Wednesday, December 26, 2012

कुमाऊँ - 3 (भगवान बागनाथ जी के चरणों में)


यात्रा संस्मरण  
 बागेश्वर- सरयू नदी का फैलाव और गोमती का संगम 
            ईश्वर को प्रणाम कर, भोजन बागेश्वर में किया जाय यह सोचकर हम आगे बढ़ते हैं. बैजनाथ से कुछ दूरी पर से एक रास्ता बायीं ओर बदरीनाथ को जाता है और दूसरा बागेश्वर को. यहाँ से निरंतर चढ़ाई चढ़ते हुए अठारह किलोमीटर दूरी पर चमोली जिले का एक हिल स्टेशन है ग्वालदम. समुद्रतल से लगभग 2000 मीटर ऊँचाई पर होने के कारण सर्दियों में जमकर हिमपात होता है जो सैलानियों को आकृषित करता है. हल्द्वानी, नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर आदि जगहों से बदरीनाथ जाने वाले लोग ग्वालदम होकर जाते हैं. ग्वालदम का सौन्दर्य प्रकृति प्रेमी को बरबस अपनी ओर आकृषित करने वाला है. हम गोमती नदी के बाएं तट पर बागेश्वर की ओर आगे बढ़ते हैं. समशीतोष्ण जलवायु वाली चौड़ी व इस रमणीक घाटी में गाँव काफी पास-पास हैं और जनसँख्या घनत्व ठीकठाक है. पहाड़ों में बढ़ते पलायन को देखते हुए कहा जा सकता है कि गगास घाटी और यह कत्यूर घाटी अपवाद है. गांवों में हलचल दिखती है. पुरुषों की भागदौड़, महिलाओं की खिलखिलाहट और बच्चों की धमाचौकड़ी से जीवन्तता आज भी बनी हुयी है. कत्यूरी शासन काल में राजधानी होने के साथ साथ कारण यह भी है कि बसासत के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध है. चारा व जलावन लकड़ी हेतु गाँव के पीछे पहाड़ियों पर घना जंगल, आस पास अपेक्षाकृत समतल कृषि योग्य प्रचुर भूमि तथा आवागमन के लिए चौड़ी सड़कें. तीन ओर पहाड़ियां होने से पानी की कमी भी कदाचित ही होती होगी. और सबसे मुख्य यह भी कि गाँव लगभग समतल भाग या हल्की ढलान वाली भूमि पर होने के कारण न भूस्खलन का खतरा है और न ही पहाड़ियों से मलबा गिरने का भय. सड़क के दोनों ओर बसे गांवों में केले, आम, खुबानी और नाशपाती के फलदार पेड़ों की कतारें मन मोह लेती है. नाशपाती के लकदक पेड़ों को देखकर मेरी बेटी ललचाती है और एकाध नाशपाती तोड़ लाने की जिद पकडती है. मना करता हूँ और किसी तरह ही उसे मना पाता हूँ.             
भगवान बागनाथ जी का मन्दिर (पार्श्व ओर  से )
             चालक राणा जी कई वर्षों तक लम्बी दूरी की बसों में ड्राइविंग करता था. इसलिए उसे हमेशा मंजिल पर पहुँचने की जल्दी रहती है. मना करते हैं कि हम लोग घूमने के मकसद से ही घर से निकले हैं इसलिए हमें कहीं पहुँचने की कोई जल्दी नहीं है. जहाँ रात होगी वहीँ पर रुक जायेंगे. नदी के दोनों ओर खेतों में किसानों ने धान की नर्सरी उगा कर खेत के शेष हिस्से में जुताई भी कर दी है. आशमान बरसेगा तो रोपाई कर देंगे. जून का अंतिम सप्ताह चल रहा है किन्तु बारिस का इन्तेजार ख़त्म नहीं हुआ. चाय पीने की इच्छा से सड़क किनारे गाडी रोकते हैं. एक अधेड़ व्यक्ति से हाल चाल पूछता हूँ तो जबाव मिलता है ठेठ कुमाउनी लहजे में " ..... कहाँ हो, इस साल बारिस हुयी ही कहाँ ठहरी, खेतों की तो छोड़ो पीने के पानी का अकाल पड़ा हुआ ठहरा ......"  नीचे गोमती में पानी की एक पतली सी धारा मात्र कहीं कहीं दिखाई दे रही थी और उसके सीने पर बेतरतीब बिखरे छोटे बड़े पत्थर शीशे की मानिंद चमक रहे थे. सन 2003 में सितम्बर माह में यहाँ से गुजरा था तो गोमती नदी किसी अल्हड़ युवती की भांति इठलाती इतराती आगे बढ़ रही थी. नदी किनारे तब कई मछुवारे बगुला बने बैठे थे. गोमती का यह सूखा रूप उदास कर गया. धीरे धीरे रास्ते में कमेरा और कमेड़ी गाँव होते हुए हम बागेश्वर पहुँचते हैं जो कि बैजनाथ से मात्र 23 किलोमीटर की दूरी पर है.
                           बागेश्वर जिला मुख्यालय है. गोमती व सरयू नदी के तट पर निर्मित बागनाथ जी का मन्दिर यहाँ का मुख्य आकर्षण है. बागनाथ भगवान शंकर का ही एक रूप है. बागनाथ जी के नाम से ही इस जगह का नाम बागेशुर पड़ा, जो कालांतर में बागेश्वर हो गया. मन्दिर का मुख्य द्वार उत्तर दिशा में है जहाँ तक पहुँचने के लिए एक सात-आठ फीट चौड़ी सड़क से गुजरना होता है. इस सड़क के दोनों ओर पूजा प्रसाद और श्रृंगार सामग्री आदि का बाजार सजा रहता है. खूब चहल पहल है. कहीं होटल में बैठकर गाँव से आये स्त्री पुरुष जलेबी, समोसा खा रहे थे तो कहीं औरतें हाथो में रंग बिरंगी चूड़ियाँ पहन रही थी. मै पत्नी को बाजार से चूड़ी, बिंदी  खरीदने को कहता हूँ तो वह मुंह बिचका कर आगे बढ़ जाती है. मन्दिर के दक्षिण में गोमती नदी है और पूरब में सरयू. जिन पर स्नानघाट बनाया गया है और पास ही गोमती-सरयू का संगम है. सरयू का जलागम क्षेत्र अधिक होने के कारण इसमें गोमती की अपेक्षा अधिक जलराशि है। मकर सक्रांति को लगने वाला उत्तरायणी मेला बागेश्वर का ही नहीं पूरे कुमाऊँ का प्रसिद्द मेला है. जिसमे
उत्तरखंड की समृद्ध संस्कृति की झलक दिखाई देती है. सरयूं नदी के दोनों ओर बाजार सजता है. मै परिवार सहित मन्दिर के उत्तरी द्वार से प्रवेश करता हूँ. मन्दिर में इक्का दुक्का लोग दिखाई दे रहे थे. भीतर पूजा अर्चना के लिए पुजारी नहीं दिखाई देते हैं तो मै बाहर आता हूँ उसी वक्त एक स्त्री मन्दिर में आती है. मै उस पर गौर नहीं करता हूँ, सोचता हूँ  दर्शनार्थ आई होगी. मै परिवार सहित बाहर ही खड़ा रहा कि कोई पुजारी आयेंगे. तो वह कुमाउनी स्त्री आवाज लगाती है " आईये, आईये !" हम आश्चर्य करते हैं तो फिर वह कहती है -"आईये, मै ही पूजा कर देती हूँ. आज स्त्रियाँ जब हवाई जहाज तक चला रही है तो क्या मै मन्दिर में पूजा नहीं कर सकती? " रावल लोग ही इस मन्दिर के पुजारी हैं और व्यवस्था भी देखते हैं. लोक धारणा है कि यदि कभी सरयू बरसात में विकराल रूप धारण करती है तो मन्दिर का रावल सरयू पुल से कूद कर बागनाथ जी से विनाश को रोकने की प्रार्थना करता है और यह बागनाथ जी की ही महिमा है कि उफनती नदी में कूदे रावल भी बच जाते हैं और मन्दिर व बागेश्वर भी. पूजा से निवृत्त होकर हम सभी बाहर आकर दीवार के सहारे बैठ जाते हैं. बाहर एक पंडित जी फर्श पर पालथी मर कर बैठे हुए थे और गाँव के एक दम्पति को उनकी कुंडली में देखकर राहू, केतु, शनि की दशा और ग्रहों का योग समझा रहे थे, साथ ही निवारण की विधि भी.
धर्म कर्म में लीन पण्डित जी और चिन्तित यजमान 
                     उनकी ओर पीठ कर मै पत्नी से इस मन्दिर की ऊँचाई नजरों से नापने को कहता हूँ. सन 1450 में कुमाऊ के राजा लक्ष्मी चन्द द्वारा ग्रेनाईट व नीस पत्थरों से निर्मित और काष्ट छत्र वाला 90 फीट ऊंचा यह मन्दिर आज भी भव्य है, मन्दिर में पूजा कक्ष व बरामदा आकार में इतना बड़ा है कि एक साथ पचास से अधिक लोग खड़े होकर पूजा कर सकते हैं. मन्दिर के चारों ओर भी
सैकड़ों भक्त खड़े हो सकते हैं. मन्दिर थोड़ा बहुत मरम्मत व सफाई मांग रहा है. गोमती की घाटी सरयू की अपेक्षा कुछ संकरी है इसलिए आबादी सरयू के तट पर ज्यादा है. लेकिन दुखद यह है कि आबादी जिस क्षेत्र में बसी है वहां कभी धान की फसलें लहलहाती थी. घाटी में होने और समुद्र तल से ऊँचाई मात्र 1000 मीटर होने के कारण बागेश्वर में काफी गर्मी पड़ती है. माना जाता है कि बागेश्वर के पूरब और पश्चिम दिशा में भीलेश्वर व नीलेश्वर पर्वत हैं तो उत्तर दिशा में सूरज कुण्ड तथा  दक्षिण में अग्निकुंड अवस्थित है. घूमते हुए शाम हो गयी थी अतः आज यहीं रुकने के इरादे से होटल की तलाश शुरू करते हैं ताकि कल की यात्रा के लिए तरोताजा रह सकें.                                                                                                                                                                                      क्रमशः  - - - - -     

Friday, December 21, 2012

कुमाऊँ - 2 (कत्यूर घाटी का सौन्दर्य)

