Friday, July 14, 2017

बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है....

रफी साहब की मखमली आवाज में ‘सूरज’ फिल्म का यह गाना आज भी जब कहीं गूंजता है तो दिल अद्भुत रोमांच से भर उठता है, मन हिलोरें लेते हुये खयालों में खो जाता है, आँखे ख्वाब देखने लगती हैं, अतीत याद आने लगता है और, और.....। हाँ सचमुच, कुदरत ने गढ़वाल में एक घाटी ऐसी बनायी है जहाँ बहार सैकड़ों प्रजातियों के फूल बरसाती है मीलों तक, फूल ही फूल। बस, महबूब को थोड़ी सी तकलीफ जरूर उठानी पड़ेगी वहाँ तक पहुँचने में। और वह घाटी है चमोली जिले की तहसील जोशीमठ के अन्तर्गत विश्व प्रसिद्ध धरोहर- फूलों की घाटी।देश दुनिया देखने की तमन्ना किसे नहीं होती है? ऐसे लोग विरले ही होंगे जिन्हंे प्रकृति न लुभाती हो। मुझे तो अपने पहाड़ ही प्यारे लगते हैं। मेरा तो मन करता है कि पहाड़ी ढलान पर पसरे गांवों, सर्पीली पगडण्डियों, कल-कल निनाद करती नदियों, हरे-भरे बुग्यालों, बर्फीली चोटियों के सौन्दर्य को अपने भीतर अधिकाधिक भर लूं। कि न जाने कब शरीर ही इन पहाड़ों की यात्रा करने से मनाही कर दे। न जाने कब आँखे सुन्दर दृश्यों को अपने कैमरे में कैद करना ही छोड़ दे। इसलिये इस बार कार्यक्रम बना फूलों की घाटी का।     
बद्रीनाथ मार्ग पर बद्रीनाथ से लगभग पच्चीस किलोमीटर पहले गुरू गोविन्द सिंह जी के नाम से अलकनन्दा नदी के दायें तट पर स्थित ‘गोविन्दघाट’ बसा हुआ है। यहीं से नदी पार कर पूरब दिशा में चौदह किलोमीटर पैदल चलकर पहुँचा जाता है घांघरिया। दूरी मात्र चौदह किलोमीटर परन्तु गोविन्दघाट से लगभग चौदह सौ मीटर ऊँचाई पर। अर्थात औसतन 1ः10 का ढलान (Gradient)। पुलना गांव तक अब पाँच किलोमीटर लम्बा हल्का वाहन मार्ग अवष्य बन गया है किन्तु पैदल दूरी तीन किलोमीटर ही कम हुयी। पुलना गांव लक्ष्मणगंगा के दायें तट पर बसा हुआ है और 2013 की प्रलयंकारी बाढ़ में नदी में पानी के साथ इतना मलबा आया कि पुलना के काफी मकान जमींदोज हो गये हैं।
संकरी व गहरी घाटी में पूरे वेग के साथ बह रही नदी के दोनो ओर घने जंगलों से युक्त पहाड़ ऊँचे उठे हुये हैं। इस मषीनी युग मे समय की बड़ी महत्ता है। इसलिये समय को सम्मान देते हुये हमने गोविन्दघाट से पुलना तक जीप द्वारा और पुलना से घांघरिया तक ग्यारह किलोमीटर का सफर खच्चरों से तय किया। समतल व कच्चे रास्ते पर खच्चर की सवारी करना आनन्द देता है, परन्तु चढ़ाई-उतराई भरे पहाड़ी रास्तों पर घोड़े/खच्चरों की सवारी केवल मजबूरी होती है। खड़न्जे बिछे रास्ते पर बार-बार सन्तुलन बनाना पड़ता है क्योंकि घोड़े/खच्चरों के खुरों पर लोहे की नाल लगी होती है जिससे खड़न्जे वाले रास्ते उनके खुर फिसलते हैं। इसलिये कितना भी हांक लिया जाय घोड़े/खच्चर हमेषा कच्चे