Sunday, December 12, 2010

ह्यूंद की खातिर

Pahalgam, J&K                                  Photo-Subir
गढ़वाली लोक कथा
                पुरानी बात है. तकनीकी विकास तब नाम मात्र था, संसाधनों की कमी थी किन्तु अभावग्रस्त होते हुए भी लोग सुख, संतोष से गुजारा कर लेते थे. दिन रात मेहनत-मजदूरी से जो मिल जाता लोग उसी के लिए ईश्वर का धन्यवाद करते न अघाते थे, और सुख चैन से रहते.  मनुष्य प्रकृति के नज़दीक थे और प्रकृति उनकी सहचारिणी.
             गढ़वाल के एक गाँव में एक दम्पति रहता था. सगे-सम्बन्धी गाँव में थे किन्तु अकेला भाई होने के कारण वह एक अकेले मकान में रहता था. छल-कपट रहित दम्पति जैसे तैसे अपना गुज़ारा कर लेते थे. पति गाँव में उठने बैठने और सभी कामों में शरीक होने के कारण दुनियादारी जानता था किन्तु पत्नी अत्यंत भोली और दूसरों पर सहज ही विश्वास कर लेने वाली  थी. पहाड़ों में गर्मी का मौसम जहाँ आनंददायी होता है वहीं सर्दियाँ कष्टकारी. और अभाव में गुज़र बसर कर रहे लोगों का तो...... परन्तु पक्षी भी आने वाले समय को भांपते हुए अपनी व्यवस्था कर लेता है फिर इन्सान क्यों नहीं कर सकता. यह दम्पति भी जो थोड़ा बहुत बच जाता उसे सम्भाल कर रखते -जलावन लकड़ी, गरम कपडे, कम्बल, घी आदि. सर्दियों के लिए जो जो इकहट्टा करते पति अपनी पत्नी को अवश्य बताता कि यह ह्यूंद (शीतकाल) की खातिर है. विडम्बना यह थी कि पत्नी दूसरे मुल्क की थी और बहुत सारे शब्दों का अर्थ वह नहीं समझ पाती थी. ह्यूंद का अर्थ भी वह नहीं समझ पाई थी और न ही अपने पति को पूछ पाई. पर उसके मन में यह जरूर था कि ह्यूंद उसके पति का कोई अज़ीज़ है जिसके लिए वह इतना इकहट्टा कर रहा है.
                           इस बात को उनके गाँव का एक धूर्त व्यक्ति जान गया था कि पत्नी ह्यूंद का अर्थ नहीं जानती है और वह मौके की तलाश में रहने लगा. एक दिन पति किसी काम से दूसरे गाँव गया तो इस धूर्त व्यक्ति को मौका मिल गया. थोड़ी वेश भूषा बदल कर वह इस भोली स्त्री के पास पंहुचा और वह सब सामान मांग बैठा जो उसके पति ने ह्यूंद की खातिर रखा था. स्त्री के यह पूछने पर कि वह कौन है तो वह बोल बैठा कि- "मुझे नहीं जानती?  मै ही तो ह्यूंद हूँ....." और सारा सामान लेकर वह धूर्त चम्पत हो गया.                                       

8 comments:

  1. सुबीर जी..... आपकी ये लोक कथा पसंद आई। भोले वाले लोगों को
    दुनिया हमेशा ही ठगती आई है। इंसान की ज़िदंगी का ये पहलू
    काफ़ी निराशाजनक है। इस कहानी के लिए आपका आभार।

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  2. सच में कितने भोले थे उस समय लोग .. और आज... क्या कहूँ ...
    बहुत ही भोली प्यारी लोक कथा .... बचपन में बहुत सुनती थी बहुत अच्छा लगता था ...
    यूँ ही लिखते रहिएगा ...
    आप मेरे ब्लॉग पर आते हैं तथा बहुत ही अच्छी बातें लिखते हो ... मुझे बहुत ख़ुशी होती है ... अपने गाँव घरद्वार के लोगों का यूँ परदेश में मिलना बहुत अच्छा लगता है

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  3. धन्यवाद वीरेन्द्र जी,.........इस सफ़र में आप मेरे साथ है, अच्छा लग रहा है........भाई, अच्छा, अच्छा नहीं बल्कि कभी ख़राब भी बोलिए. तभी तो कभी अच्छा भी लिख पाऊँगा ...... ब्लॉग पर आपके articles, followers और comments देख कर लगता है कि आप पुराने "लिखाड़ी" हैं ......... मार्गदर्शन करते रहिये, इस उम्मीद के साथ....

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  4. धन्यवाद कविता जी,..... आपने लोककथा पढी और अच्छा लगा तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है ....... अपने मित्रों को भी इस ब्लॉग से जोड़ सको तो प्रसन्नता होगी...... हौसला बनाये रखने के लिए आभार......

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  5. स्त्री के यह पूछने पर कि वह कौन है तो वह बोल बैठा कि- "मुझे नहीं जानती? मै ही तो ह्यूंद हूँ....." और सारा सामान लेकर वह धूर्त चम्पत हो गया.

    हा ...हा ..हा .....

    बहुत खूब .....
    सुबीर जी खूब कही गढवाली लोक कथा ....!!

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  6. धन्यवाद हीर जी, आपको गढ़वाली लोककथा पसंद आयी.......आभार...... मै समझता हूँ कि सभी समाजों में लोककथाएं है और दंतकथाएं भी........... दन्त कथाओं में काल्पनिकता और अन्धविश्वास अधिक होता है और लोककथाओं में समाज और जनमानस का यथार्त ..........बहरहाल, आप कृपया मार्गदर्शन करते रहिएगा, इसी उम्मीद के साथ........

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  7. "ह्युंद की खातिर ' एक सुंदर लोक कथा..आपके ब्लॉग के माष्यम से पढने को मिली , यकीन मानिये कुछ देर के लिए मनं मस्तिष्क विचरण करने लगा था उन गैल -पातलों में जहां के किस्से- कहानियां और लोक संगीत आज भी मेरे कानों में गूजती हैं, लोक जीवन की अपनी एक अलग ही पहिचान है , वास्तव में देखा जाय तो लोक धुनों में ही जीवन के गीत सुनाई देते हैं ,
    मन को उद्वेलित कर देने वाली इस पोस्ट हेतु आभार.

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  8. dhanyavad bhai Bhakuni jee, lok katha aapko syee....... ap jante hai pratyek lok jeevan me anek kathayen bhari padi hai. parvatiy samaj kuchh jyada hee......bahut kuchh likha jana baaki hai. khair. aabhar.

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