यात्रा संस्मरण  
हिमालय विलेज रिसोर्ट में चायबागान देखती बिमला रावत 
         कत्यूर घाटी का सौन्दर्य  मैदानी इलाके जून के अंतिम सप्ताह तक भी दहक रहे थे. ऐसे में रानीखेत और कौसानी जैसे हिल स्टेशन स्वर्गिक आनंद देते हैं. कौसानी से उत्तर की ओर चलने पर कुछ सर्पाकार मोड़ों के बाद हम चाय बगीचों के बीच से गुजरते हैं. हलकी ढलान लिए असिंचित सीढ़ीदार खेतों पर तैयार किये गए इन चाय के बगीचों के पार्श्व में देवदारु, बांज व चीड़ के जंगल मनमोहक लगते हैं. आज हमारी यात्रा थी कौसानी से बागेश्वर तक. सड़क के दोनों ओर ठेठ कुमाउनी काष्ट  कला के द्योतक सुन्दर मकानों वाले गाँव हैं. सड़क के दायीं तरफ नीचे ढलान की ओर एक क्राफ्ट सेंटर है. और कुछ आगे ही कौसानी से लगभग छ किलोमीटर दूरी पर बाईं ओर उत्तराखण्ड (कौसानी) टी एस्टेट है और उसके मध्य है टी फैक्ट्री. पास ही सड़क किनारे एक दुकान पर हम गए तो वहां पर फैक्ट्री की चाय अलग-अलग वैरायटी व अलग-अलग वजन के पैकेट में बिक रही थी. अच्छी लगी तो एक पैकेट मैंने भी ले लिया 'गिरियास टी' ब्रांड के नाम से. तुलनात्मक तौर पर देखा जाय तो अयारतोली चाय बगीचा यहाँ पर सबसे बड़ा है. चाय बगीचों का इतिहास उत्तराखण्ड में काफी पुराना है. माना जाता है कि गढ़वाल, कुमाऊँ की पहाड़ियों में चाय बागान लगाने की शुरुआत ब्रिटिश शासकों द्वारा सन 1836 में शुरू की गयी. डैंसी, व्हीलर आदि प्रमुख अंग्रेज अफसर थे जिन्हें यह श्रेय जाता है. ब्रिटिश शासन काल अर्थात बीसवीं सदी के मध्य तक उत्तराखण्ड में आठ हजार हेक्टेअर भूभाग में चाय बागान थे जो कि सदी के अंतिम दशक तक मात्र पांच सौ हेक्टेअर तक ही रह गए. 
                      गर्मियों की सुबह कौसानी के आँचल में हो तो फिर क्या कहना. बदलियां पिछली शाम से ही आशमान में दिखाई दे रही थी. किन्तु बरसने की उम्मीद बाकी थी. धीरे धीरे आगे बढ़ते हैं. हलकी ढलान ख़त्म होती है और समतल भूभाग में हमारी गाड़ी सरपट दौड़ रही है कि गरुड़ कस्बे में पहुचते हूँ. सन 2003 में गरुड़ में दो दिन रुका था किसी काम के सिलसिले में. नौ साल में काफी कुछ बदल जाता है. स्वतंत्रता पूर्व गरुड़ मण्डी हुआ करती थी. ग्वालदम, चमोली, बागेश्वर और सम्पूर्ण कत्यूर घाटी क्षेत्र के लिए। छोटे व्यापारी यहीं से माल खरीदकर खच्चरों में लाद कर ले जाते थे. आज आवागमन के साधन अच्छे हो गए, जिससे सामान मैदानी क्षेत्रों की मंडियों से सीधे छोटे दुकानदारों तक पहुच रहा है. तथापि आज भी गरुड़ में छोटी गाड़ियों और खच्चरों में सामान ढोते हुए देखा जा सकता हैं. (वर्तमान में गरुड़ बागेश्वर जिले की एक तहसील है) परन्तु जैसे कि नगरों-महानगरों में अतिक्रमण और अनुशासनहीनता की स्थिति है, वह गरुड़ में भी
गरुड़ गंगा व बैजनाथ का विहंगम दृश्य 
है. सड़कें अतिक्रमण के कारण संकरी हो रही है और लोगों ने जहाँ तहां गाड़ियाँ खड़ी कर जनता को परेशान करने का जैसे मन बना रखा हो. कभी रेंगते और कभी दौड़ाते हमारे चालक महोदय गाड़ी को गरुड़ से बाहर निकाल लेते हैं. और शीघ्र ही हम दो कि0मी0 दूर ऐतिहासिक स्थल बैजनाथ पहुँचते हैं.
                गोमती नदी के बाएं तट पर स्थित यह मन्दिर समूह उत्तराखण्ड के इतिहास में प्रमुख स्थान रखता है. माना जाता है कि कत्यूर शासकों द्वारा आठवीं शताब्दी में राजधानी कार्तिकेयपुर (जोशीमठ) से बैजनाथ स्थानांतरित की गयी. यहाँ पर नागर शैली में निर्मित मुख्य मन्दिर शिव को समर्पित होने के साथ साथ सत्रह और मन्दिर हैं. जो विभिन्न पौराणिक देवी देवताओं - सूर्य, चंडिका, ब्रह्मा, गणेश, पार्वती, कुबेर आदि को समर्पित है. मुख्य मन्दिर का शिखर भाग ध्वस्त होने के कारण वर्तमान में धातु की चादर से तैयार किया गया है. इतिहासकार कत्यूरी राजाओं द्वारा निर्मित इन मंदिरों का निर्माण काल नौवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य मानते हैं। बार-बार कुमाऊं पर गोरखों और रुहेलों द्वारा आक्रमण करने और मन्दिरों को क्षति पहुँचाने के कारण मन्दिर आज मूल स्वरुप में ही है, संदेह है। राष्ट्रीय धरोहर होने के कारण यह मन्दिर समूह आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा अधिगृहित है. मन्दिर से नदी में उतरने के लिए पत्थरों की सीढियां बनी हुयी है जो कि एक कत्यूरी महारानी द्वारा तैयार करवाई गयी. यहाँ शिव मन्दिर की मान्यता इसलिए भी अधिक है कि हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान शिव और माँ पार्वती का विवाह यहीं गोमती व गरुड़ गंगा के संगम तट पर संपन्न हुआ था. बैजनाथ मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है. क्योंकि शिव को ही वैद्यनाथ अर्थात कायिक विज्ञान का ज्ञाता माना जाता है. श्रृद्धालुओं को यह शांत व साफ़ सुथरा देवस्थान अधिक भाता है तभी हर वक्त भक्तों की भीड़ लगी रहती है. माँ पार्वती की आदमकद मूर्ति और उसके सामने ही शिवलिंग की स्थापना होने से यहाँ का महत्व और भी बढ़ जाता है. पास ही नदी के किनारे पानी को रोककर तालाब का रूप दे दिया गया है, जिससे उसमे काफी महाशीर मछलियाँ कलाबाजियां कर रही थी. हमारे चालक राणा जी मछलियों के बड़े शौक़ीन हैं, देखकर उनके मुंह में पानी आ जाता है. हिन्दू धर्मशास्त्र विष्णु पुराण में भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों में से एक "मत्स्य अवतार" भी हैं. शायद इसलिए आस्तिक लोग पास से ही चने व मूंगफली के दाने खरीद कर मछलियों को खिला रहे थे.
                        समुद्रतल से लगभग 1130 मीटर ऊँचाई पर स्थित बैजनाथ का पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व
बैजनाथ मन्दिर समूह 
समान रूप से है. कत्यूरी शासन काल में प्रायः जितने भी मन्दिर बने उनकी निर्माण शैली और पत्थरों की प्रकृति एक ही है. केदारनाथ, पांडुकेश्वर मन्दिर हो या  बैजनाथ, द्वाराहाट व जागेश्वर मन्दिर समूह. जैन मन्दिर, दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला व कांगड़ा शैली से हटकर मन्दिर निर्माण की जो शैली विकसित हुयी वह कत्यूरी  शैली कहलाई. कत्यूरी शासन काल स्थापत्य कला के लिए आज भी प्रसिद्द है. इस शासन काल में Architect ही नहीं अपितु structural इंजिनियर और माइनिंग इंजिनियर की प्रवीणता का मूल्यांकन इसी बात से किया जा सकता है कि उन्होंने नीस पत्थरों (Gneiss-Metamorphic Rock Types)  की खोज की, उनकी 10-12" मोटी व 3 से 6 फीट लम्बी लम्बी स्लैब बनवाकर तैयार करवाई और निर्माण स्थल तक पहुंचा कर एक अनूठी शैली के मन्दिर बनवाए.  सैकड़ों सालों में इस उच्च हिमालयी क्षेत्र में न जाने कितने भूकम्प इन मन्दिरों ने झेले होंगे किन्तु कहीं कोई क्षति नही।
                      ऐतिहासिक काल से ही उत्तराखण्ड की भौगोलिक सीमायें पूर्व में काली नदी, पश्चिम में यमुना की सहायक टोंस नदी, दक्षिण में तराई-भाबर व टनकपुर का क्षेत्र तथा उत्तर में तिब्बत (चीन) तक विस्तार लिए हुए था. इतिहासकारों व पुरातत्वविदों के अनुसार उत्तराखण्ड में दूसरी शताब्दी से पांचवीं शताब्दी के मध्य तक कुणिन्द वंश का साम्राज्य रहा है. कुणिन्द शासकों की ही एक शाखा कत्यूरे हुए, ऐसा माना जाता है, जिसके
माँ पार्वती की मूर्ती और सम्मुख शिवलिंग
संस्थापक वासुदेव कत्यूरी हुए. कत्यूरों में मुख्य राजा बिरमदेव (ब्रह्मदेव) हुए. समुद्रगुप्त के इलाहाबाद प्रशस्ति अभिलेख के अनुसार चौथी शताब्दी में उत्तराखण्ड कार्तिकेयपुर के नाम से जाना जाता था. तदनंतर उत्तराखण्ड ब्रह्मपुर के नाम से भी जाना गया. (संभवतः राजा ब्रह्मदेव के कारण) चीनी यात्री व्हेनसांग की सातवीं शताब्दी के यात्रा वर्णन में यह उल्लेख है. सातवीं सदी से बारहवीं सदी तक उत्तराखंड ही नहीं पश्चिमी नेपाल तक कत्यूरों का साम्राज्य रहा. कत्यूरी शासनकाल स्वर्णिम युग माना जाता है। किन्तु बारहवीं सदी के अंत में नेपाल के मल्ल शासकों द्वारा कत्यूरों को पराजित कर इस क्षेत्र पर अधिकार पा लिया गया. उन्होंने लगभग चौबीस वर्षों तक शासन किया. कालांतर में कत्यूरी शासन छोटी छोटी रियासतों में बंट गया और वे स्वतंत्र रूप से शासन करने लगे. कत्यूरी शासक असंगठित रहने व धीरे धीरे उनका प्रभाव कम होने के कारण गढ़वाल में पंवार व कुमाऊँ में चन्द राजवंशों का उदय हुआ. जिनका शासन अठाहरवीं सदी के अंत तक रहा. असकोट, डोरी, पाली व पछाऊँ में जो छोटे छोटे रजवाड़े रहे उनके क्षत्रप अपने को आज भी कत्यूरी वंशज बताते है।                                                                                                     
                                                                                                क्रमशः ......................... 
                        

Wednesday, December 12, 2012

कुमाऊँ - देहरादून, रामनगर से रानीखेत

देहरादून  - किसकी नजर लग गयी इस सुन्दरता को 
यात्रा संस्मरण          
         मौसम विभाग भविष्यवाणी कर चुका था कि इस वर्ष मानसून देर से आएगा. फिर कुछ दिनों बाद मौसम विभाग ने पुनः घोषणा की कि मानसून भटक चुका है और अब और देर से आएगा. दून घाटी में बारिस प्रायः मई के दूसरे, कभी तीसरे हफ्ते तक हो जाती है पर इस बार मई पूरा सूखा बीता ही और जून के दो हफ्ते भी बारिस के इन्तजार में बीत गए. ऊपर से बिजली कटौती अलग से. इतनी गर्मी पहले कभी देहरादून में झेली हो याद नहीं. पत्नी बिमला और बेटी नन्दा दोनों जोर दे रहे थे कि चलो कहीं चलते हैं पहाड़ों में. मैंने कहा हमारा बेटा भी तो सहारनपुर की गर्मी झेल रहा है, तो ? बेटे को फोन किया तो उसे छुट्टी नहीं मिली और फिर कुमाऊँ चलने का मन बनाया. मेरी माँ जब तक जीवित रही तब तक उसके पास गाँव चले जाते थे. किन्तु पिछले साल कैंसर ग्रस्त होने के कारण यहीं मेरे पास ही उसकी मृत्यु हो गयी तो अब गाँव के बन्द पड़े घर में जाने का मन नहीं करता. उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद देहरादून राजधानी बनी तो इस शहर का अमन चैन ही समाप्त हो गया. बदलाव लोगों के आचार व्यवहार में तो आया ही किन्तु मौसम के मिजाज में भी बदलाव आ गया. देहरादून बदलाव के इन हालातों को प्रसिद्द जनकवि चन्दन सिंह नेगी जी से अधिक सुन्दर शब्दों में कौन बयां कर सकता है.
ये कैसी राजधानी है! ये कैसी राजधानी है!!  हवा में जहर घुलता औ' जहरीला सा पानी है !!!

कहाँ तो साँझ होते ही शहर में नींद सोती थी, कहाँ अब 'शाम होती है' ये कहना बेमानी है !!
मुखौटों का शहर है ये ज़रा बच के निकलना तुम, बुढ़ापा बाल रंगता है ये कैसी जवानी है !!
शहर में पेड़ लीची के बहुत सहमे हुए से हैं, सुना है एक 'बिल्डर' को दुनिया नयी बसानी है !!
न चावल है, न चूना है, न बागों में बहारें है, वो देहरादून तो गम है फ़क़त रश्मे निभानी है !!
महानगरी 'कल्चर' ने बदल डाला सबकुछ, इक घण्टाघर पुराना है औ' कुछ यादें पुरानी है !! 

