Wednesday, June 22, 2011

माधो सिंह भंडारी: एक शापित महानायक

मलेथा व अलकनंदा का विहंगम दृश्य               छाया: साभार गूगल
                ऐतिहासिक पुरुष वीर माधो सिंह भंडारी का नाम गढ़वाल के घर घर में आज भी श्रृद्धा व सम्मान के साथ लिया जाता है. महाराजा महीपति शाह के शासनकाल में प्रधान सेनापति रहते हुए उन्होंने अनेक लड़ाईयां लड़ी व गढ़वाल की सीमा पश्चिम में सतलज तक बढाई. गढ़वाल राज्य की राजधानी तब श्रीनगर (गढ़वाल) थी और  श्रीनगर के पश्चिम में लगभग पांच मील दूरी पर अलखनंदा नदी के दायें तट पर भंडारी का पैतृक गाँव मलेथा है. डाक्टर भक्तदर्शन के अनुसार "लगभग सन 1585 में जन्मे भंडारी सन 1635 में मात्र पचास वर्ष की आयु में छोटी चीन (वर्तमान हिमाचल)में वीरगति को प्राप्त हुए." उनके गाँव मलेथा में समतल भूमि प्रचुर थी किन्तु सिंचाई के साधन न होने के कारण मोटा अनाज उगाने के काम आती थी और अधिकांश भूमि बंजर ही पड़ी थी.  भूमि के उत्तर में निरर्थक बह रही चंद्रभागा का पानी वे मलेथा लाना चाहते थे किन्तु बीच में एक बड़ी पहाड़ी बाधा थी. उन्होंने लगभग 225फीट लम्बी, तीन फिट ऊंची व तीन फिट चौड़ी सुरंग बनवाई किन्तु पानी नहर में चढ़ा ही नहीं. किवदंती है कि एक रात देवी ने स्वप्न में भंडारी को कहा कि यदि वह नरबली दे तो पानी सुरंग पार कर सकता है. किसी अन्य के प्रस्तुत न होने पर उन्होंने अपने युवा पुत्र गजे सिंह की बलि दी और पानी मलेथा में पहुँच सका. मृत्यु के बाद गजे सिंह की आत्मा का प्रलाप निम्न कविता में अभिव्यक्त है.
भंडारी द्वारा निर्मित सुरंग                               छाया: साभार गूगल
तुम तो वनराज की उपाधि पा चुके पिता 
किन्तु मै तो मेमना ही साबित हुआ. 
लोकगीतों के पंखों पर बिठा दिया
तुम्हे जनपद के लोगों ने,
इतिहास में अंकित हो गयी तुम्हारी शौर्यगाथा.
और मै मात्र- एक निरीह पशु सा,
एक आज्ञाकारी पुत्र मात्र- त्रेता के राम सा.
छोड़ा जिसने राजसी ठाठबाट,
समस्त वैभव और सभी सुख.
और मैंने,
आहुति दे डाली जीवन की तुम्हारी इच्छा पर. 
मलेथा में माधो सिंह भंडारी स्मारक                 छाया: साभार गूगल
क्या राम की भांति
मेरा भी समग्र मूल्यांकन हो पायेगा?

ऐसी भी क्या विवशता थी पिता,
ऐसी भी क्या शीघ्रता थी 
मै राणीहाट से लौटा भी नहीं था कि
तुमने कर दिया मेरे जीवन का निर्णय.
सोचा नहीं तुमने कैसे सह पायेगी
यह मर्मान्तक पीड़ा, यह दुःख 
मेरी जननी, सद्ध्य ब्याहता पत्नी
और दुलारी बहना.
क्या कांपी नहीं होगी तुम्हारी रूह,
काँपे नहीं तुम्हारे हाथ 
मेरी गरदन पर धारदार हथियार से वार करते हुए,
ओ पिता,
मै तो एक आज्ञाकारी पुत्र का धर्म निभा रहा था 
किन्तु तुम, क्या वास्तव में मलेथा का विकास चाहते थे
या तुम्हे चाह थी मात्र जनपद के नायक बनने की ?

