Showing posts with label ग़ज़ल. Show all posts
Showing posts with label ग़ज़ल. Show all posts

Sunday, July 10, 2011

तुम्हारे नाम

ग़ज़ल
(तकनीकी नज़र से यह ग़ज़ल गलत हो सकती है. लेकिन दिल ने जब ग़ज़ल लिखना चाहा तो ग़ज़ल के नाम पर चंद हरफों में लिख दिया. अब यह ब्लोगर्स के comments ही कह सकते हैं कि..... )

तुम्हारी यादों का मंजर सीने में दबाये रखा है
मोहब्बत है तुमसे ही राज यह छुपाये रखा है.

वक्त की रेत पर बचे निशां तुमारे  कदमों के
आँखों से चूमा उन्हें पलकों  से ढकाये रखा है.

गुजरा  हो  कोई  लमहा तुम्हें  याद किये बगैर
दिल  की  डायरी पर हिसाब यह 'निल' रखा है.

गुजरे कभी जिस गली, जिन राहों से होकर हम
सज्दे किया उनकोही मैंने मन्दिर समझरखा है.

कश्मे-वादे किये जो  चन्द घड़ियों की सोहबत में
वक्त निभानेका आया तुमने को जुदा रखा है.

'चन्दा-चकोरी' रिश्ते की दुहाई दी कभी तुमने ही
मुड़कर देखोभी तो चांद ने हाल क्या बनारखा है.

हमें रश्क है  अपनी इसी हालात पर सनम मेरे
ज़माने ने बेकार आशमा यूं ही सर पे उठा रखा है.