भाग का में चलते हैं और ऐसे रास्तों पर कच्चा हिस्सा केवल किनारों पर मिलता है। पहाड़ी की ओर चलने पर सवारी के हाथ-पांव छिलते हैं और घाटी की ओर चलने पर नीचे गहरी खाई में गिरने की आषंका बनी रहती है। दूसरे पल सोचता हूँ कि हमारे ऐतिहासिक नायक महाराणा प्रताप रहे हों या वीर छत्रपति षिवाजी, या महाराजा रणजीत सिंह या फिर महारानी लक्ष्मीबाई जी, ढाल, तलवार व भाले के साथ घोड़े की वल्गा थामे हुये किस तरह अपनी षूरवीरता दिखाते होंगे। झाड़ियों में, जंगलों में, घाटियों मंे, मैदानो में और पहाड़ों में अपने को बचाते हुये किस प्रकार षत्रुओं से लोहा लेते होंगे। कितने महान थे वे और एक हम है कि घोडे़/खच्चर मालिक द्वारा हंकाये जाने व बिल्कुल खाली हाथ होते हुये भी घोड़े/खच्चर की पीठ पर बैठ रहने तक डर से माथे पर पसीना टपकता रहता है।   
लगभग छः किलोमीटर दूरी के बाद भ्यंूडार गांव पहुँचे तो थोड़ा रुककर मैगी के साथ चाय ली। दस रुपये कीमत वाला मैगी का पैकेट जब दुकानदार दो मिनट उबाल कर सर्व करता है तो उसकी कीमत इस मार्ग पर चालीस रुपये हो जाती है और चाय बीस रुपये की। सन्तोश यह था कि खच्चर हांकने वाले हो या छोटे-छोटे ढाबे खोले दुकानदार, प्रायः सभी स्थानीय निवासी थे। फूलों की घाटी और हेमकुण्ड के दर्षनार्थ जो भी यात्री आता है कुछ न कुछ खर्च अवष्य करता है जिससे इस घाटी के निवासियों की आर्थिक स्थिति कमोबेष ठीक है। यह अलग बात है कि पूरा सीजन ही मात्र चार-साढ़े चार माह का है। भ्यूंडार गांव लक्ष्मणगंगा और काकभुसुण्डी नदी के संगम तट पर दायें किनारे बसा हुआ है। 2013 की बाढ़ में गांव के अनेक मकानों का नामोनिशान ही मिट गया था परन्तु अब लोगो ने कुछ पुराने मकान ठीक कर दिये हैं और कुछ नये बना दिये हैं। जहाँ पर आज लक्ष्मणगंगा बह रही है वहाँ कभी आबादी थी और नदी तब एकदम बायें किनारे से सटकर बहती थी। एक सज्जन ने बताया कि भ्यूंडार वस्तुतः पुलना गांव वालों की छानियां थी न कि गांव। भ्यूंडार से लक्ष्मणगंगा पार कर रास्ता उत्तर दिशा में मुड़ जाता है और ढलान अपेक्षाकृत बढ़ जाती है। लगभग आठ फुट चौड़े सीढ़ीदार व खड़ंजे बिछे इस रास्ते पर हेमकुण्ड के प्रति आस्था रखने वाले सैकड़ों श्रद्धालुओं की आवाजाही निरन्तर बनी रहती है। लोक निर्माण विभाग, उत्तराखण्ड द्वारा बनाये गये इस रास्ते पर सफाई का जिम्मेदारी एक गैर सरकारी संगठन ‘ईको विकास समिति, भ्यूंडार’ ने उठा रखी है। जिसके एवज में वे बोझा ढोने वाले कुली और प्रत्येक खच्चर स्वामी से न्यूनतम राशि सफाई के एवज में लेते हैं। परन्तु प्रसन्नता इस बात की है कि स्थानीय यात्री को भुगतान करने से मुक्त हैं।