ये कैसी राजधानी है .......!
चिलचिलाती धुप में माँ गिरिजा देवी के दर्शनार्थ भक्तों की भीड़ 
                   देहरादून से 18 जून को ही मुंह अँधेरे निकल पड़े, हरिद्वार, नजीबाबाद, काशीपुर होते हुए लगभग 240 कि०मी० दूरी तय कर रामनगर पहुंचे. फुटहिल्स में बसा लीची और आम के बगीचों के लिए प्रसिद्द यह नगर जिला नैनीताल की तहसील है और विश्व विख्यात टाइगर प्रोजक्ट जिम कार्बेट नैशनल पार्क के लिए प्रवेश द्वार भी. रामनगर से एक सड़क पूरब में काला ढून्गी होते हुए हल्द्वानी/नैनीताल को है. उत्तर में रानीखेत व धूमाकोट को चली जाती है तो पश्चिम में कालागढ़ होते हुए कोटद्वार को. रामनगर रेललाइन से भी जुड़ा हुआ है. रामनगर से ही पौड़ी व अल्मोड़ा के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए फल, सब्जी, अनाज आदि सप्लाई होता है. रामनगर मैं सन 2006 में भी आया था किन्तु तब मेरे साथ चालक स्थानीय था इसलिए कुछ ढूँढने में दिक्कत नहीं हुयी. किन्तु आज चालक राणा जी इस क्षेत्र से अन्जान थे इसलिए नाश्ता करने के लिए सही होटल की तलाश की जा रही थी. सुबह के दस बज चुके और अभी तक नाश्ता भी नहीं कर पाए थे. कुमाऊँ मंडल विकास निगम का पर्यटन आवास गृह दिखाई दिया. जाकर फटाफट परांठे तैयार करवाए और दही के साथ दो-दो परांठे हम चारों ने ले लिए. गाड़ी में पेट्रोल चेक किया और निश्चिन्त होकर आगे बढ़ गए.
भीषण गर्मी में कोसी में नहाते माँ गिरिजा देवी के भक्त 

                      रामनगर से धीरे धीरे हम चढ़ाई चढ़ते हैं. और फिर घने पेड़ों के बीच समतल भूभाग से गुजर रही साफ़ सुथरी सड़क पर गाड़ी सरपट दौड़ती जाती है. कोसी नदी के दायें तट पर यह ढिकुली क्षेत्र कभी बसासत वाला भूभाग था. कुछ लोग इसे महाभारत कालीन विराट नगरी मानते हैं, जहाँ पर पाण्डव अज्ञातवास के दौरान रहे. कुछ इसे कत्यूरों की राजधानी भी मानते हैं. कुछ विद्वान जन अल्मोड़ा में चन्द शासनकाल के दौरान ढिकुली को शीतकालीन राजधानी मानते हैं. क्षेत्र में देखे जाने वाले प्राचीन खंडहर की ईंटें और समय समय पर प्राप्त होने वाली मूर्तियाँ इस ओर इशारा भी करती है. वर्तमान में जिम कार्बेट नैशनल पार्क के निकट होने के कारण ढिकुली एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है जहाँ पर अनेक होटल, रिसोर्ट आदि बन गए हैं. यहाँ पर आबादी ठीक-ठाक होने के कारण एक इंटर कालेज है और बिजली, पानी के आफिस आदि अन्य आवश्यक जन सुविधाएँ भी. तथा काफी संख्या में बाग़ बगीचे भी हैं. ढिकुली से मात्र तीन कि०मी० आगे रानीखेत मार्ग पर (रामनगर से 11 कि०मी०) कोसी नदी के बीचों-बीच है जनआस्था का केन्द्र माँ गर्जिया देवी का मन्दिर. पौराणिक ग्रंथों के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री सती का विवाह हुआ था भगवान शिव के साथ. राजा दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में अपने पति शंकर को न बुलाये जाने पर सती रुष्ट हो गयी और अपमानित महसूस कर यज्ञ के हवन कुण्ड में ही अपने प्राणों की आहुति दे दी. जिससे क्षुब्ध होकर भगवान शंकर ने तांडव नृत्य करते हुए संहार किया था. फिर सती ने गिरिराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया. गिरिराज की पुत्री होने के कारण वह गौरा या गिरिजा भी. इनके नाम से ही यह मन्दिर है यह कोसी नदी के बीचों बीच. किन्तु यह गिरिजा जी इस क्षेत्र में गर्जिया देवी नाम से ज्यादा विख्यात है. ऐसा माना जाता है कि माँ के इस मन्दिर में प्रायः शेर आया करते हैं (जो कि गिरिजा की सवारी भी है) और गर्जना करते हैं जिससे इस मन्दिर का नाम गर्जिया देवी पड़ गया.                        उत्तर-दक्षिण बह रही कोसी नदी के मध्य एक समकोण त्रिभुज की आकृति से मिलता जुलता चालीस-पैंतालीस फीट ऊंचा टीला खड़ा है, जो कि मिट्टी, बजरी व छोटे-छोटे गोल पत्थरों के मिश्रण से बना हुआ है। जिसकी टेकरी पर निर्मित है एक छोटा सा मन्दिर. इस समकोण त्रिभुजनुमा टीले के कर्ण पर ऊपर चढ़ने के लिए सीढियां बना दी गयी है. किवदंती है कि यह टीला कहीं ऊपर कोसी नदी का कोई हिस्सा टूटकर यहाँ तक आया. परन्तु देखकर ऐसा नहीं लगता. यह अवश्य हो सकता है कि कभी यह टीला कोसी नदी का बायाँ या संभवतः दायाँ किनारा रहा होगा और किसी बरसात में नदी के कटाव के कारण यह भूभाग अलग हो गया और नदी के बहाव के कारण हर साल यह दोनों ओर से कटने लगा, जब तक कि इसके चारों ओर एक मजबूत 'फ्लड प्रोटेक्सन वाल' नहीं बनाई गयी. यह तो निश्चित है कि टीले का यह स्वरुप दस-बीस वर्षों में नहीं अपितु सैकड़ों वर्षों में तैयार हुआ होगा. यह जनआस्था का केंद्र कब बना यह ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है किन्तु यह माना जाता है कि रानीखेत से रामनगर आने जाने वाले लोग जब टीले के इस स्वरुप से आकृषित होकर टीले पर जाते थे तो चारों ओर घने जंगल और टीले के दोनों और नदी की जलधाराएं देखकर अभिभूत होते थे। जो शनै-शनै आस्था में परिवर्तित होने लगी।  सन 1941 से रानीखेत निवासी रामकृष्ण पांडे विधिवत रूप से इस टीले पर बने मन्दिर में पूजा आराधना करने लगे और धीरे धीरे मन्दिर व देवी माँ की ख्याति दूर दूर तक फैलने लगी.तब से पांडे जी के वंशज ही इस मन्दिर के पुजारी नियुक्त हैं. आज मन्दिर जाने के लिए टीले पर सीढियां बनी हुयी है, कोसी नदी पर पुल तथा नदी के दायें तट पर एक विशाल धर्मशाला और एक बाजार भी बन गया है. प्रतिदिन सैकड़ों तीर्थयात्री देवी के दर्शनार्थ आते हैं. कुमाऊँ की सीमा उत्तर में गिरिराज हिमालय, पूरब में विशाल काली
माँ गिरिजा की शरण में मै और मेरा परिवार 
नदी द्वारा सुरक्षित है तो दक्षिण-पश्चिमी सीमा माँ गिरिजा और दक्षिण-पूर्वी सीमा माँ पूर्णागिरी देवी द्वारा सुरक्षित है.
                       माँ गिरिजा देवी को प्रणाम कर कोसी नदी की विपरीत दिशा में दायें तट के साथ-साथ चढ़ाई चढ़ते हुए इस मार्ग पर आगे बढ़ते हैं. घने जंगलों के बीच से गुजरते हुए अच्छा लगता है किन्तु आबादी विहीन होने के कारण एक सूनापन खलता है. सोरल में कुछ देर सुस्ता कर व चाय पीकर फिर आगे चलने के लिए तैयार हो जाते हैं. यहाँ टोटम, खायोधार गाँव में आबादी थोड़ी बहुत दिखती है. रास्ता निरंतर चढ़ाई वाला है और सोचता हूँ ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा जब 1869 में रानीखेत में रेजिमेंट का हेडक्वार्टर बनाया गया होगा तो इस मार्ग की स्थिति कैसी रही होगी.   
                                                                                                                                  क्रमशः .............   

Thursday, November 15, 2012

अद्भुत, अनुपम सौन्दर्य है रेणुका जी का


गिरी नदी का विहंगम दृश्य 
     देहरादून जिले का शिवालिक पहाड़ी व हिमालय के मध्य वाला भाग दून वैली के नाम से विख्यात है। दून वैली की पूर्वी सीमा गंगा नदी है और पश्चिमी सीमा यमुना तथा टोंस नदी।  दो-तीन महीनों से देहरादून के बाहर नहीं निकल पाया था। छटपटाहट थी मन में। एक दो दोस्तों को फोन किया, किन्तु हर कोई इतना व्यस्त कि ‘‘घूमने’’ जैसे शब्द वे सुनना भी पसन्द नहीं करते। फिर गुरुदेव की कविता याद आयी-
‘‘जदि तोर डाक सूने केउ ना आसे,
 तोबे ऐकला चलो रे,
 ऐकला चलो  ऐकला चलो  ऐकला चलो रे।.............’’

      अतः ‘ऐकला चलो’ की नीति पर हिमाचल में रेणुका जी घूमने निकल गया। शिमला, कुलू, मनाली, धर्मशाला, डलहौजी जैसे अनेक दर्शनीय स्थलों तथा बागवानी व भेड़पालन के लिये विख्यात हिमाचल प्रदेश के दक्षिण-पूर्व में सिरमौर जिला है। कभी सिरमौर एक स्वतंत्र रियासत थी। प्रकृति प्रेमी राजा करण प्रकाश ने सन् 1621 में समुद्रतल से लगभग 930 मीटर ऊँचाई वाली कछुये जैसी पहाड़ी पर इस राज्य का मुख्यालय नाहन बसाया, जो आज भी सिरमौर का मुख्यालय है। सन् 1803 में गोरखों ने गढवाल व कुमाऊँ के साथ-साथ सिरमौर को भी अपने कब्जे में ले लिया था जो कि बारह वर्षों तक उनके अधीन रहा। सन् 1815 में अंग्रेजों के साथ सिंघौली की सन्धि के उपरान्त ही गढ़वाल, कुमाऊँ सहित सिरमौर रियासत भी गोरखों के अत्याचार से मुक्त हो पायी थी। तत्पश्चात सिरमौर रियासत औपनिवेशिक राज्य बना। स्वतन्त्रतोत्तर भारत में सरदार बल्लभ भाई पटेल की पहल पर 565 रियासतों का विलय भारतीय गणराज्य में हुआ, सिरमौर रियासत भी उनमें एक थी।
 रेणुका जी के निकट पथ प्रदर्शक 
       यमुना के दायें तट पर बसा हुआ पावंटा साहिब एक चहल पहल वाला नगर है, जो सिरमौर का हिस्सा है। पावंटा साहिब देहरादून के पश्चिम में 55 कि0मी0 तथा चण्डीगढ़ से 95 कि0मी0 पूरब में स्थित है। रेणुका जी के लिये पावंटा से सतौन होते हुये तथा नाहन से भी नियमित बस सेवा है। गिरी नदी, जो कि सिरमौर जिले को ठीक मध्य से दो समान भागों में विभक्त करती है, पार कर दो पहाड़ियों के बीच में आधा कि0मी लम्बा समतल भूभाग में मेला मैदान है।कुछ आगे लगभग चार सौ मीटर परिधि वाला एक परशुराम ताल विकसित किया गया है। इस कुण्ड के सिरे पर ही माँ रेणुका जी का भव्य मन्दिर है। आगे बढते हैं तो जमदग्नि टीला व धार गावं की पहाड़ी के मध्य स्थित है गुब्बारे के आकार वाली प्राकृतिक रेणुका झील।  जो लगभग डेढ़ कि0मी0 लम्बी और औसतन दो सौ मीटर चौड़ी है। झील के चारों ओर हरा-भरा घना जंगल है । घना जंगल होने के कारण हमें तरह तरह की चिड़ियाओं व जंगली जानवरों की मनमोहक गूंजें सुनायी देती है। झील की परिक्रमा के लिये एक पक्की सड़क है। परिक्रमा करते हुये मैने देखा कि कुछ श्रृद्धालु लोग सड़क की रिटेनिंग वाल के ऊपर छोटे छोटे चार-पांच पत्थरों को एक के ऊपर एक करके रख रहे थे। बचपन में हम ऐसे ही पांच पत्थरों को एक के ऊपर एक रखकर क्रिकेट की बॉल जितनी रबर की गेंद से खेला करते थे, जिसे ‘पंचपथरी’ खेल कहा जाता है। श्रृद्धालु से पूछा तो  बताया कि जो इन पत्थरों को गिरायेगा हमारा सारा दुःख उस व्यक्ति पर लग जायेगा और हम दुःखों से मुक्त हो जायेंगे। 
रेणुका जी का भव्य मन्दिर 
      झील के दायीं ओर आश्रम है व कुछ मन्दिर भी। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये हिरन, रीछ, शेर, मिथुन इत्यादि जानवर अलग अलग स्वतन्त्र बाड़े बनाकर यहां रखे गये हैं। झील में महाशीर मछलियां बहुतायत में है और पर्यटक व भक्त मछलियों को दाना डालते हैं। बोटिंग की पूरी सुविधा है अतः एकान्तचाहने वाले प्रेमियों को यह शान्त व रमणीक जगह खूब पसन्द आती है। ठहरने के लिये घने जंगलों के बीच हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग का यहां पर एक बड़ा सा गेस्ट हाऊस है और मात्र डेढ कि0मी0 दूर ददाहु नगर में अनेक होटल हैं।  
       पुराणों के अनुसार रेणुका जी नामक यह तीर्थस्थल भगवान परशुराम जी की जन्मस्थली है। परशुराम भगवान विष्णु के अवतार थे। ऋषि जमदग्नि और भगवती रेणुका के पुत्र के रूप में जन्में परशुराम का बचपन का नाम राम था। राम ने शस्त्र संचालन भगवान शिव से सीखा और राम की भक्ति और शौर्य से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने राम को परशा भेंट किया। दन्तकथा है कि जमदग्नि ऋषि की कामधेनु गाय व पत्नी रेणुका प्राप्ति के लिये राजा सहस्रबाहु ने ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी। अपनी लाज की रक्षार्थ व शोक से व्याकुल होकर भगवती रेणुका ने रामसरोवर में जलसमाधि ले ली। वयस्क होने पर राम को जब यह पता चला तो उन्होंने फरसे से सहस्रबाहु व उसकी सेना का संहार कर दिया। शासन व्यवस्था बिगड़ने पर उन्होंने इक्कीस बार भ्रष्ट शासकों का वध किया। तभी से वे परशुराम कहलाये जाने लगे। परशुराम ने तपोबल से माँ रेणुका जी को 
झील का मनोहारी दृश्य 
बुलाया। माँ रेणुका ने परशुराम को वचन दिया कि प्रतिवर्ष देवप्रवोधिनी एकादशी पर वह सरोवर से बाहर आयेगी और मुक्त भाव से सभी को दर्शन देगी। इतना कहकर माँ अन्तर्धान हो गयी।
तभी से रामसरोवर रेणुका झील कहलाने लगी और रेणुका जी के दर्शनार्थ प्रतिवर्ष देवप्रवोधिनी ( कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में) एकादशी को झील के निकट लाखों भक्त एकत्रित होते हैं। इस अवसर पर रेणुका विकास बोर्ड, सिरमौर, द्वारा इस अवसर पर दशमी से पूर्णिमा तक, पांच दिन मेला आयोजित किया जाता है।  श्रृद्धालु झील में स्नान कर पूजा अर्चना करते हैं । मेला मैदान में सांस्कृतिक आयोजन के अन्तर्गत हिमाचल प्रदेश की लोक संस्कृति की झलक दिखायी देती है। जिसमें राज्य ही नहीं पूरे देश भर के संस्कृति प्रेमी भाग लेते हैं।

