। प्रचुर खेती, बौद्ध मन्दिर, मिडिल स्कूल और कार्पेट बुनाई केन्द्र यहाँ पर है। भारत सरकार तिब्बतियों को भारत की नागरिकता के अतिरिक्त लगभग सभी प्रकार की सुविधायें प्रदान कर रही है। 1960 के आसपास ही बंाग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) के चिट्टगांव की पहाड़ियों और मेमन जिलों से हजारों बौद्ध धर्मावलम्बी चकमा व हाजोंग जनजाति के लोग पूर्वोत्तर भारत में आये। मिआओं, डायून में चकमा व हाजोंग भी हजारों की संख्या में शरणार्थी जीवन यापन कर रहे हैं। बड़ी संख्या में तिब्बती और चकमा आदि शरणार्थियों के बस जाने के कारण यहां का सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक जीवन पूरी तरह प्रभावित हुआ है।
    मिआओं से आगे सुदूर पूरब में विजयनगर कस्बा है (भारत के मानचित्र पर नजर दौड़ायें तो विजयनगर उस बिन्दु पर पडे़गा जहां भारत-बर्मा सीमा पर चौकान पास है।) अरुणाचल के प्रथम उप राज्यपाल श्री के0 ए0 ए0 राजा की प्रेरणा से मिआओं से विजयनगर तक मीलों लम्बी सड़क बनी तो है किन्तु वर्षा की अधिकता व लगभग आबादी विहीन क्षेत्र होने के कारण इस सड़क का मरम्मत कार्य बन्द हैै। विजयनगर जिला तिराप का ही अंग है। जाने का अवसर तो नहीं मिला पर कुछ लोग बताते है कि विजयनगर कस्बा मूलतः भारत के गढ़वाल, कुमाऊँ सहित विभिन्न प्रान्तों के सेवानिवृत्त सैनिकों द्वारा बसाया गया है जिससे विजयनगर में सम्पूर्ण भारतवर्ष की सांस्कृतिक झलक देखने को मिलती है। वर्तमान में विजयनगर केवल हवाई मार्ग से जुड़ा है।  मिआओं-विजयनगर मार्ग पर ही डिहींग नदी के दोनों ओर मीलों तक फैला हुआ ’नामडफा नेशनल पार्क’ नाम से एक ’टाईगर प्रोजेक्ट’ है।   
    एक दिन मिआओं में बिताकर अगली सुबह मिआओं से डिहींग की विभिन्न धाराओं पर लकड़ी की लम्बी-लम्बी बल्लियों व बांस की खपच्चियों से बने हैं कई छोटे-छोटे पुलों से होकर बूरी डिहींग नदी पार की और डायून की ओर बढ गये। इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि मार्गेरिटा से आगे पूरब में डिहींग नदी पर कहीं भी एक भी पक्का या स्थायी पुल नहीं है, जिससे डिहींग के दोनों ओर के आबादी युक्त क्षेत्र बरसात में असम्पृक्त रहते हैं। तब मिआओं से मात्र दस-बारह कि0मी0 दूरी पर स्थित डायून व बरदुम्सा को असम से होते हुये सौ-डेढ़ सौ कि0मी0दूरी तय कर ही पहुंचा जाता है। डायून एक छोटा सा गांव है और धीरे-धीरे एक कस्बे में परिवर्तित होता जा रहा है। डायून में एक प्राईमरी स्कूल और छोटा सा बाजार है। यहां प्लाईवुड मिल के स्वामी गांधी उपनाम वाले व्यक्ति से मुलाकात  हुयी। मिआओं-डायून मार्ग में चकमा व हाजोंग जनजातीय लोगों, की बस्तियां हैं। बांस/लकड़ियों के बने घर, अपने हाथों से बनाए हुए बेंत के फर्नीचर, कार्पेट, साफ-सुथरे आंगन, आस-पास थोड़ी बहुत खेती भी। मूल आदिवासियों की अपेक्षा हाजोंग व चकमाओं का रहन-सहन शालीन व साफ सुथरा है। आजीविका के लिये ये लोग बंेत के फर्नीचर व कार्पेट का व्यापार करते हैं।  