लगभग साढ़े तीन हजार मीटर की ऊँचाई पर घने देवदारों और दो ऊँची पहाड़ियों के बीच घाटी में बसे घांघरिया पहुँचे तो इस कस्बे को देखकर आश्चर्य हुआ। आते हुये रास्ते में मन में सवाल उठ रहे थे कि वहाँ ठिकाना मिले न मिले परन्तु घांघरिया में बड़े आलीशान होटल, दुकानें और गुरूद्वारा देखकर दंग रह गया। खच्चरों और आदमियों की पीठ पर लादकर कैसे सीमेण्ट, सरिया, रोड़ी, फर्नीचर आदि सामान यहाँ पर लाया गया होगा? रात्रि विश्राम के लिये ठिकाना मिल गया था गढ़वाल मण्डल विकास निगम का विश्राम गृह। सामान वहाँ रखने के बाद फ्रेष होकर लंज लिया और कमर सीधी करने के लिये थोड़ी देर सुस्ता लिये। सहयात्री जोषी जी से बात की कि समय काफी है क्यों न घांघरिया का ही एक चक्कर मार लें। यह जानकर खुषी हुयी कि घांघरिया में बी.एस.एन.एल. का टॉवर लगने के कारण कनेक्टिविटी थी। अन्यथा प्रत्येक दुकान के बाहर दुकानदारों ने
सेटेलाईट फोन रखकर पी.सी.ओ. बूथ खोले हुये थे। सबसे पहले ईको विकास समिति के कार्यालय गये तो वहाँ पर कार्यरत लड़की ने फूलों की घाटी के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी और भी विस्तार में जानने के लिये प्रोजेक्टर चलकार एक डॉक्यूमेण्टरी फिल्म चलवा दी, प्रति व्यक्ति तीस रुपये वसूली के बाद। आधे घण्टे की इस रंगीन फिल्म में फूलों की घाटी का इतिहास, भूगोल और घाटी में पाये जाने वाले पषु-पक्षियों और खिलने वाले फूलों के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। वहाँ से निकलकर घांघरिया के एक होटल में चाय जलेबी लेने के बाद कस्बे के मुख्य रास्ते पर बढ़े। पूरे कस्बे में चार-पाँच हजार लोगों से अधिक लोग रहे होंगे जिनमें नब्बे प्रतिशत सरदार व पंजाबी भाषी लोग और षेश दस प्रतिषत हमारे जैसे स्थानीय यात्री, होटलों के कर्मचारी, घोड़े/खच्चर चलाने वाले और पालकी/पिठ्ठू ढोने वाले। वातावरण में गूंज रहे पंजाबी संवादों व जोर-जोर बोलने की आवाजों से ऐसा लग रहा था मानों हम पंजाब के ही किसी कस्बे में आ गये हैं। शायद यही कारण है कि कुछ लोग इस कस्बे को ‘घांघरिया’ के स्थान पर ‘गोविन्दधाम’ लिख रहे हैं, जो कि अप्रत्यक्ष तौर पर स्थानीयता पर हमला है। घांघरिया के उत्तर-पश्चिम में हेमकुण्ड से आने वाली लक्ष्मण गंगा और फूलों की घाटी से आने वाली भ्यूंडार गाड का संगम है। 
घांघरिया से पैदल उत्तर दिशा की ओर छः-सात सौ मीटर चलने के बाद दायीं ओर सात-आठ फीट चौड़ व पक्का रास्ता हेमकुण्ड साहिब को चला जाता है और सीधा कच्चा रास्ता फूलों की घाटी के लिये। थोड़ी दूर चलने के बाद ही रास्ते के दायीं ओर फॉरेस्ट चौकी बनी हुयी मिली और बायीं ओर कार्यरत कर्मचारियों के आवासीय भवन। चौकी में फूलों की घाटी जाने वाले से 150 रुपये प्रति व्यक्ति शुल्क तथा 500 रुपये सेकुरिटी फी ली जाती है कि यात्री जो भी नमकीन, बिस्कुट आदि के पैकेट लेकर जा रहा है वह