Thursday, September 06, 2012

कविता के नाम पर !


पर्यावरण !
हरियाली कागजों में
ताजगी भाषणों में
और जमीं पर सिर्फ
दूषित वातावरण !! 

एन जी ओ !
देश समाज के नाम पर
चतुर विद्वान लोगों द्वारा
सरकारी धन हड़पने का
राजनीतिक सीनारियो !!

नौकरी !
दो रोटी का जुगाड़ गरीबों को
रौब-दाब समाज में सबलों को
चोरों को कमाने का साधन औ' शरीफों को
बस चाकरी !! 

प्यार !
पुल - दो विरोधी हालात के बीच
सफल तो जिंदगी गुलज़ार
हुए असफल तो जीवन भर
जीना दुश्वार !!

रिश्ते !
ता-उम्र निभाने के फेर में
भावनाएं दोहन के खेल में
फायदा उठाते शातिर और
सीधे पिसते !!

Monday, August 20, 2012

चुनाव

नव हस्ताक्षर    डाo प्रीतम नेगी 'अपछ्याण' हिंदी साहित्य जगत के उन उभरते हुए साहित्यकारों में से हैं जिन्होंने कम समय में ही अपनी पहचान कायम कर ली है. प्रीतम यद्यपि मूल रूप से कवि हैं किन्तु लोकसंस्कृति, समसामयिक और सामजिक अव्यवस्था के खिलाफ लिखने से भी कभी नहीं चूकते. वे हिंदी व गढ़वाली भाषा में समान रूप से सभी विधाओं पर जम कर लिख रहे हैं. उत्तराखण्ड के लेखकों में डाo प्रीतम अपछ्याण आज एक जाना पहचाना नाम है. पर्यावरण विज्ञान में मास्टर डिग्री धारक प्रीतम की पकड़ साहित्य में उतनी ही है जितनी कि पर्यावरण के क्षेत्र में. अब तक उनके तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. पहाड़ की भौगोलिक विषमता व विकट जीवन संघर्ष ही नहीं अपितु व्यवस्था की जड़ता भी कवि के लिए भावभूमि का काम करती है. यह कविता उनके सद्ध्य प्रकाशित कविता संग्रह "  ध्वनियों के शिखर "  से  है.

चुनाव नेतागिरी की पाठशाला है
समता समानता का वरदान पाया
हमारा यह जालिम युग
नेता प्रसूत लोकतंत्र
प्लेटों में सजा कर लाता है नेता.

कभी पुरुष, कभी स्त्री वेश में
हर जन्म नेता का जन्म है
हर पंजीकरण भावी नेता का प्रमाण-पत्र
अब जनता नहीं जनती नेता
नेता जन रहा वैध-अवैध जनता को.

चुनाव का न्यायिक चेहरा
ढक देता नेता के करम
विवेकशून्य जनता के भरम
पुरुष नेतृत्वहीन हो गए
सो औरतें पा गयी नेता आरक्षण.

लोकतंत्र व चुनाव वैसे ही हैं
नेता का महिला अवतार हो गया
ठीक उसी लीक पर अब भी
समता समानता की ढाल ताने चुनावी वाण बरसाते
आक्रमणकारी जैसे आते हैं नेता
पिछली फसल के बचे खुचे पौधों जैसे
कुछेक जनता रुपी वोटर
पचा नहीं पाए इस नए अवतार को
भ्रमित हो गए मन कोमा में गयी बुद्धि
अब न सोचती है न समझती है.

चालाक पुरुष
औरतों को घेर कर नेता बन रहे हैं
और चालाक औरतें
सशर्त गर्भवती हो रही हैं,
नेता जनना है तो ठीक
इंसान हम नहीं जनेगी.

Friday, August 03, 2012

पीतल का भगौना

                                              रामस्वरूप सिंह रौन्छेला 'सरूप'
                        रौन्छेला जी जाना पहचाना नाम भले ही नहीं है, किन्तु गुमनाम भी नहीं. मुंशी प्रेमचंद की भाँती रौन्छेला जी की कहानियों के पात्र व परिवेश पूर्णतः ग्रामीण है. भाषा व शब्दावली सरल तथा गेय है. उत्तराखंड के गाँव, समाज व नारी पीड़ा का वर्णन उनकी कहानियों में बखूबी हुआ है. कहानी पढ़ते हुए लगता है जैसे हम घटना को सामने घटित होते हुए देख रहे हों. वर्ष 1996 में प्रकाशित नौ आंचलिक कहानियों का उनका कथा संग्रह "  तारों की छांव  "   हमारी सांस्कृतिक धरोहर है. मसूरी में निवास कर रहे रौन्छेला जी तिरानबे वर्ष की आयु में भी एक सजग साहित्यकार हैं. अस्वस्थता के बावजूद आज साहित्य के प्रति उनकी रूचि व उत्सुकता में कोई कमी नहीं आयी है. प्रस्तुत कहानी उनकी कथा शैली व शिल्प की बानगी है.  
                        हमारे गाँव में ठग्गू भाई और दिलासू भाभी की लड़ाई एक कहावत बन गयी थी. गाँव में जब भी किसी घर में झगडा होता तो उनका नाम अवश्य आता. लड़ाई-झगड़े तो प्रायः हर घर में कभी कभार होते ही हैं. पति-पत्नी, सास-बहू, देवरानी-जेठानी हो या फिर ननद भाभी का झगड़ा. परन्तु ये झगड़े जैसे शुरू होते हैं वैसे ही ख़त्म भी होते हैं. सुबह का झगड़ा शाम तक और शाम का सुबह तक. उसके बाद सब कुछ सामान्य. न किसी के माथे पर शिकन और न किसी के ओंठों पर खिंचाव. जैसे कुछ हुआ ही न हो. किन्तु दिलासु भाभी और ठग्गू भाई अपवाद थे. झगड़ते तो एक-दो दिन नहीं, हफ़्तों तक ही एक-दूसरे से बात नहीं करते. कोई नहीं बोलता. घर का काम काज संकेतों में होता या फिर अपने-अपने विवेक से. अक्सर थक हार कर ठग्गू भाई को ही सुलह करनी पड़ती. 
                     कई दिनों बाद मै नौकरी से लौटा तो श्रीमती जी ने ठग्गू भाई और दिलासू भाभी के झगड़े की बात सुना दी. सुनकर बहुत दुःख हुआ. सोचा अभी जाकर उनको फटकार दूं. फिर गुस्से में जाना ठीक नहीं सोचकर कल पर टाल दिया. दूसरे दिन ठग्गू भाई के घर जा पहुंचा। उनका घर हमारे घर के पास ही था। ठग्गू भाई घर पर ही मिल गया, वह बरामदे में बैठा तम्बाखू पी रहा था. देखते ही कहने लगा; "आ सरूप ! बैठ, तम्बाखू पी"   कहकर हुक्का मेरी ओर सरका दिया। वह कुछ गंभीर दिखाई दे रहा था. मै इधर उधर की बातें करने लगा। लड़ाई की बात मैंने जानबूझकर नहीं की। दिलासू भाभी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी तो मैंने पूछ ही लिया," भाभी नहीं दिखाई दे रही, क्या कहीं गयी हैं क्या ? "    ठग्गू भाई पहले तो चुप रहा फिर आँख के इशारे से बताया कि वह रसोई में है। मैंने जोर से पुकारकर भाभी को नमस्कार किया और कहा "आज आप अन्दर चुपचाप बैठी हो, क्या बात है ?"    भाभी ने अन्दर रसोई में से ही कहा- "देवर जी, तुम बाहर क्या कर रहे हो, भीतर आ जाओ."    भीतर रसोई में गया तो भाभी को देखकर मुझे अनायास ही हंसी आ गयी। वह भी मुस्करा दी। शायद उसे इस बात का अहसास हो गया था कि मुझे उनकी लड़ाई का पता चल चूका है। चूल्हे से सब्जी उतारकर कहने लगी " बैठो, मै तुम्हारे लिए अभी चाय बनाती हूँ."    चाय बनाकर एक गिलास उसने मुझे पकडाया और दूसरा बाहर ठग्गू भाई को देने का इशारा किया। ठग्गू भाई को चाय देकर मै भीतर भाभी के पास बैठ गया और पूछा कि उसने तो अपने लिए चाय बचाई ही नहीं तो भाभी का जबाव था कि वह ज्यादा चाय नहीं पीती। मै चाय पीते-पीते उसके चेहरे का भाव पढने की कोशिश करने लगा. किन्तु उसके चेहरे पर तैरती सरलता से लगा कि वह रोज-रोज के झगडे की अभ्यस्त हो चुकी है।
                          एक दिन गाँव में बैलों का एक ब्यापारी आया। लड़कों को शरारत सूझी और ठग्गू भाई के यहाँ उसे भेज दिया। संयोग से उस दौरान भी पति पत्नी आपस में बात नहीं कर रहे थे। खरीददार ने आवाज लगाई " "  ठग्गू साहब जी घर पर है क्या ?"    दिलासू भाभी ने सोचा कि हो न हो उनका कोई रिश्तेदार हो। शाम को ठग्गू भाई जब लौटा तो देखा कोई मेहमान बरामदे में कम्बल पर बैठकर आराम से चाय पी रहा है। ठग्गू भाई ने सोचा शायद पत्नी के मायके से आया होगा.  नमस्ते कर हुक्का भर लाया और बगल में बैठ गया.  मेहमान के लिए बगीचे से ताज़ी सब्जी तोड़ लाया कि कम से कम दाल के साथ सब्जी तो होनी ही चाहिए। बैलों का खरीददार माजरा भांप गया कि वे गलतफहमी में उसे एक-दूसरे का मेहमान समझ बैठे हैं। बैल उनके यहाँ है नहीं वह देख चुका था। उसने चुप रहने में ही भलाई समझी कि रात तो आराम से कट जायेगी। रात को खाने के बाद गरम दूध का गिलास दिलासू भाभी ने मेहमान के सिरहाने रख दिया। सोचा बड़ी मुश्किल से मेहमान घर आया है और कुछ न खिलाया तो लोग नाम रखेंगे. यह सोचकर दिलासू भाभी ने सुबह नाश्ते में उड़द की दाल के पकौड़े बनाये. खा पीकर मेहमान ने ठग्गू भाई को नमस्कार किया और दिलासू भाभी को " अच्छा बहिन, बैठ फिर" कहकर विदा होने लगा तो ठग्गू भाई को यकीन हो गया कि यह मेरी पत्नी का कोई खास ही है। सोचने लगा मेहमान को खाली हाथ विदा करना भी ठीक नहीं है. कुछ न कुछ तो देना ही चाहिए। वह भीतर गया और एक पीतल का भगौना ले आया। मेहमान के ना करते करते भी ठग्गू भाई ने वह भगौना जबरदस्ती उसके झोले में ठूस दिया।  भगौना जाने का दुःख दोनों को हुआ किन्तु सकून भी हुआ कि चलो मेहमान की खातिरदारी ठीक से हो पाई .
                         अब दूसरे दिन जब भात पकाने के लिए भगौने की जरूरत महसूस हुयी तो दिलासू भाभी भीतर रसोई में अपने आप में ही बडबडा रही थी "  लो, एक भगौना था वह भी चला गया  "   इतना सुनकर ठग्गू भाई भड़क उठा "   अरे, सुना किसको रही हो ? तुम्हारा ही तो भाई था."    "  मेरा भाई ?"   दिलासू भाभी बिफर पड़ी. जब दोनों कुछ देर लड़ लिए, गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला लिए तो तब स्थिति साफ़ हुयी. दोनों ने सर पीट लिया. ....... और उसके बाद ठग्गू भाई और दिलासू भाभी की लड़ाई होते गाँव वालों ने कभी नहीं सुनी.           

