Wednesday, September 07, 2016

भगतु व पत्वा गोर्ला रावत (समय- 17वीं शताब्दी का अंतिम अंश)

             गढ़वाल के भडों(वीरों) में इन दो जुड़वाँ भाइयों का ऊँचा स्थान है। गोर्ला वंश डोटी व काली कुमाओं में अधिकारहीन होने के बाद गढ़वाल राज्य की शरण में आया था और उसे चौन्दकोट परगने के गुराड़ गाँव में निवास दिया गया था। वहां पहले गुराड़ी नेगी थोकदार थे। लेकिन किसी कारणवश उन्हें पूर्वी नयार के समीप चौमासु आदि गांवों में नेग दे दिया गया और उनकी थोकदारी गोर्ला वंश के प्रथम आगुन्तक भड़ को दे दी गयी। धीरे धीरे उस वंश को कई गांवों की थोकदारियां प्राप्त हो गयी। लेकिन कोई ठोस इलाका अर्थात (पट्टी) उनके पास नहीं थी। अपने बुद्धि चातुर्य तथा वीरता से उनका गढ़वाल के राजवंश से वैवाहिक सम्बन्ध हो गया और दरबार में उनका दबदबा इतना बढ़ गया कि ‘‘भैर गोर्ला, भितर गोर्ला, अर्ज विनती कैमू कर्ला’’ की कहावत प्रचलित हो गयी। उसी वंश के थोकदार के घर में गुराड़ गाँव में इन दो जुड़वाँ भाइयों का जन्म हुआ था।
               इनके बड़े होने पर गृह-कलह की आशंका पैदा हो गयी। यद्यपि ये दो भड़ बड़ी माता के पुत्र थे, लेकिन छोटी माता का पुत्र इनसे जेठा था। अतः इस बात को लेकर कि जेष्ठत्व पत्नी का माना जाना चाहिए या पुत्र का- एक मतभेद पैदा हो गया। इनके विपक्ष में एक तर्क यह भी था कि जुड़वाँ होने के कारण थोकदारी को दो बराबर भागों में विभाजित करना होगा। आखिर यह सारा मसला गढ़वाल के महाराज के सम्मुख पेश किया गया। उन्होंने सब तर्कों पर विचार करके यह बुद्धिमतापूर्ण निर्णय दिया कि गुराड़ की थोकदारी तो उम्र में ज्येष्ठ पुत्र को ही मिलनी चाहिए। लेकिन अगर ये जुड़वाँ भाई पूर्वी सीमा पर जाकर कुमाउंनी सरदार का सिर काट लायें तो गुजडू व खाटली की थोकदारी इन्हें दे दी जाएगी। उन दिनों एक कुमाउंनी सरदार ने उस इलाके में आतंक व अत्याचार मचा रखा था और वहां का तत्कालीन थोकदार उसका मुकाबला नहीं कर पा रहा था।
बस इन दो भड़ों को क्या चाहिए था? ये तो अपनी वीरता प्रदर्शित करने के लिए उत्सुक थे ही। अतः उन्होंने एक शुभ दिन अपनी वीर माता के साथ गुराड़ से विदाई ली और पूर्वी सीमा की ओर प्रस्थान किया। वहाँ जाकर उन्होंने जनता का मजबूत संघटन तैयार किया और कांडा (पट्टी खाटली) में अपना केंद्र स्थापित किया। आखिर सब तैयारी करके एक दिन कुमाउनी फौज से इनकी भिड़न्त हो गयी। ये बड़ी बहादुरी से लड़े और कुमाउनी फ़ौज भगा दी गयी। उसके बाद उसने उस इलाके की ओर कभी भूल कर भी नजर नहीं उठाई। इनके भी कई साथी वीरगति को प्राप्त हुए और ये जख्मी दशा में उस कुमाउनी सरदार का सिर लेकर श्रीनगर दरबार में उपस्थित हुए। महाराज ने इनकी भूरी भूरी प्रशंसा की और चूंकि प्रत्येक भड़ पर ४२ -४२ घाव आये थे, अतः इन्हें उतने ही गांवों की थोकदारी प्रदान की गयी।
                    इस प्रकार विजय प्राप्त करके और महाराज से पुरस्कार पाकर श्री भगतु गोर्ला ने सिसई (पट्टी खाटली) में और पत्वा गोर्ला ने पड़सोली (पट्टी गुजडू) में अपने केंद्र स्थान निश्चित किये तथा भविष्य में दक्षिण-पूर्वी सीमा की जोरदार रक्षा की। इनके वंशज आज भी विद्यमान है। श्री भगतु गोर्ला के वंशजों में श्री उमेश्वर सिंह, डिप्टी कलेक्टर प्रमुख हैं। श्री पत्वा गोर्ला के वंशजों में श्री विष्णु सिंह रावत, संचालक- वीविंग फैक्टरी कोटद्वार तथा श्री नारायण सिंह रावत सदस्य जिला बोर्ड प्रमुख हैं.

                                                                           (स्रोत साभार- गढ़वाल की दिवंगत विभूतियाँ -डॉ0 भक्तदर्शन ! संस्करण- 1952  )

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