उनकी रद्दी वहाँ न फेंके, वापस ले आये। इसके लिये बाकायदा बैग चेक किये जाते हैं। फॉरेस्ट चौकी पर औपचारिकता निभाने के बाद कुछ आगे बढ़ने पर एक नाला पड़ा घुसाधार गाड। पच्चीस-तीस मीटर चौड़ाई वाली गाड के ऊपर काफी बर्फ जमी हुई थी और पानी बर्फ के नीचे से बह रहा था। मुख्य रास्ता बरसात में बह गया होगा इसलिये बर्फ के ऊपर चलकर इसे पार किया। मुझे अमरनाथ यात्रा के दौरान अमरावती नदी के ऊपर चलने की याद आ गई। घुसाधार गाड पार करने के बाद से ही ब्रह्यकमल और फन फैलाये नाग के आकार के फूल दिखने शुरू हो गये थे। आगे उफान मारती भ्यूंडार गाड पर बने पुल से गाड के दायीं तट पर पहुँचे। गाड पार से एक किलोमीटर का जिग-जैग रास्ते पर चलते हुये हम निरन्तर ऊँचाई पर बढ़ते गए। रास्ते में भोजपत्र के पेड़ प्रचुर मात्रा में मिले। संयोग से रास्ते में कुछ लोग मिले तो सोचा शैक्षणिक भ्रमण पर होंगे। परन्तु यह जानकर अच्छा लगा कि वे सूरत (गुजरात) से तीन परिवारों के सदस्यों का दल था और घाटी का आकर्षण उन्हें भी यहाँ खींच लाया था। रुकते और चलते हुये इस चढ़ाई पर एक जगह खड़े होकर गुजराती दल में से चौबीस-पच्चीस साल की हँसमुख लड़की से मैंने पूछा क्या तुमने फिल्ब ‘बाहुबली-1’ देखी है? उसने हाँ बोला तो मैंने भ्यूंडार गाड के बायीं ओर खड़ी चट्टान दिखाकर कहा कि ‘वह देखो, इस चट्टान के ऊपर विषाल माहिश्मति साम्राज्य है।’ वह मुस्कराई और कहा ‘वर्णन तो अच्छा किया सर आपने। दो सौ मीटर से अधिक इस खड़ी चट्टान को देखकर तो सचमुच ही लग रहा है कि इसके ऊपर अवष्य कोई नगर होगा।’ चढ़ाई खत्म होने के बाद कुछ आगे चलकर वक्राकार रास्ता पूरब दिशा की ओर मुड़ जाता है। यहीं से पूरब दिशा में मीलों तक फैली घाटी के अनुपम सौन्दर्य का प्रथम दर्षन हुये। बुग्याल के दोनों ओर कुछ गहराई पर और बीचों-बीच भ्यूंडार गाड धीर-मन्थर गति से बह रही थी, उसका वह रौद्र रूप यहाँ नहीं दिखाई दिया जो घांघरिया से घाटी में प्रवेश करने तक है। भ्यूंडार गाड के दोनो ओर फैली चौड़ी घाटी में खिले थे सैकड़ों प्रजातियों के फूल, दूर-दूर तक। जिस गदेरे से फूलों की घाटी शुरू मानी जाती है वहाँ से ही लगभग छः-सात किलोमीटर दूर तक फेली हुयी है। संकरी घाटियों में प्रायः एक अदृश्य भय सा व्याप्त हो जाता है, परन्तु यह घाटी इतनी चौड़ाई लिये हुये है कि इसमें आगे बढ़ते हुये न भूस्खलन का खतरा मण्डराता है और न ही संकरी घाटियों वाला वह अदृश्य भय। डर है तो यह कि जंगली जानवरों से कहीं सामना न हो जाये। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पहाड़ी की उत्तरी ढलान से बर्फ पिघलकर छोटे-छोटे नालों के रूप में बहकर भ्यूंडार गाड की जल सम्पदा में वृद्धि कर रहे थे। सुदूर पूरब में बर्फ से ढकी गौरी पर्वत घाटी को आशीर्वाद देता सा प्रतीत हो रहा था। उसके ऊपर झक सफेद बादल अठखेलियां कर रहे थे, कभी वह चाँदी की चमक वाले उस पर्वत को अपने आगोश में समेट लेते और कभी चुपचाप उसके पीछे छुप जाते। सचमुच प्रकृति ने अपने दोनों हाथों से गढ़ा है इस घाटी को। मनुष्य क्या देवता भी यहाँ स्वयं वास करने का मोह षायद ही संवरण कर पाये।    1982 में नन्दा देवी राष्ट्रीय पार्क घोषित हो जाने के बाद घाटी में पशुओं की आवाजाही बन्द है और दर्शनार्थियों द्वारा कैम्प डालकर रात को ठहरने पर भी पाबन्दी है। फूलों से लकदक इस घाटी की ओर निरन्तर बढ़ने पर मेरी पत्नी काफी उत्साहित थी और इस यात्रा में सहयात्री महेश चन्द्र जोशी जी भी खूब प्रफुल्लित दिखे। श्रीमती जोशी जी रात बुखार होने के कारण कुछ सुस्त अवश्य रही परन्तु प्रकृति के इस नैसर्गिक सौन्दर्य को देखकर वे भी अभिभूत थी। 
 सभी प्रकार के फूल अभी नहीं खिले थे तथापि कम मात्रा में खिले रंग-बिरंगे फूलों से सजे बुग्याल देखकर मेरा मन हो रहा था कि यहीं बस जाऊं, एडनबरा निवासी मिस जॉन मारग्रेट लीग(1885-1939) की तरह मैं भी यहीं समाधिस्थ हो जाऊं। फूलों की इस सुन्दर घाटी को सन् 1931 में जनता के सामने लाने वाले फ्रैंक स्माइथ को सैल्यूट कर हम वापस घांघरिया लौट आये ताकि अगले दिन हेमकुण्ड साहिब की यात्रा के लिये तरो-ताजा रह सकें।

Wednesday, January 04, 2017

मनुस्मृति में क्या है ?

       चौबीस दिसम्बर को प्रतिवर्श ‘उत्तराखण्ड के गांधी’ नाम से विख्यात इन्द्रमणी बडोनी जी और पच्चीस दिसम्बर को पेषावर काण्ड के नायक चन्द्र सिंह गढ़वाली जी का जन्मदिवस पूरे उत्तराखण्ड में मनाया जाता है। पच्चीस दिसम्बर को ही क्रिसमस की धूम-धाम पूरे विष्व में रहती है। परन्तु इस वर्श चौबीस व पच्चीस दिसम्बर देहरादून वासियों के लिये खास रहा। क्योंकि चौबीस व पच्चीस दिसम्बर को ही(पूरे दो दिन) ‘समय साक्ष्य’ के तत्वाधान में देहरादून के राजपुर में ‘लिट्रेचर फेस्टिवल’ भी मनाया गया। इधर पच्चीस दिसम्बर को ही सोषल मीडिया ‘वर्डसऐप’ पर ‘लोक का बाना’ ग्रुप से इन्द्रेष आईसा (इन्द्रेष मैखुरी)जी का लेख पढ़ा कि ‘‘1927 में पच्चीस दिसम्बर को ही भीम राव अम्बेडकर की नेतृत्व में ‘मनुस्मृति’ को जलाया गया ।‘‘           वामपंथी नेता इन्द्रेष मैखुरी जितने प्रखर वक्ता हैं उतने ही वे ऊर्जावान लेखक भी। वे लिखते हैं कि ‘‘....जातीय श्रेश्ठता के नकली बोध से ग्रसित हमारे समाज के लिये वह घटना एक बड़ी चुनौती थी। मनु स्मृति ही वो संहिता है जो हिन्दू समाज के श्रमषील हिस्से को अछूत मानकर उसके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार को जायज ठहराने का अधार प्रदान करती है। महिलाओं के प्रति भी यह संहिता काफी क्रूर दृश्टिकोण लिये हुये है।.......’’