Friday, July 27, 2012

समरथ को नहीं दोष गुसाईं.....

उमड़ना, घुमड़ना हो आसमां का या हो तेज हवाएं,
विनाशकारी आंधियां हो, या हो प्रलयकारी बाढ़
कर जाती है ये तांडव कभी मौत का अचानक.

उमड़ती-घुमड़ती नहीं धरती, रहती है शान्त, नीरव
पर कभी, फूट पड़ता है लावा अचानक,
एकाएक आ जाता है भूकंप-
कांपती तब धरती, पहाड़, दरिया, समंदर सभी
उजड़ते हैं बसेरे और क्षण भर में खाक होती जिंदगियां.

परन्तु,  इस सबके बावजूद भी-
धरती माँ है और पिता आसमां, कायम है यह दर्जा
कई-कई सदियों से, कई-कई पीढ़ियों से. लेकिन
रिश्तों की इन बारीकियों को नहीं समझ पाया कभी मै.

मैंने तो अपने बच्चे को छोटी सजा देने के भाव से,
मारा था उसकी पीठ पर एक हल्का सा हाथ
और दोस्तों की बदौलत- दर्ज हो गया मुझ पर
घरेलू हिंसा का केस, क्रूर पिता की संज्ञा मिली अलग,
पहले जमानत, फिर कोर्ट, कचहरी, तारीख और वकील
 झेल रहा हूँ मै आज तक पिछले आठ माह से.
सोचता हूँ बैठकर कभी, मैं तो निर्दोष हूँ फिर भी ये सजा...
धरती व आसमां के खिलाफ क्यों नहीं उठती आवाजें कभी.
या फिर यही सच है ? 'समरथ को नहीं दोष गुसाईं '        

Friday, July 20, 2012

जिन पर वतन को नाज है !


             क्या कभी आपने सुना है कि फ़ौज का कोई  सिपाही ड्यूटी के दौरान ऊंघ या सो रहा हो और कोई अदृश्य शक्ति उस सिपाही को थप्पड़ मार कर जगा दे? कभी सुना है कि बरसों पहले शहीद हुए रणबांकुरे के शहीदस्थल पर पहुँचते ही फ़ौज के जवान तुरंत सैल्यूट करें? उस स्थल पर आज भी उस शहीद के लिए बिस्तर लगाया जाता है, कम्बल तह करके रखा जाता है और सुबह जब देखते हैं तो कम्बल खुला हुआ मिलता है ? शहीदस्थल के आसपास घाटी में आज भी किसी स्त्री की चीख सुनाई दे कि "जागो ! जागो ! आ गए ! मारो ! मारो !"........ जी हाँ ! यह वाकया है तवांग जिले की नूरानांग पहाड़ियों का. जसवंतगढ़ का.
                अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में स्थित है नूरानांग की पहाड़ियां. जो तेजपुर (आसाम ) से तवांग रोड पर लगभग 425 किलोमीटर दूरी पर है. तवांग के उत्तर में चीन (तिब्बत) है और पश्चिम में भूटान. यह सन 1962 की बात है, जब चीन ने विस्तारवादी सोच के तहत पंचशील समझौते को धता बताते हुए भारत पर आक्रमण कर दिया था. लगभग 14,000 फीट ऊँचाई पर स्थित सीमान्त क्षेत्र की नूरानांग पहाड़ी व आसपास के इलाके का सुरक्षा का दायित्व तब गढ़वाल रेजिमेंट की चौथी बटालियन पर था. यहाँ तक पहुँचने के लिए टवांग चू नदी को पार करना होता है. हाड़ कंपा देने वाली इस ठण्ड में भी चीनी सेना 17 नवम्बर 1962 को सुबह छ बजे से ही छ से अधिक बार हमला कर चुकी थी.
              से0 ले0 विनोद कुमार गोस्वामी ने एक चीनी को रायफल सहित कैद कर लिया था किन्तु विशेष परिस्थितियों में उसे मौत की नींद सुला देना पड़ा. दूसरे मोर्चे पर सेकण्ड लेफ्टिनेंट एस0 एन0 टंडन ने धैर्य और साहस के साथ चीनी सेना के आक्रमण को एक हद तक विफल कर दिया था. विशाल चीनी सेना के निरन्तर अग्निवर्षा से हिंदुस्तान के वीर सैनिक एक एक कर शहीद होते रहे. इस मोर्चे पर लैंस नायक त्रिलोक सिंह, रायफल मैन जसवंत सिंह और लैंस नायक गोपाल सिंह ही बचे रह गए थे, वे रेंगते हुए गए, शत्रु के मोर्चे पर ग्रेनेड फेंके तथा एम0 एम0 जी0 को उठाकर अपने पास ले आये. शत्रुओं के कुछ सैनिक मारे गए और कुछ घायल हो गए.
              तीनों जवान शत्रुओं पर गोले बरसाते रहे. किन्तु चीनी सैनिक एक मरता तो दूसरा उसकी जगह आ कर ले लेता. और फिर उनकी ओर से निरन्तर हमला जारी रहा. जिसके परिणाम स्वरुप हमारे जवान एक एक कर देश के काम आते रहे. पीछे से किसी प्रकार की सहायता नहीं मिल पा रही थी. लड़ते-लड़ते लैंस नायक त्रिलोक सिंह और गोपाल सिंह भी वीरगति को प्राप्त हो गए. अब अकेले रायफल मैन जसवंत सिंह रावत ने मोर्चा सम्भाल लिया. वहां पर पांच बंकरों पर मशीनगन लगायी गयी थी. और रायफल मैन जसवंत सिंह छिप छिपकर और  कभी पेट के बल लेटकर दौड़ लगाता रहा और कभी एक बंकर से तो कभी दूसरे से और तुरन्त तीसरे से और फिर चौथे से, अलग अलग बंकरों से शत्रुओं पर गोले बरसाता रहा. पूरा मोर्चा सैकड़ों चीनी सैनिकों से घिरा हुआ था और उनको आगे बढ़ने से रोक रहा था तो जसवंत सिंह का हौसला, चतुराई भरी फुर्ती. चीनी सेना यही समझती रही कि हिंदुस्तान के अभी कई सैनिक मिल कर आग बरसा रहे हैं. जबकि हकीकत कुछ और थी. इधर जसवंत सिंह को लग गया था कि अब मौत निश्चित है अतः प्राण रहते तक माँ भारती और तिरंगे की आन बचाए रखनी है. जितना भी एमुनिशन उपलब्ध था, समाप्त होने तक चीनियों को आगे नहीं बढ़ने देना है. और वह अलौकिक शक्ति ही रही होगी कि दरबान सिंह नेगी, गबर सिंह नेगी और चन्द्र सिंह गढ़वाली की आत्मोत्सर्ग करने की परम्परा को आगे बढाता वह वीर जवान, रणबांकुरा बिना थके, भूखे-प्यासे पूरे 72 घंटे (तीन दिन तीन रात) तक चीनी सेनाओं की नाक में दम किये रहा.
             परन्तु होनी को कौन टाल सकता है. एक लामा ने चीनी सेना के सामने यह रहस्य उद्घाटन कर दिया कि वह भारतीय जवान तो अकेले ही लड़ रहा है. यह सुनते ही चीनी सेना टिड्डी दल की भांति इस गढ़सिंह पर चारों ओर से टूट पडी और प्रतिशोध के पागलपन में इस वीर जवान का सर कलम कर ले गए. चीनी सैनिक इस वीर जवान का सर लेकर अपने देश लौटे कि उससे पहले ही जसवंत की वीरता की कहानी वहां तक पहुँच चुकी थी. चीनी सेना के डिव कमाण्डर ने अपने उन जवानों को बुरी तरह फटकारा और लकड़ी की पेटी में उस सर को रखकर ससम्मान इस अनुशंसा के साथ भेजा कि " इसमें वह वीर जवान सो रहा है जिसने चीन के पूरे डिविजन को 72 घंटे तक आगे बढ़ने से रोके रखा. भारत सरकार बताये कि इस वीर की वीरता को क्या सम्मान दिया गया."   यह भी अजब संयोग रहा कि जिस जसवंत सिंह का नाम भारतीय सेना ने गुमशुदा या भगोडे सैनिकों की सूची में डाल दिया था  वही माँ भारती का सच्चा सपूत निकला.
              ले0 ज0 बी0 एम0 कौल ने अपनी पुस्तक 'अनटोल्ड स्टोरी' में लिखा है कि " " जिस वीरता व साहस से गढ़वाली बटालियन ने चीनियों का मुंहतोड़ जवाब दिया यदि उसी प्रकार भारतीय सेना की अन्य बटालियनें भी, जो वहां पर तैनात थी, प्रयास करती तो नेफा की तस्वीर आज कुछ और ही होती"    वीर जसवंत सिंह रावत के शौर्य से प्रभावित होकर आर्मी हेडक्वार्टर ने 17 नवम्बर को 'नूरानांग दिवस' तथा नूरानांग पहाड़ी को 'जसवंत गढ़' नाम दिया. इसी जसवंतगढ़ में उस वीर सैनिक को आज भी पूरे सम्मान के साथ याद किया जाता है. नूरानांग की पहाड़ियों पर जो लड़ाई हुयी उसमे कुल 162 जवान वीरगति को प्राप्त हुए, 264 कैद कर लिए गए और 256 जवान मौसम की मार से या अन्य कारणों से तितर बितर हो गए. वीरता पुरस्कार से जो सम्मानित हुए वे इस प्रकार हैं  महावीर चक्र - ले0 क0 भट्टाचार्य जी एवं रा0 मै0 जसवंत सिंह रावत (मरणोपरांत), वीर चक्र - से0 ले0 विनोद कुमार गोस्वामी (मरणोपरांत), , सूबेदार उदय सिंह रावत, सूबेदार रतन सिंह गुसाईं, रा0 मै0 मदन सिंह रावत, लैं0 ना0 त्रिलोक सिंह नेगी (मरणोपरांत), लैं0 ना0 गोपाल सिंह गुसाईं (मरणोपरांत), सेना मेडल - नायक रणजीत सिंह गुसाईं आदि..
           पौड़ी गढ़वाल,उत्तराखंड के वीरोंखाल के ग्राम बाडियूं, पट्टी खाटली में गुमान सिंह रावत व लीला देवी के घर ज्येष्ठ पुत्र के रूप में जुलाई 1941 को इस वीर नायक जसवंत का जन्म हुआ. हाईस्कूल करने के बाद वे अगस्त 1960 को फ़ौज में भर्ती हो गए. जसवंत के पूर्वज गढ़वाल की ऐतिहासिक वीरांगना तीलू रौतेली के वंशज माने जाते हैं. जो रावतों में विशेष जाति 'गोर्ला रावत' कहलाते हैं।
                   यह भी सत्य है कि महापुरुषों के सम्बंध में समाज अनेक किवदंतियां गढ़ देता है. वीर जसवंत के विषय में भी कहा जाता है कि नूरानांग पहाड़ी पर तैनाती के दौरान उनका 'सीला' नाम की स्थानीय युवती से प्यार हो गया था. कहा जाता है कि जिन 72 घंटों में जसवंत सिंह संघर्ष कर रहे थे उस समय भी वह युवती साथ थी. भोजन व्यवस्था व हौसला आफजाई वही करती रही. तदोपरांत वह कहाँ गयी, जीवित बची या मारी गयी. कुछ स्पष्ट नहीं है. परन्तु माना जाता है कि नूरानांग पहाड़ियों पर आज "   जागो, जागो ! आ गए, मारो, मारो !"    की जो आवाज कभी कभार सुनाई  देती है वह उसी युवती की है. सत्य ईश्वर ही जान सकता है. 
हाँ, राजीव कृष्ण सक्सेना जी  की यह कविता अवश्य याद आती है;
             जुड़ा हूँ अमिट इतिहास से कैसे भुला दूं ?  जो जागृत प्रीत की झंकार वह कैसे भुला दूं ?
          जो घुट्टी संग भारतवर्ष की ममता मिली थी. उसे कैसे भुला कर आज माँ तुझसे विदा लूं ?
                     (सामग्री स्रोत साभार - विमल साहित्यरत्न की पुस्तक "  हीरो आफ नेफा  "  के सम्पादित अंश) 