    अरुणाचल वन विभाग में कार्यरत् एस. चक्मा घर पर थे। उन्होंने बैठने के लिए कहा तो इटावा निवासी मित्र अनिल कुमार सिंह ने तुरंत हामी भर दी। चाय पीने की इच्छा हो रही थी। काफी देर तक इधर उधर की बातों के बाद एस. चक्मा ने भरे गले से बताया कि सरकार तिब्बती शरणार्थियों की भांति हाजोंग व चक्माओं को
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सुविधा नहीं दे रही। न आवागमन के साधन, न शिक्षा और न ही चिकित्सा। शिक्षा व उपचार हेतु छः-सात माह निकटस्थ कस्बे मिआंओ तो जा सकते हैं किंतु बरसात में वह भी संभव नहीं है। रोज चार-पांच किलोमीटर चलकर बच्चे प्राथमिक शिक्षा डायून में पा लेते हैं किंतु आगे वे नहीं पढ़ पाते हैं। वे प्रार्थना करते हैं कि विशाल व्यक्तित्व वाले दलाईलामा की भांति कोई उनका धार्मिक व राजनैतिक नेता बने। अंधकारमय व त्रासदीपूर्ण जीवन जी रहे इन चक्मा शरणार्थियों के मन में यह भय कहीं गहरे तक है कि हो सकता है कि अरुणाचल सरकार कभी भी उन्हें राज्य छोड़ने का फरमान जारी कर सकती है। सहानुभूति के दो बोल कहकर द्रवित हृदय लिये हम लौट पड़े।                शेष अगले अंक(6) में...............

Saturday, September 05, 2015

फिल्म समीक्षा - मांझी : दि माउण्टेन मैन

        किसी भी फिल्म की सफलता के लिये आवश्यक होता है कुशल निर्देशन, मंझे हुये सितारे, एक अच्छी कहानी, बेहतरीन पटकथा, कसे हुये संवाद, कर्णप्रिय गीत-संगीत आदि आदि। परन्तु कभी कुछ फिल्म केवल कुशल निर्देशन या अच्छी कहानी या बडी स्टार कास्ट या गीत-संगीत के बल पर भी चल पड़ती है। और कभी सब कुछ ठीक-ठाक होने के बावजूद भी फिल्म अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाती है। ऐसे कई उदाहरण है जब बड़े बजट की फिल्म बॉक्स आफिस पर लुढ़क गयी और छोटे बजट की फिल्म झण्डे गाड़ गयी, दर्शकों की वाहवाही बटोर ले गयी।
    केतन मेहता द्वारा निर्देशित और नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राधिका आप्टे, पंकज त्रिपाठी, गौरव द्विवेदी, अशराफुलहक, दीपा साही, तिग्मांशु धूलिया, प्रशान्त नारायण आदि द्वारा अभिनीत फिल्म मांझी: दि माउण्टेन मैन की रिलीज के दिन से ही देखने की उत्सुकता थी, परन्तु देखकर निराशा ही हाथ लगी।  होली, सरदार, भवनी भवाई, मिर्च मसाला, मंगल पाण्डे: द राईजिंग व रंग रसिया जैसी एक से एक बेहतरीन फिल्म देने वाले केतन मेहता जी शायद अबकी चूक गये। लगा जैसे इस फिल्म में सारी जिम्मेदारी नवाजुद्दीन सिद्दीकी और राधिका आप्टे केे कन्धों पर डालकर वेे चुपचाप जाकर कैमरे के पीछे बैठ गये। इतनी चर्चित और दमदार कहानी हाथ आने और अभिनय के क्षेत्र में अपना लोहा मनवा लेने वाले कलाकार साथ होने के बावजूद फिल्म में कहीं कोई कसाव नहीं, कहीं गति नहीं, कोई रवानगी नहीं। फिल्म देखते समय यह उत्सुकता ही नहीं जागती कि अब आगे क्या होगा, आगे क्या होगा। जैसा कि अमूमन हर फिल्म देखते हुये या कहानी-उपन्यास पढ़ते हुये होता है। हॉल में अन्तिम समय तक इसलिये बैठे रहे कि घर से इस बहाने निकले हुये थे और फिर टिकट खरीद रखी थी।