       मनुस्मृति क्या है- हिन्दू धर्मशास्त्रों में मनुस्मृति एक प्रमाणिक ग्रन्थ माना जाता है। सम्भवतः यह पहला संस्कृत ग्रन्थ है जिसका अनुवाद ब्रिटिश शासनकाल सन् 1794 में ‘सर विलियम जॉन्स’ द्वारा किया गया है। आज मनुस्मृति के पचास से अधिक हस्तलिखित ग्रन्थ उपलब्ध हैं परन्तु सबसे पहले प्रचलन में आया व सर्वाधिक बार अनुवादित हुआ संस्करण ही अठारहवीं सदी से प्रमाणिक माना जाता है। मनुस्मृति के रचनाकाल के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न मत हैं। परन्तु अधिकांश विद्वानों का मानना है कि इस ग्रन्थ की रचना ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी और ईसा की तीसरी शताब्दी के मध्य हुयी। ऐसा माना जाता है कि ‘मनु’ और ‘भृगु’ ऋषि के मध्य धर्म सम्बन्धी हुयी वार्ता इसका आधार है।
         संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब(वेद नगर), बरेली से प्रकाषित एवं डॉ0 चमनलाल गौतम द्वारा सम्पादित ‘मनुस्मृति’ के 2004 संस्करण में सम्पादक/प्रकाषक ने दो षब्द षीर्शक में लिखा है कि ‘....यह ग्रन्थ निरा धर्मग्रन्थ ही नहीं है वरन विषेश रूप से नीतिगत भी है। आज भी इसकी मान्यता और उपयोगिता उतनी ही है जितनी कि पुरातन युग में थी। हिन्दू धर्म सम्बन्धी विवादों में अब भी विधि ग्रन्थ के रूप में इसके प्रमाण न्यायालयों में मान्य किये जाते हैं। .....राजा के लिये आवष्यक है कि वह योग्य दण्डधर होकर न्यायपूर्वक राज्य का पालन करे। उसे देष, काल, षक्ति, विद्या और वित्त के अनुसार अपराधियों को दण्ड देना चाहिये। ‘स राजा पुरुशो दण्डः स नेता षासिता च स’ के अनुसार दण्ड ही राजा है, वही नेता, षासक और रक्षक है तथा ‘दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः’ पण्डितजन दण्ड को ही धर्म कहते हैं।..... ’
             इस मनुस्मृति में बारह अध्याय हैं। जगदुत्पतिकथन, ब्रह्मोत्पति, स्त्री पुरुश की सृश्टि, मनु एवं मरीच्यादि की उत्पति, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैष्य-षूद्र के कर्म, ब्राह्मण का श्रेश्ठतव, धर्म के सामान्य लक्षण, धर्म की वेदमूलता, ब्रह्मवर्तदेषीय सदाचार, द्विजातियों का वैदिक मंत्र से गर्भाधानदि कर्तव्य, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राषन, चूड़ाकरण, ब्रह्मचारी के कर्तव्य, गुरुकुल-वास के नियम, ब्रह्मचर्य विधि, असपिण्ड कन्या से विवाह, चारों वर्णों का भार्या-परिग्रह, विवाह के आठ प्रकार, ब्राह्मादि विवाह फल, सवर्णाविवाह विधि, युग्म तिथि में पुत्रोत्पति, कन्या विक्रय दोश, पिण्डदानादि विधि, तर्पण फल, ब्रह्मचर्य गार्हस्थ्य काल इन्द्रियार्थ आसक्ति निशेध, वय-कुल के अनुरूप आचरण, रजस्वला गमनादि निशेध, नग्न स्नानादि निशेध, रात्रि में तिल भोजन और नग्न षयन निशेध, षूद्र से व्रत कथनादि निशेध, आचार प्रषंसा, यम नियम श्रद्धा-दान का फल, असत्य कथन निन्दा, मृत्यु विषयक प्रश्न, वृथा मांसादि निषेध, आचमन विधि, स्त्री धर्म कथन,