Monday, June 11, 2012

अधूरी जात्रा

               जीवन गुजर ही रहा था यूं ही तुम्हारे बिना, तुम्हारी दूसरी छुट्टी की प्रतीक्षा में. चिट्ठी का इंतजार रहता. नजर लगी रहती  पोस्ट ऑफिस से घर तक आने वाली उस संकरी, घुमावदार व चढ़ाई वाली पगडण्डी पर, एकटक. तुम्हारी वो बातें, वो शरारतें अक्सर याद आती तब और
अब. अब सिर्फ तुम. बस तुम ही ! जब शहीद हो गए तुम लाम पर. तब तुम्हारी शिकायत रहती थी मेरे से और अब मेरी....... नहीं, मै अब शिकायत क्यों जो करूं तुम से. तुम जो मेरे होते मेरे पास ही रहते और मै जो तुम्हारी होती तो तुम अकेले ही क्यों जाते.
             तुम्हें उलाहना नहीं दे रही हूँ. वह जो छाती पर सिल (पत्थर) रखा है न, उसे ही घड़ी-दो-घड़ी के लिए नीचे रखना चाहती हूँ. बस! गाँव से जात्रा जाती है कुंजा देवी के लिए. हर बरस  परम्परा वही, जात्रा वही, रास्ता वही पर उत्साह, उल्लास नया. ढोल नगाड़े के साथ रंग विरंगे परिधानों में सजे गाँव के लोग और नयी चुनरी नए श्रृंगार के साथ कहारों के कंधे पर इतराती इठलाती देवी की डोली. कुंजाधार पर पहुँचने के बाद जात्रा समाप्त होती है पूजा अनुष्ठान के बाद..... पर अपनी जात्रा?  अपनी जात्रा तो अधूरी रह गयी भुवन मेरे ! सच, तुम कितने निरुठे (निष्ठुर) हुए ठहरे.
              दादा जी अक्सर कहते भी कि फौजी निरुठे होते हैं. जब जलमपत्री मिला रहे थे घरवाले. दादी जी बोलती ही रही कि वे कमतर हैं बल. वे गंगाड़ी हैं और हम.....  उनका भात हमारे यहाँ नहीं चलता....... संजोग ही रहा होगा शायद. पिताजी किसी की बात नहीं माने, स्वभाव था उनका. न दादा की और न दादी की ही, माँ तो शायद ही उनके सामने ठीक से मुंह खोल पाई हो कभी...... बैशाख के महीने मिले थे हम पठालधार के मेले में, चलते चलते. मिले क्या देखना ही हुआ वो. जैसे सिनेमा के परदे पर कुछ ठीक से देखे भी न कि सीन बदल जाय...! आग लगे उस ज़माने को.

              माघ में शादी हो गयी. मै उन्नीस की हुयी तब और तुम तेईस के. मै गाँव में तब सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी थी- आठवीं पास और तुम हुए पलटण में ल्हैंसनैक. यह घमंड करने वाली बात नहीं रही पर  ससुर जी के लोगों से बतियाने और सास के गाँव के बीच रास्तों पर चलने में वह ठसक अक्सर झलक जाती...... शादी के बाद कहाँ रह पाए थे तुम घर, मुश्किल से पांच दिन. "   सारी छुट्टी शादी की ही तैयारी में कट गयी..."    ऐसा तुमने कहा था प्यार के क्षणों में, फिर से जल्दी आने का आश्वासन देते हुए. करते भी क्या, इकलौते बेटे जो ठहरे घर के. 
              मुश्किल से पांच चिट्ठियां ही मिल पायी थी तुम्हारी पूरे सात महीनों में। मै डाकिया को उन दिनों अक्सर कोसती कि तुम्हारी चिट्ठी क्यों नहीं लाता होगा झटपट.  तभी तो जवाब लिख पाऊंगी न. यह सोचते करते आठ माह बाद तुम ही आ गए..... खेतों में फसल पकने लगी थी और बारिस छूट रही थी जो कभी कभार भिगो ही देती. पर मै तो बाहर भीतर भीग रही थी इन दिनों. खेतों में साथ जाना होता, साथ खाना होता और साथ....  तुम अपनी कम पलटण की ज्यादा सुनाते. पलटण में ये होता है, पलटण में वो होता है. और और....... उन पचपन दिनों की दुनिया ही मेरे लिए दुनिया हुयी. और उसके बाद .....?  हाँ ! उसके बाद तो सिर्फ नरक ही हुआ न ? उन पचपन दिनों की याद मैंने सम्भाल रखी है आज तक, गठरी बाँध कर, कभी इस कोने रखती  हूँ और कभी उस कोने..... तुम्हारी धरोहर हैं वे यादें. जिसके सहारे इत्ता लम्बा अरसा कट गया.
              गाँव की गाड (गदेरे) के स्यून्साट के बीच, कभी जंगल की ओर जाती पथरीली पगडंडियों पर चलते-चलते और कभी खेतों की मेड़ पर बैठे-बैठे तुमने साथ जीने मरने का वचन दिया था. मै झट से हथेली तुम्हारे मुंह पर रख देती मरने की बात कहने पर. मरने से बहुत डरने वाली जो हुयी मै. पर तुम फौजियों को तो मरने मारने के सिवा......... और जब तुम्हारे जाने के सात महीने बारह दिन बाद ही तुम्हारे मरने की, नहीं नहीं शहीद होने की (जैसे कि लोग कहते हैं) खबर सुनी तो भरी दोपहरी में बज्र गिरा हो जैसे. शहीद हो गए लाम पर. और चुटकी में ही तोड़ गए सात फेरों, सात वचनों, सात जल्मों का रिश्ता. बन्धन में तो हम दोनों बंधे थे भुवन एक साथ. पर तुम बन्ध कहां पाए, बन्धन के सारे धर्म तो मै निभा रही हूँ और मै ही निभाऊंगी....... वीरगति पा गए तुम जैसे कि तुम्हें व तुम्हारा सामान घर लेकर आये वे हरी वर्दी वाले निर्दयी फौजी कह रहे थे. कुहराम मचा था दोनों घरों में. दादा, दादी की जली-कटी सुनने पर पिताजी को अपने फैसले पर बार-बार अफ़सोस हो रहा था. यह उनके चेहरे पर साफ़ झलकता. मुझे भी लगा था एक बार कि..... किन्तु नहीं. पचपन दिनों का जो अरसा, जितना अरसा मैंने तुम्हारे साथ जिया भुवन मेरे ! वो शेष चालीस-पचास बरस के लिए संजीवनी का काम करेंगे. (अगर जी पाऊंगी तब)   
              जहाँ जहाँ कभी तुम्हारे साथ गयी, तुम्हारे साथ रही, आज जब भी उन पगडंडियों पर चलती हूँ तो लगता है कि तुम लुका छुपी कर आगे पीछे चल रहे हो, खेतों की मेड़ पर तुम बैठे से दिखाई देते हो, पलक झपकती हूँ तो तुम नदारद. गाड में पानी के स्यून्साट की जगह तुम्हारी फुसफुसाहट सी सुनाई देती है जैसे तुम कुछ कह रहे हो. वह अनकहा भी जो तुम कहने से रह गए थे और मै खिच्च से हंस देती हूँ ........ पर तुम तो भुवन, स्वर्गतारा बन गए न अब...... बस, इतना जरूर पूछना चाहती हूँ कि पूरणमासी से लगातार क्षीण होते चांद देखकर तुम्हें पीड़ा नहीं होती क्या ?  या तुम सचमुच निरुठे हो क्या ?
                                                              X X X X X X X 

Sunday, June 03, 2012

प्रकृति से भावनात्मक तादात्म्य स्थापित करने का नाम है मैती आन्दोलन

वृक्ष दान करते श्री कल्याण सिंह रावत 
'विश्व पर्यावरण दिवस' पर विशेष
कभी वनस्पतियों को
एक कवि की दृष्टि से देखो-
कैसी विशाल कौटुम्बिकता अनुभव होती है.
अमानुषी वन पर्वतों, निर्जन जंगलों,
एकाकी उपत्यकाओं में भी
पत्र लिखी भूषाएं धारे,
सुरम्यवर्णी फूल खोंसे ये वनस्पतियाँ-
भाषातीत संकीर्तन करती
निवेदित, सुगंध ही सुगंध लिखती रहती है.