     -गांव में एक हरिजन पुरूष के जूते पहन लेने पर दबंग सवर्णों द्वारा उसके पांव काट दिये जाते हैं। परन्तु कोई आक्रोश नहीं, कोई प्रतिकार नहीं। यहाँ तक कि गांव में दबी जुबान भी कोई चर्चा नहीं करता। बीसवीं सदी की नहीं चौदहवीं-पन्द्रहवीं सदी की घटना हो जैसे।
     -बचपन में घर से भाग जाने के बाद दशरथ मांझी सात साल बाद जब गांव लौटकर आता है तो सवर्णों द्वारा उसकी पिटाई कर दी जाती है परन्तु उसके चेहरे पर पीड़ा नहीं दिखायी देती और न ही कोई आक्रोश झलकता है। इस घटना को बिल्कुल सहजता से ले लेता है वह।
     -गहलोर गांव की सामाजिक व आर्थिक स्थिति का फिल्मांकन कमजोर है जबकि मदर इण्डिया की भांति उनकी निर्धनता को बेहतरीन ढंग से दर्शाया जा सकता था। यहाँ तक कि शादी के बहाने उस क्षेत्र के लोकगीत, लोकनृत्यों को फिल्माये जाने की संभावना थी। परन्तु निर्देशक चूक गये।

     -हासिल, मकबूल, पान सिंह तोमर आदि फिल्मों का निर्देशन कर और गैंग्स ऑव वासेपुर फिल्म में अपने अभिनय का लोहा मनवा लेने वाले तिग्मांशु धूलिया की भूमिका प्रभावहीन रही। न कहीं कोई रौब, न ठाकुरों जैसी अकड़। बिल्कुल भावहीन चेहरा।
    -नायिका के पहाड़ से फिसल जाने के बाद नायक द्वारा उसे जिस तेजी से अस्पताल पहुँचाया जाता है वह तो फिल्म के अनुरूप है। परन्तु अस्पताल में नायक की न तड़प देखी गयी न आशमान सिर पर उठा देने की वेदना और न ही दहाड़ मार कर रोना। बल्कि एक कोने में अपराधी सा बैठकर चुपचाप टुकुर-टुकुर देखना।
    - तकनीकी तौर पर देखें तो खामियां नजर आती है जैसे कि नायक का पिता
(अशराफुलहक) शुरू से अन्त तक बिल्कुल उसी मेकअप में नजर आता है। वह बुढ़ाता ही नहीं है। जबकि फिल्म में नायक के बचपन से लेकर बूढ़े होने तक की कहानी है।
    -सर्वविदित है कि राजनीतिक दल कांग्रेस द्वारा केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार की विफलता के बाद ही सन् 1980 के चुनाव में हाथ को चुनावचिन्ह बनाया गया था। परन्तु फिल्म के एक दृश्य में आपातकाल से पहले ही इन्दिरा गांधी द्वारा ‘हाथ’ को मजबूत करने की अपील जनता से की जा रही है। 
   -नायक के बजीरपुर से पैदल ही दिल्ली कूच करने पर तेरह सौ किलोमीटर लम्बे रास्ते की कठिनाइयों को उभारा
नहीं गया है।
   -गांव के मुखिया व बीडीओ द्वारा रुपये हड़प लिये जाने को मीडिया नहीं उठाता है। यहाँ तक कि पूरा पहाड़ काट लेने पर रास्ता बन जाने को भी मीडिया ज्यादा तवज्जो देता नहीं दिखायी देता।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी और राधिका आप्टे द्वारा अपने अभिनय के बल पर फिल्म को सफल बनाने की पूरी कोशीश की गयी है किन्तु निर्देशक थोड़ा मेहनत करते थे तो निश्चित तौर पर यह फिल्म शेखर कपूर की ‘बैंडिट क्वीन’ से आगे की श्रेणी में रखी जा सकती थी।