पर-पुरुष गमन निन्दा, वानप्रस्थाश्रम, अथितिचर्या, महाप्रस्थान, राजधर्म, प्रजारक्षण, न्यायवर्ती राजा की प्रंशसा, प्रजारक्षण, काम-क्रोधादि त्याग, सन्धि विग्रह काल, सैन्य प्रशिक्षण, उदासीन गुण, न्यायालय प्रवेश, असत्य कथन दोष, सीमा विवाद स्थल, स्त्री-पुरुष पशु आदि का हरण, दासों के सत्रह प्रकार, स्त्री रक्षा, व्यभिचार प्रायश्चित, कुपुत्र निन्दा, द्विजाति के श्रेष्ठ कर्म, परधर्म जीवन निन्दा, द्विज वर्ण कथन, राज्याधिकार, पंचमहापातक, प्रायश्चित, पापानुताप, निन्दा, तप, वेदाभ्यास, त्रिदण्डी परिचय, पाप से कुत्सिता गति, धर्मज्ञ लक्षण आदि अनेक विषयों पर प्रकाश डाला गया है। ‘लोकानां तु निवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरूपाधतः। ब्राह्मणं क्षत्रियं वैष्यं षूद्रं च निरवर्तयेत्।।’ (31/अध्याय- एक) अर्थात लोकों की वृद्धि के लिये प्रभु ने मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, जंघा से वैष्य एवं चरण से षूद्र उत्पन्न किये। ‘एकमेव तु षूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिषत्। एतेशामेव वर्णानां सुश्रुशामनसूयया।।’ (91/अध्याय- एक) 
अर्थात षूद्र के लिये प्रभु ने एक ही कर्म का आदेष दिया कि वह उक्त तीनों वर्णों की सेवा ईर्श्या छोड़ कर करें।

‘स्वभाव एश नारीणां नराणामिह दूशणम्। अतोर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपष्चितः।।’ (213/अध्याय- दो) अर्थात स्त्रियों का स्वभाव पुरुशों को दूशित करने वाला होने के कारण युवतियों के प्रति ज्ञानी पुरुश असावधान नहीं रहते।
‘षूद्रैव भार्या षूद्रस्य स च स्वा च विषः स्मृते। ते च स्वा चैव राजष्च ताष्च स्वा चाग्रजन्मनः।।’ (13/अध्याय- तीन) अर्थात षूद्र की भार्या षूद्र होती है, वैष्य अपनी सवर्णा और षूद्रा से, क्षत्रिय अपनी सवर्णा, वैष्य और षूद्रा से तथा ब्राह्मण चारों वर्ण की कन्याओं से विवाह कर सकता है। ‘वृशलीफेनपीतस्य निःष्वासोपहतस्य च। तस्यां चैव प्रसूतस्य निश्कृतिर्न विधीयते।।’ (19/अध्याय- तीन) अर्थात षूद्रा के अधर का थूक चाटने वाला ब्राह्मण उसके साथ षयन करके उसके निःष्वास से अपने प्राणों को दूशित करता हुआ सन्तानोत्पादन करता है, उसके उद्धार का कोई प्रतिकार नहीं।
       इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं इस मनुस्मृति में। अतः बाबा साहेब अम्बेडकर साहेब ही क्या एक सामान्य व्यक्ति को भी मनुस्मृति में वर्णित कुछ बातों पर आपत्ति होना स्वाभाविक है। परन्तु यह भी सम्भव है कि मूल ग्रन्थ में ऐसा कुछ न रहा हो जो आज आपत्तिजनक माना जाता है।