                                           ......... नरेश मेहता
                         गिरिराज हिमालय का सौन्दर्य श्वेत बर्फ के ऊंचे पहाड़, कल कल निनाद करती नदियां ही नहीं अपितु यहाँ का सघन वन, अनेक जडी बूटियाँ व हरित बुग्याल भी है. राजा भगीरथ व उनके पूर्वजों ने सैकड़ों वर्षों तक तपस्या की तो गंगा धरती पर अवतरित हुयी. क्या है तपस्या? व्यावहारिक तौर पर विश्लेषण करे तो कतिपय कारणों से हिमालय वृक्षविहीन और बारिस का औसत कम होने लगा होगा. जब बारिस नहीं तो हिमालय में ही सूखा पड़ने लगा होगा. मैदानी भागों में त्राहि त्राहि मचने लगी होगी. ऐसे में जब राजा पहल करेगा तो प्रजा स्वयमेव ही आगे आएगी. राजा भागीरथ व उनके पूर्वजों ने सैकड़ों वर्षों तक तपस्या की. वह तपस्या नहीं वस्तुतः वृक्षारोपण रहा होगा. जब हिमालय की हरियाली लौटी तो वर्षा हुयी और नदी नालों में पानी ही पानी हो गया होगा. साठ हजार पुरखों के तर्पण की बात जो की गयी है वह रही होगी मैदानी क्षेत्र में पानी का साठ हजार (अर्थात अनेक) प्रकार से उपयोग करना. आज भी अनेक विनाशकारी गलत नीतियों व निरंतर वनों के दोहन के कारण हिमालय वृक्ष विहीन हो रहा है. किन्तु सौभाग्य की बात है कि उत्तराखण्ड हिमालय में आज भी अनेकों भगीरथ हैं. जो पुरखों के तर्पण के लिए नहीं अपितु दुनिया के जीव जंतुओं की रक्षा के लिए तपस्या कर रहे हैं. उनमे अग्रणी हैं उत्तराखण्ड के महान विचारक और मैती आन्दोलन के जन्मदाता कल्याण सिंह रावत.    
वृक्षारोपण करते दूल्हा दुल्हन व मैती बहनें 
                         उत्तराखण्ड की स्थानीय भाषाओँ में 'मैत' का अर्थ है 'मायका' और 'मैती' का अर्थ हुआ 'मायके वाले'. मायके के जल, जंगल, जमीन, खेत-खलिहान, नौले-धारे, पेड़-पौधे सब ससुराल गयी लडकी के लिए मैती हुए. मैती आन्दोलन में शादी के वक्त दूल्हा, दुल्हन वैदिक मंत्रोचार के साथ एक-एक फलदार वृक्ष रोपते हैं और दुल्हन उसे सींचती है. फिर गाँव में जो मैती कोष होता है उसमे एक निश्चित धनराशि दानस्वरुप दिया जाता  है. उत्तराखण्ड में कठिन दुर्गम रास्ते होने के कारण आज भी यह परम्परा है कि दुल्हन की विदाई होती है तो उसका भाई उसे छोड़ने उसके ससुराल जाता है और दूसरे दिन लौटता है. परम्परानुसार दुल्हन अपनी ससुराल में पहली सुबह धारा (जल स्रोत) पूजने जाती है. जहाँ पर मैती आन्दोलन की नीतियों के अनुसार दुल्हन का भाई एक फलदार पेड़ रोपता है और दुल्हन आजीवन उस पेड़ की परवरिश की सौगंध लेती है. इस प्रकार यह आन्दोलन एक भावनात्मक पर्यावरणीय आन्दोलन के रूप में प्रचलित हुआ. शादी के मौके पर हुए इस समारोह के प्रत्यक्षदर्शी ब्राहमण, बाराती व अन्य मेहमान अपने गाँव लौटकर जरूर इसकी चर्चा करते हैं और अपने गाँव में इस प्रकार के आयोजन करने की मंशा रखते हैं. उत्तराखण्ड के नौ-दस हजार गांवों में आज इस आन्दोलन का जूनून यहाँ तक है कि अब लोग शादी के निमंत्रण पत्र पर भी मैती वृक्षारोपण समारोह का उल्लेख करते हैं. इस प्रकार सर्वस्वीकार्यता बनी तो गाँव गाँव में मैती संगठन बने. गाँव की अविवाहित लड़कियों का यह संगठन मैती बहनों का संगठन कहलाता है. गाँव की ही तेज तर्रार लड़की को अध्यक्ष नियुक्त किया जाता है जिसे दीदी कहा जाता है. शादी के समय प्राप्त दान से कोष तैयार कर खाता खुलवाया जाता है जो कि गाँव की किसी पढ़ी लिखी बहू के नाम होता है. कोष की राशि से फलदार वृक्ष खरीदे जाते है, निर्धन बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाता है व उन स्त्रियों की मदद की जाती है जो निर्धनता के कारण नंगे पांव ही खेतों, जंगलों में जाती हैं. शादी के समय लगाये गए पेड़ों की देखभाल, खाद पानी देना जैसे कार्य मैती बहनों द्वारा किया जाता है.
                         मैती आन्दोलन के जन्मदाता कल्याण सिंह रावत जी ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि वर्ष 1994 में चमोली जनपद (उत्तराखण्ड) के ग्वालदम कसबे से शुरू हुआ उनका यह मैती आन्दोलन पूरे उत्तराखण्ड ही नहीं अपितु देश के अनेक राज्यों में लोकप्रिय हो जाएगा. यहाँ तक कि मैती आन्दोलन से प्रभावित होकर ही अमेरिका, कनाडा, चीन, नार्वे, आस्ट्रिया, थाईलैंड और नेपाल आदि देशों में भी शादी के मौके पर पेड़ लगाये जाने लगे हैं. मैती आन्दोलन की ख़बरें जब कनाडा की पूर्व प्रधानमंत्री फ्लोरा डोनाल्ड ने पढ़ी तो वे इतनी अभिभूत हुयी कि कल्याण सिंह रावत जी से मिलने गोचर(चमोली) ही जा पहुंची. इस आन्दोलन की देन ही है कि गाँव गाँव में मैती जंगलों की श्रंखलायें सजने लगी है. हरियाली दिखाई देने लगी है.  
सांस्कृतिक समारोह के दौरान नृत्य व गायन करती स्थानीय स्त्रियां 
                         मैती आन्दोलन अब शादी व्याह के मौकों पर ही वृक्षारोपण नहीं कर रहा बल्कि दायरे से बाहर निकलकर  'वेलेनटाइन डे' पर भी "एक युगल एक पेड़" का नारा देकर उनसे पेड़ लगवा रहे हैं और वेलेनटाइन जोड़े ख़ुशी ख़ुशी पेड़ लगा रहे हैं. कारगिल शहीदों की याद में बरहामगढ़ी (ग्वालदम) में शहीद वन व वर्ष 2000 में नन्दा राजजात मेले से पूर्व राज्य के तेरह जनपदों से लाये गए पेड़ नौटी(कर्णप्रयाग) में रोपकर उसे 'नन्दा मैती वन' नाम दिया गया. मोरी (उत्तरकाशी) के निकट टोंस नदी के किनारे जब एशिया का सबसे ऊंचा वृक्ष गिरा तो उसकी याद में मैती बहनों द्वारा वहां पर हजारों लोगों की उपस्थिति में एक भव्य शिक्षा प्रद कार्यक्रम आयोजित किया गया और उस महावृक्ष को श्रृद्धांजलि देते हुए वहां पर उसी चीड़ की प्रजाति के पौधे रोपे गए. विशाल टिहरी बाँध बनने के कारण टिहरी शहर के जलसमाधि लेने से पूर्व मैती द्वारा वहां के तैतीस ऐतिहासिक स्थलों की मिटटी को लाकर स्वामी रामथीर्थ महाविद्यालय के प्रांगण में अलग अलग गड्ढों में डालकर उनमे पौधे रोपे गए, दिसंबर 2006 में  एफ०आर०आई० देहरादून द्वारा शताब्दी वर्ष मनाये जाने पर बारह लाख बच्चों के हस्ताक्षर से युक्त दो किलीमीटर लम्बा कपडा एफ०आर०आई० के मुख्य भवन पर लपेटा गया. जिसकी  गांठ तत्कालीन राज्यपाल श्री सुदर्शन अग्रवाल ने बाँधी. इस अवसर पर परिसर में दो पौधे रोपे गए.  राजगढ़ी उत्तरकाशी में तिलाड़ी काण्ड के शहीदों की याद में वृक्ष अभिषेक मेला व नारायणबगड़ (चमोली) में महामृत्युंजय मन्दिर के समीप पर्यावरण सांस्कृतिक मेला आयोजित किये जाते हैं.

                         बैनोली-तल्ला चांदपुर, कर्णप्रयाग, जनपद चमोली में जन्मे व वनस्पति विज्ञान, इतिहास व राजनीति शास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट रावत जी ने राज0 इंटर कालेज में प्रवक्ता (वनस्पति विज्ञान)के रूप में कैरियर शुरू किया और आज उत्तराखण्ड अन्तरिक्ष उपयोग केंद्र, देहरादून में बतौर वैज्ञानिक कार्यरत हैं. उनका कहना है कि उनके पिता व पितामह भी वन विभाग में नौकरी करते थे. वहां पर उन्हें जंगलों के निकट रहने का मौका मिला. फिर विषय भी वनस्पति विज्ञान रहा तो वे प्रकृति के और निकट आ गए. चिपको आन्दोलन की जननी गौरा देवी उनकी प्रेरणा स्रोत रही. रावत जी ने देखा कि वन विभाग हर वर्ष वृक्षारोपण पर  लाखों करोड़ों रुपये खर्च करता है  किन्तु लोगों का भावनात्मक लगाव न होने के कारण वह सफल नहीं होता. परिणाम यह होता है कि सरकार पुनः पुनः उसी भूमि पर वृक्षारोपण करती है जिस पर वह पहले के वर्षों में कर चुकी होती है. सरकारी धन ठिकाने तो लगता है किन्तु वन क्षेत्र नहीं बढ़ता है.
                         उन्होंने इसे एन०जी०ओ० क्यों नहीं बनाया इस पर वे खुल कर कहते है कि आज अनेक एन०जी०ओ० कागजों तक ही सीमित हैं, जिससे उनकी साख घटी है. रावत जी का उद्देश्य पर्यावरण हित है न कि धन कमाना. मैती आन्दोलन को पैसे से जोड़ दिया जाएगा तो इसकी आत्मा मर जायेगी. वे इसे निस्वार्थ भाव से इस मुकाम तक ले आये और चाहते हैं कि यह एक स्वतः स्फूर्त आन्दोलन की भांति कार्य करे.
                         उतराखंड के अनेक सामाजिक संगठनों द्वारा श्री रावत को गढ़ गौरव, गढ़विभूति, उत्तराँचल प्रतिभा सम्मान, दून श्री, बद्रीश प्रतिभा सम्मान सहित दो दर्जन से अधिक सम्मानों से नवाजा जा चुका है। किन्तु यह दुखद पहलू ही है कि पर्यावरण के नाम पर दिए जाने वाले सरकारी पुरस्कारों से चिपको आन्दोलन की जननी गौरा देवी की भांति कल्याण सिंह रावत जी को भी अभी तक वंचित रखा गया है. जो कि सरकारी पुरस्कारों में बन्दरबाँट या पुरस्कारों के नाम पर दलगत व जातिगत राजनीति की कहानी ही बयां करती है.
                           (स्रोत - श्री कल्याण सिंह रावत जी से उपलब्ध सामग्री व उनसे हुयी बातचीत  के आधार पर)  
 

Saturday, May 26, 2012

एक शापित शिला

छाया - साभार गूगल 
शेरशाह, शाहजहाँ आदि बादशाहों की नजरों से
बौद्ध मठों, जैन मंदिरों व मूर्तियों के निर्माताओं से
बल्कि उससे पूर्व, सभ्यता की नीवं रखने वालों से 
छुपकर दुबका हुआ, मिटटी रेतगारे में पड़ा हुआ,
धरती के सीने पर गड़ा हुआ- एक पत्थर हूँ मै ।

ईश्वर ! भयभीत रहा हूँ मै सदा मानवी छायाओं से
आंकते हैं जब भी वे कभी मेरी उपयोगिता-
किसी देवालय की नीवं-दीवारें चिनवाने के लिए,
या शहर की ऊंची इमारतों के निर्माण के लिए,
किसी मंदिर की मूरत बनवाने के लिए, या किसी  
भ्रष्ट नेता का पापमय चेहरा गढ़ने के लिए ही।

ओह मनुष्यों ! तुम्हे तो बस
मिटा देना ही आता है किसी के अस्तित्व को
प्रहार करना ही आता है किसी की अस्मिता पर 
हो सकती है स्वतंत्र सत्ता मेरी भी, ऐतराज है क्यों तुम्हे
अरे मानव!
नहीं हो चराचर के स्वामी तुम,
उस अनाम-कोटिनाम विधाता की ही कृति हो-
तुम भी, मै भी. किया नहीं प्रयास कभी
तुम्हारा मार्ग बाधित करने का मैंने 
तुम ही गुजरते रहे हो अपितु, ठोकरें मार कर
या कभी मेरे सीने को ही रौंद कर।

शापित शिला हूँ मैं, युगों युगों से धरती के सीने में
दुबका हुआ, मिटटी रेतगारे में गड़ा हुआ.
मानव ! भगवान के लिए ही सही, रहने दो मेरी स्वतंत्र सत्ता, 
यूं ही पड़ा रहने दो मुझे, तुम यूं ही गड़ा रहने दो मुझे।

Wednesday, May 16, 2012

शौर्य व स्वाभिमान के पर्याय थे महाराणा प्रताप - (4)