और यदि यह सच है तो पिता मै भी शाप देता हूँ कि
जिस भूमि के लिए मुझे मिटा दिया गया- उस भूमि पर
अन्न खूब उगे, फसलें लहलहाए किन्तु रसहीन, स्वाद हीन !
और पिता तुम, तुम्हारी शौर्यगाथाओं के साथ-
पुत्रहन्ता का यह कलंक तुम्हारे सिर, तुम्हारी छवि धूमिल करे !!



11 comments:

  1. और यदि यह सच है तो पिता मै भी शाप देता हूँ कि
    जिस भूमि के लिए मुझे मिटा दिया गया- उस भूमि पर
    अन्न खूब उगे, फसलें लहलहाए किन्तु रसहीन, स्वाद हीन !
    और पिता तुम, तुम्हारी शौर्यगाथाओं के साथ-
    पुत्रहन्ता का यह कलंक तुम्हारे सिर, तुम्हारी छवि धूमिल करे !!
    बेटे की व्यथा का मार्मिक चित्रण ....

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  2. मार्मिक अभिव्यक्ति ....... आभार !

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  3. उफ़!!!!कितनी मार्मिक रचना है...अगर ये सच है तो ये सच कितना क्रूर और घिनौना है...

    नीरज

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  4. मार्मिक अभिव्यक्ति ......

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  5. तुम तो वनराज की उपाधि पा चुके पिता
    किन्तु मै तो मेमना ही साबित हुआ......
    bahut hi marmik kahani.nischit tour pr madho singh bhandari ek maha shapit nayak hi the,apne swarth hetu putr bali??????????

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  6. बहुत सुन्दर, कभी बड़ी कविताओं से समय निकाल कर बाल साहित्य पर आयें।

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  7. माधो सिंह मलैथ का नाम गानों में सुना था, आज आप ने पूरी कहानी पढादी धन्यवाद|

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  8. माधो सिंह भंडारी जी के बारे में रोचक जानकारी हेतु आभार. माधो जी और उनके पुत्र के बारे में कवियौं और लेखकों की कल्पना अलग अलग हो सकती है. दोनों का कठिन त्याग था और वर्तमान में हम अहसास ही कर सकते हैं. मलेथा के लोग उन्हें कितना जानते और सम्मान करते हैं ये देखने वाली बात है.

    मेरी रचना का एक अंश:

    उत्तरखंड की शान छै तू, उत्तरखंड की शान छै,

    वीर भडु की भूमि मा, जन्म लीक महान छै......

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  9. माधो सिंह भंडारी जी के बारे में रोचक जानकारी हेतु आभार. माधो जी और उनके पुत्र के बारे में कवियौं और लेखकों की कल्पना अलग अलग हो सकती है. दोनों का कठिन त्याग था और वर्तमान में हम अहसास ही कर सकते हैं. मलेथा के लोग उन्हें कितना जानते और सम्मान करते हैं ये देखने वाली बात है.

    मेरी रचना का एक अंश:

    उत्तरखंड की शान छै तू, उत्तरखंड की शान छै,

    वीर भडु की भूमि मा, जन्म लीक महान छै......

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  10. माधो सिंह भंडारी जी के बारे में रोचक जानकारी हेतु आभार. माधो जी और उनके पुत्र के बारे में कवियौं और लेखकों की कल्पना अलग अलग हो सकती है.दोनों का त्याग कठिन था और वर्तमान में हम अहसास ही कर सकते हैं. मलेथा के लोग उन्हें कितना जानते और सम्मान करते हैं ये देखने वाली बात है.

    मेरी रचना का एक अंश:

    उत्तरखंड की शान छै तू, उत्तरखंड की शान छै,

    वीर भडु की भूमि मा, जन्म लीक महान छै......

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