 यात्रा संस्मरण (पिछले अंक से जारी.....)
                                  प्रताप यह भली भांति जानते थे कि अकबर यद्यपि पश्चिमोत्तर सीमा विवाद में बुरी तरह उलझ गया है किन्तु वापस लौटने पर वह एक बार फिर मेवाड़ पराजय का कलंक मिटाना चाहेगा. अतः प्रताप ने मुग़ल शासित उन क्षेत्रों को नहीं छेड़ा जो पहले से ही मुगलों के अधीन थे. मालवा व गुजरात के मार्गों से गुजरने वाले यात्रियों को स्वतंत्र रूप से जाने दिया. मेवाड़ की आर्थिक समृद्धि के लिए कृषि, व्यापार व उद्योग को बढ़ावा देने की दिशा में तेजी से प्रयास किये जाने लगे. दूसरी ओर प्रताप मेवाड़ का सम्पूर्ण पश्चिमी भाग, सम्पूर्ण पर्वतीय क्षेत्र तथा चित्तौड़गढ़ व माण्डलगढ़ के अतिरिक्त पूरा पूर्वी भाग भी मुगलों से युद्ध कर वापस लेने में सफल रहे. मुगलों के अधीन 36 थानों में से 32 पर पुनः अपना कब्ज़ा करने में सफल रहे. थानों पर तैनात मुसलमान या तो मार दिए गए या वे स्वतः ही जान बचाकर भाग गए. मेवाड़ पर मान सिंह व जगन्नाथ कछ्वावा द्वारा आक्रमण से व्यथित होकर प्रताप ने बदला लेने के लिए अम्बेर पर चढ़ाई कर दी तथा उनके समृद्ध व संपन्न नगर मालपुरे को तहस-नहस कर डाला.
                          प्रताप द्वारा मेवाड़ पर पुनः आधिपत्य की सूचना अकबर को जब मिली तो सन 1586 में करौली के राजा गोपालदास जादव को अजमेर का सूबेदार तैनात कर दिया. तथा सन 1590 में जादव की मृत्यु के उपरांत सन 1594 में शिरोजखान को सूबेदार बनाया गया. किन्तु प्रताप की वीरता से भयभीत होकर या अन्य किसी कारण से इन सूबेदारों द्वारा मेवाड़ पर आक्रमण नहीं किया गया. अपितु यह कहा जाता है कि प्रताप के जीते जी फिर मेवाड़ पर कोई आक्रमण नहीं हुआ. तथापि अतीत को देखते हुए सुरक्षा की दृष्टि से प्रताप ने ऊंचे पर्वतों व घने जंगलों से घिरे चावण्ड गाँव को नयी राजधानी बनाया(जो कि सन 1615 तक मेवाड़ की राजधानी बनी रही). चावण्ड में राणा द्वारा छोटे-छोटे महल व माँ चामुंडा का एक मन्दिर भी बनवाया गया. सम्पूर्ण राज्य की समृद्धि के लिए राणा ने अथक प्रयास किये. युद्ध के समय साथ देने वाले छोटे छोटे शासकों को बड़ी बड़ी जागीरें भेंट की गयी.उन्हें सुरक्षा पर्दान की गयी. और लम्बे युद्ध की विभीषिका से बाहर निकल कर मेवाड़ एक बार फिर संपन्न राज्यों में शुमार हो गया. अन्न धन के भण्डार भरने लगे और घी-दूध की नदियां बहने लगी.
                           किन्तु विधि का विधान देखिये कि जो प्रताप लगभग सत्रह वर्षों तक मुगलों की बड़ी से बड़ी सेना के खिलाफ निरंतर युद्ध करता रहा, घायल होने पर भी नेतृत्व करने से पीछे नहीं हटा, कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी. वही प्रताप एक बार शिकार खेलते समय कमान जोर से खींचते के कारण घायल हो गए और शय्या पकड़ ली. जिसके चलते 19 जनवरी 1597 को मात्र 57 वर्ष की आयु में चावण्ड में मृत्यु को प्राप्त हो गए. चावण्ड के निकट बन्दोली गाँव के नाले के तट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया. जहाँ पर संगमरमर पत्थरों से आठ खम्बे वाली एक छतरी बनी हुयी है.
                          प्रताप की मृत्यु का समाचार सुनकर अकबर खुश होने की बजाय उदास हो गया. "वीर विनोद" पुस्तक के अनुसार उस दौरान एक चारण 'दुरसा आढ़ा' एक स्वरचित 'छप्पय' खूब गाया करता था. अकबर ने जब सुना तो चारण को बुलवाया गया. चारण भय से कांपते कांपते सम्राट अकबर के पास पहुंचा कि शत्रुओं के प्रशंसा गीत गाने पर दंड अवश्य मिलेगा. किन्तु अकबर ने पूरा छप्पय सुनकर उसे ईनाम  दिया तो चारण चकित रह गया. छप्पय इस प्रकार था,
"अश लेगो अण दाग, पाघ लेगो अण नामी. 
गो आड़ा गबडाय जिको बहतो धुर बामी. 
नब रोजे नह गयो, नागो आतशा नवल्ली.
न गो झरोखा हेठ, जेथ दुनियाण दहल्ली........."
 अर्थात जिसने अपने घोड़ों को दाग नहीं लगवाया,(तब परम्परा थी कि पराजित होने पर जो घोड़ा शत्रुओं के हाथ पड़ जाता था उसके पुट्ठों पर दाग लगाया जाता था) किसी के सामने अपनी पगड़ी नहीं झुकाई, आड़ा(वीरगाथा) गवाता चला गया, नरोज (नववर्ष की भांति नौ ऱोज तक चलने वाला त्यौहार) के जलसे में नहीं गया, शाही डेरों में नहीं गया, दुनिया जिसका मानकरती थी ......ऐसा प्रताप चला गया"
                           यह भी हकीकत है कि चारणों ने  ही भूतकाल को जीवित रखा. चारण गीतों में राजाओं - महाराजाओं के अनेक किस्से मिलते हैं. चारणों की वीरगाथाओं में ही यह भी मिलता है कि निरंतर युद्ध पर युद्ध और हार पर हार से प्रताप तिलमिला गए थे. हर वक्त डर रहता था कि वे या उनके परिवार का कोई सदस्य कहीं मुगलों के हाथ न पड़ जाये. मेवाड़ के राज परिवार के सदस्य कभी पर्वतों की गुफाओं में पत्थरों पर सोकर रातें गुजारते तो कभी पेड़ों पर बैठे-बैठे दिन काटते थे. जंगली फलों पर गुजारा करते थे. कई बार शत्रुओं से बचने  के लिए मामूली भोजन छोड़कर भी भागना पड़ा. केवल इस संकल्प के लिए कि तुर्कों के सामने सिर नहीं झुकायेंगे. किन्तु एक बार उनकी प्रतिज्ञा टूटने लगी, वे झुकने लगे. हुआ यह कि महारानी और युवरानी ने घास के बीज के आटे से रोटी बनाई थी. बच्चों को एक-एक रोटी दी गयी कि वे आधी अभी खा लें और आधी बाद में. प्रताप किनारे बैठे किसी गहन सोच में थे कि उनकी पौत्री की दारुण पुकार उन्हें सुनाई दी. वास्तव में एक जंगली बिल्ली उसके हिस्से की रोटी झपटा मारकर ले गयी थी. महाराणा तिलमिला गए. एक घास की रोटी के लिए राज परिवार की कन्या की ह्रदयभेदी चीत्कार. युद्ध भूमि में अपने सगे क्या अपने पुत्र के वीरगति प्राप्त करने पर भी जो प्रताप कभी विचलित न हुआ हो एक छोटी सी राजकुमारी के दर्द से विचलित हो गए, उनकी आँखों में आंसू आ गए. उन्होंने तुरन्त अकबर को संधि पत्र लिखा.
                            अकबर पत्र पाकर बहुत खुश हुआ. वह पत्र बीकानेर के राजा के भाई पृथ्वीराज को दिखाया जो अकबर के दरबार में राजकवि था. पृथ्वीराज राजपूतों की आखरी आशा और वीर महाराणा की वह चिट्ठी देखकर अत्यंत दुखी हुए. किन्तु प्रत्यक्ष में ढोंग करने लगे कि 'मुझे विश्वास नहीं कि यह चिट्ठी प्रताप की है. मुग़ल साम्राज्य मिलने पर भी प्रताप कभी सिर नहीं झुकाएगा. मै स्वयं ही पता कर लेता हूँ.' पृथ्वीराज महान कवि थे,  अतः घुमा फिराकर यह पत्र लिखा;
अकबर समद अथाह, तिहं डूबा हिन्दू तुसक.
मेवाड़ तिड़ माँह, पोयण फूल प्रताप सी.
अकबरिये इकबार, दागल की सारी दुनी,
अण दागल-असवार, चेतक राणा प्रताप सी.
अकबर घोर अंधार, उषीणा हिन्दू अबर,
जागै जगदातार, पोहरे राण प्रताप सी.
हिन्दुपति परताप, पत राखी हिन्दू आण री,
सहो विपत संताप, सत्य सपथ करि आपनी.
चंपा चितोड़ हा, पोरसतणो प्रताप गीं,
सौरभ अकबरशाह, अलि यल आमरिया नहीं.
पातल जो पतशाह, बोले मुखऊ तो बयण.  
मीहर पछिम दिश माँह, उगै कासप रावत. 
पटके मुद्दां पाया, कि पटकूं निज कर तलद.
दीजै लिख दीवाण, इन दो महली  बात इक. 
अर्थात अकबर रुपी समुद्र में हिन्दू तुर्क डूब गए हैं, किन्तु मेवाड़ के राणा प्रताप उसमे कमल की तरह खिले हुए हैं. अकबर ने सबको पराजित किया किन्तु चेतक घोड़े पर सवार प्रताप अभी अपराजित हैं. अकबर के अँधेरे में सब हिन्दू ढक गए हैं किन्तु दुनिया का दाता राणा प्रताप अभी उजाले में खड़ा है. हे हिन्दुओं के राजा प्रताप ! हिन्दुओं की लाज रख. अपनी प्रतिज्ञा के पूर्ण होने के लिए कष्ट सहो. चित्तौड़ चंपा का फूल है और प्रताप उसकी सुगंध. अकबर उस पर बैठ नहीं सकता. यदि प्रताप अकबर को अपना बादशाह माने तो भगवान कश्यप का पुत्र सूरज पश्चिम में उदय होगा. हे एकलिंग महादेव के पुजारी प्रताप ! यह लिख दो कि मै वीर बनके रहूँगा या तलवार से अपने को काट डालूँगा.
      पृथ्वीराज की इस कविता ने दस हजार सैनिकों का काम किया और प्रताप ने उत्तर में यह लिख भेजा.
तुरुक कहाँ सो मुख पतों, इन तणसुं इकलिंग,
उसै जासु ऊगसी, प्राची बीच पतंग.
अर्थात भगवान एकलिंग जी के नाम से सौगंध खाता हूँ कि मै हमेशा अकबर को तुर्क के नाम से ही पुकारूँगा. जिस दिशा में सूरज हमेशा से उगता आया है वह उसी दिशा में उगता रहेगा. वीर पृथ्वीराज ! सहर्ष मूंछों पर ताव दो, प्रताप की तलवार यवनों के सिरों पर ही होगी.
                             ओझा आदि विद्वानों ने इसे कपोलकल्पना मात्र माना है. उत्तर में कुम्भल गढ़ से दक्षिण ऋषभदेव की सीमा तक लगभग 90 मील और देबारी से सिरोही तक लगभग 70 मील चौड़ा क्षेत्र सदैव ही राणा के अधिकार में रहा. जिससे कभी खाद्यान की कमी नहीं रही. फिर इस क्षेत्र में फल फूल पर्याप्त मात्रा में थे. सैकड़ों गाँव आबाद थे इसलिए खेती भी ठीक ठाक होती थी.इस पूरे पहाड़ी क्षेत्र को घेरने के लिए लाखों सैनिकों की आवश्यकता होती. हजारों वीर व स्वामिभक्त भील दुश्मन की सेना की चालीस पचास मील तक की हरकत कुछ ही समय में राणा तक पहुंचा देते थे.और राणा योजना बनाकर शत्रुओं का संहार करता  था. जिसके कारण बीहड़ प्रदेश में घुसने की की हिम्मत मुगलों ने कभी नहीं की. फिर राणा के पास अकूत सम्पति थी. जिससे वे राज परिवार का ही नहीं अपने सैनिकों व उनके परिवार का भरण पोषण करते थे. भामाशाह एक चतुर व कुशल मंत्री थे. उन्होंने खजाना सुरक्षित स्थान पर रखा था और आवश्यकता अनुसार प्रताप को देते थे. उदयपुर की क्यात और महाराणा की वंशावली से ज्ञात होता है कि राणा की सेना में एक राजा, तीन राव, सात रावत, पंद्रह हजार अश्वारोही, एक सौ हाथी और बीस हजार पैदल थे. अतः इतनी बड़ी सेना का भरण पोषण साधारण खजाने से नहीं हो सकता था. परन्तु पृथ्वीराज और प्रताप के बीच संवाद को पूर्णतया ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता. पृथ्वीराज और प्रताप मौसेरे भाई थे. सम्भव हो अकबर इस बात को जानता हो और अकबर ने ही पृथ्वीराज से पत्र लिखवाया हो कि प्रताप संधि कर ले. किन्तु राजपूताना के प्रति असीम प्रेमवश पृथ्वीराज ने प्रताप से मेवाड़ की रक्षा का वचन ले लिया.
                                 वास्तविकता जो भी हो किन्तु यह सत्य है कि इन किवदंतियों ने राजस्थान में राजपूत धर्म की परम्परा अक्षुण बनाये रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. प्रताप के बारे में जेम्स टाड ने लिखा है कि चित्तौड़ पर से अधिकार समाप्त होने पर प्रताप ने प्रतिज्ञा ली थी कि- 'जब तक चित्तौड़ वापस नहीं ले लेंगे मै और मेरे वंशज सोने चान्दी के वर्तनों पर नहीं पत्तलों पर भोजन करेंगे, घास के बिस्तरों पर सोयेंगे, दाढ़ी नहीं बनायेंगे और नगाड़ा सेना के पीछे बजायेंगे. कमोवेश यह परम्परा आज भी निभाई जाती है. परन्तु यह कथन भी कितना सत्य है कहा नहीं जा सकता.
                                 जो भी हो प्रताप आज साढ़े चार सौ साल बाद भी मेवाड़ ही नहीं पूरे राजस्थान अपितु पूरे हिंदुस्तान में प्रातः स्मरणीय है, पूज्य है, उनकी वीरता के किस्से लोग बड़े गर्व से बयां करते हैं, बड़े चाव से सुनते हैं. उनके नाम पर सौगंध ली जाती है.
                                                                                                                                                                                                                                                                                                           --समाप्त------
    (सामग्री स्रोत साभार-Manorama Yearbook1988 & 2009, युगपुरुष महाराणा प्रताप-मोहन श्रीमाली व एस० पी० जैन, Mewar &Welcome to Rajsthan- Rajsthan Tourism's Magazines तथा रजवाड़ा-देवेश दास आदि  पुस्तक)